
अपराजिता -157
उधर अपार्टमेंट की लिफ़्ट में चढ़ कर मानसी भी यही सोच रही थी..
“कैसी अजीब बात है.. ना मैंने उस का नाम पूछा ना उसने मेरा.. खैर ठीक भी है.. जब अब कभी मिलना ही नहीं तो नाम ही पूछ कर क्या हो लेना था !”
लिफ़्ट खुली और वो अपने फ़्लैट तक भारी कदमो से बढ़ गयी.. ये क्या हो गया था उसे..
क्या सिर्फ एक नजर में भी कोई इतना अच्छा लग सकता है… कैसी भीनी सी मुस्कान थी उसकी, उज्वल दंतपंक्ति और मुस्कुराने पर एकदम बच्चो सा भोला भाला मासूम लगता चेहरा..!
एक तरफ के गाल पर गहरा गड्ढा भी बन रहा था…
आँखों पर चश्मा चढ़ा था, और उन चश्मों के भीतर से गहरी गहरी आँखे उसे देख रही थी..
पल भर को वो एकदम से मायूस हो गयी.. अब क्या सच में वो घर पर आये मेहमानों से खुले दिल से मिल पायेगी..?
भारी मन और कदमो से वो दरवाज़े की तरफ बढ़ गयी.. उसने बेल बजायी और झट से दरवाज़ा खुल गया..
“आजा बेटा.. जा जल्दी से कपड़े बदल कर आ जा !”
उसकी माँ ने कहा और एक नजर कमरे में बैठे अतिथियों पर डाल कर वो अंदर अपने कमरे में चली गयी.. इतने लोगों में उसे बस लड़के की माँ ही नजर आयी और वो हल्के से सर झुका कर अंदर चली गयी….
मानसी की माँ भी पीछे पीछे अंदर चली आयी..
“फटाफट कपड़े बदल ले और जल्दी से बाहर आ जा, समझी ?”..
“हम्म !” मानसी का अब मन तो नहीं लग रहा था, लेकिन जाना तो था इसलिए चुपचाप वॉशरूम में घुस गयी..
कपड़े बदल कर उसने एक सिम्पल सा कुरता निकाला और पहन कर गीले बालों को सुलझा कर बाहर चली आयी..
बाहर बहुत लोग बैठे थे.. वो चुपचाप आकर एक तरफ बैठ गयी..
धीरे से उसने आँखे उठायी और सामने बैठे लोगो की तरफ देखने लगी..
एक एक को देखते हुए उसकी नजर अचानक ठिठक कर मानव पर रुक गयी..।
अरे ये लड़का यहाँ कैसे ?
कहीं ये ही तो मुझे देखने नहीं आया..
मानसी के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान चली आयी…
वो उस समय मानव की तरफ ही देख रही थी, मानव भी मुस्कुरा उठा..
“मानसी ये तिवारी जी है, और ये हैं इनकी बहन के बेटे सागर शुक्ला !” उसके बगल में बैठी उसकी माँ ने उसे एक दूसरे लड़के की तरफ इशारा कर दिया…
वो चौंक कर उस तरफ देखने लगी..
मानव के ठीक बगल में सागर बैठा था.. वो भी उसे देख कर मुस्कुरा रहा था !
मानसी के चेहरे पर इस बार मुस्कान नहीं आ पायी..
उसने चुपचाप सर झुका लिया..
“मानसी आप लोग आपस में बात-चीत कर लो बेटा.. ऐसा करो सागर को अपना टेरेस गार्डन दिखा दो !”
मानसी का मन नहीं था, लेकिन उसके पास और कोई उपाय भी नहीं था.. वो खड़ी हो गयी, उसके साथ ही सागर भी खड़ा हो गया..
” ले बेटा चाय की ट्रे भी पकड़ ले, तुम दोनों ऊपर ही चाय पी लेना। मानसी की मां ने दो कप चाय ट्रे में रखकर मानसी को पकड़ा दी।
मानसी चुपचाप आगे जाने को मुङी और फिर जाने क्या सोचकर पलटी और बड़ी वाली ट्रे से एक और कप चाय उठाकर उसने रख ली। सागर के बगल में ही बैठे मानव की तरफ उसने देखा और धीरे से बोल पड़ी।
” आप भी चलिए, गार्डन देख लीजिएगा।”
मानव एकदम से चौंक गया। उसे नहीं लगा था कि उसकी बुआ के बेटे सागर के लिए वह जिस रिश्ते को देखने अपनी मां के सौ बार बुलाने पर आ रहा है, वह लड़की वही निकलेगी जिसे उसने कुछ देर पहले लिफ्ट दी थी।
उसका सुबह से ही मन नहीं था, लेकिन उसकी मां जबरदस्ती उसके पीछे पड़ी थी..।
दरअसल सागर के पिता बहुत पहले गुजर चुके थे..।
सागर की माँ ने इसीलिए रिश्ता देखने आने से लेकर शादी हो जाने तक की सारी ज़िम्मेदारी मानव के पिता यानी अपने भाई को सौंप दी थी..।
सागर और मानव अच्छे दोस्त भी थे…
इसलिए मानव की माँ सुबह से मानव के पीछे पड़ी थी कि वो भी लड़की देखने के कार्यक्रम में साथ चले। पर मानव को ये सब चोंचले पसंद ही नहीं आते थे..।
उसे इस तरह की औपचारिकता सख्त नापसंद थी..।
माँ की बात को तो वो शायद उड़ा भी देता लेकिन सागर ने खुद होकर उसे फ़ोन कर दिया था, इसलिए मानव को अचानक दूर्वागंज से वापस निकलना पड़ा था..
मानसी के कहने पर मानव ने एक नजर अपनी माँ की तरफ देखा और उनकी सहमति से उठ खड़ा हुआ।
वो तीनो एक साथ गार्डन के लिए ऊपर चले गए..
ऊपर टेरेस पर मानसी का अच्छा खासा गार्डन बना हुआ था….
काफी सारे पौधे उसने लगा रखें थे.. ऊपर लगी कुर्सियों पर वो तीनो बैठ गए.. ।
मानसी ने उन दोनों की तरफ चाय बढ़ाई और अपनी कप उठा ली..
उसी समय नीचे से घर में काम करने वाली दीदी नाश्ते की ट्रे भी ऊपर ले कर आ गयी..
मानसी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या बोले, सागर भी चुप ही था.. मानव ने ही बात छेड़ दी..
“ये गुलदाउदी है ना ?”..
“हम्म.. !”..
“और ये चमेली है क्या ?”
“नहीं ये मोंगरा है.. खुशबु दोनों ही पौधे में होती है !”
“हम्म.. खुशबु बहुत सुंदर है !”
“बहुत ज्यादा.. मैं तो अक्सर कटोरी में पानी भर कर ये फूल डाल देती हूँ… पूरा कमरा महकने लगता है !”
“हम्म… हमारे यहाँ भी गार्डन है, लेकिन मैं कम ही देख पाता हूँ.. पापा देखभाल करते है। और हफ्ते में एक बार माली आ जाता है !”
“क्यों आपकी हॉबी गार्डनिंग नहीं है ?”
“नहीं मेरी हॉबी तो कुकिंग है.. मुझे अलग अलग जगह की डिशेस बनाना बहुत पसंद है !”
“अरे वाह… वैसे आपका नाम क्या है ?”
“मानव.. और तुम्हारा ?”
“मानसी !” अबकी बार जवाब सागर ने दिया, वो मानसी की तरफ ही देख रहा था..
“मानसी तुम्हारी हॉबी क्या है ?”
“मुझे पौधो से बहुत प्यार है.. गार्डनिंग ही हॉबी है, और कुछ एक दो एनजीओ से जुडी हुई हूँ..।
हम लोग सुदूर ग्रामीण अंचलों में रहने वाले बच्चो के लिए काम करते हैं..।
जो बच्चे पढ़ने नहीं आ सकते, उन्हेँ हफ्ते में दो दिन जाकर पढ़ाना, उनके लिए किताबे पैंसिल और नोटबुक का इंतज़ाम करना, उन्हेँ स्कूली शिक्षा से जोड़ने के लिए और मुख्य धारा में लाने के लिए प्रयासरत है !”
“बहुत बढ़िया !” मानव मानसी की बात से बहुत प्रभावित लग रहा था..
सागर ने उन दोनों की तरफ देखा..
“मुझे तुम दोनों से कुछ कहना था ! स्पेशली मानसी तुम से !”
“कहिये ना !”
“मैं मामाजी के कहने पर आज यहाँ आ तो गया लेकिन मैं इस शादी के लिए तैयार नहीं हूँ !”
मानसी को तो जैसे मन चाही मुराद मिल गयी..
“क्यों सागर ? क्या हुआ ?” मानव ने पूछा
“भाई.. क्या बताऊँ, कहाँ से शुरू करूँ ?”
“शुरू से ही शुरू कर ले भाई.. !”
“हम्म… मैं जब स्कूल में था, उसी समय एक दोस्त थी.. अफेयर जैसी कोई बात नहीं थी, लेकिन दोस्ती अच्छी थी, फिर ट्वेल्थ के बाद वो कहीं बाहर चली गयी.. मैंने इंजीनियरिंग कर ली और उसने भी।
प्लेसमेंट भी हो गया..।
फिर बहुत दिन बाद वापस मिलना हुआ और हम दोनों ही एक दूसरे को देखकर बहुत खुश हुये।
हमारी दोस्ती उतनी ही ताजा थी, जितनी बचपन में।
फिर हमारी बातें होने लगी और हमें भी मालूम नहीं चला कब हमारी दोस्ती प्यार में बदल गई लेकिन…”
“लेकिन… क्या सागर ?”
” लेकिन उसके बारे में मैं मां से बात करता, उसके पहले मानसी का रिश्ता आ गया। अब ये रिश्ता मामा जी लेकर आए थे तो, मैं मना नहीं कर सकता था..।”
“अरे ऐसी कोई बात नहीं है सागर ।”
“जानता हूँ ऐसी बात नहीं है!, मामाजी ने मेरी पढाई से लेकर मेरी जॉब और बाक़ी भी हर वक्त मेरा और माँ का बहुत साथ दिया है। इसलिए उनका और मामी जी का हमारे जीवन में योगदान कभी कम नहीं हो सकता।
बस इसी सम्मान के लिए उन्होंने जब ये रिश्ता बताया तो मैं मां की बात काट नहीं पाया और मां को रूही के बारे में बता नहीं पाया।
रूही की फैमिली पारसी है। हो सकता है मां रूही के लिए ना माने, यह भी हो सकता है कि मामा जी और मामी भी नहीं माने..।
बस दिमाग में यही सब चल रहा था की कैसे सबको मनाऊंगा उसके पहले यह रिश्ते वाली बात हो गई। और मैं यहां आ गया।
मैंने सोचा था कि मानसी तुमसे मिलकर चुपचाप तुम्हें सब कुछ बता दूंगा, और तुमसे ही कहूंगा कि हो सके तो मना कर दो। क्योंकि मुझसे मामा जी का लाया रिश्ता मना नहीं किया जाएगा ।
आई एम सॉरी मानव लेकिन तू भी यहां था नहीं कि तुझे ही सब बता पाता।
तू भी रेशम के पास दुर्गागंज गया हुआ था। बस इसीलिए मुझे अभी मौका मिला ,तुम लोगों को यह सब बताने का।
मानसी तुम्हारा भी दिल दुखाने का या तुम्हें तकलीफ देने का कोई इरादा नहीं था मेरा। तुम समझ रही हो ना मैं क्या कह रहा हूं..?”
“मैं तो बिल्कुल समझ रही हूं, आप जो कह रहे हैं। लेकिन आप इतनी दूर तक आने के बाद यह निर्णय कैसे ले रहे हैं ?
मतलब इतना सब होने के बाद हम नीचे जाकर क्या कहेंगे? वहां नीचे तो सब शादी और सगाई की तारीख निकालने में लगे हुए हैं..।”
“फिर मैं क्या करता बोलो ?”
“हम्म, आपकी कोई गलती नहीं है। काश कुछ ऐसा हो जाता कि नीचे मौजूद सारे बड़े लोग भी खुश हो जाते और आप भी दुखी नहीं होते..।”
मानसी की इस बात पर सागर आश्चर्य से उसे देखने लगा।
” लेकिन ऐसा कैसे संभव है? अगर अभी मैं जाकर नीचे रूही के बारे में सबको बताता हूं तो, बाकियों का तो नहीं पता, लेकिन मेरी मां बहुत नाराज हो जाएगी..।”
“एक बात बताइए सागर जी, अगर मुझसे आपकी शादी नहीं होती है, और नीचे मौजूद लोग भी आपसे किसी बात पर नाराज नहीं होते हैं, तो फिर आप अपनी मां को रूही से शादी के लिए कैसे मनाएंगे..?”
“अगर तुमने सब को मना लिया कि शादी तुम नहीं करना चाहती हो, तब मैं रूही के लिए माँ को मना लूंगा !”
मानसी ने मानव की तरफ देखा..
” लेकिन मेरे लिए भी ऐसे बोलना जरा मुश्किल होगा। मतलब मैं ऐसा क्या कारण बता कर इस शादी के लिए मना कर सकती हूं सागर जी?
क्योंकि आपके पास तो एक वाजिब कारण भी है, लेकिन मेरे पास तो ऐसा कोई कारण नहीं, जिसका नाम लेकर मैं बोल दूं कि मैं इनसे शादी करना चाहती हूं, इन से नहीं!”
मानसी ने बोलते समय मानव की तरफ देखा.. और सागर ने उन दोनों की तरफ..
“मानव यार एक काम क्यों नहीं करते? तुम दोनों रिलेशन के बारे में क्यों नहीं सोच लेते..? देखो कितनी सुंदर जोड़ी लग रही तुम्हारी.. !”
मानव चौंक कर मानसी की तरफ देखने लगा और मानसी हलके से मुस्कुरा उठी..
“लेकिन ऐसे कैसे.. मानसी ने हिचकते हुए कहा..
” क्या ऐसे कैसे? मैं भी तो अरेंज मैरिज के लिए ही तुम्हें देखने आया था ना ? समझ लो मेरी जगह मानव आया है। और मानव का भी जितना मैं जानता हूं कोई अफेयर नहीं है। इसकी भी शादी की उम्र हो चुकी है। दो एक साल बाद वह भी निकल जाएगी। इसलिए टाइम रहते यह भी शादी करके घर बसा ले, तो बेहतर होगा। क्यों मानव सच कह रहा हूं ना मैं..?”
मानव को वैसे भी मानसी पसंद आ गयी थी..
“अब मैं क्या बोलूं, जैसा इन्हें ठीक लगे।”
मानव ने मानसी की तरफ देखकर इशारा कर दिया। मानसी कुछ सोचने की मुद्रा में इधर-उधर देखने लगी।
” ठीक है आपकी मदद करने के लिए हम ऐसा कर सकते हैं, लेकिन यह बात अगर मैं खुद कहूं तो बड़ा अजीब सा नहीं हो जाएगा कि मुझे यह वाला नहीं यह वाला लड़का पसंद है..।”
“हम्म.. रुको कुछ चक्कर चलाते हैं.. ! तुम दोनों तो कम्फर्टेबल हो ना ?”
मानव और मानसी ने हामी भर दी…
उसके बाद तो सागर ने नीचे जाकर उन सभी को क्या पट्टी पढाई, ये वही जाने लेकिन सब ने खुले ह्रदय से मानव और मानसी का स्वागत किया..।
उसी समय मानव की माँ ने मानसी के आंचल में मिठाई नारियल और कुछ रूपये डाल कर उसके माथे पर तिलक कर दिया..।
एक तरह से रोके की रस्म कर के मानव का परिवार सागर के साथ वापस लौट गया..
हालाँकि ये सब इतनी जल्दी हुआ कि रेशम वहाँ पहुँच ही नहीं पायी..
पंडित जी से मुहूर्त निकलवा कर सगाई और शादी की तारीखे ऐसी ही निकलवाई गयी जिनमे रेशम अपनी नयी जोइनिंग के पहले की छुट्टियों का भरपूर उपयोग कर सके…
आज जब रेशम अपनी पैकिंग कर रही थी तब मानसी से बातें भी करती जा रही थी..
मानसी की अलग तैयारियां चल रही थी और वो अपनी हर तैयारी रेशम को भी बताती चलती थी..
उसका अपना शादी का जोड़ा नहीं आया था, वो बस रेशम के आने का ही इंतज़ार कर रही थी…
रेशम ने फ़ोन रखा ही था कि दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दे दी..
रेशम भाग कर दरवाज़े पर पहुँच गयी..
उसने दरवाज़ा खोला सामने अखंड खड़ा था !
क्रमशः

जीवनसाथी के आगे के भाग कब आएंगे. …..
रब ने बना दी जोड़ी 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻 कहां सागर और मानसी एक होने वाले थे पर जोड़ी बन गई मानव और मानसी की, आखिरकार पहली नजर का प्यार,जीवनभर होगा साथ।
मानव और मानसी के लिए ❤️❤️❤️❤️ बहुत सारा प्यार।
सच ही कहते हैं न कि जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं।यहां तो बस मिलने के बहाने होते हैं।तो कुछ इसी तरह रब की बनाई जोड़ी बन गयी मानव और मानसी की।
अंतरजातीय विवाह ही आज भी प्रचलित नहीं तो फिर अन्य धर्म मे तो कदापि आसान न होगा लेकिन अगर सोचो तो मन मिलने के बाद कौन सी जाती कौन सा धर्म शेष रह जाता है ।
मानसी के संग मानव और सागर भी अपने जीवनसाथी के साथ आगे जीवन व्यतीत करने की राह पर बढ़ ही जाएंगे।
अब रेशम के द्वार अखण्ड किस हेतु आया है ..?
Very interesting and Fantastic n Fabulous n Bahtareen part,
Very interesting part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
Ab akhand ko hi kyu akela chhoda hai vaise uska pyar Resham k liye itna gehra aur saccha hai ki koi uske hriday mein baith hi nahin Sakta uske hriday aur dimag per utani use samay ki ghatnaon ki chhap hai ki vah unse kabhi udhar hi nahin Paya but ho sakta hai samay ke sath vah bhi yah kar sake Jaise Resham aage badh gai Dil dimag se dar Nikal Gaya Dhirendra ke khate mein ke sath aur akhand ke sath bhi ho sakta hai aisa hi ho jaaye
Arre bhai mast kar di vapis se बीच में मुझे थोड़ा अजीब सा लगने लगा था but aap best हो
Arrrre mam
Main to Akhand babu ko yaad ki kr rahi thi, or sath mein doctor sahib or bhawna ko bhi , ab Akhand ka kya hoga mam uske dil ka kya ….. plz 🙏 kuch sochna uske liye bhi ..🫣🥰😘🤗😊
Akhand ab kya kehne aaya h resham se …
Manav aur Mansi ki shaadi ka chakkar badhiya tha ….sagar bhi Bach gya aur manav aur Mansi ki shaadi bhi Pucci ho gyi
Wow cute one.