
मायानगरी- 43
अभिमन्यु बस से उतर कर लंबे लंबे डग भरता अपने घर की तरफ बढ़ गया …..
वो अभी गेट खोलने जा रह था कि उसका छोटा भाई अपनी साइकल से ठीक उसके पीछे उतरा ..
” अबे सम्भल के , ऊपर चढ़ा दोगे क्या ?”
विभु ने प्यार से अभिमन्यु की तरह देखा और एक तरफ से सायकल गेट के अंदर घुसा ली….
सायकल रख कर वो वापस पलटकर अभिमन्यु के गले से लग गया अभिमन्यु ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और उसके हाथ में टंगे बैग की तरफ देखने लगा..
” तुम कब से घर का सामान लेने जाने लग गए कॉकरोच..?”
बैग को देख विभु मुस्कुराने लगा..
“रामनगर वाली बड़ी माँ आयी है बैठने, उनके लिए समोसा लेकर आए हैं..”
” ओह नहीं यार !! अब मुझे देखते ही इनका वापस शुरू हो जाएगा ..!”
” हाँ तो झेलो, बड़े भी तो हो ..!”
” सच्ची, कभी कभी लगता है बड़ा पैदा होकर ही सबसे बड़ा गुनाह कर दिए हैं…वैसे हम बड़े पैदा होते या छोटे उनकी नजर शुरू से हम पर है , कि कब हम पढ़ लिख जाए और…
उसी वक्त दरवाजे पर आए अभिमन्यु की पिता की नजर अभिमन्यु और विभु पर पड़ गई और उन्होंने वहीं से आवाज लगा दी..
“अरे अभी तुम कब आए और तुम दोनों बाहर खड़े खड़े क्या बातें कर रहे हों?फटाफट अंदर आओ..”
अभिमन्यु और विभु अपने पिता की आवाज सुनते ही घर के अंदर की तरफ दौड़ पड़े। अभिमन्यु ने झुक कर अपने पिता के पैर छुए और उन्होंने मुस्कुरा कर उसके सर पर हाथ रख दिया..
“जाओ अंदर तुम्हारी बड़ी अम्मा बैठी है, मिल लो उनसे..”
हाँ मे सर हिलाकर अभिमन्यु अंदर चला गया। उसने अपनी मां के पैर छूने के बाद अपनी बड़ी मां के पैर भी छुए और बाहर जाने को हुआ कि बड़ी माँ ने उसे वहीं बैठा लिया..
अभिमन्यु की मां की आंखों में सवाल था कि ऐसे बेमौसम अभिमन्यु कैसे घर आ गया… उन्हें पता था कि अभिमन्यु घर पर रहकर पढ़ाई नहीं कर पाता इसलिए इम्तिहान के पहले तो वह कभी भी घर आना पसंद नहीं करता… ..
उन्होंने आंखों से अभिमन्यु से पूछा कि कैसे आना हुआ? और अभिमन्यु ने ना में सिर हिला के जवाब भी दे दिया..
” दीदी आप अभि के साथ आप बैठे, हम आपके लिए चाय और समोसा लेकर आते हैं..”
वह मुस्कुराकर अंदर जा ही रही थी कि, इतनी देर में विभु एक बड़ी सी ट्रे में सबके लिए चाय और नाश्ता लेकर आ गया..
“अरे तूने चाय कब बना ली?”
अभिमन्यु की मां की आंखों में सवाल था और चेहरे पर मुस्कान उस पल को लगा उन्हें अपने बेटे पर बहुत गर्व महसूस हो रहा है, लेकिन तभी उनके सारे गर्व पर बड़ी माँ ने वहीं बैठे बैठे वज्रपात कर दिया..
” यह क्या विभु चाय तूने बनाई है?”
विभु के चेहरे पर खुशी झलक रही थी..
” हां बड़ी मां! मैं बहुत अच्छी चाय बनाता हूं, और चाय चढ़ा कर ही समोसे लेने गया था..”
बड़ी मां ने अपनी दोनों हथेलियां अपने गालों पर रखी और आंखें फाड़ कर अपने सामने बैठी अपनी देवरानी को देखने लगी…
” यह क्या छोटी !लड़कों से कोई काम करवाता है ? म बेचारे की खेलने कूदने की उम्र है, उसे तुम रसोई में चौका चूल्हा करवा रही हो..”
“अरे दीदी हम नहीं करवाते, यह तो विभु को शौक है वरना अभि से पूछ लो, कभी उससे कुछ करवाया हो तो..?”
अभिमन्यु का ध्यान अपनी बड़ी मां और मां की बातों पर नहीं प्लेट में रखे समोसे पर था । उसने तुरंत चाय के साथ समोसा उठा लिया …
” वाह अमृत तुल्य बनाई है भाई! क्या चाय बनाई है तूने.. बड़ी अम्मा एक बार चाय पी कर देखिये, फिर आप अम्मा से कहेंगे कि बहुत अच्छा किया जो विभु को चाय बनाने दिया वरना अम्मा की चाय तो जानती ही है आप..एकदम ही जन्नत बनती है.”
” अच्छा तो यह कह रहे हो हमको चाय बनाना नहीं आता? दिन भर एक टांग पर खड़े रहते हैं। कभी तुम्हारे पापा कहेंगे चावल का चीला खाना है और तुम्हारा भाई कहेगा पास्ता बना दो।
दो दो तरह के तो दीदी हमारे घर में नाश्ते बनते हैं। फिर दोपहर के खाने के समय भी वही हरकत .. लड़के को भिंडी पसंद है तो लड़के के बाप को कटहल। अब दो अलग-अलग तरह की सब्जी बनाओ, दाल बनाओ रायता भी चाहिए दोनों को। सलाद भी हम ही काटे। रोटियां भी हम बेले…अब बताइए इस सब में कहां से चाय अच्छी बनेगी?
हम तो दिन भर में इतना थक जाते हैं, कि लगता है शाम को एक कप चाय कोई दूसरा बनाकर पिला दे। तब जाकर सांस में सांस आती है कि रात का खाना बना सके।
दीदी आप की भी यही हालत होती होगी? हमारे घर में कम से कम यह है कि चाय विभु बना देता है। दिन भर की थकान उतर जाती है और फिर से काम करने की हिम्मत आ जाती है..”
“बात तो सही कह रही हो छोटी …अब हमारे भी तो तीन तीन लड़के हैं । लेकिन मजाल कोई अपने हाथ से पानी भी ले ले, हम तो रो पड़ती है सुबह से शाम तक खट खट के….
वैसे चाय वाकई अच्छी बनाई है हमारे विभु ने…
अभिमन्यु ने बड़ी अदा से विभु की तरह देखा और अपने कमरे में जाने लगा कि उसकी बड़ी माँ उसी की तरह मुड़ गई…
” और बेटा अभि, कब तक पूरी हो जाएगी तुम्हारी पढ़ाई?”
“बस बड़ी अम्मा साल भर और बचा है ..!”
” उसके बाद बस तुम्हारी नौकरी लग जाए ..फिर?”
” फिर क्या ?” विभु ने तुरंत उन्हें टोक दिया …
” फिर तेरे लिए एक सुन्दर सी भाभी ले आयेंगे हम ..अच्छा छोटी देखो इसी सब में हम असली बात तो भूल गए थे ..
हमारे बड़के की शादी लग गई है ..
” गुड्डा भैया की ?” अभिमन्यु ने सवाल किया ..
” हाँ लड़की वाले यही गोविंदगढ के हैं…अगले महीने ओली डालने चलना है … शादी दो महीना बाद होगी…यही बताने आए थे और वहीं भूल कर इधर उधर की बातों में लग गए थे …..
और अभि तुझे भी आना है ना , कॉलेज का बहाना बना कर टाल मत जाना.”
” कैसी बात कर रही हो बड़ी अम्मा ? गुड्डा भैया की शादी और मैं टाल जाऊँ? हो ही नहीं सकता …और मेरी परीक्षाएँ भी बस अगले हफ्ते से है ..तो दो महीने बाद वैसे फ्री ही रहूँगा …
वो अपनी बात पूरी कर कमरें से निकल गया ..और धीमे स्वर मे फुसफुसाहट के साथ बड़ी अम्मा अभिमन्यु की माँ को शादी की प्लानिंग समझाने लगी…
“गुड्डा की शादी में तो सभी आयेंगे , हमारी छोटी बहन भी आयेगी ही ..एक इकलौती लड़की है उसकी ..और वो तुम्हारे अभि को पहले कहीं देख चुकी है ..तभी से लट्टू हैं इस पर …लड़की का बाप सिविल जज है ..खूब मोटा माल मिलेगा , बताओ और क्या चाहिए …?”
वहीं बैठे विभु को इस सब बातों में बड़ा मजा आ रहा था …
” अरे वाह तब तो बढ़िया है , अभि भैया है भी क्रिमिनल माइंड..घर पर ही जज साहब रहेंगे तो भैया के बचने के चांस रहेंगे ..
” क्या बक रहा है विभु? चल जा अपने कमरे में ।
” वाह वाह!! स्वार्थी लोग , जब चाय बनानी थी तब तो विभु से अच्छी कोई चाय नहीं बनाता कह कह कर सिर पर चढ़ाया और जैसे ही अपना मतलब निकल गया यहां से भगाया जा रहा है …
गुरुदत्त साहब बहुत सही गाना गए है आप..
ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है,
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है ..
जहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है ,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है….
गाते गुनगुनाते हुए वो बाहर निकल गया …और अभिमन्यु के कमरें में पहुंच कर हंसते हुए पलंग पर गिर पड़ा…
अभिमन्यु फोन पर अधीर से बात कर रहा था ….
” हाँ अधीर कल सुबह की बस से वापसी है भाई..?
” हैं तो बस एक रात के लिए आए हो क्या ..?”
विभु ने चौंक कर उससे पूछ लिया ..
” हाँ मेरे कॉकरोच..बस आज रात के लिए आए हैं… कल सुबह पांच बजे की बस से निकल जाएंगे ..
” अबे यार ये क्या है ? फिर आए ही क्यों ..मेरी एक रात की दुल्हन ।”
” अबे तेरी भाभी को छोड़ने आए हैं ..वो भी इसी शहर की है ..
” अब ये कौन से नंबर की भाभी है मेरी ?”
” नंबरों का गणित अभिमन्यु मिश्रा याद नहीं रखते..!”
” पर पापा की चप्पल का नंबर याद रख लेना , किसी दिन बहुत पिटोगे इसी लड़कीबाजी में ..?
” आज तक कभी पिटे हैं..और ये तो सीरियस वालीं है भाई..
” पिछली उन्नीस भी सीरियस टाइप ही थीं….
” कौन है सीरियस टाइप..” उन दोनों की बातों के बीच उनकी माँ कमरें में चली आयी…
” बड़ी अम्मा चली गई? ” विभु के प्रश्न पर उसकी माँ ने हाँ में सिर हिलाया और प्यार से अभिमन्यु को देखने लगी …
” क्या खाएगा खाने में , वहीं बना लेती हूं…जा विभु बाजर से पनीर ले आ, मटर पनीर बनाऊँगी..!”
” नहीं माँ! तुम्हारे हाथ का दाल चावल खाने का मन है बस …वहीं बना लो ..
” ठीक है बैंगन बस पड़े है…बैंगन आलू बना लेती हूं..
” हाँ ! तुम्हारे हाथ का सादा खाना भी अमृत लगता है , पर पहले थोड़ी देर यही बैठो ना ..
अभिमन्यु की माँ भी वहीं बैठ गयी और अभिमन्यु ने आगे बढ़ कर उनकी गोद में सिर रख दिया और लेट गया…
विभु उन्हें देख कर मुस्कराते हुए उठ कर अंदर गया और रसोई से कुछ देर मे सब्जियां उठा लाया …
” दाल चढ़ा कर आया हूँ और सब्जियां काट देता हूं…जिससे आपको खाना बनाने में देर ना हो …”
अभिमन्यु की माँ ने प्यार से विभु के सिर पर हाथ फेरा और अभिमन्यु के बालों पर हाथ फेरते उन्हें बड़ी अम्मा के साथ हुई गोष्ठी का पूरा ब्यौरा देने लगी….
अगली सुबह अभिमन्यु ने 5 बजे की बस पकड़ ली उसे चौक तक छोड़ने आए विभु ने उसके पैर छूने के लिए हाथ आगे बढ़ाये थे कि अभिमन्यु ने उसे गले से लगा लिया..
” जल्दी आना भाई हमारे एग्जाम के पहले आओगे तो थोड़ा पढ़ा देना..
” तुमको सब करवा देंगे चिंता मत करो। इस बार तुम सभी सब्जेक्ट में पूरे में से पूरा नंबर लाओगे चिंता मत करो।”
बस के दरवाजे पर खड़े अभिमन्यु ने हाथ हिलाया और विभु बस से थोड़ा पीछे हट कर खड़ा हो गया और बस माया नगरी की तरफ आगे बढ़ गई….
बस रंगोली की गली के सामने वाले रास्ते से गुजर रही थी, कि अभिमन्यु का ध्यान चला गया…
रंगोली यही उतरी थी, उसने उस गली की तरफ एक बार यूं ही नजरें डाल ली…
गली से कुछ अंदर ही एक घर की छत पर उसे रंगोली खड़ी नजर आ गई..
अभिमन्यु के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा उसने रंगोली की तरफ देखकर धीरे से हाथ दिला दिया…
रंगोली उसे ही देख रही थी, लेकिन वह हाथ नहीं हिला पायी..
वह चौक भी एक स्टॉप था इसलिए बस कुछ देर के लिए रुकी थी। सवारियों को लेते ही बस आगे बढ़ गई और अभिमन्यु मुस्कुरा कर अपने बालों पर हाथ फेरते आंख बंद करके बैठ गया…
रंगोली को बातों बातों में ही अभिमन्यु ने बताया था कि वह सुबह पांच बजे की बस से निकलने वाला है। और इसीलिए रंगोली सुबह पौने पांच से उठकर घर की छत पर खड़ी उस बस के निकलने का इंतजार कर रही थी..
बस में बैठे अभिमन्यु को एक झलक देखकर रंगोली के चेहरे पर भी हल्की सी मुस्कान चली आयी..
और वह बस के निकलते ही नीचे उतर कर अपने कमरे में चली आयी…
कमरें मे बिस्तर पर एक तरफ मेहंदी सोयी हुई थी…बिना आवाज किए रंगोली वापस दोहड़ में घुस कर सोने की कोशिश करने लगी …
” इतनी सुबह-सुबह छत पर क्या कर रहीं थीं तुम ?”
मेहँदी का सवाल सुन रंगोली की धड़कन रुकते रुकते बची..
” तू इतनी सुबह जाग कैसे गई?”
मेहँदी ने आंखें खोल कर रंगोली को देखा …
” कल वाला लंबू ही था ना बस में ..?
” किस बस मे? मैं तो सूर्योदय देखने गई थी ..!”
” अच्छा! फिर बता सूरज किस तरफ निकला था ?”
” सोने दे यार मेहँदी..जब देखो तेरी जासूसी शुरू हो जाती है ..!”
मेहँदी अपनी हंसी छुपाती सोने का अभिनय करने लगी और उसे घूर कर रंगोली सोने की कोशिश करने लगी…
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दोपहर बाद तक अभिमन्यु हॉस्टल पहुंच गया …अपने कमरें में अधीर के साथ बैठा वो पढ़ाई में लगा था कि उसके फोन पर किसी का कॉल आने लगा …
अधीर ने चार्जिंग पर लगे उसके फोन को उठाया और स्क्रीन पर चमकते नंबर को देख आश्चर्य में डूब गया…
” अबे वाशिंग पाउडर का फोन आ रहा है ..?
अभिमन्यु ने तुरंत फोन छीना और कमरें से बाहर निकल गया…
वो बात कर के वापस आया तो अधीर उसे ही घूर रहा था …
” निरमा मैडम का फोन था ना ? उन्होंने तुझे क्यों फोन किया ?”
” अबे यूनिवर्सिटी हेड हैं, वो किसी को भी फोन कर सकती है..
” हाँ पर तुझ जैसे वेल्ले को क्यों ?”
” अबे होगा कुछ काम?”
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” वहीं तो पूछ रहा हूं ..क्या काम है ..?
” अभी शाम सात बजे कहीं जाना है. उसी के लिए किया था …बाकी बातेँ वापस आकर बताता हूं…हो सकता है आज रात नहीं लौट पाऊँ..पर ये बात इस कमरें से बाहर नहीं जानी चाहिए भाई …
आकर सब बता दूँगा …
अभिमन्यु ने अधीर के बालों पर हाथ फेरा और एक बैग टांग तेज कदमों से बाहर निकल गया ….
क्रमशः
aparna …
