
जीवनसाथी -2/77
पिया अपने कमरे में थकी सी लेटी हुई थी…
आज का पूरा दिन बहुत थकान भरा था, सुबह पंखुड़ी की शादी फिर शाम में रिसेप्शन सब कुछ निभाते हुए उसे बहुत ज्यादा थकान लगने लगी थी…
लेकिन शारीरिक से ज्यादा उसका मन थका हुआ सा था…
जब से उसे अपने माँ बनाने के बारे में मालूम चला था उसका ध्यान जाने कैसे लेकिन शोवन से हट गया था… और सिर्फ उसका ही नहीं उसके साथ साथ समर का भी यहीं हाल था….
बात वैसे देखी जायें तो कोई बहुत बड़ी नहीं थी लेकिन सोचा जायें तो छोटी भी नहीं थी…
शोवन उन दोनों का बच्चा नहीं था और अब उनके जीवन में उनका अपना बच्चा आ रहा था..
एक पति और पत्नी का रिश्ता बच्चे के आने के बाद ही तो पूर्णता को प्राप्त करता हैं…
ये अकाट्य सत्य हैं लेकिन एक पुरुष जब अपनी पत्नी में अपने बच्चे की माँ को देखना शुरू करता हैं तब उसके मन में एक अलग ही सम्मान की भावना पैदा होती हैं, वैसा ही कुछ औरत के साथ भी होता हैं !
ऐसे में अपने सुखी संसार में कौन सा पुरुष या महिला होते होंगे जो किसी अन्य को इसमें प्रवेश करने का मौका दे…
कहीं यहीं तो उन दोनों के साथ नहीं हो रहा…
वो दोनों आज अपने बच्चे की आने की ख़ुशी में शोवन को भूल गए, कल जब बच्चा उनके हाथ में होगा तब शोवन का क्या होगा… ?
शोवन के साथ वैसे भी जो हुआ हैं उसके कारण वो सामान्य बच्चों से अलग हैं…
पिता का साया कभी उसके सर था ही नहीं, फिर इतनी छोटी सी उम्र में अपनी माँ की तकलीफ उसका तड़पना देखा और फिर माँ भी छोड़ गयी…
वो बेचारा निरपराध होते हुए भी जाने कौन सी सज़ा भुगत रहा हैं…
उसे इस वक्त भरपूर प्यार और समय की ज़रूरत हैं.. अगर मै इस समय अपने बच्चे में व्यस्त हो गयी तो उसका ध्यान कौन रखेगा ?
घर पर भी किसी को उससे कोई विशेष स्नेह नहीं हैं… समर की माँ को तो वो अँगरेज़ ही लगता हैं और इसी लिए वो इतने बरस अंग्रेज़ो की गुलामी का बदला ही उस बच्चे से निकालने लगती हैं.. हाँ समर के पिता ज़रूर उसे प्यार करते हैं लेकिन प्यार करने के बावजूद उनकी उम्र अब ऐसी नहीं हैं कि वो उसकी देखभाल कर सकें….
सोचते सोचते पिया का सर भारी होने लगा था, उसी वक्त कमरे के दरवाज़े पर हलकी सी दस्तक हुई और शोवन धीमे से कमरे में झाँकने लगा…
उसने अंदर आने के लिए पूछा और पिया ने मुस्कुरा कर हाँ बोल दिया…
शोवन एक ट्रे हाथ में लिए अंदर चला आया…
पिया ने देखा ट्रे में एक कप के साथ एक छोटा सा नोट और गुलाब का फूल रखा था !
पिया ने आश्चर्य से शोवन की तरफ देखा…
शोवन ने मुस्कुरा कर कप पिया के हाथ में पकड़ा दिया…
“ये आपके लिए लाली दीदी से बनवाया हैं… !”
हॉट चॉकलेट का कप पिया के हाथ में पकड़ा कर शोवन मुस्कुरा दिया…
पिया ने कप अपने मुहँ से लगा लिया और शोवन ने वो कार्ड उठा कर पिया के सामने कर दिया…
“ये भी आपके लिए हैं.. !”
,उस कार्ड को पिया ने खोल कर देखा…
एक छोटा सा थैंक यू नोट था जो शोवन ने अपनी टेढ़ी मेढ़ी राइटिंग में लिखा था…..
उसे पढ़ कर पिया कर चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान चली आयी….
उस पर लिखा था…
डियर आंटी,
थैंक यू सो मच फॉर एवरीथिंग !!
आई लाइक यू..
शोवन की लिखावट देख कर और उसके मन के भाव पढ़ कर पिया की आंखें भर आई…
वो अब तक जिस बात का निर्णय नहीं लें पा रहीं थी, अब उसने अपने निर्णय पर निश्चिंतता की मुहर लगा दी..अब बस उसे एक बार अपनी डॉक्टर दोस्त पंखुड़ी से सलाह करना था और किसी निर्णय पर पहुंचना था !
उसने शोवन को पास बुलाया और उसे प्यार से अपनी गोद में बैठा लिया और उससे इधर उधर की बातें पूछनी लगी..
उसी समय कहीं से घूम फिर कर समर भी ऊपर चला आया…
उसने जैसे ही शोवन को पिया की गोद में बैठा देखा वो ज़ोर से घबरा कर चीख उठा..
“अरे पागल हो गयी हो क्या.. ?”
और वो भाग कर पिया के पास पहुंचा और शोवन को उठा कर किनारे बैठा दिया..
“क्या हो गया मंत्री जी ?”
“पेट पर इतना भार नहीं डालना चाहिए था न ! खुद डॉक्टर हो और ऐसी लापरवाही…
तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी पिया.. और शोवन तुम भी सुनो, आंटी से ज़रा दूर से ही बात किया करो बच्चे…
अभी तुम्हारी आंटी की तबियत सही नहीं हैं ना !”
समर और भी कुछ समझाता रहा लेकिन शोवन चुपचाप पलंग से उतर कर एक तरफ खड़ा हुआ और फिर धीरे से बाहर निकल गया…
पिया ने शोवन का जाना देखा लेकिन उस वक्त वो समर के उत्साह को ख़त्म नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने उस समय कुछ नहीं कहा…
लेकिन शोवन के पास जाने के लिए उसका मन व्याकुल सा हो गया…
****
इधर दो चार दिनों में ही समर एकदम से बदल गया था.. वहीं समर जो अपनी हर ज़रूरत के लिए दिन भर पिया के नाम की पुकार मचाये रहता था, अब सुबह पिया के उठने से पहले उसके लिए गर्म पानी चाय सब उसके बिस्तर तक लें आता था !
शाम को जब पिया थक कर अस्पताल से वापस आती, उसके आने से पहले खुद अपने ऑफ़िस से घर पहुँच कर उसके लिए ताज़े फलों का जूस तैयार करवा के रखता और उसकी इच्छा न होने पर भी उसे पिलाता था !
उसकी पसंद का ही खाना बने ये उसने लाली को भी कह दिया था…
रात में पिया के सर और गर्दन का मसाज करता, कभी उसके लिए गर्म पानी भरा टब लें आता…
उसे सुबह शाम ज़बरदस्ती अपने साथ लेकर सैर पर लें जाता और सुबह शाम उसे वजन मापने की मशीन में खड़ा कर वजन देखता और डायरी में नोट कर लेता.. !
पिया उसके पागलपन को देख मुस्कुरा उठती लेकिन दूसरे ही पल इस सब में दरकिनार हुए जाते शोवन पर भी उसकी नज़र पड़ जाती और उसका मन उदास होने लगता…
और आखिर एक दिन उसने अपना निर्णय लें लिया…
*****
दादी साहब के गुजरने के बाद से महल से उदासी की परत उतर नहीं रहीं थी कि महल की उदासी दूर करने पिंकी और रतन अपने बेटे के साथ वहाँ चले आये…
पिंकी बहुत खुश थी.. उसका आई ए एस में सेलेक्शन हो चुका था…
और इसलिए वो अपने परिवार के साथ इस ख़ुशी को मनाना चाहती थी…
पूरा महल पिंकी की इस ख़ुशी से झूम उठा था… लेकिन सबसे ज्यादा खुश राजा था !!
आखिर उसने ही अपनी प्यारी सी बहन के लिए ये सपना देखा था.. और आज उसकी बहन ने उसका ये सपना पूरा कर दिया था…
महल के सारे लोग साथ बैठे थे, रतन और पिंकी को घेर कर उनके किस्से सुन रहें थे.. बाँसुरी कुछ देर वहाँ बैठने के बाद उठ कर अपने कमरे में चली गयी थी…
उसे ज्यादा देर वहाँ बैठने में थकान सी लगने लगी थी..
पिंकी शौर्य को प्यार से गोद में बैठाये अपनी तैयारी के किस्से सुना रहीं थी…
“रूपा भाभी सा क्या बतायें हम.. रात दिन एक कर दिया था हमनें… पर एक बात मानने लायक हैं हमारी तैयारी के दौरान रतन हमारा बहुत साथ दिया करते थे.. गोलू को भी उन्होने ही संभाल रखा था, वरना तो बच्चे के साथ हमारा पढ़ना बिल्कुल ही नामुमकिन था !”
“हाँ पढाई के नाम पर इन्होने अच्छा काम निकलवाया हैं मुझसे… !”
“मॉम.. पिंकी बुआ भी अब कलेक्टर बन जाएँगी… ?”
वहीं बैठे हर्ष ने अपनी माँ रूपा सा पूछा और पिंकी ने उसके माथे को चूम कर हाँ में गर्दन हिला दी…
“हाँ हर्ष.. अब आपकी पिंकी बुआ भी कलेक्टर हो जाएँगी.. !”
हर्ष ने ख़ुशी से अपनी बुआ के गाल चूमे और शौर्य को साथ लें खेलने चला गया…
“बहुत बहुत बधाई पिंकी.. !”
निरमा भी वहाँ पहुँच गयी थी… उसने पीछे से आकर पिंकी के कंधे पर हाथ रखा और उसकी आवाज़ सुनते ही पिंकी चौंक कर खड़ी हो गयी…
वो तुरंत निरमा के गले से लग गयी…
“कैसी हो नीरू… ?”
“मै तो एकदम ठीक हूँ… तुम सुनाओ.. रतन सा को ख़ूब सताया होगा ना परीक्षा और पढाई के नाम पर.. !”
निरमा ने रतन के पास जाकर उसके पैर छुए और रतन संकोच से सिमट गया…
“अरे भाभी.. आप पैर ना छुआ करें !”
“मै सबके पैर छूती भी नहीं, लेकिन कुछ लोग हैं जिन्हे देख कर अंदर से आदर की भावना जाग जाती हैं, और दिल से उनके पैर छूने का मन करता हैं, जिनमे कुछ ही लोग हैं…
एक हैं हमारी सबकी लाड़ली रूपा भाभी, एक हैं आप और एक हैं राजा भैया.. लेकिन राजा भैया मुझसे कभी पैर नहीं छुवाते.. !”
“अच्छा तो आप हमारे प्रेम भैया को भूल गयीं… उनके पैर छूने का दिल नहीं करता आपको ?”
निरमा मुस्कुरा उठी…
“उनके तो पैर धो कर पी लूँ तब भी कम हैं.. उनके लिए मेरे मन में जो सम्मान हैं उसे इस जीवन में क्या बल्कि किसी जीवन में कोई नहीं पा सकता.. ! उन्होंने तो मेरे जीवन के मायने ही बदल दिये !!
हर उस बात में जहाँ मेरी सोच स्थिर हो जाती हैं उन्होने आगे से होकर निर्णय लिया और मुझे हमेशा ही क्या करूँ क्या नहीं की स्थिति से उबार लिया..
मेरे परिवार के नाम पर सिर्फ मामा जी और मामी ही तो थे.. अभी जब पिछले साल मामा जी नहीं रहें तब मामी के लिए मुझे बहुत चिंता हो गयी थी, लेकिन इन्होने बिना ज्यादा सोचें विचारे उनका सामान उठाया और हमारे साथ लें आये !
कौन करता हैं इतना, वो भी अपनी पत्नी के घर वालों के लिए.. !”
“ये तो सही कहा नीरू ! हमारे प्रेम भैया जग से निराले हैं.. उनसा कोई दूसरा पैदा ही नहीं हुआ हैं.. !”
पिंकी की इस बात पर वहीँ बैठी रूपा ने भी हामी भर दी..
“सिर्फ प्रेम ही नहीं बल्कि प्रेम, कुमार और समर इनकी तिकड़ी देख कर हम हमेशा यहीं सोचा करते थे कि इन तीनों जैसा कोई पैदा नहीं हुआ.. एक दूसरे पर इन तीनों का विश्वास और श्रद्धा देख कर लगता हैं ये किसी पूर्वजन्म में एक ही इंसान रहें होंगे उसके तीन हिस्से इस जन्म में अलग अलग रूप में पैदा हो गए होंगे.. !”
“सही कह रहीं हैं आप रूपा.. ! हम तो इन तीनों की अगली पीढ़ी को भी वैसे ही देखना चाहते थे.. अगर कुमार प्रेम और समर तीनों के लड़के होते तो ये तीनों इन्हीं तीनों की तरह होते.. !”
युवराज ने हॅंस कर रूपा की बात पर अपनी मुहर लगा दी…
“युवराज भाई सा, अभी भी वैसा ही होगा.. देख लीजियेगा !! प्रेम भाई की बिटिया प्रेम भाई से भी दो कदम आगे हैं…
दिमाग में तो उसे पार पाना मुश्किल ही हैं, और आपने इस बात पर गौर किया हैं या नहीं वो शौर्य का बिल्कुल अपने छोटे भाई की तरह ध्यान रखती हैं, और शौर्य भी उसकी इजाज़त के बिना कुछ नहीं करता…
अब ये राजा भैया और प्रेम भैया का भविष्य तो दिख रहा हैं, समर भाई ही अब तक अपने रेप्लिका को हमें नहीं दें पाए हैं… क्यों पिया.. ?”
कुछ देर पहले ही रूपा के बुलाने पर पिया भी अपने अस्पताल से सीधे वहीँ चली आई थी…
पिंकी की बात सुन वो मुस्कुरा उठी..
“मंत्री जी का रेप्लिका हैं ना…. वो देखिये.. वो रहा.. ” पिया ने दूर खड़े शोवन की तरफ ऊँगली घुमा दी, और वहाँ बैठे सारे लोग उसी तरफ देखने लगे…
वहाँ बाकी बच्चे खेल रहें थे और शोवन एक तरफ खड़ा उन सब को ध्यान से देख रहा था…
उसी वक्त परी की उछाली हुई बॉल शोवन के सर पर आकर लगी, और शोवन कुछ बोलता उसके पहले हर्ष परी को समझाने चला गया…
“ये बच्चे तो हमारे शोवन को बुली कर रहें हैं.. हम अभी इन्हें समझा कर आते हैं.. !”
जया अपनी जगह से उठने लगी कि पिया ने उसका हाथ पकड़ कर उसे वापस बैठा दिया…
“भाभी साहब !! उसे अपनी लड़ाई खुद लड़ने दीजिये.. ! मै शोवन को बिल्कुल मंत्री जी सा बनाना चाहती हूँ, इसलिए उसे उसके बहुत से मसले खुद लड़ने देती हूँ.. वो वैसे भी बहुत शर्मीला हैं… !”
“हाँ वैसे सही कह रहीं हो.. ! अब तो तुम भी खुशखबरी सुनाने वाली हो ना.. !”
जया की बात पर पिया फीका सा मुस्कुरा कर रह गयी….
उसकी तबियत खराब सी महसूस होने लगी थी…
असल में उसने बिना समर को बतायें ही ये निर्णय लें लिए था कि ये बच्चा उसे फ़िलहाल नहीं रखना हैं.. उसे लगने लगा था कि उसकी प्रेग्नेंसी उसे और समर को शोवन से दूर कर देगी, उसलिए उसने आज दोपहर अस्पताल में अपने गर्भ को हटाने के लिए दवा लें ली थी..
उसके बाद वो घर जाकर आराम करना चाहती थी लेकिन रूपा का फ़ोन आ जाने से वो महल चली आई थी, लेकिन अब उसकी तबियत ख़राब होने लगी थी और इसलिए सबकी इजाज़त लेकर वो घर वापस निकल गयी थी…
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अनिर्वान के पास अब सारे सुबूत जमा हो चुके थे.. वो जान गया था कि राजा अजातशत्रु और रानी बाँसुरी का सबसे बड़ा शत्रु कोई एक इंसान नहीं था, बल्कि ये कुछ ऐसे लोगों का समूह था जो राजा साहब से जले कुढ़े बैठे थे……
इनमें सबसे पहला नाम ठाकुर साहब का था, जिन्होंने राजा साहब को गद्दी से हटाने का भरसक प्रयास किया था और जब अपने प्रयासों में सफल नहीं हुए तब उन्होने राजा साहब पर गोली चला दी थी..
हालाँकि उसी प्रयास में वो पकडे गए थे और कोर्ट में कार्यवाही के दौरान मारे भी गए थे..
लेकिन उनका मर जाना एक युग का अंत सा लगा था लेकिन ऐसा था नहीं…
उनके मरने के बाद भी उनके लोग राजा साहब से बिना किसी बैर के भी चिढ़े बैठे थे…
उन्हीं ठाकुर साहब के परिवार से अपूर्व सिंह महल में स्थायी आवास बना कर बैठ चुका था…
हालाँकि उसके बारे में अब तक किसी तरह का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला था कि वो राजा साहब के खिलाफ हैं, लेकिन उस व्यक्ति पर भी अनिर्वान को भरोसा नहीं था…
इसके साथ ही आज उसे दर्श ने जो खबर सुनाई थी वो और भी चौंकाने वाली थी…
शेखावत की पत्नी और सुनील की माँ और कोई नहीं बल्कि ठाकुर साहब की बड़ी बहन थी…
ये वहीं बड़ी बहन थी जिनके ठाकुर साहब से बहुत अच्छे संबंध थे.. इन दोनों भाई बहन की कुंडली एक सी थी इसलिए जब इनकी सबसे छोटी बहन यानी आदित्य की माँ का राजा अजातशत्रु के चाचा के साथ संबंधो का पता चला था तब सबसे ज्यादा क्रोधित होने वाली उनकी बड़ी बहन ही थी…
आदित्य के मामले में ठाकुर साहब और उनकी बड़ी बहन के विचार अलग थे.. वो तो आदित्य को भी गंदगी की पैदाइश मान कर मरवा देना चाहती थी, लेकिन ठाकुर साहब ने दूरदर्शिता दिखाते हुए आदित्य का पालन पोषण इसीलिए किया था कि उसे राजा अजातशत्रु के खिलाफ अपना हथियार बना कर प्रयोग में ला सकें…
लेकिन राजा अजातशत्रु का सम्मोहन ऐसा था कि आदित्य भी अपने ख़ून की पुकार को ठुकरा नहीं सका और अपने परिवार के साथ जा मिला था, तबसे उस पर सुनील की माँ की नाराज़गी और भी अधिक बढ़ गयी थी..
राजा अजतशत्रु से बदला लेने के लिए अब वो उसके सारे परिवार को तबाह कर देना चाहती थी.. उसकी पत्नी बाँसुरी और उसके बेटे शौर्य दोनों को…
दर्श से फ़ोन में ये सारी जानकारी मिलते ही अनिर्वान महल जाने के लिए अपनी जगह से उठ गया…
उसे लगा अब उसे ये सब कुछ अपने ऊपर तक बता देना चाहिए…..
वो निकल चुका था, उसी वक्त उसके पास बाँसुरी का फ़ोन आने लगा…
“मिस्टर भारद्वाज, इस वक्त कहाँ हैं आप.. ?”
“आपके महल ही आ रहा हूँ, रानी साहेब !”
अनिर्वान को मालूम था कि उन दोनों के फ़ोन भी टैप किये जा सकतें हैं इसलिए वो अपनी तरफ से कोई चूक नहीं होने देना चाहता था…
“अरे.. लेकिन हम तो किसी काम से बाहर निकल गए हैं.. !”
अनिर्वान ने अपना हाथ अपने माथे पर मार लिया…
“आपके साथ सिक्योरिटी हैं ?”
“क्या आपको लगता हैं हमें सिक्योरिटी की ज़रूरत हैं ?”
“हाँ रानी साहेब !! अगर इस वक्त आप अकेली हैं तो तुरंत महल वापस लौट जाइये.. !”
“हम तो महल से काफ़ी दूर निकल आये हैं.. अब वापस लौटना मुश्किल हैं ! अब तो हम अपना काम निपटा कर ही जायेंगे.. इस वक्त हम सदर पहुँचने वाले रास्ते पर हैं.. !”
“आप जहाँ हैं वहीँ रुक जाइये, आसपास देखिये कोई बैठने लायक जगह जैसे कैफे या रेस्तरां दिखता हैं तो बैठ जाइये.. मै वहीँ पहुँचता हूँ.. !”
“इतना सुनसान रास्ता हैं, रात अलग गहरा रहीं हैं, यहाँ कहाँ इंतज़ार करें हम.. ?”
अनिर्वान के माथे पर पसीने की बुँदे छलकने लगी थी… उसने अपने पैरों से एक्सलरेटर पर दबाव बनाया और गाड़ी और तेज़ भगा दी… लेकिन उसका अनुमान सही था..
वहाँ से कुछ दूर कानों में ईयर फ़ोन लगा कर बैठा लड़का बाँसुरी की कहीं एक एक बात साथ बैठे आदमी को बताता जा रहा था..
उस आदमी ने तुरंत सारी बातें सुनील की माँ तक पहुँच दी और एक कुटिल मुस्कान के साथ उसकी माँ ने उस आदमी को -” अब काम निपटा दो ” कह कर आदेश दें दिया…
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सारिका अपनी प्यारी रानी साहेब के लिए फ़ोन लेने अपनी जान की परवाह किये बिना दर्श के ऑफ़िस में घुस गयी..
हालाँकि उसके साथ दर्श और काका बहुत भला व्यवहार किया करते थे, लेकिन वो इतने दिनों में यह भी समझ गयी थी कि उसकी छोटी सी गलती भी उसे गहरे संकट में डाल सकती थी..
जैसे उस दिन उसके साथ हुआ था, जब बाँसुरी की इच्छा का मान रखने के लिए उसे वो अपने साथ चुपके से पहाड़ी के मंदिर पर लें जाने वाली थी..
हालाँकि वो मंदिर उस हवेली से मुश्किल से किलोमीटर भर के दायरे पर था….इसलिए उसे लगा था कि रानी साहब और वो अपना चेहरा छुपा कर मंदिर चले जायेंगे, लेकिन वो रानी साहेब को लेकर नीचे उतर कर पिछले दरवाज़े पर पहुंची ही थी कि जाने कहाँ से दर्श किसी जादूगर सा वहाँ प्रकट हो गया था और उन लोगों को बड़े सम्मान के साथ अंदर लें गया था !!
दर्श ने अपना चेहरा कपड़े से ढांक रखा था इसलिए बाँसुरी उसे नहीं पहचान पायी थी…
बाँसुरी को उसके कमरे में पहुँचाने के बाद बाहर निकल कर पहली बार दर्श सारिका पर बरस पड़ा था..
” तुम्हारी अक्ल ठिकाने पर हैं या नहीं.. ? रानी साहेब अपनी मर्ज़ी से यहाँ नहीं रह रहीं हैं, उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध यहाँ रखा गया हैं.. कहीं तुम्हारे इस मंदिर दर्शन के चक्कर में वो यहाँ से भाग जाती तो.. ? तो क्या होता, जानती भी हो ?” आइंदा ऐसे किसी मसले पर अपना दिमाग मत लगाना.. तुम्हें जिस काम के लिए रखा हैं वहीं करो.. दिमाग लगाने के लिए मै अकेला काफ़ी हूँ..!
अब जाओ रानी साहब को जूस देने का वक्त हो गया हैं… उन्हें जूस देकर मेरे लिए एक कप कॉफ़ी लें आना.. !”
अपमान से सारिका की आँखों में आँसू आ गए और वो बड़बड़ाते हुए रसोई में चली गयी.. -“और कॉफ़ी में ज़हर भी मिला दूंगी !”
“मिला देना, तुम्हारा ज़हर मुझ पर असर नहीं करने वाला !”
.दर्श ने उसकी धीमी सी कहीं बात का भी जवाब दें दिया और वो एक नज़र पलट कर झेंपती हुई रसोई में चली गयी थी..
उस दिन के बाद से उसने कभी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया था.. उसे खुद नहीं मालूम था कि ये सब क्या और क्यों हो रहा हैं बस उसे वासुकी भैया पर पूरा विश्वास था इसलिए वो यहाँ थी..
लेकिन आज रानी साहब की व्यकुलता देख उससे नहीं रहा गया और वो दर्श के ऑफ़िस में फ़ोन लेने दाखिल हो ही गयी..
इस समय पर काका अक्सर नीचे शहर साग भाजी लेने चले जाया करते थे…
दर्श भी इस वक्त घर में नहीं हुआ करता था.. बाकी सारे सिक्योरिटी गार्ड्स भी बाहर ही तैनात रहते थे, इसलिए पूरी तरह निश्चिन्त होकर सारिका ने दर्श के ऑफ़िस में कदम रख दिया..
वो इधर से उधर फ़ोन तलाश करती आगे बढ़ती जा रहीं थी कि उसे एक टेबल पर दो तीन लैपटॉप रखें दिख गए… उसने ध्यान से देखा उनमे सीसीटीवी कनेक्ट किया गया था,..
ओह इसका मतलब यहाँ बैठ कर दर्श उस पर और रानी साहब पर नज़र रखा करता हैं.. लेकिन एक ही लैपटॉप पर इस हवेली के कमरे और छत दिखाई दें रहें थे, बाकी के लैपटॉप पर क्या दिख रहा था, उसकी समझ से बाहर था, वो बड़े ध्यान से उसे देखने लगी कि तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और दर्श अंदर दाखिल हो गया…
दर्श को अपने सामने देखते ही सारिका चौंक गयी, और दर्श के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी…
क्रमशः
aparna…..
दिल से….
जैसा कि आप सब को मालूम चल ही चुका हैं कि कहानी लीप लेने वाली हैं…
तो मुझे ये बतायें कि कहानी के लीप को मै यहीं इसी में आगे बढ़ाऊ या इस सीज़न को लीप के पहले ख़त्म कर के अगला सीज़न शुरू कर दूँ.. ?
जैसा आप लोग चाहेंगे, वैसा ही कर लेंगे… आगे की कहानी तो तैयार हैं, बस कहाँ लिखना हैं ये पूछ रहीं हूँ…
और हाँ भाई कहानी दिमाग में तैयार हैं ड्राफ्ट में नहीं.. वरना आप कहोगे कि…
जब कहानी तैयार हैं तो, रोज़ पोस्ट करती क्यों नहीं ?
मुहब्बत क्यों लिखती हो, तुम रोस्ट
