जीवनसाथी- 2/72

सुनील अपने घर पहुँच चुका था, और यहाँ पहुँचने के बाद उसके अंदर का ज्वालामुखी और भी ज्यादा धधकने लगा था… हर एक पल उसे अपना खोया हुआ रुतबा, अपनी खोयी हुई आन और अपने पिता याद आ रहे थे..
और हर एक याद उसके हृदय को नासूर सा घाव देती जा रही थीं…
  
    उसके दिल दिमाग पर वासुकी से बदले का भूत इस कदर सवार हो चुका था कि सोते जागते उसके दिमाग में बस वासुकी ही छाया हुआ था…
  उसने वहाँ पहुँचते ही अपने आदमियों को उसकी खोजखबर के लिए भेज दिया था…
लेकिन अजब इत्तेफाक था कि वासुकी से मिल चुके लोगों के पास भी वासुकी की कोई तस्वीर नहीं थीं…

  उसके लोग इसी खोजबीन में लगे थे और सुनील अपने ऑफ़िस में बैठा वो अपना बिखरा काम समेट रहा था कि उसकी माँ का फ़ोन चला आया…

“तुम अब तक वहाँ बैठे कर क्या रहे हो सुनील.. ?”

“आप चिंता ना करें, मैं कोशिश में लगा हुआ हूँ मॉम .. !”

“क्या फ़ायदा, तुम्हारी कोशिशों का.. ? हमें तो लगा था तुम इण्डिया वापस आते ही हमारा बदला ले लोगे, लेकिन तुम तो पता नही कहाँ उलझे पड़े हो.. ?
वक्त बीतता जा रहा है और तुम अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे हो.. !  पहले ही तुम्हारे बाप ने कम गलतियां नहीं की, अच्छा खासा हमारा बिजनेस चल रहा था…!  सिर्फ ड्रग्स  के काम में ही हाथ आजमाते हुए हम काफ़ी आगे पहुँचते जा रहे थे..  लेकिन तुम्हारे बाप के दिमाग में जाने क्या फितूर सवार था |
   उन्हें जंगल भी काटने थे, माइंस भी खोदनी थीं,  उन्हें लकड़ियों की भी तस्करी करनी थी और इसी सब में खुद को ले डूबे..!
   हमने  जाने कितनी बार उन्हें समझाने की कोशिश की थी बाकी के कामों में कुछ नहीं रखा है ! हम आराम से तुम्हारे पास पहुंच कर वहीं बैठे-बैठे इंडिया में अपना कारोबार चला सकते हैं | लेकिन उन्हें तो अपना मेल ईगो सैटिस्फाई  करने की पड़ी हुई थी जो उस कलेक्टरनी के पीछे पड़ गए…
     उसकी नजर में पडे बिना भी हम लोग आराम से अपना काम कर सकते थे ! तुम्हारे बाप को मैंने 100 बार समझाया था लेकिन वह ज़बरदस्ती  उससे उलझते रहे और देखो नतीजा क्या निकला..?
   अब किसी भी हाल में हमें उस औरत के मौत की खबर सुननी है… अगर यह काम तुम्हारे बस का नहीं है तो हम खुद भी यह काम पूरा कर सकते हैं ! हमें हम पर और हमारी गन पर पूरा यकीन है..!   हमारे दिल को उन दोनों की लाश देखने के बाद ही तसल्ली मिलेगी और हमने पहले से सोच रखा है वासुकी और बांसुरी को मारने के बाद हम अपना सारा कारोबार यहां अपने भाई को समझा कर तुम्हारे साथ वापस चले जाएंगे..!
वहां से हमें कैनाडा जाना है और वहीँ से हम अपना आगे का कारोबार करेंगे…!
हम अपने स्तर पर उन दोनों को ढूंढ कर अब तक मौत के घाट उतार चुके होते, अगर तुमने हमें कसम देकर ना रोका होता | लेकिन अब हमारे सब्र का बांध टूटा जा रहा है क्योंकि तुम हाथ पर हाथ धरे बैठे हो और वक्त बीता जा रहा है | अगर ऐसा ही चलता रहा तो दिन बीतते जाएंगे और तुम कुछ नहीं कर पाओगे सुनील ! कभी-कभी हमें यकीन नहीं होता कि तुम  हमारा खून हो !  तुम्हारे बाप से शादी होने से पहले हम पर दो मडर्स के चार्ज लगे थे और वह दोनों हमारे घर के खास नौकर थे !
अपनी शादी और माँ बनने के बाद भी हम नहीं सुधरे तो अब हमें कौन रोक सकता है… ? तुम बस एक बार हमें  बता दो कि यह काम तुम्हारे बस का नहीं है तो हम खुद उन दोनों को देख लेंगे..!”

“नहीं मॉम ऐसी बात नहीं है… मैं अपने स्तर पर उसे ढूंढने की कोशिश में हूँ लेकिन… “

“लेकिन क्या सुनील.. ? ऐसा ही चलता रहा तो वक्त बीतता जायेगा वो लोग अपने में मग्न रहेंगे और तुम अपनी कोशिशों में लगे रहना.. ! तुम्हें अब तक उस जल्लाद के बारे में कोई ठोस खबर हाथ नहीं लगी है, ये हम जानते हैं…
तुमसे ज्यादा तो हमारा नेटवर्क स्ट्रांग है… तुम्हें जो वहाँ उसी शहर में रहते हुए नहीं पता वो यहाँ बैठे हमें  पता चल गया है…
  उस जल्लाद और रानी के बीच कोई खिचड़ी तो पक रही है ! हम तुम्हें कुछ तस्वीरें भेज रहे हैं… उन तस्वीरो को देख कर ऐसा लग रहा है जैसे वो रानी अपने राजा साहब  को धोखा दें रही है ! “

अपनी माँ की बात सुन सुनील आश्चर्य में पड़ गया.. उसने तुरंत अपनी माँ की भेजी तस्वीरें देखी…  उन तस्वीरों में वासुकी और बांसुरी एक साथ नजर आ तो रहे थे लेकिन दोनों के ही चेहरे स्पष्ट नहीं थे..

वह उन तस्वीरों को जूम करके चेहरे पहचानने  की कोशिश में था कि तभी सुनील का एक आदमी वहां चला आया..

“सर एक खबर मिली है.. !”

“क्या.. ?”

“रानी साहेब, यहीं इसी शहर में हैं !”

  आश्चर्य से सुनील के माथे पर बल पड़ गए, क्योंकि उसे यही मालूम था कि रानी साहेब अपने राजा जी के साथ महल में रह रही हैं | फिर महल से इतनी दूर अपने पति को छोड़कर रानी यहां क्या कर सकती है..?

” ऐसा कैसे हो सकता है हमें तो पक्की खबर मिली है कि महारानी साहेब अपने महल में ही है..!”

उस आदमी ने बांसुरी की कुछ तस्वीरें सुनील के सामने फेंक दी…
यह तस्वीरें कुछ समय पहले की तस्वीरें थी जिनमें बांसुरी राजा के साथ नजर आ रही थी..
उन तस्वीरों को देखकर सुनील सोच में पड़ गया और वह सामने खड़े आदमी की तरफ देखने लगा…

“ये तस्वीरें कब की है.. ?”

“तस्वीरें तो पुरानी हैं,  ये तो आपको इसलिए दिखा रहे कि आप रानी साहब को पहचान सके… ! ध्यान से देख लीजिये.. !”

सुनील ने बाँसुरी की तस्वीर देखी तो थीं लेकिन उसे हलकी सी झलक बस याद थीं… वो इस तस्वीर को देखने के बाद कुछ समय के लिए देखता ही रह गया…
बाँसुरी को देखता वो अपने विचारों में खोया था कि सामने खड़े उस आदमी ने सुनील को झकझोर दिया..

“क्या सोच रहे हैं सर… अभी मेरे एक आदमी ने  रानी हुकुम को एक पुरानी कोठी के टेरेस पर देख कर ही मुझे फ़ोन किया था…. आप यक़ीन मानिये मेरा वो आदमी गैंग में सबसे पुराना और वफादार है.. उसने मुझे फ़ोन कर के कहा कि आप लोग जिस रानी की तलाश में हैं वो यहीं हैं… !”

सुनील कुछ सोचने लगा…

“उस आदमी से बात करवाओ मेरी.. !”

“जी !”

उसने तुरंत अपने आदमी को फोन लगाया और  उससे रानी साहब के बारे में पूछताछ करने लगा..

“दीन ये सुनील सर तुमसे बात करना चाहते हैं.. !”

और गिरधर ने फ़ोन सुनील की तरफ बढ़ा दिया…

“क्या बोल रहे थे दीन ?  क्या वाकई रानी बांसुरी  को तुमने देखा है..?”

” जी सर मैं इस वक्त उनके हवेली के ठीक सामने खड़ा हूं और टेरेस पर रानी साहब इधर से उधर टहल रही हैं उनके  हाथ में एक कप है, शायद चाय या कॉफी है जो वह पी रही हैं… हमारा फोन जरा पुराने तरीके का है वरना हम इसमें तस्वीर उतार कर आपको भेज देते …!”

” कोई बात नहीं तुम कहां पर हो, अपना एड्रेस बताओ.. मैं इसी वक्त वहाँ पहुंच जाऊंगा..!”

” जी सर!”

इतना कहकर दीन ने सुनील को अपना पूरा पता सिलसिलेवार बता दिया और पता सुनते हुए ही सुनील भागकर अपनी गाड़ी तक पहुंच गया |  उसने अपना फोन स्पीकर में डाल दिया था और उसके बताए अनुसार ड्राइवर ने गाड़ी भगा दी…
बदले की आग में जलते सुनील का पूरा ध्यान वासुकी को मारने पर लगा हुआ था और इसीलिए वह वासुकी के शहर में आ चुका था | यही वह शहर था जहां पर सुनील के पिता ने अपना सारा कारोबार जमाया था, और जहां से वासुकी ने उसके पिता की जड़ें खोद कर उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया था..
वासुकी और बांसुरी से बदला लेने के लिए सुनील तड़प रहा था और इसीलिए वह चाहता था पहले वासुकी को मारने के बाद वापस रियासत में लौटकर रानी बांसुरी को भी मार डालेगा लेकिन आज अचानक बांसुरी की तस्वीरें देखने के बाद उसका मन बदलने लगा था…
    और जैसे ही उसने यह सुना कि बांसुरी यहीं इसी शहर में मौजूद है वह बांसुरी की तलाश में निकल गया…

गिरधर भी सुनील के साथ मौजूद था सुनील बाहर निकला उसके आदमी भी दूसरी गाड़ी में बैठने लगे लेकिन उसने इशारे से सब को अपने साथ आने से मना कर दिया | अपनी लोडेड गन उसने अपने साथ ही रखी थी..

” क्या मतलब ? क्या आप रानी साहब को इसी वक्त मार देना चाहते हैं?”

सुनील ने एक गहरी सी नजर साथ बैठे गिरधर पर डाली और धीरे से गर्दन ना में हिला कर तिरछा मुस्कुरा उठा…

कहते हैं  इंसान कितना भी बदशक्ल हो,  लेकिन अगर वह मुस्कुराता है तब उस वक्त वह सुंदर ही दिखने लगता है ! लेकिन सुनील के साथ ऐसा नहीं था | उसकी तिरछी मुस्कान उसके चेहरे की कुटिलता को और भी ज्यादा बढ़ा देती थी |  उसकी छोटी छोटी आंखें दंभ से चमकने लगी और उसने अपनी जुबान से जहर उगलना शुरू कर दिया..

” पहले इस रानी को इतना ध्यान से देखा नहीं था हमने..!  यह रानी मारने के लायक नहीं बल्कि अपने पास सजाकर रखने लायक है!
इन्हें देखने के बाद अब समझ में आ रहा है कि क्यों हर कोई उनके पीछे दीवाना हुआ जाता है…
इन्हें देखने के बाद अब मैंने अपना इरादा बदल दिया है अब इन्हें जान से नहीं मारना इन्हें तो मैं अपने साथ सात समंदर पार ले जाऊंगा…!”

साथ बैठे गिरधर की आंखें फटी की फटी रह गयी… ये आदमी पहले सुनील  के पिता के लिए काम किया करता था और वासुकी के फौलादी व्यक्तित्व से परिचित था | उसे अच्छे से याद था कि उसके बड़े भाई को एक थप्पड़ मार कर वासुकी  ने हमेशा हमेशा के लिए उसे वज्र बहरा बना दिया था..!

उसने सुनील के ऊपर अपना डर जाहिर नहीं होने दिया और चुपचाप बैठ गया उनकी गाड़ी तेजी से भागती हुई उस हवेली की तरफ बढ़ गई…!

वो लोग हवेली के उस हिस्से  की तरफ बढ़ गए जिधर दीन खड़ा हवेली पर नजर रखे हुए था….
गाड़ी से उतरकर गिरधर के साथ तेज कदमों से चलते हुए सुनील भी दीन के पास पहुंच गया  और उसी वक्त  उसने छत की तरफ इशारा कर दिया..
लेकिन इत्तेफाक से सुनील की नजर जब तक छत पर पड़ती उस वक्त तक बांसुरी वहां से हट चुकी थी और उसकी जगह सारिका खड़ी थी..
किसी काम से सारिका छत पर से पीछे की तरफ मुड़ी और उसका चेहरा नजर आते ही सुनील के चेहरे का रंग बदलने लगा | उसने  गिरधर की तरफ देखा और गिरधर और सुनील ने एक साथ दीन की तरफ देखा…

दीन की नजर इस वक्त छत पर नहीं बल्कि सुनील की तरफ थी | उसे लगा था सुनील को साक्षात रानी साहिब के दर्शन करवाने के बदले में उसे बहुत बड़ा पुरस्कार मिलेगा, और इसीलिए वह खुशी से मुस्कुरा रहा था |  लेकिन जैसे ही सुनील ने छत पर खड़ी सारिका को देखा गुस्से में गिरधर को देखने के बाद उसने दीन की तरफ देखा और उस के मोटे चश्मे पर नजर पड़ते ही सुनील  के अंदर लावा उबलने लगा…

” कहां देखा था तुमने रानी साहब को..?

” बस यही सामने,उस  छत पर खड़ी देखा था | वह देखिये… वह अब भी  खड़ी है… !”

सारिका अब भी छत पर ही खड़ी थी लेकिन अब उसकी पीठ सुनील की तरफ थी…
सुनील ने गुस्से में पलट कर दीन की तरफ देखा और उसके चश्मे को अपने हाथ में ले लिया..

” उम्र क्या है तुम्हारी..?

” हुज़ूर अगले फागुन में पूरे 80 बरस का हो जाऊंगा..!”

” बधाई हो.. ! और तुम्हारे चश्मे का नंबर क्या है..!”

” चश्मे का नंबर तो अभी याद नहीं आ रहा हुजूर पर हां बिना चश्मे के हम आपको भी नहीं पहचान पाएंगे..!”

हां में सर हिलाते हुए सुनील वापस गाड़ी की तरफ मुड़कर जाने लगा और सुनील की नाराजगी देखकर घबराया हुआ सा गिरधर भी उसके पीछे तेज कदमों से भागने लगा | दीन  उन लोगों को आवाज दने लगा,  लेकिन उसकी बात सुने बिना ही सुनील आगे बढ़ गया और गिरधर ने पलटकर गुस्से में दीन को दो कड़ी बातें सुना दी…
” अरे कक्का जब ठीक से दिखाई नहीं देता तो झूठ बोलेने की क्या जरूरत थी ? सुनील साहब गुस्सा हो गए ना ! वह किसी जरूरी मीटिंग में जाने वाले थे, उसे छोड़कर रानी साहब को देखने के लिए यहां चले आए थे और तुम घोंचू टाइप का काम कर गए.. !
ले देकर मौका मिला था शेखावत साहब के बेटे को पटाने का और तुमने सब गुड गोबर कर दिया..!”

” गिरधर मेरी बात पर विश्वास कर, रानी साहब यही इसी कोठी में मौजूद हैं और आज पहली बार नहीं है कि मैंने उन्हें देखा है |  इसके पहले भी वह कई बार मुझे इस टेरेस पर दिखाई दे चुकी हैं..!”

गिरधर  ने दीन की तरफ अविश्वास भरी नजरों से देखा और सुनील की तरफ तेज कदम बढ़ाते हुए आगे बढ़ गया | दीन उन दोनों को जाते हुए देखता रहा, लेकिन उसे अपने खुद के ऊपर पूरा विश्वास था कि उसकी आंखें धोखा नहीं खा सकती ! भले ही उसे बुढ़ापे के कारण बहुत ज्यादा पावर का चश्मा चढ़ चुका है, बावजूद वो रानी साहब को पहचानने में भूल नहीं कर सकता…!”

अपने दांत पीसता हुआ सुनील अपनी गाड़ी में जा बैठा और गिरधर के सुनील के पास पहुंचते तक में सुनील ने ड्राइवर से कहकर गाड़ी आगे बढ़वा दी !  गिरधर हाथ  मलता वहीं खड़ा रह गया…|

शेखावत के समय में भी वह शेखावत का बहुत करीबी नहीं बन पाया था, लेकिन अब सुनील के आने पर वह खुद से आगे आगे बढ़कर सुनील का खास हो जाना चाहता था | लेकिन उसे किसी भी तरीके से यह मौका नहीं मिल पा रहा था..|

और आज एक बार फिर वही हुआ था…|
  वह धीरे-धीरे रास्ते पर आगे बढ़ने लगा कि तभी उसे दीन की आवाज सुनाई पड़ी |  दीन उसे वापस बुला रहा था यह बोल कर के देखो रानी साहब छत पर खड़ी है… उस वक्त वाकई सारिका की जगह बांसुरी छत पर मौजूद थी लेकिन गिरधर ने सोचा कि यह बुड्ढा अपने पागलपन में  कुछ भी प्रलाप कर रहा है | यह सोच कर उसकी बात पर ध्यान दिए बिना गिरधर अपने रास्ते आगे बढ़ता चला गया……

*****

पिया पंखुड़ी के साथ उसके घर पहुँच चुकी थीं… पंखुड़ी की माँ रसोई में व्यस्त थीं… और पंखुड़ी अपने कमरे में..
पंखुड़ी की माँ ने अपनी बहुत सुन्दर सी मेहरून शिफॉन की साड़ी उसके लिए निकाल रखी थीं…
साड़ी देख कर पंखुड़ी ने पिया को देखा और मुहँ बना लिया…

“क्या हुआ,? साड़ी तो बहुत सुंदर लग रही है.. !”

“हाँ लेकिन मैं कहाँ कम्फर्टेबल होती हूँ साड़ी में.. ?”

“ज़िन्दगी में हर चीज़ अपनी कम्फर्ट के लिए नहीं की जाती पाखी.. |
माना कि आजकल लोग अपने आप को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानने लगे है, अपनी ख़ुशी अपने कम्फर्ट के आगे किसी को कुछ नहीं समझते लेकिन इतनी आत्ममुग्धता क्या सही है ?
मैं ये नहीं कहती कि बात बात पर समझौते करो, लेकिन जहाँ गुंजाइश है वहाँ तो किया ही जा सकता है…
अगर हम दूसरों की ख़ुशी के लिए एक कदम उठाते है तो भगवान हमें हमारे इस एक नेक काम के बदले ढ़ेर सारी नेमतों से नवाज़ते हैं, ये मेरा विश्वास है ! मैंने खुद देखा है.. !
अब अगर आंटी तेरे साड़ी पहन लेने से खुश हो जाती हैं तो पहन लें ना यार ! कौन सा बड़ा पहाड़ टूट जायेगा..
और वैसे भी ये शिफॉन की साड़ियां भी अलग ही रोमांस जगाती हैं… !”

पिया ने धीरे से अपनी एक ऑंख पंखुड़ी को देख कर  दबा दी….

पंखुड़ी के चेहरे पर भी मुस्कान तैर गयी… उसी वक्त फ्लैट के दरवाज़े की बेल बजी और पंखुड़ी को वहीँ छोड़ पिया बाहर निकल गयी….

दरवाज़ा उसी ने जाकर खोला ! दरवाज़े पर एक भद्र सा पति पत्नी का जोड़ा खड़ा था ! उन लोगों ने पिया को देख अपने हाथ जोड़ दिये.. पिया भी मुस्कुरा कर उन लोगों को अंदर लें गयी… !
रसोई से हाथ पोंछती पंखुड़ी की माँ बाहर चली आई !
उन लोगों को देख बड़े आदर से पंखुड़ी की माँ ने उन लोगों का स्वागत किया और उन्हें बैठा दिया…
  तब तक पंखुड़ी के पिता भी बाहर चले आये !

“बस आप दोनों ही आये हैं.. ?”

“नहीं बेटा आ रहा है.. वो गाड़ी पार्किंग में लें गया तब तक में हम लोग यहाँ चले आये.. !”

पंखुड़ी ने कमरे के दरवाज़े से झांक कर देखा उसी वक्त दरवाज़े से शेखर और रिदान भीतर चले आये…

शेखर को देखते ही पंखुड़ी के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान चली आई और वो लजाती हुई सी बाहर चली आई…
उसे देख शेखर भी अपनी जगह पर खड़ा हो गया.. पिया भी शेखर से मिल चुकी थीं….!
लेकिन शेखर पिया पंखुड़ी किसी ने भी वहाँ बैठे बड़ों के सामने ये ज़ाहिर नहीं होने दिया और चुप ही बैठे रहे !
पिया पंखुड़ी की माँ के साथ खाने पीने का सामान सजाने लगी |
  शेखर के माता पिता पंखुड़ी के माता पिता से बातचीत करने लगे और शेखर चुप चाप सबकी नजर बचा कर पंखुड़ी को देखने में लगा था..
लेकिन इत्तेफाक से जब जब वो उसकी तरफ देखता  उसे खुद की तरफ देखता पा कर नज़र फेर लेता…
उसी समय चाय लिए पिया वहाँ चली आई…

“अगर आप लोगों को सही लगे तो ये दोनों वहाँ बालकनी में चाय पी लेंगे.. !”

पिया की बात पर किसी को भी ऐतराज़ नहीं हुआ और शेखर और पंखुड़ी बालकनी में चले गए…

वो दोनों ही अपनी अपनी चाय के  कप पकडे चुप ही खड़े थे..
पंखुड़ी ने पहले ही अपनी माँ को कह रखा था की सबकी चाय के साथ वो उसे कॉफ़ी पकड़ा दें लेकिन मेहमानो की आवभगत में खोयी उसकी माँ ये बात भूल गयी और उसे कॉफ़ी की जगह चाय पकड़ा  दी… चाय पंखुड़ी से पी नहीं जा रही थीं…

     इधर शेखर अपनी अलग उलझन में मग्न था… उसे नहीं लगा था कि उसकी माँ ने पंखुड़ी के घर पर बात चलायी है, क्योंकि उसकी माँ ने तो उसे बताया था कि लड़की अभी किसी एग्जाम कि तैयारी कर रही है.. यहाँ तक की उसकी माँ ने उसे लड़की का नाम भी कुछ और बताया था…
फिर उसे लगा, हो सकता है उसने ध्यान से नहीं सुना होगा, इसलिए उसे नाम याद नहीं आ रहा.. !

दोनों अभी बात शुरू ही कर पाए थे कि, शेखर के पिता के मोबाइल पर किसी का फ़ोन आने लगा…

“कहाँ तक पहुंचे मिश्रा जी.. !”

“जी शर्मा जी, आप कहाँ से फ़ोन कर रहे ? हम तो आप ही के घर में बैठे है.. !”

“अरे कहाँ बैठ गए हैं जी ? हम तो अपने घर की टेरेस पर खड़े आप ही का रास्ता देख रहे हैं !”

“अरे ऐसा कैसे हो सकता है ! गुलमोहर अपार्टमेंट में तीसरे माले का सात नंबर फ्लैट नहीं है आपका.. ?”

“गुलमोहर अपार्टमेंट में ही है, लेकिन सांतवे माले का तीन नंबर का फ़्लैट है हमारा ! आप कहीं और चले गए हैं !”

सामने वाले के मुहँ से ये सुनते ही शेखर के पिता के चेहरे पर हवाइयाँ सी उड़ गयी… उन्होंने तुरंत अपने बगल में बैठी अपनी श्रीमती जी के कान में कुछ कहा और वो भी सुन कर चौंक गयी…

सामने बैठे पाखी के पिता को किसी गड़बड़ का अंदेशा हो गया..

“क्या हो गया मिश्रा जी ? कुछ बात हो गयी क्या ?”

“जी.. दरअसल हम लोग गलती से गलत घर में आ गए हैं.. !”

“आपका मतलब ? कहना क्या चाहते हैं आप ?”

“जी माफ़ कीजियेगा लेकिन इसी गुलमोहर अपार्टमेंट के सांतवे माले पर कोई शर्मा जी रहते हैं ना.. !”

“हाँ हाँ रहते तो हैं.. !”

“बस उन्हीं के यहाँ लड़की देखने जाना था और हम लोग गलती से यहाँ आ गए !”

उनकी बात सुन पंखुड़ी के माता पिता के साथ ही वहाँ बैठे रियान और पिया भी चौंक गए…
दरअसल पंखुड़ी के यहाँ आने वाला परिवार भी मिश्रा ही था इसलिए किसी को कोई शंका नहीं हुई थीं, लेकिन यहाँ बात उलट गयी… और पंखुड़ी को देखने आने वाले परिवार की जगह गलती से शेखर का परिवार वहाँ पहुँच गया था !
  उसी वक्त दरवाज़े पर एक बार फिर दस्तक हुई और वो दूसरा परिवार भी वहाँ चला आया.. !

पिया ने एक नज़र बालकनी में बैठे शेखर और पंखुड़ी पर डाली….

दोनों की बात धीमे से शुरू हो चुकी थीं और किसी बात पर दोनों उस वक्त खिलखिला कर हॅंस रहे थे.. उन्हें यूँ हँसते देख पिया की पंखुड़ी और शेखर को बुलाने जाने की हिम्मत ही नहीं हुई और वो उन दोनों को देखती रह गयी…

क्रमशः

aparna…

दिल से…

जब यहाँ तक रख लिया तो थोड़ा धैर्य और रख लीजिये… !
जल्दी ही एक नए मोड़ के साथ कहानी के सारे राज़ खुल जायेंगे…
  तब तक पढ़ते रहिये…- मुझे
  लिखते रहिये    …..   – समीक्षा
  और बरसाते रहिये     -अपना प्यार..

aparna….
.

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