
अतिथि -4
माधव के इस अप्रत्याशित सवाल पर सभी अचकचा कर उसे देखने लगे।
कुछ देर पहले तक माधव में अपने भावी दामाद को देखने वाली सुलोचना अचानक अपनी पुत्री के किसी अनजान युवा के साथ अकेले बाहर जाने को लेकर सजग हो उठी..
सुलोचना ने विनोद की तरफ देखा, वो वैसा ही निर्लिप्त बैठा था..
एक ये आदमी है, बगल वाले घर पे आतंकवादी हमला भी हो जायेगा न, तब भी ऐसे ही तटस्थ बैठे रहेंगे।
ये नहीं कि टोक दे लड़के को.. मन ही मन सोचती सुलोचना अभी कुछ जवाब दे पाती कि केदार ने ही अपने बेटे को अनुमति दे दी..
“हाँ जाओ, घूम आओ ! अब तो इसी शहर में रहना है !”
“अरे पापा इंटरव्यू में सेलेक्शन तो होने दीजिये, अभी तो बहुत सीढियाँ बाकी है !”
माधव ने बहुत शांति से कहा, लेकिन उसकी बात के पीछे छिपी उसकी खीझ डिंकी के साथ साथ वहां बैठे बाक़ी लोगो को भी समझ आ गयी..।
डिंकी अपना छोटा सा बैग लेकर चली आयी..
“चले ?” उसी ने आगे बढ़ कर माधव से पूछा और माधव चुप चाप अपने बालो पर एक बार हाथ फेर कर खड़ा हो गया..
डिंकी के पीछे वो भी बाहर निकल गया..
उनके निकलते में सुलोचना दरवाज़े पर चली आयी..
“सुबह जल्दी आ जाना लाड़ो !” भीगी सी आवाज में वो बोल पङी।
दिन रात बेटी में सौ अवगुण देखने वाली माँ का दिल बेटी से रात भर की भी जुदाई सोच कर कलपने लगा था..
पता नहीं जब ससुराल जाएगी तब कैसे रह पाउंगी इसके बिना ! जब तक सीढ़ियों पर वो दोनों दिखते रहे सुलोचना उन्हें देखती रही..
“तुम भी खाना खा लो.. !”
विनोद ने ही उसे आवाज़ लगायी..
“भाभी यहीं परोस लाइए खाना.. मैं तो इतनी देर से कह रहा, हमारे साथ ही भोजन लीजिये पर पता नहीं आप औरतो को हम मर्दो को पहले खिला कर खाने में क्या सुकून मिलता है !
माधव की माँ भी ऐसी ही है.. पहले मुझे खिलाएगी तब खुद खायेगी !”
“भाई साहब माधव का एक छोटा भाई भी है न ?”
“हाँ इससे चार साल छोटा है, लेकिन उसका पढ़ने लिखने में दिल नहीं लगता ! घिस तिस कर कॉलेज पहुंचा है..
माधव हमारा, पढ़ने में बहुत होशियार है, बारहवीं के बाद तुरंत ही सरकारी कॉलेज में एडमिशन मिल गया..
पता नहीं इसकी माँ की ज़िद है कि सरकारी नौकरी में ही लड़का जाए, बस इसी लिए झींक रहा..
दो तीन जगह के इम्तिहान दे चुका, बस यही इंटरव्यू में आकर अटक जाता है !”
“चिंता मत कीजिये भाई साहब , इस बार हो जायेगा !”
“हाँ उम्मीद तो है.. इस सब में भी जान पहचान बहुत चलती है न.. पीडब्ल्यूडी में वरिष्ठ अभियंता के पद पर बिट्टो के नन्दोई के कोई मित्र काम करते है.. बिट्टो ने ही कहा भैया एक बार बात कर के देखिये, हो सकता है बात बन जाए !”
“अरे वाह, ये तो बढ़िया बात है ! वैसे आजकल बिट्टो रहती कहाँ है, ससुराल तो कासगंज थी न उसकी ?”
“हाँ ससुराल कासगंज है, पर जमाई बाबू सहारनपुर में नौकरी में थे, अभी फ़िलहाल बरेली में है..।
उसके भी दोनों बच्चे बड़े बड़े हो गए.. मुझसे चार पांच साल की छोटी थी, लेकिन लड़की थी इसलिए अम्मा ने ज़िद कर के उसकी शादी मुझसे पहले करवा दी थी..
अब तो उसकी बडी बिटिया ब्याह लायक हो गयी है.. हो सकता इन सर्दियों में ब्याह भी दे वो !”
“बहुत बढ़िया.. बच्चे कितने बड़े हो जाते है न, पता भी नहीं चलता !” विनोद को ज्यादा बातें बनाना नहीं आता था, वो एक कुशल श्रोता ही था..।
कभी पत्नी की सुनता, कभी बच्चो की, तो कभी दोस्तों की !
उन दोनों की बातों के बीच अपना खाना ख़तम कर सुलोचना रसोई समेटने चली गयी…
रसोई समेटते हुए उसके दिमाग में डिंकी ही घूम रही थी..
इधर सीढ़ियां उतर कर दोनों लोग रोड पर उतर आये..
माधव चुपचाप डिंकी के साथ चल रहा था.. डिंकी ने एक बार उसकी तरफ देखा वो कुछ खोया सा लगा। डिंकी वापस सामने मुड़ गयी, लेकिन माधव को इस बात का आभास हो गया..
“कहाँ है घर ?” माधव ने चुप्पी तोड़ी
“बस सोसाइटी के बाहर ये जो दूसरी गली है न, वही चौथा घर है !”
हाथ बढ़ा कर सामने दिखाते हुए डिंकी ने जवाब दे दिया.. दोनों फिर चुप हो गए..
कुछ देर में ही दोनों डिंकी की सहेली के घर के सामने थे..।
गेट के पास से ही माधव बिना कुछ बोले वापस मुड़ गया.. डिंकी की दोनों सखियाँ उस समय बाहर बगीचे में ही थी, दोनों लपक कर डिंकी के पास पहुँच गयी…
“ओये होये! कौन था ये हैंडसम ?”
डिंकी को कुहनी मार कर सुषमा से पूछा..
“अबे कोई नहीं यार.. !”
“अच्छा, भूत है क्या.. ?
मुझे तो दिख रहा, तुझे नहीं दिखा..? देख गम्मो आजकल के भूत कितने जानलेवा दिखने लगे है !”.सुषमा ने वापस डिंकी को छेड़ दिया और डिंकी ने चिढ कर जवाब उसके मुहं पर फेंक के मारा..
“पापा के एक दोस्त है केदार चाचा, उन्हीं का लड़का है.. कल कहीं इंटरव्यू है इसका.. बस दोनों लोग आज घर आये है.. वही रुकेंगे !
मैं तो जान बचा कर निकल आयी !”
“ज़माना क्या जाने छुपी सी मुहब्बत क्या होती है…
क्या ही समा होता है जब दो दोस्तों की छनती है..
अल्लाह की मेहर होती है जो दोस्ती रिश्तेदारी में बदले
एक का बेटा दूल्हा, दूजे की बेटी दुल्हन बनती है.. !वाह वाह। “
सुषमा की इस फूहड़ शायरी को सुन गरिमा वाह वाह कह उठी.. और डिंकी सर से पैर तक जल कर रह गयी..
“अब अंदर चले या यहीं रात बितानी है ?” डिंकी ये बोल कर अंदर जाने लगी कि गरिमा ने टोक दिया..
“रुक न, हम लोगो को यही पास में दुकान है न, वहाँ जाना है.., चल वहाँ से आ जाते है !”
“क्यों, क्या लेना है ?”
“बस चिप्स और कोल्डड्रिंक्स.. यार मूवी देखते हुए चिप्स खाने का मज़ा ही अलग है !”.
डिंकी ने मुस्कुरा कर हामी भरी और तीनो सखियाँ झूमती झामती गुमटी की तरफ निकल गयी..
गली के बाहर ही एक ठीक ठाक सा जनरल स्टोर था, हालाँकि वहीँ से मेन रोड जुड़ती थी, इसलिए ठीक बाजु में पान की गुमटी भी थी..
तीनो आपस में बतियाती चली जा रही थी, तभी सुषमा का ध्यान गुमटी पर बैठे सिगरेट फूंकते माधव पर चला गया..
वो एक स्टूल पर बैठा अपने दोनों घुटनो पर हाथ टेके ज़मीन को घूरता हुआ सिगरेट फूंक रहा था..
“ए… ए.. !”
“क्या… क्या ए ए लगा रखा है !”
“डिंकी, देख न.. तेरे अंकल का लड़का फूंक रहा है ! देख वहां !”
डिंकी ने आंखे छोटी कर के ध्यान से देखा..
“हाँ यार.. ये तो वो ही है.. अच्छा तो इस लिए जनाब मुझे छोड़ने निकले थे, असल में इनको तलब लगी थी, पर बाहर निकलने का बहाना नहीं मिल रहा था..
चल जरा इसकी खबर ली जाए !”
“छोड़ यार डिंकी, जाने दे न.. उसकी अपनी लाइफ है.. ग्रास फूँके या सुट्टा, हू केयर्स ?”
“आई डू !” डिंकी उछल कर माधव के सामने जाकर खड़ी हो गयी.. माधव की नजरे नीचे ही देख रही थी… अचानक उसकी नजर एक जोड़ी पतले पतले पैरों पर पड़ी, जिनमे गुलाबी रंग के स्नीकर्स थे..
उन जूतों से नजर ऊपर ले जाते हुए धीरे से माधव ने ऊपर देखा और सामने खड़ी डिंकी को देख हड़बड़ा गया
“अरे.. तुम ? यहाँ कैसे ?”
डिंकी माधव की खबर भले ही लेने आयी थी, लेकिन उसकी लाल आंखे देख वो कुछ कह नहीं पायी, उसका सारा उत्साह तिरोहित हो गया..
वो खुद भी हड़बड़ा गयी..
“आप यहाँ कैसे ?” सिगरेट पर एक साथ ही माधव और डिंकी की नजर टिक गयी.. माधव ने तुरंत सिगरेट फेंक दी..
दोनों एक बार फिर चुप खड़े रह गए, उन दोनों को देखती उनसे थोड़ा दूर खड़ी सुषमा और गरिमा भी चुप खड़ी थी..
सुषमा ही धीरे से आगे बढ़ी..
“”डिंकी.. चले ?” उसने पूछा और जैसे ही डिंकी ने उसकी तरफ देखा, सुषमा ने उसे इशारे में माधव से परिचय करवाने को कहा..
डिंकी कुछ जवाब दे पाती, उसके पहले ही माधव पलट गया और सुषमा की तरफ देखने लगा, उसके देखते ही सुषमा उसे देख कर मुस्कुरा उठी..
“हाय !”
“हैलो !” माधव ने जवाब दिया..
डिंकी को औपचारिकता निभानी पड़ी..
“ये मेरी दोस्त है सुषमा और ये गरिमा ! और ये केदार अंकल के बेटे है !”
डिंकी को माधव का नाम नहीं पता था, इसलिए चुप रह गयी..
सुषमा ने अपना परिचय सुनाने के साथ ही अपना हाथ बढ़ा दिया..
उसका बढ़ा हुआ हाथ देख उसके बचपने पर माधव को हंसी आ गयी.. उसने आगे बढ़ कर सुषमा का हाथ थाम कर ज़ोर से हिला दिया..
“मेरा नाम माधव है !” मुस्कुरा कर सुषमा और गरिमा को देखने के बाद उसने डिंकी को देखा..
“ठीक है, मैं चलता हूँ !”
डिंकी ने गर्दन हिला दी और अपनी सहेलियों को देख चलने का इशारा कर दिया..
वो लोग साथ साथ ही आगे बढ़ रहे थे कि माधव ठिठक गया..
“डिंकी.. सुनो इस बारे में घर पर किसी से कुछ बताना मत.. पापा भी नहीं जानते !”
डिंकी ने चुपचाप हामी भर दी..
“मैं स्मोकर्स नहीं हूँ। बस कभी जब बहुत टेंशन हो जाये तब.. कल के इंटरव्यू की टेंशन हो रही..।
मेरे लिए और खास कर पापा के लिए ये जॉब बहुत ज़रूरी है। पता नहीं कल क्या होगा, बस यही सोच कर…
यूँ ही.. !”
वो चुप हो गया..
लेकिन उसकी इस बात के बाद एक अजीब सा भारीपन उन लड़कियों पर भी तारी हो गया…
जैसे उसकी पीड़ा उन तीनो के अंदर बहने लगी थी। अपने पिता कि ज़िम्मेदारियों को उठाने के लिए लालायित ये तरूण अचानक ही उन तीनो को सुपर हीरो सा लगने लगा था।
डिंकी का मन किया माधव के सामने आकर उसे रोक कर कह दे, कि वो कभी किसी से कुछ नहीं कहेगी, आज अभी वो इस बात को भूल भी गयी कि उसने क्या देखा, लेकिन वो कुछ बोल नहीं पायी..
चुपचाप चारों चलते रहे,सुषमा के घर का मोड आते ही तीनो लड़कियाँ उधर मुड़ गयी और उदास सा माधव आगे बढ़ गया..
क्रमशः

सिगरेट पीना बुरी बात है, रोज रोज तो बिलकुल नहीं पीना चाहिए, माधव क्यूं पी रहा था, उत्सुकता बनी रहेगी, कॉमिक टाइमिंग पढ़ के मज़ा आ गया…💐
Jindgi me kitni tension hai na jo kabhi khatam hone ka naam hi nahi leti
Kuch banene kaa pressure bahut jyada hoga hai. Agar aap much ban gate toh thik varna log jeene nahi dete.
ये उम्र ही ऐसी है ना खुल कर अपने भावो को रख पाते है और ना ही छुपा पाते है..
माधव का हाल भी यही है अंजान शहर में किससे कहे अपने मन की
Bahut sundar Uttam bhag di, rochakta bani rhi, Madhav ki ghabrahat ekdum real hai aur teenage group ka reaction v…💐🙏
Very very nice part 👌👌
Bahut sundar
Very interesting and lovely part
👌👌👌👌
Very nice part of the story and very interesting too