जीवनसाथी -2/88

जीवनसाथी -2 भाग -88

  ये क्या है ? खुद आप सब ने इजाज़त दी थी, कहानी अपने हिसाब से लिखिए वरना मैं तो वासुकी के उसी हसीं सपने के साथ कहानी ख़त्म कर देती.. !

मैंने इसी लिए वो सपना लिखा भी था.. लेकिन आप लोगों ने कहा, नहीं मैम आप अपने हिसाब से ही कहानी आगे बढ़ाये तो बढ़ा दी….
लेकिन बाँसुरी के निर्णय से बहुतों को आपत्ति हुई है… और उसके लिए आप सब के मन से संशय दूर करने बाँसुरी खुद आप लोगों से बात करेगी…

तब तक हम चलते हैं ये देखने कि महल और वासुकी के घर में हो क्या रहा है… !!

*****

    बाँसुरी के निर्णय के बाद बाँसुरी वहीँ रह गयी…. और उसके निर्णय का सम्मान करते हुए राजा वापस लौट गया !!

   बच्ची को गोद में लिए बाँसुरी ऊपर अपने कमरे में आ गयी… नवजात बच्ची के पालन पोषण के लिए ज़रूरी सभी चीज़ो की लिस्ट तैयार कर उसने सारिका के हाथ वासुकी के पास भिजवा दी..
और दर्श सारा सामान लेने चला गया..
बच्ची को दूध पिला कर बाँसुरी ने अपनी गोद में सुला दिया…

अगली सुबह से फिर वो घर एक छोटी सी परी का आशियाना बन गया…

वासुकी जब जब अपने कमरे में नेहा को याद कर उदासी में डूब रहा होता, सारिका बच्ची को लिए उसके पास चली आती और उसकी गोद में थमा कर बाहर निकल जाती… |

बच्ची की किलकारियों के बीच फिर वो वापस मुस्कुरा  उठता.. … |

बच्ची को नहलाना, उसे तैयार करना, उसे दूध पिलाना, उसे गोद में लेकर टहलते हुए उसे लोरी सुनाना ये सब बाँसुरी के काम हो गए थे… |

सारिका हर वक्त बाँसुरी के आदेश के पालन के लिए तत्पर रहती… !
उसे भी रानी साहब, राजा साहब के साथ नहीं गयी इस बात का बेहद दुःख था ! लेकिन अब उसकी प्यारी रानी उसके सामने थी इस बात की ख़ुशी भी थी.. !

बच्ची को सब अपने अपने नामों से पुकारा करते थे..
काका जहाँ उसे गुड़िया रानी कहते वहीं सारिका उसे लड्डू बुलाती.. दर्श के लिए वो परी थी तो बाँसुरी के लिए कली …..
  एक वासुकी ही था जो उसे किसी सम्बोधन में बांध नहीं पाया था…
उसके लिए तो वो उसकी जान थी… उसका सारा आसमान थी….!

बावजूद वो उसे किसी एक नाम से नहीं बुला पाता था..!

ऐसे ही एक सुबह वो बाहर बगीचे में बैठा किसी कम्पनी के साथ चल रहें कॉन्ट्रेक्ट पर दर्श से कुछ बातचीत कर रहा था, कि बाँसुरी बच्ची को गोद में लिए सारिका के साथ वहीँ चली आई..
सारिका के हाथ में चाय की ट्रे थी.. सारिका ने टेबल पर ट्रे रख सबके सामने कप रख दिये…
काका भी वहीं कुछ काम कर रहें थे, उन्हें भी सारिका ने चाय पीने बुला लिया…

वासुकी अब भी बाँसुरी को देख खुद में सिमट जाता था.. !

बाँसुरी को वहाँ रहते सात महीने हो चुके थे, बावजूद वासुकी की पूरी कोशिश रहती की उसका बाँसुरी से आमना सामना ना हो..
वो सामने आ भी जाती तो वो नजरे झुकाये एक तरफ को निकल जाता.. !
वो किसी तरह से भी अपनी आँखों में बसे उन भावो को बाँसुरी से छिपाये रखना चाहता था जिनके कारण उसकी ज़िन्दगी में इतनी तबाही मची थी.. !

अभी भी बाँसुरी के आते ही वो कुर्सी से तुरंत खड़ा हो गया..!
और उसकी उस ततपरता को देख बाँसुरी को हंसी आ गयी..

“मिस्टर वासुकी ने तो अब भी मुझे कलेक्टर साहिबा ही समझ रखा है !”

और हॅंस कर वो एक कुर्सी खींच बैठ गयी…
बच्ची को बड़े प्यार से इसने अपनी गोद में बैठाया और उसे दूध की बॉटल पकड़ा दी…

“अब इसके लिए आप लोगों ने कुछ सोचा भी है.. ?”

वासुकी आश्चर्य से अपनी नन्ही सी गुड़िया को देखने लगा… कि अभी इसके लिए क्या सोचना है ?

बच्ची के वैक्सीनेशन से लेकर उसके कपड़ों और दूध तक का चयन बाँसुरी ही करती आई थी…
वासुकी तो जब भी उसके लिए कुछ लेकर आता बच्ची के हिसाब से बेहद गैरज़रूरी चीज़ ही उठा लाता…
कभी उस नन्ही सी जान के लिए बड़ा सा हैलीकॉप्टर खिलौना या कभी बड़ी सी सायकल !

अब बच्ची पूरे सात महीने की हो गयी थी . !

” मैं सोच रहीं हूँ अब इसका अन्नप्राशन करवाकर नाम भी रख देना चाहिए ! वैसे तो नामकरण बच्चे के जन्म के छठवें दिन हो जाना चाहिए, लेकिन उस समय जैसी परिस्थितियां थी मुझे किसी को भी टोकना अच्छा नहीं लगा !
..मिस्टर वासुकी आप सुन रहे हैं ना मेरी बात !  आप जाकर पंडित जी को ले आइए, तब तक मैं और सारिका पूजा पाठ की तैयारी कर लेते हैं ! काका आज नाश्ता मत बनाइयेगा… सब पूजा के बाद ही खाएंगे !”

बाँसुरी ने आदेश दिया और वासुकी ने सर झुका कर हामी भर दी…

लेकिन उसे ख़ूब ढूंढने पर भी उस कस्बे में उस दिन पूजा करवाने के लिए कोई पंडित नहीं मिला.. ! पता नहीं सारे के सारे उसी दिन अपना पोथा बगल में दबाये कहाँ निकल गए थे ?

दर्श के साथ गाड़ी में इधर से उधर भटकते वासुकी को जब कोई नहीं मिला तब उसने अपनी सिक्योरिटी टीम के ही एक लड़के को पकड़ कर धोती पहना कर किताबें उसके हाथ में पकड़ा दी..

“लेकिन साहब.. मुझे कहाँ कुछ आता है ?”

“तो हमारे यहाँ किस को कुछ आता है ? ये पूजा पाठ मन्त्र तंत्र हममें से भी किसी को नहीं आते..!
तू चुपचाप भगवान की फोटो के सामने बैठ जाना और पहले पानी छिड़क देना, फिर चंदन लगा कर फूल चढ़ा देना और फिर इस किताब से एक आध मन्त्र पढ़ देना.. !
बस… !!
  इससे ज्यादा क्या होता है.. ? क्यों अनिर ? ठीक है ना ?”

दर्श ने अपना संचित ज्ञान उस लड़के को पकड़ा दिया..

“उसके बाद प्रसाद भी देना होता है !”

वासुकी ने एक पंक्ति अपनी जोड़ दी.. वो लड़का अब भी इस सब झमेलों में नहीं पड़ना चाहता था, लेकिन बांसुरी के आदेश को टालने की वासुकी की भी हिम्मत नहीं थी! और उसने एक टपली लगाकर उस लड़के को अपने साथ गाड़ी में खींच कर बैठा लिया..

  अपनी धोती संभालते गिरते पड़ते पंडित जी गाड़ी में पीछे समा गए !

पीली धोती सफेद कुर्ते के साथ माथे पर तिलक लगा कर  वह लड़का खुद के अंदर के पंडित को महसूस करने की पुरज़ोर कोशिश में लगा था !
वह लोग हवेली में पहुंचे तब तक बांसुरी ने सारिका के साथ मिलकर पूजा की सारी तैयारियां कर ली थी | हॉल के एक तरफ की दीवार पर के नीचे लंबे चौड़े पाटे पर एक लाल कपड़ा बिछाकर बांसुरी ने ऊपर अपने मंदिर में सजा रखे भगवानों को नीचे पाटे पर सजा दिया था | पाटे के नीचे चौक पूर कर उसने दोनों तरफ लंबे-लंबे दीपक रख दिए थे | सामने एक तश्तरी में फल फूल और मिठाई सजा दी थी… ……
हल्दी सुपारी हवन सामग्री आम की लकड़ी किसी चीज की कोई कमी बांसुरी ने नहीं छोड़ी थी..
आखिर उसके अंदर की ब्राह्मणी जो बचपन से अपने घर पर यह सारा पूजा-पाठ, अनुष्ठान देखती आ रही थी किसी भी मौके पर कैसे चूकती…. ?

काका दूसरे मजहब के जरूर थे, लेकिन भागदौड़ करके बाँसुरी की सारी जरूरतें पूरी करते जा रहे थे…
बाँसुरी ने खुद प्रसाद बनाया था.. !
पंचामृत, पंजीरी और केला सब कुछ सहेज कर बस अब पंडित जी का इंतज़ार था..

दरवाज़े से ही पंडित जी ने जब पूजा पाठ की ऐसी विशाल तैयारी देखी तो उलटे पांव खिसकने को मचलने लगे…
और वासुकी ने उनके कंधे पकड़ उन्हें सामने की तरफ मोड़ दिया…

वो धोती संभालते गिरते पड़ते अंदर पूजा स्थल तक चले आये….

पूजा पाठ की तैयारी देख कर जाने क्यों पंडित जी को घबराहट सी हो रही थी ! वह बीच-बीच में अपने कुर्ते की बाँह से अपना माथा भी पोछते जा रहे थे..
वह जा कर पूजा स्थल पर खड़े हो गए ! बांसुरी ने खड़े होकर अभिवादन करने के बाद उन्हें उनकी आसनी दिखा दी…

” पंडित जी आप यह स्थान ग्रहण कीजिए !”

” थैंक यू !”

पंडित जी के मुंह से थैंक यू सुन कर बांसुरी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई.. उसने बाकी लोगों के बैठने के लिए भी आसन बिछवा रखा था और अपनी जगह से थोड़ी दूरी पर ही अपनी नन्हीं सी परी का पालना भी लगा रखा था ! जिसमें बच्ची आराम से सो रहीं थी…

सबको वही नीचे बैठने का इशारा कर बांसुरी अपनी जगह पर बैठ गई..

” पंडित जी शुरू कीजिये !”

“क्या शुरू करें ?”

“आवाहन पूजन आदि … !”

बाँसुरी ने कहा और पंडित जी मुड़ कर वासुकी की तरफ देखने लगे.. वासुकी के चेहरें की कठोरता देखते ही पंडित जी को दर्श का सिखाया पढ़ाया सब कुछ याद आ गया और वह पानी का कलश ढूंढने लगे..
पानी के कलश में से पानी कैसे डालें यह उनके लिए विचारणीय विषय था उन्होंने बांसुरी से चम्मच की मांग की और बांसुरी ने पूछ लिया..-” चम्मच किस लिए.. अभी तो पंचामृत स्नान में वक्त है ना ?”

“जी जी.. वो पानी चढ़ाना है सब पर.. !”

“जी.. उसके लिए ये फूल है ना !”

और बांसुरी ने 1 गेंदे का फूल कलश में डाल दिया..
पंडित जी को अब भी विचारों में डूबा देख बांसुरी ने उनसे मंत्र पढ़ने कहा और खुद ही कलश से पानी लेकर सब जगह छिड़क दिया..
पंडित जी ने इसके बाद आनन-फानन हल्दी कुमकुम फूल वगैरह चढ़ाएं और प्रणाम करने लगे..
आंखें बंद कर वो होठों ही होठों में कुछ बुदबुदाने का अभिनय करते रहे और पंडित जी को देखकर बांसुरी ने भी हाथ जोड़ लिये..

” आप थोड़ा जल्दी में लग रहे हैं… शायद कहीं और भी पूजा करवाने जाना होगा ! चलिए कोई बात नहीं, अब आप कथा पढ़कर सुना दीजिए..!”

पंडित जी ने अपने गले की थूक निगली और दर्श की दी हुई किताब को अपने झोले में से निकाल कर पढ़ने जा रहे थे कि बांसुरी की नजर उस किताब पर पड़ गई और उसने एक बार फिर पंडित जी को टोक दिया….

” यह क्या.. ? यह तो वैभव लक्ष्मी व्रत कथा है पंडित जी ! हमें तो यहाँ सत्यनारायण जी की कथा करनी है!”

पंडित जी ने एक बार फिर अपने माथे का पसीना पोछा और वासुकी की तरफ देखने लगा वासुकी ने उसे घूर कर वापस किताब की तरफ इशारा कर दिया…

“जी.. ! मैं इसी में से कथा पढ़ लूंगा !”

” इसमें से कैसे ? वैसे तो आपको कथा याद होगी.. तो ठीक है आप ऐसा कीजिये सिर्फ संस्कृत वाली कथा पढ़ लीजिये !”

पंडित जी की हालत ख़राब हो रहीं थी..
उसे वासुकी की खौलती आँखों को देखने में जितना डर लग रहा था उससे कहीं ज्यादा अब उसे बाँसुरी की चित्र विचित्र बातों को सुन कर लग रहा था…

बाँसुरी की बातें उसे किसी दूसरे लोक की लग रहीं थी..

“रुकिए मैं मेरे पास की किताब लेकर आती हूँ !”

बाँसुरी अपनी जगह से उठते उठते रह गयी..

“अरे मैं पूजा में बैठ गयी हूँ.. सारिका ऊपर मेरे मंदिर में देखना सत्यनारायण व्रत कथा मिल जायेगी.. लेती आना !”

सारिका उठ कर किताब ले आयी..
पंडित जी ने किताब बड़े ध्यान से खोली और संस्कृत में लिखें श्लोक देख कर उन्हें सारा ब्रम्हांड आँखों के सामने घूमता दिख गया..

इंग्लिश भले ही फनी लेंग्वेज हो सकती है पर संस्कृत कहीं से फनी नहीं लग रहीं थी…..

उस दिन पहली बार पंडित जी को अपने घर वालों और प्राथमिक शाला के आचार्यों पर ज़बरदस्त गुस्सा आने लगा की अगर वो बचपन में जब बालक था और पढ़ना नहीं भी चाहता था तो उसकी कुटाई कर के उसे क्यों नहीं पढ़ाया लिखाया गया… कम से कम आज की शर्मिंदगी से तो बच जाता !

नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकादयः ।
प्रपच्छुर्मुनयः सर्वे सूतं पौराणिकं खलु ॥1॥

ये पंक्तियाँ देख कर पंडित जी के हृदय में जो हाहाकार मचा उन्हें लगा एक छलांग लगा कर वो सीधा अपने पुश्तैनी गाँव भाग जायें…
लेकिन वासुकी की लाल आँखों का खौफ उसे चुपचाप बैठे रहने को बाध्य कर गया.. !
उसने एक शब्द बोल कर ही खाँसना शुरू कर दिया.. और पंडित जी के लिए पानी का ग्लास लेने के लिए उठती बांसुरी एक बार फिर पूजा में बैठी है यह सोच कर बैठी रह गई और सारिका से पानी मंगवा लिया…

“पंडित जी अब ठीक लग रहा है तो शुरू कीजिये.. आप ऐसा करें आपको ज्यादा बोलने में तकलीफ है तो आप सिर्फ संस्कृत श्लोक पढ़ लें !”

पंडित जी इधर गिरूं की उधर गिरूं,  इसी विचार में मगन थे..
अब उनके दिमाग में यही चल रहा था कि इस सामने बैठी पंडिताइन से बचने का एक ही उपाय है कि वह चक्कर खाने का बहाना बना कर लुढ़क जाए…
उन्होंने अपने माथे को धीरे-धीरे दबाना शुरू किया और उन्हें देखकर बांसुरी ने एक नजर वासुकी और दर्श पर डाली और उसके बाद पंडित जी की तरफ मुंह कर उनसे बोल उठी..

” पंडित जी लगता है आपकी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब है लाइए वह किताब दीजिए कथा मैं ही पढ़ लेती हूं..!
वैसे भी मेरे पापा हमेशा कहा करते थे कि अगर पूजा पाठ के लिए यथोचित ब्राह्मण या पंडित उपलब्ध ना हो तो जो भी पूरी श्रद्धा और भावना से पूजा करने के लिए आसन पर बैठता है वही उस समय पंडित हो जाता है ! और फिर देखा जाए तो जन्म से तो ब्राह्मण ही हूं ही भले ही शादी के बाद राजपूत हो गई हूं..!”

शादी का जिक्र आते ही बांसुरी के चेहरे पर एक लाज भरी भीनी सी मुस्कान आ गई और उसने पंडित जी की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया !
पंडित जी ने पूरी आतुरता के साथ और पूरे सम्मान के साथ सत्यनारायण व्रत कथा की पुस्तक बांसुरी को सौंप दी और बांसुरी अपने सर पर से आंचल लेकर पुस्तक को प्रणाम कर उसमें से कथा का पाठ करने लगी…

वह कथा पढ़ती जा रही थी और आसपास बैठे सभी  मंत्रमुग्ध से उसके मुंह से कथा सुनते हुए विभोर हुए जा रहे थे….

उसी समय झूले में लेटी हुई नन्हीं सी बच्ची जाग गयी  और रोने लगी.. जब तक कोई और उठ कर उसे संभाल पाता बांसुरी एक झटके में खड़ी हुई और बच्ची को अपनी गोद में लिए वापस अपनी आसनी पर आकर बैठ गई !
   उसकी गोद में आते ही बांसुरी की चिरपरिचित खुशबू और उसकी गोद की गर्माहट महसूस होते ही बच्ची  एक बार फिर नींद के झोंके में चली गयी  और वासुकी सामने बैठी उस कर्तव्य परायण पंडिताइन को देखता रह गया जो अभी कुछ देर पहले ही बाकी कामों के लिए उठते उठते रह गई थी..
लेकिन अभी उस नन्ही परी के लिए वह पूजा के बीच में भी उठ कर चली गई…..

गोद में बच्ची को लिए बाकी की पूजा बाँसुरी ने सम्पन्न की और आरती के लिए अपने साथ साथ सबको खड़ा कर दिया…

जाने कब से वासुकी और दर्श ने अपना यह आशियाना बनाया था लेकिन इतने सालों में शायद आज वो पहला दिन था, जब इस घर में सत्यनारायण की पूजा और हवन संपन्न हुआ था ! सब कुछ निपटने के बाद बांसुरी ने पंडित जी से कहकर सभी के माथे पर तिलक करवाया और हाथों में रक्षा सूत्र बंधवा दिया…

” पंडित जी अब मेरी इस प्यारी सी कली का एक कोई प्यारा सा नाम भी रख दीजिए..!”

पंडित जी ऊपरी तौर पर मुस्कुरा तो रहे थे लेकिन वह यह भी जानते थे कि यह बच्ची वासुकी की थी और वासुकी की बेटी का नाम रखने की उनकी मजाल नहीं थी..

” आप लोगों में जो भी सबसे बड़ा है, वह बच्चे का नाम रख दे… अपने हिसाब से..
कोई परेशानी की बात नहीं है !”

बांसुरी ने पीछे खड़े काका की तरफ देखा और उन्हें भी सामने अपने पास बुला लिया.. और बच्ची को वासुकी की गोद में पकड़ा दिया..

” मिस्टर वासुकी ये आपकी बेटी है, आप अपनी मर्जी से कोई प्यारा सा नाम रख दीजिए ! क्योंकि अब बहुत हो गया..
हम सब इसे अलग अलग नाम से बुलाते हैं, कल को यह थोड़ी बड़ी होगी तो अपना ही नाम पहचानने में कंफ्यूज होने लगेगी ! इसलिए इसका कोई एक नाम रखना जरूरी है..!”

वासुकी अपनी बाहों में उस मक्खन के गोले को लेकर उसके चेहरे को देखते हुए खो सा गया..
उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान चली आई और उसने उसके माथे को चूम लिया…

” बिल्कुल सुबह की हवा सी ताज़गी और  बेइंतहा खूबसूरती समेटे हुए हैं हमारी बच्ची… हमारी आँखों का नूर है ये ” काका की इस बात को सुनकर वासुकी ने एक नजर काका को देखा और वापस अपनी लाडली को देखने लगा..

” काका अगर आप रखते तो इसका नाम क्या रखते ?”

” अगर मुझसे पूछोगे तो मैं इसका नाम सुबह की हवा यानी सबा रखना पसंद करता, लेकिन आप लोग बड़े लोग हो, आप अपने हिसाब से ही इसका नाम रखिए..!”

“सबा…. इसका नाम आज से सबा है !” वासुकी ने कह दिया

बांसुरी ने वासुकी से कहा कि उसके कान में उसका नाम बोल दीजिए.. वासुकी ने अपने लख्ते जिगर को अपनी बाहों में बड़े प्यार से समेटे हुए उसे अपने पास लिया  और उसके कान में धीरे से उसका नाम गुनगुना गया..

” मेरी सोना मेरी लाडली आज से तुम्हारा नाम सबा होता है !”

बच्चे का नामकरण निपटा कर बांसुरी ने सभी को प्रसाद बांटा और बच्ची को एक बार फिर गोद में लेकर बैठ गई..
सारिका से कहकर उसने खीर की कटोरी मंगवाई और चम्मच में खीर लेकर वासुकी की तरफ देखा…

” मिस्टर वासुकी सबा का मुंह भी जूठा करवा दीजिए..!”

“वो आपका काम है मैडम !”

वासुकी अब भी बांसुरी को मैडम कहकर पुकारता था.. इसके अलावा उसे बांसुरी के लिए और कोई संबोधन समझ में नहीं आता था…
वासुकी की बात सुनकर बांसुरी ने धीरे से चम्मच में थोड़ी सी खीर ली और सबा के मुंह में लगा दी..
छोटी सी सबा अपने मुंह में एक स्वाद घुलते ही और खाने की इच्छा दिखाते हुए अपने मुंह को चलाने लगी और मुस्कुराकर बांसुरी ने थोड़ी सी और खीर उसे चटा दी……

पूजा पाठ का सारा तामझाम निपटते ही बांसुरी ने पंडित जी को दान दक्षिणा देकर वहां से विदा किया और वासुकी और दर्श उसे लेकर वहां से बाहर निकल गए….

बाहर निकलते ही वो वासुकी के चरणों में गिर गया..

“माफ़ कर दीजिये साहब !”

उसी समय बाँसुरी किसी काम से बाहर चली आयी..

“अरे पंडित जी !! ये चश्मा रह गया था आपका.. !”

बाँसुरी की आवाज़ सुनते ही वासुकी ने तुरंत उसे खींच तान कर सीधा खड़ा कर दिया..

बाँसुरी आश्चर्य से उन लोगों को देखने लगी.. उसे एकाएक समझ नहीं आया कि हो क्या रहा है? और दर्श तुरंत सफाई देने लगा..

“वो पैर छूने लगा… !”

“हाँ हाँ पंडित जी भले ही उम्र में छोटे हैं पर उनके पैर तो छूने ही चाहिए.. आप दोनों आशीर्वाद ले लीजिये.. !”

वासुकी ने घूर कर उस पंडित को देखा और उस के ना ना में गर्दन हिलने के बावजूद वासुकी और दर्श ने उसके पैर छुए और उसे साथ लिए गाड़ी में निकल गए..

उन लोगों के निकलते ही हवेली के गार्डन का लम्बा चौड़ा गेट बंद हो गया…
वासुकी ने अपने ऑफ़िस की तरफ गाड़ी मोड़ ली, लेकिन मोड़ के दूसरी तरफ खड़ी उस लम्बी सी गाड़ी पर वासुकी का ध्यान चला गया..
ये गाड़ी उसने पहले भी यहाँ देख रखी थी..
फ़िलहाल उसे ऑफ़िस में कोई ज़रूरी काम था इसलिए वो निकल गया…

बच्ची को खिला पिला कर उसे गोद में लिए गाना सुनाते हुए बाँसुरी सुलाने की कोशिश में लग गयी..

“महरूम थे…
   उलझे सवालों के जायज़ जवाब मिले ना…
   कुछ गम के थे साए जो सड़कों पर
   ढूंढे मीलों तक मिले ना….

*****

इधर बहुत दिनों बाद निरमा के बहुत बुलाने पर राजा शाम की चाय पीने के लिए निरमा के घर गया हुआ था बगीचे में निरमा और समर के साथ बैठा राजा चाय पी रहा था..
वहीं बगीचे में एक तरफ अपने खिलौने फैलाए मीठी खेल रही थी..
प्रेम शौर्य को लेकर जाने कहां गायब था.. ?

महल में बाकी किसी को बांसुरी के निर्णय की खबर नहीं लग पाई थी, लेकिन प्रेम अपनी आदत से मजबूर निरमा से झूठ नहीं बोल पाया था और इसलिए निरमा को बांसुरी के बारे में मालूम चल गया था ! आज निरमा उसी बात के लिए राजा को आड़े हाथों ले रही थी…

” आदर्श पति होना बहुत अच्छी बात होती है राजा भैया,  लेकिन आपने तो मेरी सहेली को सर पर बैठा रखा है ! उसने कुछ भी निर्णय ले लिया और आप ने मान लिया ? आप उसे वैसे ही छोड़कर चले आए, एक बार यह भी नहीं सोचा कि शौर्य का क्या होगा…?”

” शौर्य के लिए आप मौजूद है भाभी..!”

अबकी बार समर ने निरमा की बात का जवाब दे दिया और निरमा उसे घूर कर देखने लगी…-”  एक तो मैं आप दोनों से परेशान हूं ! राजा साहब कोई भी निर्णय लें उनके हर निर्णय में आंख मूंदकर आप दोनों उनका साथ देने के लिए कूद पड़ते हैं.. ! यह गलत बात है समर भाई साहब!”

” आप है ना, समय-समय पर हम तीनों की गलतियां बताकर सुधारते रहने के लिए..! बस एक बात का ध्यान रखिएगा कि पिया से कुछ भी मत कहिएगा..!”

” वाह वाह मतलब रियासत के मंत्री जी भी अपनी पत्नी से दबते और डरते हैं..!”

निरमा की इस बात पर राजा हल्के से मुस्कुरा उठा..

“हम तीनों ही दोस्तों में से ऐसा कौन है जो, अ

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