
अपराजिता -141
सत्यानाश !! जो नहीं होना था वो ही हो गया… इतनी देर से इन सब की बातें सुनता खड़ा अथर्व अब जाने क्या सोच बैठा होगा?
ये सोच कर ही भय से थर थर कांपने लगी रेशम और वो खुद को संभाल कर बैठ पाती उसके पहले ही उसका सर घूम गया और वो ज़मीन पर गिरती उसके पहले ही उसके बाजु में खड़े अखंड ने आगे बढ़ कर उसे संभाल कर सहारा दे दिया..
रेशम घबराहट में कांपने लगी थी… उसके दिमाग में एकदम से दबाव बढ़ने लगा था, उसे घबराहट होने लगी थी.. एक तरफ तो उसे कॉलेज में घटी सारी बातें याद आने लगी, दूसरी तरफ अथर्व को सामने पा कर उसका डर सांतवे आसमान पर पहुँच गया..
वो खुद को सम्भालना चाह रही थी, लेकिन उसे ऐसा लग रहा था जैसे मुट्ठी में बंद रेत की तरह सब कुछ उसके हाथ से फिसलता चला जा रहा है..।
उसे वो एक एक पल याद आने लगा, जब इस घटना के बाद वह कुछ समय के लिए अस्पताल में भर्ती थी। और उस वक्त उसे देखने जांचने परखने वाली डॉक्टर और नर्स की आंखों में उसने अपने लिए सहानुभूति देखी थी। वह सभी उसके साथ एक बेचारी लड़की की तरह व्यवहार कर रही थी..।
उस अस्पताल में मौजूद स्टाफ को यही लग रहा था कि उसके साथ रेप हो चुका है, जबकि वह चीख चीख कर सबको बताना चाहती थी कि नहीं जैसा वह लोग सोच रहे हैं, वैसा उसके साथ कुछ नहीं हुआ।
लेकिन उसकी हालत इतनी खराब थी, वह इतना डरी हुई थी कि वह किसी के सवालों का ढंग से जवाब नहीं दे पा रही थी…।
अस्पताल से लौट के आने के बाद भी बहुत बार ऐसा हुआ कि उसकी मां ने उससे घुमा फिरा कर सवाल पूछने जारी रखे, और कहीं ना कहीं उनके सवालों में एक घातक प्रश्न छिपा होता था कि उस लड़के ने तुझे किस हद तक तकलीफ पहुंचाई?
कहीं ना कहीं रेशम की मां के मन में भी यह डर था कि कहीं उस लड़के ने अपनी हदें पार तो नहीं करी थी।
रेशम ने बहुत बार अपनी मां को बताया था कि नहीं उसके साथ वैसा कुछ नहीं हुआ, जैसा वह सोच रही है। लेकिन पता नहीं उसकी मां भी सच को स्वीकार पाई थी या नहीं? या शायद वह भी यही सोचती रह गई कि रेशम उनसे सच छुपा रही है।
इन्हीं सब बातों के कारण रेशम के मन में और भी ज्यादा यह बात बैठ गई थी कि बाहर की दुनिया यही सोचती है कि उसके साथ बहुत ज्यादा गलत हो चुका है। और उसका बार-बार यह सफाई देना कहीं ना कहीं उनकी सोच को और मजबूत करता जा रहा था।
इसलिए उसने उस वक्त लोगों से मिलना जुलना छोड़ दिया था। रिश्तेदारों के घर जाना बंद कर दिया था। यहां तक की घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया। लेकिन मानव ने उसे बिल्कुल अकेला नहीं छोड़ा।
हर वक्त परछाई की तरह उससे चिपक ही रहता, और शायद यही कारण था कि वह बहुत जल्द अपने काले अंधियारे अतीत से बाहर निकलने की कोशिश कर पाई। वह उसे खाली बैठने ही नहीं देता था। अगर वह अपने कमरे में बैठी सूनी सूनी आंखों से खिड़की से बाहर लोगों को आते जाते देखती रहती तो वह उसके सामने लाकर एक बड़ी सी कैनवास रख देता।
ढेर सारे रंग रख देता, और “चल मिलकर कुछ अच्छा सा पेंट करते हैं” बोलकर उसके हाथों में जबरदस्ती रंग और तुलिका पकड़ा देता था।
वह अगर धीरे-धीरे अपने मन को पढती हुई एक गुलाब बनाने की कोशिश करती, इतनी देर में शिनचेन की बेतरतीब पेंटिंग बनाकर वह उसे दिखाकर हंसने पर मजबूर कर देता था।
उसे जबरदस्ती पकड़ कर अपने साथ कभी माॅल लेकर जाता, कभी मूवी लेकर जाता।
कभी उसकी पसंद की आइसक्रीम खिलाने ले जाता, कभी पूरी फैमिली को मना कर एक साथ डिनर के लिए ले जाता। और उसके इन्हीं सब प्रयासों को देखते हुए रेशम ने अपने आप को मजबूत कर आगे बढ़ने की ठान ली थी। क्योंकि वह अपने भाई के प्रयासों का अपमान नहीं करना चाहती थी।
इसलिए उसने पूरी दुनिया से मुंह फेर लिया था। उसने सोच लिया था जिसे जो सोचना है सोचता रहे। लेकिन मुझे आगे बढ़ना ही पड़ेगा।
सेकंड ईयर की क्लासेस जब शुरू हुई, तब वह वापस हंसती मुस्कुराती उस हादसे के पहले वाली रेशम बन गई।
बस मन में कहीं किसी कोने में एक डर था कि वह लड़का वापस उसके सामने ना चला आए। लेकिन तब वह क्या जानती थी कि जितना उस हादसे से वह दबी और बुझी थी, उतना ही अखंड सिंह परिहार भी दब गया था। बुझ गया था।
वह तो फिर भी अपनी जिद में जीने की ललक में एक बार फिर सर उठा कर खड़ी हो गई, लेकिन वह तो ऐसा झुका, ऐसा डूबा की आज तक खड़ा नहीं हो पाया। इन्हीं सब बातों के बीच उसे याद आ रहा था कि कैसे लोग उस पर सहानुभूति रखने लगे थे।
आज अथर्व के सामने इस तरीके से वह सारी बातें आई है, पता नहीं अथर्व इन बातों का क्या मतलब निकलेगा?
या तो वह उस पर सहानुभूति रखेगा, और या फिर उससे यह सोचकर नफरत करने लगेगा कि वह तो उसके लायक ही नहीं रही।
लेकिन दोनों ही सूरत में नुकसान तो उसका खुद का ही है।
क्योंकि अथर्व इन दोनों में से जो भी सोचेगा दोनों ही बातों में प्रेम का अस्तित्व तो कहीं पर भी नहीं होगा…
वो खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी कि पलक झपकते अथर्व उसके पास पहुंच गया।
उसकी आंखें बंद हो रही थी, अथर्व उसके ठीक सामने की कुर्सी पर बैठ गया। उसने दोनों हाथों से रेशम के कंधों को पकड़कर हिला दिया।
” उठो रेशम! ऐसे कमजोर नहीं पड़ सकती तुम, आखिर इस सब में तुम्हारी गलती क्या है? तुम क्यों इतना डरती हो? जिसने तुम्हारे साथ गलत किया, उसे डरना चाहिए और सच्चाई को सामने लाने देना चाहिए। हो सकता है तुमसे प्रेम के वशीभूत तुम्हारे परिवार वालों ने उस वक्त केस बंद करवा दिया था, लेकिन अगर उस वक्त केस बंद नहीं हुआ होता और तुम्हें सारी सच्चाई मालूम चल पाती तो शायद आज तुम्हारा यह हाल नहीं होता।
तुम एक नाम से, एक अंधेरे से, एक आवाज से डरी हुई हो।
तुम जानती हो तुम किस हद तक डरी हुई हो? रात में नींद में तुम बडबडाती हो।
चौंक चौंक कर उठ जाती हो..।
कभी अगर तुम कमरे में अकेले खिड़की के पास खड़ी हो और पीछे से जाकर मैं तुम्हें पकड़ लूं तो तुम इतनी जोर से घबराती हो कि मुझे लगता है कि तुम्हारा हार्ट न फेल हो जाए।
चूहे जैसा दिल हो गया है तुम्हारा। तुम नहीं जानती कि तुम किस हद तक मानसिक अस्थिरता में जी रही हो…।
मैं मानता हूँ तुम्हे मानसिक आघात पहुंचा है लेकिन उसका उपाय भी होना ज़रूरी है..।
और अब तुम डरोगी नहीं.. किसी से भी नहीं..।
तुमने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसके कारण तुम्हें आंखें नीचे करके बैठना पड़े।
रेशम! इधर देखो, मेरी तरफ देखो।”
अथर्व की बातें सुनकर रेशम में थोड़ी हिम्मत आने लगी थी। उसने आंसुओं से भरी आंखें ऊपर उठकर अथर्व को देखना चाहा।
अथर्व के ठीक पीछे अखंड भी खड़ा उसे ही देख रहा था।
लेकिन रेशम की पलके अथर्व पर जाकर ठहर गई।
अनिर्वान ने पानी का गिलास अथर्व की तरफ बढ़ा दिया। अथर्व ने वह गिलास अनिर्वान से लिया और रेशम के सामने रख दिया। रेशम में धीरे-धीरे पानी के घूंट भरे और पानी का गिलास एक तरफ रखकर आंसू पोंछकर अथर्व की तरफ देखने लगी..
“रेशम खुद को गुनहगार समझना छोड़ दो। तुम अपने मन में किसी तरह की कोई गिल्ट मत रखो। तुम कसूरवार नहीं हो। तुम्हारे साथ जो भी हुआ उसमें ना तुम्हारी गलती है, और ना उस नाम की गलती है जो तुम्हारे दिमाग में आज तक गूंज रहा था।
अखंड सिंह परिहार बेकसूर है, और तुम भी।
तुमसे शादी होने के पहले से मैं तुम्हारे साथ बीते हर हादसे को जानता था। जब तुम फर्स्ट ईयर में थी और जिस वक्त तुम्हारे साथ यह हादसा हुआ, उस वक्त मैं फाइनल ईयर में था और हमारी बैच एजुकेशनल टूर पर बाहर गई थी।
लेकिन लौट के आने के बाद मुझे सारी बातें मालूम चल रही थी।
तुम तो जानती हो कॉलेज का माहौल ही गॉसिप्स वाला होता है, और अगर कहीं वह कॉलेज, मेडिकल कॉलेज हुआ तब तो सोने पर सुहागा।
यहां तिल का ताड़ बनने में देर नहीं लगती। तुम्हारा किस्सा भी मुझे ऐसे ही बढ़ा चढ़ा कर सुनने को मिला था। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे तुम शुरू से बहुत अच्छी लगती थी, बहुत प्यारी।
और जब तुम सेकंड ईयर में चली गयी और हमारे बैच का फेयरवेल हो गया, तब सारी बैचेस की एक जॉइंट फोटोग्राफ निकाली गई थी। जिसमें तुम फर्स्ट ईयर वालों के साथ सबसे पहली पंक्ति में मौजूद थी और मैं सबसे पीछे खड़ा था।
जिस दिन वह तस्वीर मेरे हाथ में आई, उसी दिन दिल ही दिल में एक चाहत उभरी कि काश मैं तुमसे शादी कर सकता।
उसके बाद वह काश मन में ही रह गया। क्योंकि इंटर्नशिप और उसके बाद नौकरी की भाग दौड़ में और कुछ सोचने का वक्त नहीं मिला।
धीरे-धीरे तुम्हारी भी पढ़ाई पूरी हो गई और फिर ऐसा हुआ कि घर पर रिश्ते देखे जाने लगे। जब मेरे घर पर रिश्ता देखा जा रहा था, तब मैंने ही अपने मामा जी से अपने मन की बात कह दी थी।
तुम्हें यकीन नहीं होगा, लेकिन उन्होंने ही मेरे पापा के पास तुम्हारी तस्वीर किसी तीसरे के हाथों भिजवाई और फिर तुम्हारे ताऊ जी तक भी वही मेरी तस्वीर लेकर गए। और इस तरह से घर परिवार में किसी को पता ही नहीं चला कि यह शादी मैंने अपनी पसंद से करवाई है।
मैं सब कुछ जानता था रेशम, लेकिन उस हादसे के बाद जब भी तुमको देखा, तब हमेशा तुम बहुत निष्पाप नजर आई।
मुझे भी वही मालूम चला था जो ज्यादातर लोग जानते थे कि तुम्हारे साथ किसी लड़के ने बहुत गलत कर दिया है। लेकिन उसके बावजूद मेरे मन में जो तुम्हारी पाक़ीज़ा सी छवि थी वह नहीं बिगड़ी।
मुझे लगा अगर किसी एक लड़के ने तुम्हें तकलीफ दी भी है, तो मैं अपने प्यार से तुम्हारे सारे जख्मों को भर दूंगा। मैं तुम्हें कभी उस तकलीफ का एहसास नहीं होने दूंगा। तुम याद करके देखो हमारी शादी के बाद का वह सारा समय क्या कभी भी मैंने तुम्हें कोई तकलीफ दी है?”
रेशम लगातार अथर्व को देख रही थी और उसकी आंखों से आंसू बहते जा रहे थे। अथर्व के ठीक पीछे खड़े अखंड की आंखें भी बरस रही थी। उसे रेशम की जिंदगी का कष्ट देखकर जितना दुख हो रहा था, उतना ही अथर्व की समझदारी देखकर अथर्व पर प्यार भी आ रहा था। उसने धीरे से ऊपर छत की तरफ देखा और उस अनदेखे परमपिता के सामने अपनी आंखे मूँद कर उन्हें आभार व्यक्त कर दिया, रेशम की जिंदगी में बिल्कुल भगवान जैसा इंसान लाने के लिए।
अथर्व ने रेशम का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया।
” रेशम तुम्हें याद है एक दो बार मैंने तुमसे पूछने की कोशिश की थी। वह भी सिर्फ इसलिए पूछा कि मुझे लगा अगर तुम खुद अपने साथ गुजरे हादसे के बारे में मुझे बता दोगी, तो शायद तुम मेरे साथ और सहज हो जाओगी।
लेकिन तुम उन बातों के जिक्र से ही इतनी असहज हो जाती थी कि मुझे समझ में आ गया कि अभी वह सही वक्त नहीं आया है, जब मैं तुमसे इन बातों के बारे में पूछताछ करूं।
और इसलिए मैंने भी सोचा कि अगर तुम उन बातों को भूल कर आगे बढ़ना चाहती हो, तो मुझे तुम्हारा साथ इसी बात पर देना चाहिए।
मैं हमेशा से तुम्हारे साथ था, और आगे भी हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा। मैं चाहता हूं कि तुम भी अपने जीवन में सामान्य हो जाओ। लेकिन उसके साथ ही यह भी चाहता हूं कि तुम्हारे जैसे ही बेकसूर उस आदमी को भी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए।”
इतना कहकर अथर्व अपनी जगह से खड़ा हो गया ।
उसने अखंड की तरफ देखा और उसके दोनों हाथ थाम लिये।
“माफ कीजिएगा अखंड जी, लेकिन आज तक मैं भी अनजाने में ही सही आपको जाने कितनी गालियां दी होगी नहीं पता।
कितना कोसा होगा आपको।
क्योंकि आपका नाम ही वह नाम था जिससे रेशम घबरा जाती थी, लेकिन आज मुझे मालूम चल गया है कि इस सब के पीछे आप नहीं है, लेकिन फिर भी मैं जानना चाहता हूं कि असल सच्चाई क्या है..?
आज आपको चुप नहीं रहना है, आपको बोलना होगा.. क्यूंकि आज तक आपका चुप ही था जिसके कारण सिर्फ आप ही नहीं, मेरी पत्नी भी तड़पती रही है अखंड जी.. आप बताइये की असली सच्चाई क्या है !”
अखंड की आंखे अपने आंसुओं को रोकने में प्रयास में लाल हो गयी थी.. उसके ह्रदय में जो पीड़ा उठ रही थी उसका वर्णन कर पाना उसके लिए बेहद मुश्किल हो रहा था.. ।
वो अपनी तकलीफ क्या बताता, कैसे बताता.. लेकिन आज उसे बोलना ही था..
अगर आज वो चुप रह गया तो फिर कभी नहीं बोल पायेगा…
हालाँकि उसके लिए अब भी बोलना बताना कठिन हो रहा था।
बार बार उसकी आवाज़ में नमी तैर रही थी..लेकिन उसे बोलना तो था और , यही सोच कर उसने शुरू से सब कुछ बताना शुरू कर दिया..
अखंड की बातों के बीच ही गीता भी वहाँ चली आयी.. जो बातें अखंड को भी नहीं मालूम थी, उन बातों की कड़ियों को गीता ने जोड़ना शुरू कर दिया और एक एक कर ये कड़ियाँ जुड़ती चली गयी और इसके सिरे पर जो नाम उभर के आया, वो नाम था धीरेन्द्र प्रजापति…।
सारी बातें ध्यान से सुनते बैठे यज्ञ और अथर्व की भी जाने कितनी ही बार आंखे भीगी, कितनी ही बार गुस्से से दोनों की मुट्ठियां भींच गयी, लेकिन उन दोनों ने खुद को संभाल लिया….
इन बातों को सुनने के बाद अनिर्वान के माथे पर बल पड़ गए…
गीता अखंड और रेशम की तीनो की बातो का सार यही निकल रहा था कि धीरेन्द्र से ही ये जघन्य अपराध हुआ था, और अब उसके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत भी थे..
“सर अब तो रेशम खुद तैयार है, इस केस को खुलवाने के लिए।
तो हमें धीरेन्द्र के किसी और केस को निकलवाने की ज़रूरत ही नहीं रही.. !”
गीता के ऐसा कहने पर अनिर्वान ने उसकी तरफ ध्यान से देखा..
“मैं एक बात कहना चाहता हूँ.. उस समय जब ये केस चल रहा था, तब रेशम जी के दुपट्टे और उनके आसपास फैली चीज़ो का मुआयना करवाया था मैंने…
रेशम जी ने अपने हमलावर पर अपने हाथो से प्रहार किया था… उसके बालों को पकड़ कर खींचा था, और सामने वाले को नोचने की कोशिश की थी..
अब उस वक्त रेशम और उसका परिवार ज़रूर इस केस को ज्यादा नहीं खींचना चाह्ते थे, लेकिन हमें तो केस की तह तक जाना ही था, और इसलिए उसी वक्त रेशम के नाखुनो में मिले त्वचा के नमूने और उनके कपड़ो में पाए गए बालो के नमूनों की जाँच करवाई थी मैंने..
पहला शक सभी का अखंड पर था, लेकिन ना तो रेशम के नाखूनों में पाए गए त्वचा के नमूने के डीएनए का मिलान अखंड के डीएनए से हुआ और ना ही बालों का मिलान हुआ.. इसी आधार पर अखंड निर्दोष साबित हो सका..
“हाँ तो अब क्या परेशानी है आपके पास नमूना सुरक्षित रखा है, तो अब धीरेन्द्र से मिलान करवाया जा सकता है ना ?”
यज्ञ बोल पड़ा, और अनिर्वान उसकी तरफ देखने लगा..
“उस वक्त धीरेन्द्र भी पुलिस थाने में आना जाना कर रहा था, तब मैंने उसके बालों का सेम्पल किसी तरह ले लिया था और आप सभी को सुन कर आश्चर्य होगा कि रेशम के पास से मिले डीएनए सेम्पल धीरेन्द्र के भी नहीं थे.. !”
“क्या ?” गीता के साथ साथ अखंड अथर्व यज्ञ रेशम सब अनिर्वान की तरफ देखने लगे…
“हाँ मेरी जाँच से स्पष्ट हुआ था कि अखंड का नाम ख़राब करने के लिए सारी चाल धीरेन्द्र ने ज़रूर चली थी, लेकिन उस दिन स्टोर रूम में रेशम के साथ बदतमीजी करने वाले हाथ धीरेन्द्र के नहीं थे.. हो सकता है वो उस कमरे में रहा हो, लेकिन उस के साथ कोई और भी था..।
और वैसे मेरी प्राथमिक जाँच के अनुसार रेशम के साथ बदतमीजी किसी और ने की और उसके जाने के बाद पहले धीरेन्द्र और फिर अखंड वहाँ पहुंचा !”
“लेकिन वो तीसरा आदमी कौन हो सकता है?” अथर्व ने पूछा और अनिर्वान उसकी तरफ देखने लगा..
“त्वचा और बालों की जांच की रिपोर्ट से जितना समझ में आया,, उसके अनुसार रेशम के साथ हादसे वाली जगह में कोई लड़की मौजूद थी.. !”
अनिर्वान के इतना कहते ही सब घोर आश्चर्य में डूब गए..
क्रमशः

Aakhir koun thi wo ladki jisne resham ke sath akhand ko bhi itni taklif de di 😡😡
Very interesting and Fantastic n Fabulous n Bahtareen and Lajabab part
Ab saraya bhad khul jayanga,sub clear ho jayaga.Nice n Lajabab part
पूर्वा होगी पक्का
😳😳
अखंड जैसे लड़के लाखों करोड़ों में ही एक पैदा होते हैं ठीक उसी तरह अथर्व जैसे इंसान भी लाखों करोड़ों में ही एक पैदा होते हैं कुछ ना करते हुए भी इतना बड़ा पाप अपने सर पर ले कर जीना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है और जबकि अखंड जैसा मासूम दिल का इंसान किस हद तक परेशानी और निराशा में जी रहा होगा यह बात आज समझ में आई अथर्व को सब कुछ मालूम था लेकिन वह शुरू से लेकर आखिर तक बस यही कोशिश में रहा की रेशम उसे खुद से बताएं ना कि वह कुरेद कुरेद के पूछे Itna बड़ा रहस्य खुला aj ki kisi ladki ने रेशम के साथ बदतमीजी की पर वो kon ho sakti hai
Lo ji khoda pahad aur nikli chuhiya …..yaani ladki … dheerendra ko gunahgaar samajh rhe the ….ab koi teesra aa gya ….aur ab ye ladki kon thi ….kahin Geeta hi toh nhi thi ….jo aacha banne ka shayad dikhawa kar rhi ho….ya phir koi aur
इतना सस्पेंस डाल दिए। आगे का पार्ट जल्दी शेयर कीजिए।
Very touching but suspense bhi bana diya great writing
बहुत रुला दिया आज आपने अपर्णा जी. पहले रेशम के अतीत का दुख, फिर अथर्व के अथाह प्यार और विश्वास की खुशी.
मुझे लगा था कि अथर्व के अंदर कुछ तो बात छुपी हुई है, जो ऐसे रिएक्ट किया है.
लेकिन ये लड़की कौन हो सकती है, प्लीज रेशम की दोस्त का नाम मत लेना. कोई तो ऐसी होगी जो अखंड से नफरत करती होगी. क्या वो लड़की जिसे पीजी का सीट छोड़ने के लिए अखंड ने मजबूर किया था?