
मायानगरी-33
दिन बीत रहे थे और अब नेता जी के भतीजे की सेहत में पहले से कहीं अधिक सुधार नजर आने लगा था … अब वो धीरे से उठ कर किसी की सहायता से कुछ कदम चलाने फिरने की स्थिति में आ गया था। नेता जी का परिवार बड़ा था इसलिए आए दिन कोई न कोई अस्पतालों में बना ही रहता।
लेकिन नेता जी के परिवार ने इस बात का पूरा ध्यान रख रखा था कि उनके शहर से बाहर रह रहे रिश्तेदारों को भुवन की हालत का पता न ही चलेगा तो अच्छा है। इसके साथ ही यहाँ भी आदेश पड़ोसियों और दूर दराज के जानने वालों से नेता जी और उनके परिवार मे ये बात छुपा रखी थी ..
भुवन की चंडाल चौकड़ी को भी नेता जी ने साफ़ ताकीद कर रखी थी कि ये बात अपने लोगों से बाहर ना जाने पाए..
अस्पताल में भुवन को देखने वाले दोनों डॉक्टर मृत्युंजय और पंखुड़ी के हिसाब से अब भुवन को घर ले जाया जा सकता था लेकिन नेता जी का परिवार अभी भी कुछ और ही सोच रहा था ।
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सुबह पौने छ का अलार्म बजा और मृत्युंजय आंखे मलते हुए उठ बैठा .. उसने अपने सिंगल बेड के किनारे रखे टेबल पर पड़े अपने मोबाइल पर बजते अलार्म को बंद किया और साथ रखी बोतल से उठा कर पानी पी लिया…
फटाफट फ़्रेश होकर उसने अपने रनिंग शूज की लेस बंधी और अस्पताल के अपने ड्यूटी रूम से निकल कर नीचे की सीढियां पकड़ ली।
एक दिन पहले उसकी नाइट शिफ्ट थी, और उसी शिफ्ट में दो तीन इमर्जेंसी आ गई थी , उसे रात भर चैन से सोने नहीं मिला था। एक कार्डियक अरेस्ट का केस था, जिसमें मरीज को स्टेबल करने में ही आधी से अधिक रात बीत गई थी..आज उसका सुबह उठाने का बिल्कुल मन नहीं था लेकिन सुबह वालीं डॉक्टर के आने के पहले उसे अपना राउंड तो निपटाना ही था ।
वो नीचे अपने केबिन में पहुंचा कि नर्स उसके लिए कॉफ़ी ले आईं।
कॉफ़ी के साथ ही उसकी लायी हुई फाइल्स भी मृत्युंजय ने उठा कर पलटनी शुरू कर दी …
वो अभी उसी आदमी की फ़ाइल देखता हुआ आगे करवाने वालीं जाँच लिख रहा था कि भागती हुई सी गौरी उसके केबिन में चली आईं …
” सर …?”
” हाँ !! अंदर आ जाओ गौरी ! क्या हुआ ?
“सर क्या मिस्टर जयेश सक्सेना कल अस्पतालों में एडमिट हुए हैं..?”
“हाँ कार्डियक अरेस्ट हुआ है उन्हें! लेकिन तुम क्यों पूछ रही….?
ये सवाल पूछते हुए भी मृत्युंजय गौरी के चेहरे के भाव देख कर ही समझ गया कि वो इंसान गौरी का कोई बेहद करीबी है , और वो तुरंत अपनी जगह से खड़े होकर गौरी के पास चला आया, गौरी के घबराया चेहरे को देख उसने तुरंत केबिन से बाहर आकर गौरी को उस जगह की तरफ़ इशारा कर दिया जहाँ जयेश सक्सेना भर्ती थे।
गौरी एक तरह से भागते हुए वहां पहुंच गई .. लेकिन इंटेंसिव केयर यूनिट का दरवाजा बंद था ..
मृत्युंजय ने आगे बढ़ दरवाजा खोल दिया और गौरी भाग कर उस आदमी तक पहुंच गई ….
गौरी ने धीमे से पापा कहा और उस आदमी ने आंखे खोल दी….
वो उनका हाथ पकड़ कर वहीं स्टूल पर बैठ गई , आंखों से बहते आंसू पोंछ कर भी उसके मुहँ से कोई शब्द नहीं निकल रहा था , यूं लग रहा था गले में कुछ अटक सा गया है , मृत्युंजय भी धीमे कदमों से आकर गौरी के पीछे खड़ा हो गया ।
गौरी के पिता ने उसे देखा और मुस्करा दिए …
“अरे बेटा इतना परेशान होने की बात थोड़े ना है , डॉक्टर साब ने दवा दे दी है ,और देख ना कितना कुछ ड्रिप वगैरह सब चल तो रहा है । “
“आप यहां आए कब ? क्या अकेले ही आए हैं ?”
गौरी किसके बारे में जानना चाहती थी ये समझ कर उसके पिता और खामोश हो गए …
बचपन में जब गौरी की माँ ने उसके पिता से तलाक लेकर दूसरी शादी कर ली तब कुछ समय तक अकेले रहने के बाद गौरी के पिता ने भी दूसरी शादी कर ली थी , लेकिन ये दूसरी शादी भी उनकी बच्ची का मानसिक स्वास्थ्य सुधार नहीं पायी बल्कि और खराब कर गई ।
जयेश को यूँ चुपचाप लेटे देख फिर गौरी ने और कुछ नहीं पूछा…
“मैं अब बिल्कुल ठीक हुँ बेटा , बाकी जैसा तुम्हारे डॉक्टर कहेंगे वैसा करवा लेंगे.. मैं यहां अपने ऑफ़िस के काम से आया था , सोचा था दोपहर में मेरा काम निपट जाएगा तो शाम को तुम से मिल कर निकल जाऊँगा वापस, लेकिन काम निपटाने में ही रात के नौ बज गए, उसके बाद सोचा अब इतनी रात में तुम्हारे हॉस्टल आकर मिलना ठीक नहीं है और मैं हमारे फ्लैट पर चला गया।
रात में खाने के बाद सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन बड़ी देर तक नींद नहीं आ रही थी , शाम से ही सीने में भारीपन लगा रहा था और खाना खाने के बाद घबराहट सी लगने लगी।
“आपको यहां कौन लेकर आया पापा ?”
” मैं खुद ही आया हूं बेटा , रात में तबीयत बिगड़ने लगी, मुझे समझ में आ गया की कुछ तो गडबड है और इसलिए किसी तरह फ्लैट से नीचे उतरा और कैब बुक करने की कोशिश कर रहा था ,लेकिन तकलीफ इतनी थी कि हाथ नहीं चल रहे थे , उसी वक़्त उधर से एक लड़का गुजर रहा था, उसने मेरी हालत देख कर गाड़ी रोक दी ..”हैलो,क्या आप ठीक हैं?”
” नहीं बेटा , तबीयत सही नहीं लग रही है , आसपास कोई अस्पताल हो तो वहीं जाना है , उसके लिए कैब देख रहा हूँ!”
मेरी बात सुनकर कर वो तुरंत अपनी जीप से उतरा और मेरे पास चला आया , मुझे सहारा देकर उसने अपनी गाड़ी में बैठाया और यहाँ ले आया ..
” ठीक है पापा आप आराम कीजिए, मैं डॉक्टर से बात कर के आती हूँ …
गौरी ने झुक कर अपने पिता के माथे पर हाथ रखा और बाहर निकल गयी अब तक मृत्युंजय उन्हें की फाइल्स तैयार कर रहा था, गौरी को देख वो थोड़ा गंभीर हो गया ..
गौरी अपने पिता के कमरें से बाहर निकल रही थी कि कमरें के ठीक बाहर खड़ी प्राची दीवार से लगकर छिप कर खड़ी हो गई…
वो भी इतनी देर से बाहर छिप कर खड़ी खड़ी गौरी और अपने पिता की बातेँ सुनकर रही थी , उसकी भी आंखे भीग गई थी लेकिन उसका दुख दिखाने का तारीफ कुछ अलग सा था ।
गौरी के वहाँ से जाते ही उसने वापस एक झलक अपने पिता को देखा और अपने आंसू बहने से पहले ही अंदर ही रोक लिए , तेज़ी कदमों से चलती वो अस्पताल के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गयी ।
पीछे बने गार्डन की बेंच पर बैठ कर उसने अपनी जेब से सिगरेट निकल ली , लेकिन उसके पास माचिस नहीं थी , उसे याद आया पिछली शाम ही उसकी माचिस की तीलियों को एक दूसरे से अजीबो-गरीब तरीके से जोड़ घटा कर अधिराज ने कुछ बनाया था जिसमें एक तीली में आग लगा कर बाकी तीलियों को भी उसी के साथ स्वाहा कर डाला था।
उसने वहीं एक किनारे बैठे एक लड़के को आवाज दी, वो जरूर किसी बीमार का परिजन रहा होगा , अस्पताल के इस पिछले हिस्से में ज्यादातर अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजन ही रहा करते थे ..
“ए छोटे इधर आ!”
“क्या चाहिए ?”
“माचिस है ?”
उस लड़के ने अजीब नजर से उसे घूरा …
“क्यों ? क्या करोगे माचिस का?”
“तेरा घर जलाना है, अबे है कि नहीं ये बोल ना ?”
” यहां सिगरेट पीना मना है , मैं अस्पताल का स्टाफ हूं , यहां सफाईकर्मी हूं, अभी आपकी शिकायत कर दूँगा ।”
प्राची ने उसके सिर पर एक टपली मारी और उसके हाथ से माचिस छीन ली ..
“जा कर दे शिकायत , मैं यहीं डॉक्टर हूं नाम है डॉक्टर गौरी सक्सेना , जा कर दे शिकायत .. पर बेटा जिसे भी ये कहेगा ना कि डॉक्टर गौरी ने सिगरेट के लिए माचिस मांगी तू सीधा थप्पड़ खाएगा!”
अपनी सिगरेट जलाये फिर वो उस लड़के से थोड़ा आगे निकली गई .. एक खाली सी जगह पर बैठ कर सिगरेट पीते हुए उसकी आंखों में वापस उदासी तैरने लगी थी ..
गौरी मृत्युंजय के केबिन में पहुंच कर बैठी और मृत्युंजय ने उसके सामने उसके पिता की फाइल्स रख दी…
“मैसीव हार्ट अटैक है गौरी ,मेरा कहा मानो तो जितनी जल्दी हो सके एनजियोग्राफी करवा लो, कम से कम हमें ब्लॉकेज का परसेंटेज पता चल जाएगा उसके बाद जरूरत हुई तो प्लास्टि करवा लेंगे..”
” सर एंजियोग्राफी के लिए कहां ले जाऊँ पापा को ?”
” कहीं ले जाने की ज़रूरत नहीं है , हमारे यहां भी शुरू हो गई है। वैसे तो कार्डियोलॉजिस्ट शहर से भी बुलाए जाते हैं और अपने यहां अभी जो कार्डियोलॉजिस्ट फिलहाल काम कर रहे हैं वह एम्स में 12 साल काम कर चुके हैं उसके पहले बीगल्स में काम कर रहे थे, काफी अनुभवी डॉ हैं डॉक्टर शुक्ला! कल रात भी मैंने उन्हें ही बुलाया था। उन्होंने ही इमरजेंसी में तुम्हारे पापा का ट्रीटमेंट किया है और उनके स्टेबल होते तक वो यहीं रुके रहे। अभी भी आते ही होंगे, थोड़ा तुम्हारे पापा की कंडीशन और सुधर जाए फिर आगे का सोचते है। “
गौरी ने मृत्युंजय की बात पर हामी भरी और फाइल्स के पन्ने पलटने लगी…
” सर वो लड़कों कौन था जो पापा को यहां पहुंचा करा गया ?”
मृत्युंजय ने अपने सामने पड़े कागज़ों से सर उठा कर एक नजर गौरी को देखा और फिर वापस अपनी नजर उन्ही पन्नों में गड़ा दी …” वेदांत!!”
कुछ देर में ही पंखुड़ी तेज़ी से केबिन में चली आईं , उसके आते ही मृत्युंजय ने उसे पिछली रात के नए एडमिट किए मरीजों आदि की जानकारी दी और अपना एप्रन और आला उठाए बाहर निकल गया …
“यार पाखी , वो कार्डियक अरेस्ट वाले पेशेंट गौरी के फादर है सो थोड़ा ध्यान देना!”
“ओह ओके, मैं देख लूँगी, तुम जाओ !”
” वैसे सोकर उठने के बाद आ जाऊँगा एक बार उन्हें देखने !”
पंखुड़ी उसे देख मुस्कुरा उठी , और मृत्युंजय उसे बाय कर बाहर निकल गया ..वो जाते जाते आईसीयू के सामने से निकला तो उसने देखा गौरी अपने पापा के कमरें के बाहर लगी बेंच पर अकेली बैठी थी … शांत बैठी वो मन ही मन जाने क्या सोच रही थी , मृत्युंजय आकर उसके बाजू की बेंच पर बैठ गया ..
” घबराओ मत गौरी, अंकल ठीक हो जाएंगे, आज शाम तक वेट करते हैं फिर आज रात या कल उनकी सर्जरी प्लान कर लेंगे!”
गौरी ने बिना कुछ बोले बस हाँ में सिर हिला दिया । गौरी के पिता जिस आईसीयू में थे उसके ठीक सामने आईसीयू से निकलने वाले मरीजों के कमरे थे और गौरी इस वक़्त भुवन के कमरें के ठीक सामने ही बैठी थी, वो तो अच्छा था सुबह का समय होने से अभी भुवन के कोई चेले वहाँ मौजूद नहीं थे वर्ना गौरी का वहाँ बैठना दूभर हो जाता।
” मैं जल्दी ही वापस आता हूं , अपना ध्यान रखना !”
मृत्युंजय का जाने का मन तो नहीं था , लेकिन वो रात भर सोया भी नहीं था इसलिए एक बार अपने रूम पर जाना उसके लिए ज़रूरी था , यही सब सोच कर वो रूम के लिए निकल गया ।
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अभिमन्यु और अधीर अपने एसाईनमेंट जमा करने जा रहे थे कि एडमिन ऑफ़िस के सामने खूब भीड़ भाड़ था , वो दोनों भी भीड़ देख कर रुक गए …
” अबे कौन मर गया जो यहाँ इतनी भीड़ जमा कर रखी है ?”
अधीर लोगों को हटाते हुए पूछते पूछते आगे बढ़ा, उसने देखा सामने दो गुट आमने सामने खड़े थे । दोनों ही इंजीनियरिंग वाले ही थे , एक आईटी वालों का और दूसरा मेकेनिकल वालों का ..
दोनों तरफ़ से दनादन एक दूजे पर आरोपों प्रत्यारोपों की बारिश हो रही थी ..
” साले तुझे काटकर जंगल में ना फेंक आया तो मेरा नाम बदल देना !”
” हाँ तो अपना नाम अभी से बदल ले क्योंकि मुझे काटने के पहले मैं तुझे रेल की पटरी पर जिंदा बाँध आऊंगा, समझा!”
” मुझे पटरी पर जिंदा बांधने के लिए तेरा जिंदा होना भी तो जरूरी है , तुझे तो मैं तेजाब से नहला कर फिर आग लगाऊंगा!”
“और मुझे आग लगाते हुए साले खुद उस आग में जल जाना , एक माचिस की तीलि तक तो जलायी नहीं जाती बड़े आए हैं आग लगाने वाले…
उन दोनों गुटों का ये चल रहा था कि अधीर ने इधर उधर से पूछ पाछ कर लड़ाई का कारण पता किया और पीछे बाईक पर बैठे अभिमन्यु के पास वापस आ गया, उसे आते देख अभिमन्यु मुस्करा उठा …
” क्या हुआ कारण पता चल गया कि दोनों ग्रुप एक दूसरे को इतनी गीदड़ भभकी क्यों दे रहे हैं?”
” हाँ , कॉलेज में लडाई के जो कॉमन कारण होतें हैं वहीं बात है,आईटी वाली बंदी से मेक के किसी लड़के ने बात कर ली अब उसी का रोना रोते रहे हैं ये आईटी वाले..पर मानना पड़ेगा इतना गुस्सा आने पर भी हमारे इंजीनियर लड़के एक दूसरे पर हाथ नहीं उठाते।”
“जानता है अधीर इसका कारण क्या है?”
“क्या?”
” क्योंकि हम इंजिनीयर हैं हम हर मशीन के कलपुर्जे की कीमत जानते हैं और ये भी जानते हैं कि उन कलपुर्जों को मशीन से अलग करना और फिर वापस जोड़ना भारी ख़र्चे का काम है, हमारे लिए हमारा शरीर ही नहीं सामने वाले का शरीर भी बेहद कीमती है इसलिए बेवजह एक दूसरे को लात घूंसे मार कर हम अपना और सामने वाले का समय इस सब फालतू की हीरोगिरी में बर्बाद नहीं करते ।
और वैसे भी यार ये कॉलेज की मारपीट सिर्फ फ़िल्मों में होती है कि एक माचो सा हीरो आया जिसे देखते ही लड़कियाँ टप टप गिरने लगी और उसने आते ही एक साथ एक दर्जन लड़कों की पिटाई कर दी।
हम लोग प्रैक्टिकल लड़के हैं दिमाग से सारा युद्ध लड़ते हैं ना कि हाथ पैर से !”
“कभी कभी इत्ते दिमाग वालीं बात कहाँ से बोल देते हो तुम गुरु ? लगता ही नहीं कि ये वहीं झल्ला अभिमन्यु है ?”
” देखो बेटा, दिमाग तो हमारे पास अनाप शनाप है बस यूज कम करते हैं!”
उसी वक़्त अचानक से वहाँ का सारा झगड़ा शांत हो गया , और सारे लड़के सामने एक साथ चलेगा आए …
दूर से एक बाईक हवा से बात करती आयी और उन लड़कों के एक तरफ़ जाकर खाड़ी हो गई , उस बाईक पर से वहीं आईटी वालीं लड़की जिसके नाम पर इतना सारा कांड हो रखा था उतरी और अपना बैग पीठ पर सेट करते हुए उस लड़के के सामने चली आई
” ओके बेबी शाम को मिलते हैं।” उसकी ओर एक किस उछाल कर वो कॉलेज के अंदर चली गई और वो लड़कों उसके जाने के बाद धूल उड़ाता युवराज आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स कॉलेज की तरफ़ निकल गया …
अभिमन्यु और अधीर का हंस हँस कर बुरा हाल था , और वो लड़के जो अब तक एक दूसरे के खून के प्यासे हो रखे थे एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखें कैंटीन की तरफ़ निकल गए ….
क्रमशः
aparna..
