
जीवनसाथी -2 भाग -86
जीवनसाथी 2 वासुकी के अभूतपूर्व प्रेम की कहानी है, जिस प्रेम में कोई कलुषता नहीं थी.. ! वासना का ज्वर नहीं था, थी समर्पण की उष्णता !
उसका प्रेम उस अग्नि की तरह पवित्र था जिसमे होम कर देवी देवताओ को भोग लगाया जाता है.. !
उसी धधकती अग्नि को अपने अंदर समेटे वो अपने प्रेम से विमुख हो भी जाता लेकिन उसके कर्तव्य ने उसे एक बार फिर अपने प्रेम के सामने ला खड़ा किया..!
और अपने कर्तव्य की परीक्षा में उसने अपना जीवन ही नहीं अपनी प्रेयसी का भी जीवन होम कर दिया… !!
आज भी धरती पर ऐसे इंसान होते हैं… पर क्या इनका जीवन सिर्फ होम करने के लिए बना होता है नहीं भगवान इतने निष्ठुर नहीं होते कि किसी इंसान की जिंदगी से दोनों हाथों से हर चीज छीन ले…
अगर भगवान किसी इंसान से कोई वस्तु छीनते हैं तो बदले में उससे अधिक कीमत का या उसके बराबर का कुछ ना कुछ वापस ज़रूर करते हैं… ये और बात है की हम उस वक्त जाने वाली वास्तु के दुःख में प्राप्य को भूल जाते हैं…
सबका प्रारब्ध एक सा नहीं होता, सब को उनके हक का मिलता ज़रूर है, किसी को जल्दी किसी को देर से…
लेकिन मिलता ज़रूर है… !!!
भाग -86
नेहा दरवाज़े को पकडे खड़ी मुस्कुरा रहीं थी और वासुकी का उसको देख देख कर भी मन नहीं भर रहा था… पलक झपकने का कष्ट भी उसे भारी लग रहा था..
“बस पड़े रहिये ऐसे ही.. ये नहीं की झटपट उठ कर तैयार हो जायें.. कहा था न आज शोना को लेकर मंदिर जाना है !”..
एक गहरी साँस छोड़ कर वासुकी मुस्कुरा उठा, और इशारे से नेहा को अपने पास बुला लिया | नेहा ने वहीं खड़े खड़े गर्दन ना में हिला दी..
वासुकी ने प्यार से अपने हाथ जोड़ लिए और आखिर नेहा को उसकी ज़िद मान कर उसके पास आना पड़ा | वह आकर पलंग पर उसके करीब बैठ गई, और उसके कंधों पर अपनी बाहें टिका दी……
उसके माथे पर अपने माथे को टिका कर मुस्कुराकर वह उसे तैयार होने के लिए जिद करने लगी और वासुकी ने नेहा को कसकर अपनी बाहों में भर लिया..
” अब कभी मुझसे दूर मत जाना नेहा, तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगा.. ! आई लव यू नेहा !”
” लव यू टू, और सुनिए ऐसा मत कहिए मिस्टर हस्बैंड, क्योंकि अगर हमारे बिना आप नहीं जी पाएंगे तो हमारी लाडो रानी का क्या होगा ? उसे कौन देखेगा, उसे कौन प्यार करेगा, उसे इस दुनिया में अपने पैरों पर खड़े होना कौन सिखाएगा ? हम चाहती हैं, हमारी प्रिंसेस बिल्कुल आपके जैसी बने.. !”
” और मैं चाहता हूं कि वो बिल्कुल दूसरी नेहा बने!”
” हमसे किया हुआ प्रॉमिस भूलिएगा मत ! जहां जहां हमने कहा है वहां वहां आपको सोना को लेकर जाना है समझे ! और अब बहुत देर हो गई…
अब उठ जाइए इस नींद से.. !”
“नहीं… बहुत अच्छा लग रहा है नेहा ! तुम मेरी बाहों में हो अब मुझे किसी की जरूरत नहीं है!”
” लेकिन आपकी प्रिंसेस को आपकी जरूरत है, मिस्टर हस्बैंड ! और इसलिए अब आपको उठना पड़ेगा, उठिये उठिये ना… बहुत देर हो गई है..!”
“ठीक है.. फिर एक बार किस करो.. ! गुड मॉर्निंग किस !!”
नेहा ने ना में गर्दन हिलायी और वासुकी के चेहरे के बेहद करीब आ गयी… -“गुड बाय किस !”
नेहा ने अपने होंठ वासुकी के होंठों पर रख दिए..
वासुकी ने उसे अपने और करीब खींच कर अपने अंदर भींच लीया..
उसी वक्त उसे अपने कंधे पर किसी का हाथ महसूस हुआ..
जैसे उसे कोई उठा रहा हो !
उसने बड़ी अनिच्छा से आंखें खोली और सामने अस्पताल का माहौल देख कर पल भर को चौंक गया…!
कहां गया उसका कमरा ? उसका वो गुदगुदा बिस्तर ? उसकी खिड़की से छनकर आता धूप का टुकड़ा, वह बसंती बयार… ?
एक झटके में वो सब कहाँ चला गया ?
तो क्या अब तक वो जो कुछ देख और महसूस कर रहा था वो सब उसका सपना था ?
लेकिन इतना वास्तविक भी कोई सपना हो सकता है भला ?
वो अब तक अपने होंठो पर नेहा के होंठो का भीगा सा स्पर्श महसूस कर पा रहा था.. !
अभी कुछ देर पहले ही तो उसने अपने इन्हीं हाथों से अपनी साल भर की गुड़िया को गोद में खिलाया था..? और वो कितनी बड़ी बड़ी बातें बना रहीं थी.. !
पर सच ही तो है, साल भर के बच्चे इतना बोलते है क्या ?
उसका शरीर कांप कर रह गया…
एक झुरझुरी सी उसके बदन में फ़ैल गयी !
काश ये सपना नहीं हकीकत होता …
कितना सुखद था सब..!
उसने अपने दाहिनी तरफ देखा, लीना खड़ी थी.. वो उसे जगा रहीं थी !
“क्या हुआ ?” वो उससे पूछते हुए खड़ा हो गया ..
“रानी साहब नहीं रहीं !”
छन की आवाज़ हुई और उसके बाद वासुकी के कानों में एक सनसन सी आवाज़ होने लगी.. उसे लगा उसका सर घूम रहा है..
लीना इसके बाद भी कुछ बताती रहीं, लेकिन अब उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था..
जाने क्या सोच कर लीना ने उसे अपनी बाँहों का सहारा दे रखा था…
लेकिन इस वक्त वासुकी के दिल में जो चल रहा था वो हाहाकार सबकी समझ से परे था..
उसे लगा वो ज़ोर से चीख उठे, अगर अब भी वो नहीं चिल्लाया तो वो पागल हो जायेगा… बेशक पागल हो जायेगा !
उसने धीमे से लीना की बाँहों से खुद को छुड़ाया और तुरंत वहाँ से उठ कर बाहर निकल गया…
ये खबर शायद महल तक पहुँच गयी थी.. एक एक कर महल से लोगों का आना शुरू हो गया था..
पूरा अस्पताल जैसे दुःख के सागर में डूब गया था..
महल की रानी नहीं रहीं थी.. !
रानी बाँसुरी नहीं रहीं थी..!
हर तरफ हाहाकार मच गया था.. लेकिन ये बात अगर अस्पताल से बाहर चली जाती तो पूरी रियासत अपनी प्रिय रानी के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ती..
इस वक्त क्या कैसे किया जायें ये भी विचार का विषय था.. महल की औरतें क्या पुरुष भी रो रहें थे..!
युवराज सा जिन्हे आज तक किसी ने कमज़ोर पड़ते न देखा था.. सुबक सुबक कर बच्चों की तरह रो रहें थे….
वहीं हाल रूपा रेखा निरमा पिंकी सब का था… किसी के दुःख का वारपार ना था..
पंखुड़ी खुद डॉक्टर होकर खुद को संभाल नहीं पा रहीं थी.. लेकिन उसे अपने प्रोफेशन का भी मान रखना था !!
अपने मन को कड़ा कर वो अपनी टीम के एक सीनियर डॉक्टर के समझाने पर उनके साथ बाहर आ गयी..
युवराज के पास जाकर वो लोग खड़े हो गए..
“बड़े राजा सा आपसे कुछ ज़रूरी बातें करनी थी, क्या आप दो मिनट के लिए मेरे केबिन में आ सकते है !”
युवराज ने अपने आँसू पोंछे और समर के साथ डॉक्टर के केबिन की तरफ बढ़ गया..
“रानी साहब की हालत आपसे छिपी नहीं है ! वो प्रेग्नेंट थी और ऐसे में उनका एक्सीडेंट हुआ.. शरीर पर बहुत से अंदरूनी और बाहरी घाव थे जिसके कारण बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हुई है.. !
एक डॉक्टर के तौर पर आपसे यहीं गुज़ारिश करना चाहूंगा की उनकी बॉडी अपने साथ ना लें जायें..
बॉडी लें जाने लायक नहीं रह गयी है..
आप आज्ञा दे तो यहीं उनकी बॉडी…
“लेकिन डॉक्टर साहब ऐसा कैसे सम्भव है..? अब तक कुमार ने बाँसुरी को देखा भी नहीं.. और आप कह रहें..
“वो देखने लायक है भी नहीं… देखिये कहना तो नहीं चाहिए लेकिन भावुकता में आकर आप जाने वाले और उनके बाद यहाँ रह जाने वालों की तकलीफ और बढ़ा रहें हैं..! उनकी बॉडी की जो हालत है, वो कहीं लें जाने लायक नहीं बची है.. मेडिकली ही कह रहा हूँ…
आप सब सारे अनुष्ठान घर पर कर लीजियेगा लेकिन बॉडी को यहीं बरी करने की अनुमति दे दीजिये ! !
डॉक्टर ने समर की तरफ देखा, समर ने साथ बैठे युवराज को किनारे से अपनी बाँहों का सहारा दे रखा था.. युवराज के इशारे पर समर ने राजा को फ़ोन लगा दिया…
उधर खाना पीना निपटने के साथ ही राजा और प्रेम बाँसुरी का सामान लिए वहाँ से निकलने की तैयारी में थे की समर का फ़ोन आ गया…..
“हुकुम !”
“हाँ बोलों समर !”
“नेहा नहीं रहीं.. !”
“क्या.. ? ” ये सुनते ही राजा का दिमाग सुन्न पड़ गया..
” लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है ? अभी कुछ देर पहले ही तो उसने बेटी को जन्म दिया है.. मुझे लगा वो ठीक हो रहीं है.. !”
राजा समर से बात करते हुए एक तरफ को आगे बढ़ गया था…
“नहीं हुकुम, उसे तो होश आया ही नहीं !”
“लेकिन ये कैसे सम्भव है समर ! मुझे अब तक यहीं लग रहा था की उसे हलकी फुलकी सी चोट आई होगी और डिलीवरी के बाद उसे लेकर उसका पति वासुकी यहाँ आता ही होगा…! मैंने ऐसा तो सोचा नहीं था.. !
ये तो बहुत बहुत गलत हो गया.. !
बहुत ज्यादा गलत.. ! नहीं समर बोल दो की ये झूठ है ! एक बेगुनाह की मौत वो भी मेरे कारण.. नहीं ऐसा नहीं हो सकता !”
“हुकुम इसमें आप कैसे कारण हो गए..? आपने तो उसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा था लेकिन.. !”
“लेकिन क्या समर ? नेहा का सुरक्षा गार्ड कहाँ था उस वक्त, पंकजा कहाँ थी, वो भी तो उसकी सुरक्षा के लिए ही थी.. फिर ये सब लोग कहाँ थे उस वक्त ?”
“हुकुम यहीं तो कहना चाहता हूँ की नेहा ने किसी को साथ लिया ही नहीं और अकेली निकल गयी थी.. !
“वो सब जो भी हो लेकिन ये बहुत गलत हो गया समर ! नहीं मैं इस पाप का बोझ…
“क्या गलत हो गया है साहब ? किस पाप की बात कर रहें हैं आप ?
बाँसुरी भी वहाँ चली आई… राजा को अपलक देखते हुए उसने अपना सवाल कर लिया…
उसे देख राजा चौंक गया, वो जानता था की बाँसुरी बहुत भावुक है.. भावुक वो खुद भी बहुत था.. !!
उसे नेहा के बारे में सुन कर अब कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन अब उसके हाथ में कुछ नहीं रह गया था..
आज तक उसने कभी जानबूझ कर तो एक मच्छर भी नहीं मारा था फिर इतना बड़ा पाप उससे कैसे हो गया.. ?
वो जानता था ये एक दुर्घटना थी, ऐसा होना ही था इसलिए हुआ, बावजूद नेहा की मौत उसके सर आई थी..
उसने सिर्फ और सिर्फ बाँसुरी की सुरक्षा के लिए इतना बड़ा कदम उठाया था, पर उसे नहीं मालूम था की उस काम का नतीजा ऐसा निकलने वाला है.. !
किसी एक इंसान की मृत्यु अकेले उसकी मृत्यु नहीं होती, उसके करीबी और साथ वाले लोगों के सपनों की मृत्यु होती है !
उनकी ख्वाहिशो की मृत्यु होती है !
उनके अरमानों की मृत्यु होती है.. !
इसलिए कोई मृत्यु साधारण नहीं होती… मरने वाला तो बड़ी आसानी से चला जाता है लेकिन अपने पीछे छोड़ जाता है कई कलपती आत्माएं, कई सिसकते अरमान, कई अधूरी ख्वाहिशें और तपते रेगिस्तान जैसी लम्बी और अकेली ज़िंदगियाँ !!
राजा की आँखों से बूंदे बरस पड़ी…
उस लड़की के सम्मान में जिसने अपने प्रेम के लिए अपना सर्वस्व ही नहीं अपने प्राण तक उत्सर्ग कर दिये..
राजा ने अपनी आंखें अपनी हथेलियों में छिपा ली, लेकिन बाँसुरी ने आकर उन हथेलियों को हटा दिया..
“मुझे बताइये साहब… की क्या हुआ है ?”
बाँसुरी एकाएक चीख पड़ी… वरना आज तक उसने अपने साहब से कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं की थी..! उन दोनों के बीच कभी आपसी मनमुटाव ना हुआ हो ऐसा नहीं था, बावजूद बाँसुरी ने अपनी शालीनता कभी नहीं त्यागी थी, लेकिन आज अपने साहब को आँसू बहाते देख उसका सब्र का बांध टूट गया….
“समर बोलों ना.. क्या हुआ है ? महल में सब ठीक तो हैं ना ? शौर्य कैसा है ? रूपा भाभी, नीरू, रेखा सब ठीक है ना ?”
“रानी साहेब…
समर का भी गला रुंधने लगा था क्योंकि इस सब के पीछे असल में तो वो ही था..
नेहा पर सबसे पहली बार उसी की नजर पड़ी थी, और उसे पहली बार देखते ही उसके दिमाग में ये बात आई थी की इस रानी साहब जैसी दिखने वाली लड़की को रानी साहेब की जगह महल में रख कर रानी सा का जीवन बचाया जा सकता है..!
और इस बाबत जब उसने पहली बार राजा से अपनी मंशा बताई तब राजा ने साफ तौर पर मना कर दिया था, लेकिन समर अपनी ज़िद पर अङा रहा था और आखिर समर की नज़ीरो के सामने राजा ने चुप होकर उसकी बात मान ली थी !
वैसे भी उस वक्त वो अपनी राजनैतिक उलझनों में जिस प्रकार फंसा हुआ था उसके सामने बाँसुरी को सुरक्षित करना सबसे ज्यादा ज़रूरी था…
आज अपनी उन्हीं बातों को याद कर समर भी भावुक हुआ जा रहा था..!
वैसे समर का जो स्वभाव था वो अपनी ईमानदारी और कर्मठता के सामने किसी को कुछ नहीं मानता था.. !
कोरी भावुकता उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं थी.. वो इस बात को भली प्रकार जानता था की एक राजगद्दी कई लाशों पर बिठाई जाती है.. !
उसे राजा के शत्रुओ को मारने में कभी संकोच नहीं हुआ था.. !
फिर चाहें हो वो ठाकुर साहब हो या कोई और..
लेकिन नेहा का मसला ज़रा अलग हो गया था..
उस प्यारी सी लड़की का इस तरह इतनी कम उम्र में संसार छोड़ जाना किसी भी तरीके से न्यायसंगत नहीं लग रहा था.. !
भगवान भी कैसे निष्ठुर हो गए थे… !
बाँसुरी ने एक बार फिर अपना सवाल दुहरा दिया था…
समर बाँसुरी से जाने क्यों नज़रें चुरा रहा था..
“रानी साहब… नेहा नहीं रहीं !”
“क्या…. ?”
ये सुन कर बाँसुरी को झटका सा लगा.. उसे लगा वो घूम कर गिर जायेगी.. उसने अपने पास पड़ी कुर्सी का सहारा लेकर खुद को संभालने की कोशिश की बावजूद वो खुद को संभाल नहीं पायी, अगर पास ही खड़े राजा ने उसे संभाला ना होता तो वो भरभरा कर ज़मीन पर गिर पड़ती…
“लेकिन उसका तो अभी अभी बेबी हुआ है ?”
आँसू भरी आँखों से उसने राजा की तरफ देखा और राजा ने बाँसुरी को अपने सीने से लगा लिया..
बाँसुरी सिसक उठी…
उसके लिए ये बहुत कठिन पल थे..
एक लड़की जो उसकी रक्षा के लिए उसका रूप धर कर उसके महल में रह रहीं थी, आखिर उन साज़िशों का शिकार हो ही गयी जिनसे बचाने के लिए इतना बड़ा चक्रव्यूह रचा गया था….
बाँसुरी ने जब उस दिन पहली बार यह बात सुनी थी कि नेहा का बच्चा हुआ है, तभी उसके दिमाग में यह सारी उलझने चलने लगी थी कि एक ऐसी लड़की जो मां बनने वाली है उसका इस तरह से दुर्घटनाग्रस्त होना क्या सही होगा ?
और तभी से उसके मन में यह परेशानियां दौड़ रही थी कि सिर्फ और सिर्फ उसकी सुरक्षा के लिए एक लड़की के जीवन की बलि चढ़ाने की तैयारी कर ली गई थी.. उसे यह बात उसी समय नागवार गुजरी थी कि राजमहल की चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्थाओं के बीच आखिर नेहा की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हुई कैसे?
जाने क्यों उसी वक्त उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी ने घर कर लिया था…
शायद उसकी छठी इंद्री उसे बता गई थी कि नेहा का बचना मुश्किल था, और आज वही खबर समर के मुंह से सुनकर उसका रहा सहा धैर्य भी चूक गया था…
बार-बार उसके मन में यह विचार चल रहा था कि अगर वहाँ नेहा नहीं होती तो बाँसुरी होती.. !
नेहा की जगह मरना बाँसुरी को था लेकिन मरी नेहा !!
इतना बड़ा बलिदान ! इतना बड़ा त्याग !!
बाँसुरी की सिसकियाँ थमने की जगह बढ़ती चली जा रहीं थी… उस कमरे में हाहाकार मच गया था.. !
सारिका को कुछ समझ नहीं आ रहा था.. वो पानी का गिलास लिए अपनी रानी के पास चली आई…
बाँसुरी को संभालना मुश्किल हो रहा था.. उसे इस तरह बिखरते राजा ने इससे पहले कभी नहीं देखा था…!
बाँसुरी कभी नेहा से नहीं मिली थी, बावजूद उसके त्याग के बारे में सोच सोच कर बाँसुरी की रोते रोते हिचकियाँ बंध गयी थी… !
“अब नेहा की बेटी का क्या होगा साहब ?”
रोते रोते बाँसुरी ने सवाल किया… राजा को भी इसका जवाब कहाँ मालूम था.. वो क्या जवाब देता.. वो बस बाँसुरी को तसल्ली देता खड़ा था…
उसके दिमाग में इस वक्त सिर्फ नेहा की बेटी ही नहीं वासुकी भी घूम रहा था..
राजा ने एक नज़र बाँसुरी के चेहरें को देखा और फिर उसे लगा अगर आज नेहा की जगह बाँसुरी होती तो ? और उसने बाँसुरी को कस कर खुद से चिपका लिया..
वो अपने जीवन की कल्पना भी बाँसुरी के बिना नहीं कर सकता था, फिर वासुकी… ?
वो कैसे रहेगा ? क्या करेगा ?
उसे वासुकी के स्वभाव के बारे में पता था !
*****
इधर वासुकी अस्पताल से कहीं दूर निकल गया था..
उसे मालूम था कि अब वहां उसका कोई काम नहीं था उसने जाने से पहले पंखुड़ी और युवराज की बातें सुन ली थी….
उसने अपनी लाल लाल आंखें पोंछी और अपना मोबाइल निकाल कर एक नंबर मिलाने लगा..
” जी हुज़ूर ?”
“बाबूराव.. मेरे चॉपर की जानकारी तुम्हें है ना… मुझे दस मिनट के अंदर मेरे भेजें पते पर चाहिए.. कर लोगे ?”
“हो जायेगा हुज़ूर.. आप पता मेसेज कर दे ! और किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो बताएं !”
“बस…. अब और कुछ नहीं चाहिए !”
कुछ देर में ही वासुकी की बताई जगह पर उसका चॉपर मौजूद था…
आज से ठीक आठ महीने पहले वो अपना वासुकी का चोला फेंक कर अनिर्वान भारद्वाज बन कर यहाँ ऐसे ही इसी चॉपर से उतरा था…
ज़िंदगी से भरपूर अनिर्वान भरद्वाज आज वापस अनिरुद्ध वासुकी बन अपनी ज़िंदगी को पीछे छोड़ वापस लौट रहा था…
“हुज़ूर अब कब वापसी होगी ?”
“शायद कभी नहीं.. ! “
“आप बहुत याद आएंगे साहब.. डिपार्टमेंट में आज तक आपसा कोई दूजा ऑफिसर नहीं आया, और ना आगे कभी आएगा !”
” मैं ऑफिसर था ही नहीं बाबूराव ! ये तो एक चोला पहना था, कुछ समय के लिए जो उतार कर वापस अपनी दुनिया में जा रहा हूँ… ये शरीफों की दुनिया मेरे लिए नहीं बनी !”
उसने अपना कार्ड वहीं फाड़ कर फेंका और बाबूराव के कंधे थपक कर आगे बढ़ कर चॉपर में बैठ गया !..
वासुकी ने एक बार बाहर नज़र डाली, अपने आँसू पोंछे और पायलट को आगे बढ़ने का इशारा कर दिया…..
*****
समर ने फ़ोन रखने के बाद पंखुड़ी को देख हामी भर दी…
युवराज और समर कमरे से बाहर आ गए..
तभी एक तरह से भागती सी रूपा युवराज के पास आ गयी..
“साहेब.. साहेब… बच्ची.. ?”
“क्या हुआ रूपा.. ?”
“डॉक्टर कह रहीं की बच्ची अपने वार्ड में नहीं है.. !”
रूपा की बात सुनते ही युवराज के चेहरें पर क्रोध के भाव आ गए..
उसने तुरंत उस डॉक्टर की तरफ देखा, लेकिन पहले ही वहाँ हड़कंप मचा हुआ था.. इतनी देर में पूरे अस्पताल ने हर एक कोना छान मारा था लेकिन बच्ची कहीं नहीं मिली थी..
वहाँ मौजूद हर एक के चेहरें पर यहीं सवाल नजर आ रहा था की इतनी कड़ी सुरक्षा के बीच आखिर बच्ची को ज़मीन खा गयी या आसमान निगल गया…
पंखुड़ी अंदर रानी साहब के कमरे में पहुंची और उनका बिस्तर खाली देख उसकी चीख निकलते निकलते रह गयी..
वो वापस उलटे कदम बाहर की तरफ भागी की उसके सीनियर डॉक्टर ने उसे पकड़ कर रोक लिया..
“क्या हुआ पंखुड़ी ?”
“रानी साहब की बॉडी गायब है ? ऐसा कैसे हो गया ?”
पंखुड़ी की बात सुन डॉक्टर के चेहरे के भाव पल भर के लिए बदले लेकिन उन्होंने तुरंत अपने आपको संभाल लिया…
” रुक जाओ पंखुड़ी !! बाहर जाकर ऐसा कुछ भी मत कहना ! वैसे भी हमें उस बॉडी को बरी करने की इजाजत मिल गई थी, हम यही कह देंगे कि हमने बॉडी को इलेक्ट्रिक फर्नेस में बरी कर दिया ! क्योंकि वैसे भी राज महल की राजकुमारी गायब हुई है.. !
पता नहीं अब यह महल वाले हमारे अस्पताल और स्टाफ के साथ क्या करेंगे ? ऐसे में अगर हम ने यह भी बता दिया कि रानी साहब की बॉडी खो गयी…
तुम समझ रही हो ना मैं क्या कह रहा हूं..?”
पंखुड़ी अपने सीनियर डॉक्टर से क्या कहती ? वह कैसे बताती है कि वह इतने बड़े झूठ को अपने अंदर नहीं छुपा सकती ! वह बाकी दुनिया से भले झूठ कह ले लेकिन शेखर के सामने तो उसे सच्चाई बतानी ही पड़ेगी..
वक्त की नजाकत समझते हुए फिलहाल उसने अपने सीनियर डॉक्टर की बात मानकर चुप रहना ही बेहतर समझा, लेकिन साथ ही उसने यह भी सोच लिया कि समय मिलते ही सबसे पहले शेखर को इस सच्चाई के बारे में बताना पड़ेगा ! वह बाहर निकल रही थी कि तभी एक दूसरे सीनियर कंसलटेंट डॉ वहां पहुंच गए..
” आप लोग शायद रानी साहेब की बॉडी गायब होने की बात कर रहे हैं, लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि उनकी बॉडी बरी कर दी गई है !
इसलिए डॉक्टर पंखुड़ी और डॉक्टर धीरज आप दोनों को ही परेशान होने की जरूरत नहीं है..!”
डॉक्टर बिंदल अस्पताल के काफी सीनियर डॉक्टर थे, 60 साल की उम्र में भी अपने ज़िद्दी और सनकी स्वभाव के कारण वह अक्सर जूनियर डॉक्टर्स पर बरसते ही रहते थे…
आज भी जाने क्यों उनके चेहरे के भाव देखकर पंखुड़ी को उनकी बात पर विश्वास तो नहीं हुआ लेकिन वह चुप होकर वहां से बाहर निकल गई ! इस वक्त उसके दिमाग में शेखर घूम रहा था !
कहीं ना कहीं शेखर के मन की बांसुरी के प्रति कोमलता से वह भी परिचित थी और अभी उसे फिलहाल अपने पति को संभालना था….
क्रमशः
aparna….
दिल से..
साथ बनायें रखियेगा.. व

लाजबाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻