
जीवनसाथी -2 भाग -44
नंबर इंटरनेशनल था… किसी लड़की का कॉल था.. बड़ी मीठी सी बोली में उधर से किसी ने कहा..
“हैलो सैमर ! डिस इस रेवन दिस साइड.. ! हाउ आर यू… !”
एक ब्रिटिश एक्सेंट में बात करती लड़की कि आवाज़ सुन पिया चौंक गयी.. उसने मुड़ कर देखा समर मीठी सी नींद सो चुका था..
पिया ने उसे समर के सोने और बाद में फ़ोन करने कि बात कह कर फ़ोन रख दिया…..
वह पूरा दिन भी उन दोनों का साथ में घूमते फिरते और शॉपिंग करते निकल गया…
उसी शाम उनकी वापसी की फ्लाइट थी और दोनों अपने मीठे से हनीमून के बाद ढेर सारी खुशियों को और यादों को संजोए वापस लौट गए……
एयरपोर्ट से घर के रास्ते में समर वापस अपने फोन पर अपने कामकाज की रूपरेखा देखने के लिए अपने सेक्रेटरी से बात करने लगा…
पिया भी अपने अस्पताल में फोन लगाकर जानकारियां लेने लगी….
अपने अपने फोन कॉल से निपटने के बाद पिया ने अपना फोन पर्स में डाला और समर के कंधे पर सिर टिका कर उसकी बांहों को पकड़े हुए आंखें मूंद कर बैठ गयी…
यह पिछले चार-पांच दिन जैसे पंख लगाकर उड़ गए थे… शहद से मीठे दिन और चांदी सी चमकीली रातों के हसीन हस्ताक्षर उसके मन पर उसके दिल पर खुद कर रह गए थे….
उसके होठों से मुस्कान जा नहीं रही थी उसके दिल दिमाग पर समर बुरी तरह से छाया हुआ था….
समर से प्यार तो वो बहुत करती ही थी लेकिन अब इस प्यार में एकाधिकार शामिल हो गया था…
पति पत्नी का रिश्ता वैसे भी जग से निराला होता है… एक युवक अपने माता पिता अपने भाई बहन सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है लेकिन अपनी पत्नी के लिए वह दुनिया में सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है.! वही भाव अब पिया के मन में आने लगे थे..!
उसने समर को पूरी तरह से पा लिया था समर अब पूरी तरह से सिर्फ पिया का था और यह भावना पिया के मन में एक अलग सा उत्साह और रोमांच भर रही थी….
इस हनीमून के बाद वह पूरी तरह से समर के प्रेम में दीवानी हो चुकी थी…
” क्या सोच सोच कर मुस्कुरा रही हो..?”
समर के सवाल पर पिया ने मुस्कुराकर ना में गर्दन हिला दी….
समर भी मुस्कुरा कर बाहर देखने लगा….
इन सारी व्यस्तताओं में पिया समर को रेवन के फोन के बारे में बताना भूल गई….
दोनों अपने घर पहुंच गए….
रात हो चुकी थी और दोनों खाना बाहर से ही खाकर आ रहे थे इसलिए घर में एक बार सब से मिलने के बाद दोनों ही थके हारे से अपने कमरे में चले गए….
समर फ्रेश होकर आ कर बैठा !
अपना लैपटॉप खोल के कुछ देख रहा था और पिया बाथरूम में फ्रेश हो रही थी कि समर का फोन बजने लगा….
समर ने फोन उठाया दूसरी तरफ रेवन थी…..
” हेलो सैमर कैसे हो..?”
” मैं ठीक हूं… तुम..?
समर के माथे पर हल्की सी चिंता की लकीरें खिंच गई वह तुरंत पलंग से उतरा और बालकनी की तरफ बढ़ गया…
” मैं ठीक नहीं हूं, मुझे तुमसे मिलना है…?”
” पर तुम हो कहां..?”
” मैं इस वक्त एम्स्टर्डम में हूं और मुझे तुमसे बहुत जरुरी काम से मिलना है…. प्लीज समर मना मत करना हो सके तो एक बार मुझसे मिलने आ जाओ..!”
” पर बात क्या है..? तुम कुछ बताओगी.. ? मुझे वहाँ आने में अभी वक्त लगेगा..!”
” समर मैं बीमार हूं.. बहुत बीमार और इस वक्त यहां के काउंटी हॉस्पिटल में एडमिट हूं…. यहां के मेरे डॉक्टर तुमसे बात करना चाहते हैं…!
एक्चुअली मेरा एक बेटा है.!
मेरा और तुम्हारा बेटा ! उसे मैं तुम्हें वापस देना चाहती हूं…
मेरे घर परिवार में वैसे भी कोई नहीं है ! तुम जानते ही हो कि मैं बचपन से अपने पेरेंट्स को खोने के बाद अपने अंकल के साथ रहती थी, और बाद में कॉलेज हॉस्टल में ही मेरी ज़िंदगी बीती है…
इसलिए मेरे पास कोई ऐसा रिलेटिव नहीं है जिसके पास मैं अपने बच्चे को छोड़ सकूं और मुझे अपने किसी दोस्त पर भी इतना भरोसा नहीं है… !
मेरी जिंदगी का अब कोई भरोसा नहीं है समर इसलिए मैं तुम्हें तुम्हारा बेटा देना चाहती हूं…!”
” मेरा बेटा…? रेवन यह तुम क्या कह रही हो…?”
” मैं सच कह रही हूं समर, प्लीज हो सके तो जितना जल्दी आ सको आ जाओ…
मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है तुम जितना देर करोगे मुझसे उतनी दूर होते जाओगे हो सकता है….
पता नहीं मैं तुम्हारे आने तक बचूंगी भी या नहीं.. ! इस इसलिए प्लीज कोशिश करो कि जितना जल्दी आ सको आ जाओ..!”
” लेकिन रेवन…. ? मेरा बेटा….?
मेरा मतलब कितना बड़ा है वह..?. क्या करता है..? कैसा दिखता है..? क्या नाम है..? कुछ तो बताओ..?
लेकिन समर के इतने सारे सवालों के जवाब देने से पहले ही रेवन की तरफ से फोन कॉल कट हो चुका था…
परेशान हाल समर जैसे ही फोन रख कर पीछे मुड़ा उसके ठीक सामने पिया खड़ी थी….
पिया हाथ बांधे उसे ही देख रही थी…
” किसका फोन था…?”
पिया के सवाल पर समर एकदम से कोई जवाब नहीं दे पाया और पिया के एक तरफ से निकलकर कमरे के अंदर चला आया…
” मैं कुछ पूछ रही हूं ! जवाब तो दीजिए कि आखिर फोन किसका था…?”
” मेरी एक दोस्त रेवन का…!”
” रेवन..?” पिया के माथे पर बल पड़ गए उसे याद आ गया कि जब वो लोग पोर्ट ब्लेयर के होटल के रूम में थे तब भी इसी लड़की का फोन आया था..
” इंग्लिश में बातें कर रही थी क्या..?”
” हां!! क्यों?”
” इसका फोन तो तब भी आया था जब हम पोर्ट ब्लेयर में थे लेकिन आप सो रहे थे तो मैंने आपको उठाया नहीं..!”
” क्यों नहीं उठाया..? उठाना चाहिए था ना..?”
” अच्छा !! मुझे नहीं पता था कि वह इतनी इंपॉर्टेंट है आपके लिए..?”
समर रेवन की बातों से वैसे ही परेशान था उस पर पिया के यह सवाल जवाब इस वक्त उसे बेहद अखर रहे थे….
” इस वक्त थक गया हूं पिया… मैं फिलहाल किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहता..!”
” लेकिन मैं सारे सवालों के जवाब अभी चाहती हूं… आप के और रेवन के बीच क्या था..? आप इस वक्त रेवन से क्या बातें कर रहे थे..? आपने कहा आपका बेटा तो क्या आपके और उस के बीच ऐसे संबंध थे कि आपका रेवन का कोई बेटा भी हो गया ?
आपने आज तक मुझे इन सारी बातों के बारे में क्यों नहीं बताया… ?”
पिया कि आवाज़ कि नाराज़गी उसकी बातों में झलक रही थीं…
” पिया प्लीज मैं भी इस वक्त रेवन के फोन से डिस्टर्ब हो रहा हूं…
” आप डिस्टर्ब हो रहे हैं इसका मतलब.. ? यह आपका किया धरा है समर..! आपका ऐसा खूबसूरत सा पास्ट था जो आपके वर्तमान में आग लगाने का काम कर रहा है.. इसके पीछे का कारण आप हैं.. !
आपने रेवन के बारे में मुझे शादी से पहले थोड़ा बहुत कुछ बताया तो था लेकिन इतना सब नहीं बताया कभी….
आप दोनों कि दोस्ती इतनी आगे तक थी कि आप दोनों के बीच…
मुझे तो कहते हुए भी शर्म आ रही है, और मैं आपके लिए ऐसा सोच भी नहीं सकती थी…
अगर आप और रेवन इस हद तक आगे बढ़ चुके थे तो आपने मुझसे शादी क्यों की? आपको उसी से शादी कर लेनी चाहिए थी…
” वह उस वक्त शादी के लिए तैयार नहीं थी और शायद मैं भी..!”
समर का यह जवाब पिया के चेहरे को एक गहरी उदासी से रंग गया ! इतना सब इल्जाम लगाते हुए भी कहीं ना कहीं पिया यही सोच रही थी कि समर यह कह दे कि उसके और रेवन के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं था और जो भी हुआ वह सिर्फ एक भूल थी…! लेकिन समर ने वैसा कहने की जगह कुछ और ही कह दिया और समर ने जो कहा उसका मतलब तो यही निकल रहा था कि रेवन शादी के लिए तैयार नहीं थी इसलिए समर पीछे हट गया यह सुनकर पिया का दिल टूट गया…
” अच्छा इसका मतलब अगर उस वक्त रेवन शादी के लिए तैयार होती तो आप और रेवन शादी कर चुके होते..?
” शायद..?”
” क्या आपके घर वाले, यह महल वाले सब लोग एक विदेशी लड़की जिसकी जात पात किसी का कोई पता नहीं था उसे अपनी बहू बनाने के लिए तैयार हो जाते.. ? क्या आप की मां उसे बहू बनाने के लिए तैयार हो जाती..? एक क्रिश्चियन लड़की को..?
हद हैं.. यहां तो मुझसे शादी के पहले आपकी मम्मी के इतने टंट्रम्स थे, और अब एक विदेशी लड़की के लिए आप अपने मां-बाप को तैयार कर लेते वाह..! क्या दोगलापन है आपका और आपकी फैमिली का..!”
” पिया तुम लिमिट क्रॉस कर रही हो..!”
” आपने अपनी लिमिट्स को क्रॉस किया था मैंने नहीं और इसलिए भुगतना आपको है मुझे नहीं..!
मेरी जिंदगी में आप से पहले ना कोई था और ना आप के बाद कोई आएगा इसलिए मैं पूरे कॉन्फिडेंस से यह कह सकती हूं लेकिन आप इस बात पर पूरे आत्मविश्वास से यह तक नहीं कह सकते कि मैं पूरी तरह से तुम्हारा हूं पिया..!
पता नहीं मैं आज तक किस मुगालते में जी रही थी…,?
मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि जब आपको रेवन से प्यार था तो आपको मुझसे शादी करने की क्या जरूरत थी ?
आप भी आखिर उन्हीं लड़कों की तरह निकले समर…!
जो अपनी जरूरते तो कहीं भी पूरी कर लेते हैं, लेकिन शादी के लिए उन्हें एक ऐसी लड़की ही चाहिए होती है जिसे समाज में अपनी बराबरी में खड़ा कर सके ! जिसके साथ शादी करने के बाद उन्हें समाज के सवालों के जवाब न देने पड़े..!
मैंने आपको क्या सोचा था और आप क्या निकले..!”
” पिया प्लीज, मैं बहुत परेशान हूं और मुझे और ज्यादा परेशान मत करो, अगर तुम मेरे साथ रहना चाहती हो तो रहो, नहीं रहना चाहती हो तो अपना सामान उठाओ और इसी वक्त अपने घर निकल जाओ..!”
समर की इस बात को सुनकर पिया का चेहरा गुस्से से लाल हो गया…
उसने उसी वक्त अपना बैग उठाया और कमरे से बाहर निकलने लगी! समर भी बैठा बैठा यही सोच रहा था कि गुस्से में ये यह सब क्या कह गया..? उसका यह मतलब बिल्कुल नहीं था कि पिया घर छोड़कर चली जाए ! वह यह कहना चाहता था कि पिया अपने गुस्से को शांत करें और दोनों शांत मन से बैठकर सारी बातें क्लियर कर ले लेकिन पिया अपने गुस्से में कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी…!
पिया अपने दोनों बैग खींचते हुए कमरे के दरवाजे तक निकल गई, दरवाजे के बाहर जाने के बाद जाने क्या सोचकर वह वापस पलट कर चली आई…!
” मैंने तो कोई गलती नहीं की फिर मैं क्यों छोड़ कर जाऊं आपका घर..? शादी के बाद अब ये मेरा भी घर हैं !
अगर मैं छोड़कर जाती हूं तो लोगों के सवाल मुझ पर उठेंगे हर कोई मुझे गुनहगार ठहरायागा.. !
शादी होकर फेरे फिरने के बाद पूरे संसार के सामने आपने मेरी मांग में सिंदूर सजाया है और उसके बाद पूरी शान से मैं इस घर में दाखिल हुई हूँ तो फिर ऐसे कैसे निकल जाऊंगी..? मैं कहीं नहीं जाने वाली ! मैं यही रहूंगी..! “
अपना बैग एक तरफ पटकने के बाद पिया पलंग में जाकर मुंह फुलाए एक तरफ बैठ गई…
समर अपनी उलझन में डूबा था ! उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह रेवन से क्या कहें और पिया से क्या कहें..? इन सबके बीच वह बच्चा भी था जिसके बारे में रेवन जिक्र कर रही थी…
सोचते सोचते समर का सर फटने लगा था वह कमरे से निकलकर बाहर बालकनी में चला गया… बाहर की ठंडी हवा में सिगरेट सुलगाए वह अपनी सोच में गुम था कि उसे क्या करना चाहिए…
वह रेवन को जितना जानता था उसके अनुसार रेवन बहुत सच्ची और ईमानदार लड़की थी और अगर इस वक्त वह समर को अपने पास बुला रही थी तो इसके पीछे जरूर कोई बड़ा कारण छिपा था…
सोचते सोचते आखिर समर ने तय कर लिया कि वो अगले ही दिन रेवन से मिलने निकल जायेगा… क्योंकि रेवन के अनुसार अब उसके पास वक्त बहुत कम था..
*****
नेहा अपने मन कि बात वासुकी से कहने के बाद वहाँ से बाहर चली गयी…
जाते जाते वो एक बार फिर उसे उसका वादा याद दिलाती गयी…
” शाम छैः बजे मै वापस आउंगी.. मेरा इंतज़ार करना…. !”
हाँ में गर्दन हिलाने के अलावा वासुकी के पास और कोई उपाय ना था…
वो चली गयी लेकिन बेचैनी से पहलु बदलते वासुकी कि हालत देख एक बार को दर्श को भी हंसी आ गयी…
“अब अगर उसके ख्यालों से बाहर निकल गए हो तो कुछ काम कि बात हो जाएं.. !”
“मै किसी के ख्यालों में नहीं हूँ.. !”
“जानता हूँ… मै ये कह रहा था…शेखावत इस बार यहाँ से पार्टी प्रत्याशी के तौर पर देखा जा रहा हैं… समतंत्र पार्टी के मुखिया सर्वेश्वर जी से आजकल रोज़ उसकी मुलाकातें हो रही हैं और अंदर की खबर ये हैं कि सर्वेश्वर जी ने भी शायद उसे हरी झंडी दे दी हैं…
काका बता रहें थे कि सर्वेश्वर इस बार पार्टी टिकट देने के बदले मोटी रकम मांग रहा हैं सबसे… और बोली लगाने वालों में शेखावत सबसे आगे हैं..
उसे पूरा भरोसा हैं कि चंदन के जंगलों के सिर्फ एक चौथाई हिस्से से वो अपने लिए पार्टी का टिकट खरीद लेगा.. !”
“तब तो उसने मैडम पर दबाव बनाना शुरू कर दिया होगा.. !”
जबसे बाँसुरी वासुकी के शहर आई थीं और उससे दो एक बार सामना हुआ था तबसे वासुकी बाँसुरी का नाम लेने में भी हिचकने लगा था..
और दर्श इस बात पर उसका खासा मज़ाक बनाया करता था…
” हाँ बिल्कुल… !
उस दिन की पार्टी के बाद उसने कलेक्टर साहिबा के घर कोई सूटकेस भिजवाया था, जिसे बिल्कुल खोटे सिक्के सा कलेक्टर साहिबा ने फेर दिया…
और शेखावत उसके बाद से बहुत ज़बरदस्त झुंझला उठा हैं… !”
” हम्म !” एक छोटे से हम्म के बाद वासुकी कुछ गहन सोच विचार करता खिड़की की तरफ आगे बढ़ गया..
उसकी खिड़की के ठीक बाहर बाँसुरी के घर का आंगन नजर आ रहा था… वो अपने बगीचे में बैठी अपने असिस्टेंट दीवान के साथ निगम से जुड़े कुछ कार्यों का लेख जोखा ले रही थीं…
तभी कुछ युवा उसके पास चलें आये…
चार पांच लड़कों को एक साथ अंदर आते देख वासुकी ने तुरंत अपने गार्ड्स को फ़ोन किया और तेज़ी से नीचे उतर गया…
वो अपने बगीचे की दीवार के पार खड़ा उनकी बातें सुनने लगा..
ये सब फारेस्ट विभाग के कर्मचारी थे, लेकिन नियमित कर्मचारी ना होकर कॉन्ट्रेक्चुअल थे…
वो सभी कलेक्टर मैडम के पास अपनी फरियाद लेकर आये थे…
“मैडम हम लोग पिछले दस साल से यहाँ काम कर रहें हैं.. लेकिन अब तक हमारे नियमितीकरण की तरफ सरकार ने कोई संज्ञान नहीं लिया हैं….
फारेस्ट विभाग में बहुत ज्यादा मनमानी भी चल रही हैं जिसके बारे में हम लोग समय समय पर लिखित शिकायत दे चुके हैं लेकिन अब तक उस ओर किसी बड़े अधिकारी का ध्यान नहीं गया…..
मैडम आप के पास बहुत उम्मीदों से आये हैं.. आपकी कार्यशैली बाकियो से अलग हैं.. आप किसी भी समस्या के कारण तक जाकर उसे हल करने में यकीन करती हैं….. और इसलिए हम लोग अपना आवेदन आप को देना चाहते हैं.. !”
“आप लोगों की संख्या कितनी हैं.. !”
“हम पच्चीस लोग अनियमित हैं बाक़ी के नियमित कर्मचारी हैं.. उनकी और हमारी तनख्वाह में भी भारी अंतर् हैं मैडम.. !”
उन लोगों के हाथ से उनके आवेदन लेकर बाँसुरी ने उन्हें आश्वस्त किया…
“मै आप लोगों के लिए जो कर सकती हूँ वो ज़रूर करुँगी.. ! निश्चिन्त रहें… अगर समान काम करने के बावजूद वेतन और पद में विसंगति हैं तो मै उसे दूर करने का पूरा प्रयास करुँगी…. !”
बांसुरी ने उन लोगों से बात करने के बाद उन्हें वहां से रवाना किया और उन सब की फाइल लेकर दीवान के साथ उन लोगों का सारा ब्यौरा लेने लगी…..
वासुकी ने देखा कि वो लड़के बातचीत कर के चलें गए तो उसने भी राहत कि साँस ली और वापस ऊपर आ गया….
अंदर आते ही वासुकी कि नजर बरबस ही दीवार पर लगी बड़ी सी घडी पर चली गयी…..
उसकी परेशानी देख दर्श के चेहरे पर हंसी खेल गयी…
” वासुकी तुझसे दुनिया डरती हैं और तू…
“और मै.. क्या.. ?”
“तू औरतों से… एक के सामने तेरी बोलती बंद हो जाती हैं और दूसरी कि हरकतें तेरी ज़बान पे ताला डाल देती हैं.. !”
“ऐसा कुछ नहीं हैं.. !”
“अरे अभी तो छै नहीं बजे और तुम अभी से आ गयी.. !”
दर्श ने वासुकी के पीछे की तरफ देखते हुए कहा..
और वासुकी घबरा कर पीछे मुड़ गया.. पर पीछे कोई ना था.. ये देख वासुकी ने लम्बी सी राहत कि साँस ली.. और दर्श खिलखिला कर हॅंस पड़ा..
” ये हैं नेहा का टेरर !” दर्श होंठो ही होंठो में बुदबुदा उठा…
तभी वासुकी का फ़ोन बजने लगा…
“नेहा बोल रही हूँ वासुकी.. तुम मुझे लेने आ रहें हो, मै बस स्टैंड के पास वाले शिव मंदिर में हूँ.. !”
“नहीं मै नहीं आ पाउँगा.. तुम आ जाओ.. !”
“मै तुमसे पूछ नहीं रही मिस्टर वासुकी, तुम्हे बता रही हूँ कि मै मंदिर में हूँ तुम यहाँ आ जाओ…. और सुनो दर्श को भी साथ ले आना… !”
वासुकी ने लाचारगी से दर्श की तरफ देखा… दर्श ने इशारे से पूछा और वासुकी ने फ़ोन दर्श की तरफ बढ़ा दिया…
दर्श ने फोन में जैसे ही नेहा का फरमान सुना उसे ज़ोर से हंसी आ गयी लेकिन उसने पूरी गंभीरता के साथ उसे हाँ बोल दिया…
“अब जाना तो पड़ेगा मिस्टर वासुकी… !”
दर्श ने वासुकी को नेहा के अंदाज़ में पुकार कर उसे और आग लगा दी…
और उसे साथ लिए मंदिर की तरफ निकल गया…
वासुकी की समझ से बाहर था, और इसी से उसका सवाल उसकी ज़बान पर भी आ गया..
-“दर्श, समझ में नहीं आ रहा कि नेहा जैसी लड़की मंदिर में क्या कर रही हैं… ?”
“नेहा जैसी लड़की से क्या मतलब हैं तुम्हारा वासुकी.. ? उसमे देखा जाएं तो कोई कमी नहीं हैं… उसकी सिर्फ एक कमी हैं कि तुम उसे प्यार नहीं करते, वरना उस जैसी लड़की को पाने के लिए लड़को कि लाइन लगी रहें.. !”
वासुकी खुद अपनी बात कह कर झेंप गया था, रही सही कसर दर्श ने पूरी कर दी…
दोनों मंदिर पहुंचे तब तक शाम भी ढलने लगी थीं… गोधूलि बेला थीं…. गाय, जानवर पंछी सब अपने अपने घर लौट रहें थे, और दर्श वासुकी मंदिर की सीढ़ियां चढ़ रहें थे…
ऊपर पहुँचते ही वासुकी ने देखा नेहा सामने ही खड़ी थीं.. उसने बहुत सुन्दर मेहरून लहंगा पहना हुआ था.. और वाकई इस वक्त उससे नजर हटानी वासुकी के लिए मुश्किल काम हो रहा था… दर्श चुपचाप मुस्कुरा रहा था…
वो दोनों जैसे ही नेहा के पास पहुंचे नेहा ने वासुकी को देख एक मीठी सी मुस्कान दी…
“आप के यहाँ आने के लिए आपका जितना धन्यवाद कहूं कम हैं.. !”
“वो सब बाद में करना, अभी बताओ यहाँ क्यों बुलाया हैं.. ?”
वासुकी के सवाल पर नेहा मुस्कुरा उठी…
“मैंने आपको नहीं दर्श जी को धन्यवाद कहा हैं… आप तो मेरे ही हैं.. आपसे कैसी औपचारिकता.. ?”
नेहा की बातें सुन वासुकी के चेहरे पर झुंझलाहट नजर आने लगी….
और उसने मुहँ दूसरी ओर घुमा लिया… कि तभी नेहा हाथ में एक बड़ी सी प्लेट उठाये उस तक चली आई…
प्लेट में फूलों कि माला रखी थीं…
वासुकी के माथे पर बाल पड़ गए, उसने माला देख नेहा से पूछ लिया.. -“ये सब क्या हैं.. ?”
“आपको अगले चालीस घंटों के लिए मुझसे कुछ पूछने कि इजाज़त नहीं हैं, आप ये माला उठा लीजिये.. बस !!”
वासुकी ने दर्श कि तरफ देखा और दर्श ने भी “क्या फर्क पड़ जायेगा, एक माला पकड़ लेने से “वाले भाव दिखा कर खींसे निपोर ली…
झुंझला कर वासुकी ने माला पकड़ ली..
“बाकी तो सब ठीक हैं पर तुम मुझे अचानक आप क्यों बुलाने लगी.. !”
नेहा ने इठला कर वासुकी कि तरफ देखा.. -” मै कहाँ जाकर मरुँ दर्श ! ये आदमी मेरी बात इतने ध्यान से सुनता हैं मुझे मालूम ही नहीं था..
मतलब मिस्टर वासुकी को हमारा नया अंदाज़ पसंद आ रहा हैं… तुम से आप बोलने का.. !”
“हरगिज़ पसंद नहीं आ रहा, मैंने तो यूँ ही टोक दिया.. !”
“कोई बात नहीं.. आपने मुझ पर ध्यान दिया, यही बहुत हैं…
पंडित जी आ जाइये.. !”
पंडित जी कि पुकार सुनते ही दर्श और वासुकी एक साथ चौंक कर पीछे पलटे और पीले कपड़ो में माथे पर तिलक लगाए हाथ में पूजा कि थाल लिए पंडित जी उन लोगों के सामने चलें आये….
क्रमशः
aparna…..
