अपराजिता-151

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अपराजिता -151

हममें उस वक्त इतनी ताकत भी नहीं थी कि खुद को बचा सके, हम सोच समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है? फिर पता नहीं हम कब तक बेहोश रहे! और जब हमें होश आया तो हमने अपने आप को लाल बंगले में पाया।

हम लाल बंगले के एक कमरे के बिस्तर पर पड़े हुए थे। हमें नहीं पता हम कितने दिन से वहां थे, लेकिन हां जब हमारी आंख खुली तो हमने देखा हमारे हाथों पर कुछ पट्टियां बंधी थी। हमारी नसों में लगे इंजेक्शन से ताकत की दवा हमें दी जा रही थी।

हमारे पास ही लगी कुर्सी पर एक आदमी बैठा था। बैठा क्या था कुर्सी पर आंख मूंद कर सो रहा था। हम उसे देखकर पहचान नहीं पाए।
सोच में पड़ गए कि यह कौन है? और तभी हमारे हिलने डुलने से उसकी आंख खुल गई। हम एक झटके से बिस्तर पर उठ बैठे, लेकिन हमारा सर एकदम से चकरा गया। और वह आगे बढ़कर हमें लेटने के लिए पकड़ने की कोशिश करने लगा।

हम उस पर जोर से चिल्ला उठे,कि वह हमसे दूर रहे।वह थोड़ा सा दूर हो गया। लेकिन उसने हमारी भलाई के लिए हमें आराम करने की सलाह दी।

हमें इतना तो समझ में आ गया था कि इस आदमी ने हमारी मदद की है, लेकिन इसने हमारी मदद की क्यों यह हम नहीं समझ पाए। धीरे-धीरे हमारी तबीयत सुधरने लगी।
हफ्ते में एक बार कहीं दूर से कोई डॉक्टर आता था जो हमें देखकर हमारी दवा लिख जाता था..।

धीरे-धीरे हमें समझ में आने लगा कि वह आदमी हमारा कोई फायदा नहीं उठा रहा। उल्टा हमारी मदद कर रहा है। लेकिन हम नहीं समझ पा रहे थे कि वह हमारी मदद क्यों कर रहा है। फिर एक दिन हमने उससे पूछ लिया कि आखिर हमारी मदद करने के पीछे ऐसी क्या वजह है?

तब उसने बताया कि हमारा जो एक्सीडेंट हुआ था, वह बहुत भयानक था। हमारे सर पर बहुत गहरी चोटें आई थी। इतनी ज्यादा चोट थी कि हम लगभग साल भर तक कोमा में रहे। और उसके बाद हमें होश आया है। हम ये सुनकर आश्चर्यचकित रह गये, क्योंकि कोमा से उठने के बाद भी हम पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए थे। हम बहुत सी बातें भूल गए थे। कुछ बातें याद थी, लेकिन सब कुछ इतना जटिल हो गया था कि हम किन्हीं भी बातों को आपस में जोड़ नहीं पा रहे थे।
यहां तक की अपना नाम छोड़कर हम अपनी पहचान भी बहुत हद तक भूल गए थे। हमें धीरेंद्र का नाम याद था, सान्या का नाम याद था, अपना खुद का नाम याद था। लेकिन हम कहां रहते थे, क्या करते थे, हम यह भूल चुके थे।

और तब उस इंसान ने हमारी बहुत मदद की। उसने धीरे-धीरे हमें हमसे जुड़ी बातें बताना शुरू किया, और यह सब करते हुए भी उसने हमसे कभी कोई उम्मीद नहीं रखी। वह हमसे हमेशा एक दूरी बनाए रखता था। धीरे-धीरे हमें वह इंसान अच्छा लगने लगा। हमने जब उससे उसका नाम पूछा तब उसने अपना नाम दीपक बताया। फिर हमने पूछा कि वह आखिर हमारी मदद क्यों कर रहा है? हमें बेहोशी की हालत में पाकर वह पुलिस स्टेशन पर भी तो छोड़ सकता था। किसी सरकारी अस्पताल में पटक कर भी निकल जाता, तो कोई उससे कोई सवाल नहीं करता।

         फिर आखिर उसने अपने घर पर रखकर हमारा इलाज क्यों करवाया, और तब दीपक ने हमें बताया कि कभी किसी वक्त हमने उसके छोटे भाई पंकज की मदद की थी।
हम सच कहें तो हमें उस वक्त याद नहीं था कि कौन है पंकज?
   और हमने उसकी कब कैसे मदद की? लेकिन दीपक ने हमें सब कुछ बताया और तब हमें धीरे-धीरे याद आया कि हां हम जिस यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे, वहां मेडिकल में एक लड़का था पंकज। जिसकी हमने मदद की थी। उस एक मदद के बदले दीपक हमारी जान बचाने में लगा है..।

यह बात भी हमें बहुत आश्चर्य में डूबा गई। जब हमने उससे कहा कि हम पंकज से मिलना चाहते हैं, तो वह थोड़ी देर के लिए चुप हो गया और फिर उसने बताया कि पंकज को अखंड ने मार दिया है..।

यह खबर सुनकर हमारी आंखें फटी रह गई।
उस समय तक हम भूल चुके थे कि पंकज जिन्दा नहीं है, लेकिन जाने कैसे एक बुरे सपने की तरह हमें एक एक बात याद आती चली गयी..
हमें याद आ गया कि अखंड को पूरी तररह फंसाने के लिए पंकज को धीरेन्द्र ने ही जान से मार देने की प्लानिंग की थी..

हमे एक झटके में ये सब अचानक याद आ गया। लेकिन उस वक्त हम चुप रह गए।
एक तो हमारी याददाश्त हमारे साथ खेल खेल रही थी, और दूसरा हम खुद अभी कुछ वक्त सिर्फ आराम करना चाहते थे। और जानना चाहते थे कि धीरेंद्र ने हमारे साथ इतना बुरा क्यों किया?

बस इसी सब में हमें खुद मालूम नहीं चला कि कब दो से तीन साल बीत गए।
   साथ रहते रहते दीपक और हम एक दूसरे की जरूरत बन गए। दीपक ने बाद में हमें बताया कि उसकी पहली पत्नी उसे छोड़ कर जा चुकी है, और वह भी उसके खराब स्वभाव के कारण।

हम जानते थे दीपक का स्वभाव बहुत खराब था। लेकिन अपने भाई के मरने के बाद उसने अपने गुस्से को काबू में करना सीख लिया था। अब वह अपने गुस्से को जमा करके अखंड से बदला लेना चाहता था। वही अखंड जिससे हम बदला लेना चाहते थे।

एक ही इंसान के दो दुश्मन अब एक हो गए थे।

धीरे-धीरे हमें काफी सारी बातें याद आने लगी थी और तब दीपक ने अपनी पहचान बताई कि वह किसी गांव में रहता है। वहां के किसी बड़े ठाकुर चंद्रभान के साथ मिलकर वह काम करता है, और भी कई सारी बातें उसने बताई।

और इन्हीं बातों के दौरान उसने बताया कि अखंड से बदला लेने के लिए वह क्या-क्या उपाय कर रहा है। हम उसका साथ देने के लिए तैयार हो गये, लेकिन इस सबके साथ ही हम धीरेन्द्र से भी बदला लेना चाहते थे। क्योंकि अखंड ने तो फिर भी हमारे साथ कुछ भी बुरा नहीं किया था, लेकिन धीरेंद्र तो हमें जान से मारने की कोशिश करी थी।

     हम चोरी छुपे धीरेंद्र पर नजर रखने लगे। इसमें भी दीपक ने हमारी काफी मदद की और तब हमें पता चला कि धीरेंद्र ने गीता से शादी कर ली है।गीता विधायक चाचा जी की बेटी थी। हमें सब समझ में आ गया।

एक तरफ पापा की सारी जमीन जायदाद, दोनों हवेलियां सब कुछ धीरेन्द्र के नाम हो चुका था। दूसरी तरफ उसने विधायक चाचा की भी पूरी प्रॉपर्टी हथिया ली थी। हमें समझ नहीं आ रहा था कि गीता ने ऐसी बेवकूफी कैसे की?

वह तो धीरेंद्र को अच्छे से जानती थी। फिर उसने धीरेंद्र से शादी की क्यों?

गीता और धीरेंद्र पर नजर रखते समय हमारा ध्यान सान्या के दोनों बच्चों पर भी चला गया। सान्या के बच्चों को गीता ने बिल्कुल अपने बच्चों की तरह पाला पोसा था, और यह देखकर हमें अंदर ही अंदर यह महसूस होने लगा कि हम कितनी खराब लड़की है।

हमें अपने स्वार्थ के अलावा कभी कुछ नजर नहीं आया। अपना पैसा कमाने के लिए हम इस हद तक पागल हो गए थे कि हमने अपनी सगी बहन को भी नहीं छोड़ा। और यह गीता दूसरों के बच्चों को भी अपने बच्चों की तरह पाल रही थी…

अब हमें समझ में आ चुका था कि अगर हमें धीरेंद्र से बदला लेना है, तो उसके खिलाफ वह सारे सबूत जोड़ने होंगे जो यह साबित कर सके कि धीरेंद्र ने अखंड को झूठे तौर पर बदनाम ही नहीं किया, बल्कि उसके दोस्त गोलू लल्लन और उस मेडिकल वाली लड़की के मर्डर की भी साजिश रची थी।
यह विचार दिमाग में आते ही हमने छुप छुप कर गीता पर नजर रखना शुरू किया…।

और फिर हमने यहां की पुलिस को मुखबीर के माध्यम से खबर दी और किसी तरह गीता तक पहुंचा दिया..।

ये पुलिस वाला स्मार्ट था, और इसे अखंड की बेगुनाही पर पूरा भरोसा था। इसलिए उसने अपने लेवल पर काम शुरू कर दिया। हमारा काम आसान हो गया था। क्योंकि गीता धीरेंद्र के बारे में सब कुछ जानती थी। और हम इतना जानते थे कि अगर पुलिस एक बार गीता तक पहुंच गई तो आधे से ज्यादा किस्सा उन्हें गीता से वैसे ही मालूम चल जाएगा, और उसके बाद जब धीरेंद्र के बारे में धीरेंद्र के घर पर उसके पुराने नौकरों, ड्राइवर और बाकी लोगों से पूछताछ होगी तो हम सब का किस्सा सामने आ जाएगा।

आज हम खुद इस बात की गवाही देने को तैयार है कि धीरेंद्र के मन में प्रॉपर्टी का लालच था, और इसके कारण उसने अपनी दोनों बहनों और जीजा को रास्ते से हटाने की साजिश रची थी। आज यह साबित हो जाता है कि धीरेन्द्र ने हीं सब कुछ किया था।”

मान्या की गवाही के बाद अब और कुछ बाकी ना रहा..
मान्या ने धीरेंद्र को गुनहगार साबित करने के साथ-साथ अपने भी सारे गुनाह कबूल कर लिए।
मान्या खुद भी अखंड का नाम खराब करने की साजिश में शामिल थी। इसके अलावा उसने खुद पर लगे सारे इल्जाम कबूल कर लिए।

लल्लन से उसकी नाराज़गी कुछ ज्यादा ही थी, इसलिए धीरेन्द्र के पीछे पड़ कर उसने लल्लन को भी मरवा दिया था..
लल्लन को मारने के बाद उन लोगो ने युनिवर्सिटी के पीछे के बड़े बगीचे में एक पेङ के नीचे उसकी लाश को गहरा गड्ढा खोद कर गाड़ दिया था …
मान्या की गवाही के बाद पुलिस ने वहाँ खनन कर वहाँ से लल्लन का कंकाल बरामद कर लिया था.

सारी बातें सच सच बताने के बाद मान्या ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया..
दीपक पर भी जो भी आरोप लगे थे सच साबित हो चुके थे! अब दीपक के पास भी भागने का कोई रास्ता नहीं बचा था!

अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए उसने भी जो सब कुछ किया था, वह सब अब उजागर हो चुका था! और उसके पास अपने आप को कानून के हवाले कर देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था..!!

दीपक को भी कटघरे में बुलाया गया और उसने अपना बयान देना शुरू किया..

“हमें अपने छोटे भाई से बहुत उम्मीदें थी..
हमारे पास बाप दादा के दिए खेतों के अलावा और कुछ नहीं था, उन खेतों को अपने खून पसीने से सींचा था हमने… ।
थोड़ा बहुत जोड़ा जाड कर उन खेतो को खूब बढ़ाया भी, लेकिन पंकज की पढ़ाई के लिए हमें उन खेतो को चंद्रभान के पास रेहन रखना पड़ गया..।

हम इतने सालों से चंद्रभान के यहां काम कर रहे थे। हम यह नहीं कहते कि हम बहुत ईमानदार थे, कुछ थोड़ा बहुत पैसों का हेर फेर हमने जरूर किया था, लेकिन हम इतने बेईमान भी नहीं थे, जितनी बेईमानी हमें चंद्रभान ने खुद सिखाई ।

चंद्रभान ठाकुर गरीबों को उनकी जरूरत के वक्त रूपए की मदद करके फिर ब्याज में मोटा रुपया उगाहता था। वही काम उस ने हमारे साथ भी किया। हमें जब पंकज के एडमिशन के लिए रूपयों की जरूरत थी, तब हमने चंद्रभान के सामने हाथ फैलाया।
बाकी गांव वालों से वह ब्याज में मोटा रुपया लेता था, यह अलग बात थी। लेकिन हम तो खुद उसी के लिए काम करते थे। फिर भी उसने हमें बख्शा नहीं, बल्कि हमसे भी उसी दर पर ब्याज की बात कह दी।

शुरुआत में हम तैयार भी हो गए, और हमने उससे रुपए उधार ले लिए। लेकिन पंकज की जरूरते बढ़ती जा रही थी। उसकी फीस भी भरना जरूरी था। बार-बार रूपया उधर लेने में हमें भी दिक्कत आ रही थी। क्योंकि चंद्रभान हम पर चक्रवृद्धि ब्याज के नाम पर पैसा जोड़ता ही चला जा रहा था, और आखिर उस सब से बचने के लिए हमें अपने खेतों का एक हिस्सा उसी के पास रेहन रखना पड़ गया।
   उन खेतों के बदले भी उसने बहुत ज्यादा रुपए नहीं दिये, तब से ही दिमाग में चंद्रभान से नफरत भर गई थी। और कहीं ना कहीं हम उससे बदला लेने का विचार मन में पालने लगे थे…।

बीच-बीच में हम पंकज से मिलने शहर जाया करते थे। और वही हमें मालूम चला कि पंकज का अखंड सिंह परिहार से कोई मसला चल रहा है। हमने पंकज से पूछा और उसने बताया कि अखंड सिंह परिहार हाथ धोकर उसके पीछे पड़ा हुआ है। हमने अपनी तरफ से पंकज को समझाने की कोशिश की, लेकिन जल्दी ही हमें समझ में आ गया कि अखंड एक गुंडा है, और मेडिकल की किसी लड़की के कारण वह पंकज को परेशान कर रहा है।
दो-तीन बार उसने पंकज को इस बुरी तरह से पीटा भी। पंकज के हाथ पैर टूट गए, उसे अस्पताल में भर्ती करवाने की नौबत आ गई। इन सब बातों से बहुत दुखी थे हम।
      हम तो चाहते थे हम वही अखंड का किस्सा ही खत्म कर दें, लेकिन अपने गुस्से पर काबू करके हम लौट गए। वैसे भी हम अपने गुस्से के लिए ही पूरे गांव में बदनाम थे। हमारी पहली पत्नी हमारे स्वभाव के कारण ही हमें छोड़ कर चली गई थी। हम मानते है, हम अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाते और जो दिल में आता है वह बोल जाते हैं, हम अपने मन में कुछ नहीं रखते।
    हां कभी-कभी गुस्सा इतना बढ़ जाता है कि हम सामने वाले पर हाथ भी उठा देते हैं।
बस इन्हीं सब तरह से परेशान होकर हमारी पत्नी भी हमें छोड़कर चली गई थी..।
उसे हमने वापस भी नहीं बुलाया। हम जैसे थे हमें किसी के सहारे की जरूरत नहीं थी..।

हमें पता था कि पंकज के कॉलेज में कुछ परेशानियां चल रही थी। एक बार पंकज के दोस्त का फोन आया कि पंकज को वापस अस्पताल में भर्ती करना पड़ा है। हम भागे दौड़े से अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि इस बंदे अखंड ने फिर से पंकज के साथ मारपीट की है। हमारा इतना खून खौलने लगा कि जाकर अखंड का सीधा खून कर दें, लेकिन पंकज ने हीं हमें रोक लिया। उस रात बड़ी देर तक हम पंकज के साथ बैठे रहे।

उसे छोड़कर लौटने का मन ही नहीं कर रहा था। लेकिन गांव लौटना भी जरूरी था। हम अपनी बाइक निकाल कर वापस गांव लौट गये। सुबह हमारी आंख खुलने से पहले ही खबर आ गई कि पंकज को किसी ने मार डाला है। हम उल्टे पैरों वापस अस्पताल पहुंच गए। हमारे पास हमारा एक ही सहारा हमारा छोटा भाई ही था जो अब हमें छोड़ कर चला गया था, और उसके दोस्तों ने बताया कि अखंड ने ही पंकज को मारा है..।
हम तो उसी समय उस आदमी की जान ले लेते लेकिन अखंड वहां से भाग चुका था..

हम उसकी तलाश में निकलना चाह्ते थे लेकिन पंकज को अकेले नहीं छोड़ सकते थे….।
दो चार दिन बाद जब हमें अखंड को पकड़ने का होश आया तब तक वो पुलिस के हत्थे चढ़ चुका था..
उस पर केस चलने लगा.. हमे लगा इसे फांसी की सजा हो जाये तो अच्छा, लेकिन तीन साल बाद ये छूट कर बाहर आ गया..

तब तक हमारा गुस्सा शांत तो नहीं हुआ था, लेकिन बदले की आग में सिंक कर निखर गया था, और इसलिए हमने इससे बदला लेने का अलग तरीका सोचा..

धीरे धीरे समय बीता और हमें मौका मिल गया..
इत्तेफाक से चंद्रभान की बहन का रिश्ता अखंड के भाई से जुड़ गया.. और तभी हमें चंद्रभान और अखंड दोनों से ही बदला लेने का रास्ता एक साथ मिल गया..।

हम तो चंद्रभान की बहन की बेइज्जती कर के चंद्रभान से बदला लेना चाहते थे, लेकिन वो लड़की इतनी तेज़ थी की कभी हमारे हाथ नहीं चढ़ी..
फिर हमने अखंड के भाई पर ध्यान लगा दिया..

तब तक मान्या भी हमारे साथ आ चुकी थी.. धीरे से उसकी याददाश्त भी वापस आ गयी थी..
उसी ने हमसे कहा अगर अपने छोटे भाई की मौत का बदला लेना है तो अखंड के छोटे भाई को मार दो..
हमें भी लगा ये ही सही होगा, जो दर्द हमने झेला वही दर्द अखंड भी झेले..

इसलिए हमने अखंड के भाई यज्ञ पर गोली चलवा दी.. इससे हमारे दो मनोरथ पूरे हो जाने थे..
यज्ञ के मरने से अखंड जिन्दा लाश हो जाता और दूसरी तरफ अपनी बहन को खाली हाथ घर में बैठे देख चंद्रभान भी जीते जी मर जाता।
लेकिन यज्ञ नहीं मरा…।
और हमारा अखंड से बदला रह गया..।

हम और कुछ सोच पाते उसके पहले पुलिस वालों ने हमारा लाल बंगला ढूंढ़ लिया और हमारे साथ साथ मान्या को भी पकड़ कर ले आये..।
बाकी तो सब, आप सब को पता ही है !”

दीपक के बयान के बाद अब किसी शक शुबहे  की गुंजाईश नहीं बची थी….
हर एक का छिपा हुआ गुनाह बाहर निकल आया था…. चाहे मान्या हो, दीपक हो या धीरेन्द्र…

धीरेंद्र के पापों का घड़ा भर चुका था और अब उसे भी समझ में आ गया था कि कोई भी झूठ अब उसे नहीं बचा सकता..
सारे गुनाह एक-एक कर सिद्ध होते चले गए और आईपीसी की अलग-अलग धाराओं के अंतर्गत धीरेंद्र पर मानव हत्या करने की साजिश, मानव हत्या करवाने की साजिश के साथ ही जालसाजी और धोखाधड़ी जैसे आरोप साबित हो गए!

अलग-अलग धाराओं के तहत लगे आरोपों पर जज साहब ने उसे सजा सुना दी, उसके साथ-साथ उसकी छोटी बहन मान्या और दीपक पर भी केस हुआ और उन्हें भी अलग-अलग आरोपों के अंतर्गत दोषी करार मानकर सजा दे दी गई….

लेकिन कोर्ट द्वारा दी गयी सजा से वहां मौजूद लोग खुश नहीं थे.. खास कर अनिर्वान भारद्वाज !!

क्रमशः

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Yashoda Sharma
Yashoda Sharma
1 year ago

कहा से सुरू किया और कहा पहुंचे,,,,,, ये धन दौलत सच में जो ना करवाएं वो कम।

Savita Agarwal
Savita Agarwal
1 year ago

Puri Ram kahni ki tarah saraya bhad khult gyaAcchi kahani, Waiting for the next part

Upasna Dubey
Upasna Dubey
1 year ago

माँन्या और दीपक की गवाही धीरेन्द्र प्रजापति के गुनाहों के ताबूत की आखिरी कील साबित हुई।
साबित हो गए उंसके सारे गुनाह और उसके एवज में सजा भी सुना दी गयी लेकिन उनकी असली सजा मुकर्रर करेगा अनिर्वान ।
जलन, कुत्सित विचार लालच और स्वार्थ लोगों को अपराधी बनाके ही छोड़ता है और जो इस दलदल में धंसा फीर चाहके भी बाहर नहीं निकल पाता इससे ।
बुरे का अंत बुरा ही होता है ।

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

कौन कहाँ, कितना गुनहगार सब क्लियर तो हो गया पर सज़ा के नाम पर ठेंगा…..गुनाह करने वाले के मन मे कोई खौफ नहीं और झेलने वाले की इन कुछ सालों मे मौत से बुरी ज़िन्दगी हो गई फिर भी शायद यही हमारा क़ानून है पर अनिर्वान के अपने बनाए रुल है वो अपने तरीके से सज़ा देगा ये तो पक्का है पर देखते है आगे क्या होता है..।
लाजबाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।

Neeta
Neeta
1 year ago

💚💛💛💛🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Vandana
Vandana
1 year ago

Anirvaan hi koi sazza tay karega woh bhi apne style me ….

Soma ( J T)
Soma ( J T)
1 year ago

Indian law me aaropi ko sja bahut ajib hi milti h… Victim pr itne atyaachaar ho jate h.. Pr bdle me kuch salo ki sja suna di jati h kya ye shi h..?
Mujhe to ni lgta

Neena
Neena
1 year ago

अंत बुरे का बुरा 👌👌

Meera
Meera
1 year ago

आज गुत्थी सुलझ गई के इतने सालो में क्या क्या हुआ और कोन कहा था , अब तो अनिर्वाण को सजा मंजूर नहीं तो क्या कोई रास्ता निकलेगा ? अनिर्वाण स्टाइल में इन गुनहगारों को सजा दी जाएगी ?
आगे के इंतज़ार में…

Yashita Rawat
Yashita Rawat
1 year ago

Oh wow very interesting. Now all things crystal clear but still Akhand’s whole life destroy although he was innocent. And Resham’s life also affects badly. She was also in trauma for long time. She gets partner like Atharv who not only understand her also stand like a strong pillar with her. Very sweet Atharv .That’s very shame ful and painful that we person never think a while that our one wrong step ruins someones whole life. Ur story is awesome and ur presentation of story is wonderful pyari lekhika ji.