जीवनसाथी- 2/49

जीवनसाथी -2 भाग -49

    नाश्ता करने के बाद वासुकी अपने ऑफ़िस के लिए उठ कर निकलने वाला था कि नेहा ने उसकी कलाई थाम ली…

“आज एक दिन बिना ऑफ़िस गए नहीं रह सकतें.. ? “

वासुकी ने बिना कुछ कहे ना में गर्दन में हिलायी और अपनी कलाई छुड़ा कर ऑफ़िस की तरफ बढ़ गया…

वासुकी के जाते ही दर्श ने नेहा की तरफ देखा…

“वो ऑफ़िस छोड़ कर रुक नहीं सकता लेकिन तुम भी तो ऑफ़िस जा सकती हों… तुम्हारे लिए कोई मनाही थोड़े ना है… ?”

नेहा मुस्कुरा कर खड़ी हों गयी… अपनी शिफॉन की साड़ी का आंचल लहराती वो वासुकी के पीछे बढ़ गयी…

  ऑफ़िस में वासुकी बैठा शेखावत की माइंस वाली फाइल देख रहा था… बाँसुरी इस प्रोजेक्ट का भी पुरज़ोर विरोध कर रही थीं…
   इस प्रोजेक्ट में माइंस में खुदाई के काम के लिए शेखावत ने अपना टेंडर पहले ही पास करवा रखा था इसी से उसे सीधे तौर पर रोकना बाँसुरी के लिए ज़रा मुश्किल था… और माइंस की खुदाई के लिए शेखावत जो करने वाला था उससे वहाँ बसे लोगो के साथ बहुत गलत हों जाता.. उन लोगों को उनकी जगह से हटा कर दूसरी जगह ज़मीन देकर बसाना चाहता था, जिसके लिए लोग तैयार नहीं थे.. !
 
उसी फाइल में सर खपाता बैठा वासुकी कुछ बीच का रास्ता निकालने पर विचार कर रहा था… माइंस के प्रोजेक्ट पर शेखावत ने वासुकी को भी ख़ूब पैसा दिया था.. और उसी पैसे की खातिर वासुकी शेखावत की तरफ से उस प्रोजेक्ट को बचाने की सोच रहा था…

उसी वक्त शेखावत का कॉल आ गया….

“वासुकी, जैसे भी हों उस कलक्टरनी को इस प्रोजेक्ट से दूर रख वरना मुझे उसका परलोक का टिकट काटने में वक्त नहीं लगेगा… “

“शेखावत, तेरा काम हों जायेगा.. लेकिन अगर तूने उनकी तरफ नजर उठा कर भी देखा तो तू सोच लें मै तेरे साथ क्या  करूँगा.. !”

“अगर कोई मेरे पेट पर लात मारेगा तो क्या मै उसे   छोड़ दूंगा.. तू पहले भी उस औरत के कारण मुझसे भिड़ चुका है.. !”

“उसके बावजूद तुझे मेरी बात समझ नहीं आ रही… इस काम में मै तुझसे पहले से था.. तू ज़बरदस्ती इस काम में मेरे साथ घुसा है… पहले ही मैंने तुझे कह दिया था की उनसे दूर रहने की शर्त पर ही तुझे इस काम में हिस्सा मिलेगा… लेकिन अब तू कुछ सुनने को तैयार नहीं है… शेखावत जान से ज्यादा कुछ कीमती नहीं होता… क्यों अपनी जान का दुश्मन बना बैठा है… तू अच्छे से जानता है  मुझे…
  तेरी जान लेने में मुझे पल भर भी सोचना नहीं पड़ेगा… !

वासुकी बात कर रहा था की नेहा वहाँ चली आई……

“क्या हुआ मिस्टर हस्बैंड कोई टेंशन है क्या.. ?”

“तुझसे बाद में बात करता हूँ.. !” बोलकर वासुकी ने फ़ोन रख दिया……

“बहुत बिज़ी है क्या.. ?”

“नहीं… तुम बोलो क्या काम है.. ?”

“बस आज का दिन ही तो है मेरे पास… क्या हम साथ साथ कहीं घूमने जा सकतें हैं.. ?”

“देखो नेहा… !”

वासुकी की बात पूरी होने से पहले ही नेहा ने उसकी बात काट दी…

“ओके ओके, मिस्टर हसबैण्ड ! मै समझ गयी आप बिज़ी हैं… मेरे साथ नहीं जा सकतें… !”

“ऐसा मैंने कब कहा.. ? मै तो कहने वाला था कि देखो नेहा यहाँ एक बहुत पुराना शिव मंदिर है, और उससे आगे बढ़ कर झील है, जंगल है, पहाड़ है.. तुम कहाँ जाना चाहती हों.. ?”

“हाय सच्ची !! तो ऐसा करते हैं सबसे पहले हम शिव मंदिर ही चलते हैं… वहीँ से फिर आगे बढ़ेंगे.. !”

वासुकी नेहा की बात मान कर उसके साथ जाने के लिए उठ गया.. जाते जाते उसने दर्श को सारी  फाइल सौंप कर उसे सब कुछ समझाया और फिर आगे निकल गया…

वासुकी गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठा और नेहा उसके ठीक बगल में बैठ गयी…
वासुकी ने गाड़ी मंदिर वाले रास्ते पर बढ़ा दी…
नेहा ने वासुकी को एक नजर देखा…

“मिस्टर हस्बैंड मै कुछ गुनगुना सकती हूँ.. ?”

“हम्म !” एक छोटा सा हम्म सुनकर भी नेहा चहक उठी…

” थैंक यू थैंक यू सो मच… अब मै आपकी तारीफ में कुछ गा लेती हूँ…

मैं का करूँ राम मुझे बुड्ढा मिल गया
हाय हाय बुड्ढा मिल गया

सब जो गये बाग़ मेरा बुड्ढा भी चला गया
सब तो लाये फूल बुड्ढा गोभी ले के आ गया
मैं हो गई बदनाम.. मुझे बुड्ढा मिल गया
मैं का करूँ राम…

नेहा मुस्कुराते हुए गाना गा रही थी, और वासुकी ने  उसका गाना सुनकर उसे घूर कर देखा और तेजी से  ब्रेक लगा दिया…

” इतना वाहियात गाना तुम मेरे लिए गा रही हो..?”

“कुछ रोमांटिक सा गाऊं… ?”

नेहा की बात सुनकर वासुकी उसे घूरता रहा और नेहा दूसरा गाना गुनगुनाने लगी….

तू आता है सीने में
जब जब सांसें भरती हूँ
तेरे दिल की गलियों से
मैं हर रोज़ गुज़रती हूँ
हवा के जैसे चलता है तू
मैं रेत जैसे उडती हूँ
कौन तुझे यूँ प्यार करेगा
जैसे मैं करती हूँ
हो हो……

नेहा मुस्कुरा कर वासुकी को देख रही थीं… और उसकी नज़रों कि आंच वो सह नहीं पाया…  गाड़ी एक तरफ खड़ी कर वो बहार निकल गया..
उसके पीछे वो भी बाहर चली आई…
   रास्ते के  एक तरफ झील थीं.. उसी झील कि तरफ मुहँ किये अपनी गाड़ी से टिक कर खड़ा वासुकी हाथ बांधे झील में बहते पानी को देखता खड़ा था…..
नेहा उसके ठीक बगल में आकर खड़ी हों गयी…

” मुझसे इतना प्यार मत करो नेहा ! मै इस लायक नहीं हूँ.. !”

“वो तो मै ही जानती हूँ कि आप किस लायक हैं,  मेरा बस चलें तो आपको अपने दिल में बिठा कर रात दिन आपकी पूजा कर सकती हूँ.. !”

“क्यों कर रही हों ऐसा… ? मुझे बुरा लगता है तुम्हारे लिए कि तुम्हारे इतने प्यार का बदला मै तुम्हे नहीं दें सकता.. !”

“आपने जितना दिया है वही बहुत है मिस्टर हस्बैंड !!
मुझे तो इतने कि भी उम्मीद नहीं थीं… आपने जितना किया है वो बहुत बहुत है मेरे लिए… ! कल की रात मेरे जीवन की सबसे अनमोल रात हों चुकी है.. उस रात की यादें, वो सारी बातें अब सारी ज़िन्दगी मेरे ज़हन में मौजूद रहेगी.. !
   कल आपकी खुशबु जो मुझमें रच बस गयी है अब वो मुझसे कभी अलग नहीं हों सकती… !

वासुकी ने नेहा कि तरफ गहरी नज़रों से देखा और उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया…
उसका हाथ थाम कर नेहा उस तक आई और उसके सीने से लग गयी…
  धीमे से वासुकी ने अपनी बाँहों के घेरे में नेहा को बांध लिया….

******

प्रेम और राजा गुरूदेव से मिलने निकल गए……
वो लोग जिस वक्त गुरुदेव  के पास पहुंचे, वो वक्त गुरु जी का साधना में बैठने का था.. और वो अपनी साधना में लीन थे..
   गुरूदेव की उम्र कितनी थीं इस बारे में किसी को भी ठीक ठीक अंदाज़ा नहीं था, लेकिन ये बात राजा को खुद उसके पिता ने बताई थीं कि वो अपने पिता महाराज के साथ अक्सर गुरुदेव के पास आशीर्वाद लेने आया करते थे…
    यहां तक कि अपने राज्याभिषेक के पहले भी राजा के पिता अपने पिता के साथ वहां गुरुदेव का आशीर्वाद लेने आए थे…
   इसके अलावा राज महल के सारे शुभ कार्यों में भी गुरुदेव का आशीर्वाद लेना आवश्यक माना जाता था…
   राजा के राज्याभिषेक के समय भी गुरुदेव को सादर आमंत्रित किया गया था लेकिन किसी कारणवश वह स्वयं उपस्थित नहीं हो पाए थे परंतु उन्होंने अपने सबसे खास शिष्य को राजा के राज्याभिषेक के वक्त भेजा था…!
.    गुरुदेव के पास बांसुरी ने शौर्य  की कुंडली भिजवाई  थी और उस कुंडली को पढ़ने के बाद गुरुदेव ने काफी सारी बातें राजा और बांसुरी को बताई थीं…
    लेकिन अभी अचानक कुछ दिनों पहले गुरुदेव ने राजा को मिलने के लिए बुलवाया था इस संदेश के मिलने के बाद से ही राजा अपने काम निपटा कर उनके पास जल्दी से जल्दी पहुंचने की कोशिश में था और आज प्रेम के साथ उनके पास मिलने के लिए पहुंच गया था…

गुरुदेव की साधना समाप्त होने के बाद उन्होंने राजा को अपने कक्ष में बुला लिया..
राजा और प्रेम गुरुदेव के कक्ष में जाते ही उन्हें सादर  प्रणाम कर एक तरफ को खड़े हो गए!  गुरुदेव ने उन दोनों की आहट सुन उन्हें बैठने का इशारा कर दिया…
गुरुदेव जमीन से थोड़ा ऊपर को रखे पाटे पर बिछे आसन पर बैठे थे… राजा और प्रेम उनके सामने बिछे आसन पर बैठ गए…

   उन दोनों को आशीर्वाद देने के बाद गुरुदेव ने राजा से सवाल कर दिया…

” कैसे हो अजातशत्रु ?”

” आपका आशीर्वाद है गुरुदेव..!”

” हमारा आशीर्वाद तो सदा तुम्हारे साथ है ! हम चाहते हैं तुम्हारी यश पताका चहूं ओर फैले !  सारा संसार तुम्हारा नाम जुग-जुग तक याद रखें.. तुम्हारी कीर्ति सूरज की रोशनी की तरह सारे संसार को आलोकित करें ! लेकिन एक बात याद रखना अजातशत्रु,  जिस व्यक्ति का जीवन संसार को समर्पित हो जाता है फिर उस व्यक्ति का अपना परिवार नहीं रह जाता है..!”

” स्वामी जी ऐसा क्यों कह रहे हैं आप..?”

” उस दिन भी हम अपनी बात कहते कहते रह गए थे…  लेकिन तुम्हारी कुंडली में स्पष्ट तौर पर हम ये  देख पा रहे हैं कि तुम्हारा पारिवारिक जीवन  कभी भी संतोष में नहीं रहेगा ! साथ रहते हुए भी तुम और तुम्हारी पत्नी अलग रहोगे और हो सकता है कि यह अलगाव बहुत जल्दी एक लंबे बिछोह में बदल जाए…
    लेकिन इस सारे कालखंड में तुम्हें स्वयं को और अपने परिवार को समझने और जानने का मौका मिलेगा ! इस सारी  अवधि में तुम्हें अपने और परायों का फर्क भी समझ में आ जाएगा ! लेकिन एक बात तय है कि तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का बिछोह स्थायी नहीं है…
एक लंबे समय के बाद तुम दोनों वापस मिल जाओगे एक हो जाओगे…!

” पर गुरुदेव  मैं तो अभी अपनी पत्नी से अलग ही रह रहा हूं ! उस समय भी आपने कहा था कि बांसुरी के सुख और स्वास्थ्य के लिए हम दोनों का अलग रहना उसकी कुंडली के अनुसार दिखा रहा है..!”

” वही कुंडली तो अभी भी मुझे विचलित कर रही है अजातशत्रु !!  तुम दोनों की कुंडली में अभी एक लंबा अलगाव दिखाई दे रहा है..! हालाँकि उसके बाद सब शुभ ही शुभ है ! और एक बात दिख रही जो मुझे चिंतित कर रही है…
   तुम्हारे बेटे की कुंडली में राजयोग है, गजकेसरी योग है बिल्कुल तुम्हारी कुंडली की तरह, लेकिन अपने पिता के लिए ये कभी सहिष्णु और स्नेहिल नहीं रहेगा… ! इसका गुस्सा इसकी बुद्धि और पराक्रम पर सदा भारी पड़ेगा.. !
    तुम कितना भी उसे अपने महल में बांधना चाह लो वो कभी किसी एक जगह नहीं ठहरेगा !
  उसे रोकें रखने के तुम्हारे सारे प्रयत्न विफल हों जायेंगे अजातशत्रु…
  रूप रंग कद काठी में तुम्हारी परछाई तुम्हारा बेटा स्वभाव में तुमसे बिल्कुल अलग होगा…!
निर्द्वन्द, निर्बाध, सनकी, अपने मन की करने वाला,  लेकिन तुम्हारे नैसर्गिक गुण तुम्हारे जींस उससे कभी किसी का अहित नहीं करवाएंगे…
  वो बस तुम्हारे लिए ही इतना नकारात्मक होगा… संसार के लिए नहीं… !
पर फ़िलहाल मै उसके लिए नहीं उसकी माँ के लिए चिंतित हूँ… !

  बाँसुरी की कुंडली में मारक योग बन रहा है और ये तुम्हारे साथ रहने पर अपने दुगुने प्रभाव से कार्य करेगा…
   तुम उससे जितना दूर रहोगे, उतना उसके जीवन के लिए उचित और सुरक्षित होगा.. !

“जी गुरुदेव.. ! इसलिए तो बाँसुरी को खुद से इतना दूर रख रखा है.. ! “

” और अभी यह दूरी समाप्त करने का समय नहीं आया है..!”

” जानता हूं  गुरुदेव!  मेरे लिए उसका सुरक्षित रहना सबसे अधिक जरूरी है!  वैसे भी मैं जिस कार्यक्षेत्र में हूं मेरे दुश्मनों की वैसे भी कोई कमी नहीं है इसके अलावा बांसुरी भी अब प्रशासनिक में आ चुकी है और उसकी इमानदारी सदा से ही उसके गले का फंदा बनती आ रही है… अब तो विश्वास ही नहीं होता हर वक्त दिल में डर बना रहता है कि पता नहीं कब कहां कौन बांसुरी पर घात लगाए बैठा हों..  इसलिए उसकी सुरक्षा का सबसे कड़ा बंदोबस्त कर के आया हूं…
बांसुरी खुद नहीं जानती  कि उस पर कितने सारे पहरे  मैंने बिठा रखे हैं..
   क्योंकि अगर उसे पता चल जाएगा तो वह मुझसे इस बात पर नाराज हो जाएगी…!
मुझसे  विवाह के बाद मुझसे कहीं ज्यादा वीर और पराक्रमी वह हो गई है ! अब उसे अपने खुद के जीवन की कोई परवाह नहीं है!  जिस तरह उसे मेरे जीवन मेरे स्वास्थ्य की चिंता रहती है, उसी तरह मुझे भी तो उसकी चिंता रहती है..!”

” अजातशत्रु तुम उससे दूर रहते हुए उसके लिए जो भी कर रहे हो वह सब उसी के लिए सर्वश्रेष्ठ है! इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है, क्योंकि अगर तुम दोनों एक साथ रहते हो तो बांसुरी की कुंडली में पूर्ण मृत्यु योग दिख रहा है..!”

“नहीं गुरुदेव ! उससे कुछ समय अलग रह सकता हूँ लेकिन उसे हमेशा के लिए खो नहीं सकता.. ! गुरुदेव मन में एक खटका सा था, क्या आपसे पूछ सकता हूँ.. ?”

” हमसे पूछने के लिए इतनी औपचारिकता की क्या आवश्यकता है अजातशत्रु !”

“गुरुदेव आपने शौर्य के बारे में जो भी बताया,  उसके बाद एक प्रश्न उठ रहा है.. !
   मैंने तो शौर्य को राजपाट देने का कभी सोचा ही नहीं.. !
  मै अक्सर युवराज भाई साहब से और समर प्रेम से इसी बात की चर्चा करता हूँ की गद्दी पर हर्ष यानी युवराज भैया का बेटा हर्षवर्धन बैठेगा… फिर आपने कैसे कहा कि शौर्य गद्दी पर बैठेगा.. !”

“तुम चाहें कितने प्रयास कर लो अजातशत्रु लेकिन राजा तो शौर्य ही बनेगा.. कर्क लग्न की कुंडली में चन्द्रमा और बृहस्पति उसके भाग्य और कर्म भाव में ऐसी बैठे है की वो कितना भी भाग लें लेकिन परिस्थितियां ऐसी बन ही जाएँगी कि राजमुकुट तुम्हारे और बाँसुरी के पुत्र शौर्य के माथे ही सजेगा..
   और उसके राजा बनते ही तुम्हारे महल के अच्छे दिन वापस आ जायेंगे… लेकिन तब तक तुम ढ़ेर सारे गृहक्लेश, पारिवारिक और समाजिक वैमनस्य को अकेले झेलने के लिए बाध्य रहोगे.. !”

राजा सच्चे दिल से चाहता था कि अपने कार्यकाल में ही वो  युवराज के पुत्र हर्षवर्धन को अपनी गद्दी सौंप दें… क्योंकि इधर राजनीति में जबसे  उसका पदार्पण हुआ था तब से उसकी व्यस्तता कुछ अधिक ही बढ़ गई थी….
और वो हर्षवर्धन को गद्दी सौंपने के बाद अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करना चाहता था…. लेकिन जाने उसकी कुंडली में और उसके भाग्य में अभी और न जाने कितना क्या कुछ देखना बाकी था…!
    लेकिन इस सबके बावजूद आज तक उसने शौर्य प्रताप को कभी भी भावी राजा के रूप में नहीं देखा था ! एक तो शौर्य घर भर में सबसे छोटा था और दूसरे युवराज भैया के गद्दी पर ना बैठने के कारण ही उसे स्वयं को उस गद्दी  को संभालना पड़ा था और इसलिए भी उसके मन में यही चाहत थी कि उसके बाद यह गद्दी युवराज भैया के पुत्र की हो..!
  
राजा के मन के भाव गुरुदेव को भी समझ में आ रहे थे लेकिन वह तो वही पढ़ सकते थे जो उन्होंने कुंडली में देख रखा था….

गुरुदेव ने अंदाजे से टटोलकर सामने बैठे राजा के सर पर हाथ रखा और उसे आशीर्वाद दें दिया… -” चिरंजीव भव !”

प्रेम ने भी राजा के बाद गुरुदेव को प्रणाम किया और गुरुदेव से आज्ञा लेकर वो दोनों वहाँ से निकल गए…

” हुकुम आप से एक छोटा सा सवाल करना चाहता हूं..?”

” बोलो प्रेम..?”

” गुरुदेव तो आंखों से देख नहीं सकते हैं ना..? फिर यह कुंडली कैसे बांच लेते हैं..!”

” गुरुदेव के बारे में मैंने सुना है कि वह जन्मांध है, यानी जन्म से ही उनकी आंखें नहीं थी..! लेकिन उसके बावजूद उनके पिता ने उन्हें ग्रह नक्षत्र खगोल शास्त्र जन्म कुंडली आदि  की पूरी गणना करना सिखाया,  और अब भी वह जन्मकुंडली को अपने तरीके से लेकर बांच लेते हैं.. !”

” कितने आश्चर्य की बात है हुकुम जो इंसान अपने सामने घट रही चीजों को नहीं देख सकता वह इतने आराम से लोगों का भूत और भविष्य बयान कर जाता है..!”

” सही कह रहे हो प्रेम!  यह सिर्फ उनका अर्जित किया ज्ञान भर नहीं है बल्कि बचपन से ही उनमें एक दिव्य दृष्टि थी और उसी के कारण वह इतनी सटीक कुंडली गणना करते हैं…!”

” जी हुकुम ! गुरुदेव का व्यक्तित्व भी निराला है ! तो अब क्या सोचा है हुकुम ? यहाँ से वापस रियासत लौटना है या..!”

“आज का दिन तो गुरुदेव की सेवा में ही बिताना है.. उसके बाद कल देखते हैं… कल सुबह या दोपहर तक निकल जायेंगे… बाँसुरी से मिलने.. ! उसके बाद उसे कुछ दिन के लिए अपने साथ लें चलूँगा..
  कुछ दिनों की छुट्टी मना कर भले ही वापस लौट आएगी..!”..

“जी हुकुम !

गुरुदेव के कक्ष से निकल कर दोनों गुरुदेव के आश्रम में दाखिल हों गए… वहाँ पर के लोग पहले ही राजा अजातशत्रु के इंतज़ार में थे….
  उन दोनों को देखते ही सबके चेहरे पर प्रसन्नता खिल गयी…

क्रमशः…

aparna….  

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