जीवनसाथी-2/6

जीवनसाथी 2.. – भाग 6

   
       राजमहल के नियम शुरुआत से जैसे चल रहें थे आज भी उनमे कोई बदलाव नहीं आया था… पीढ़ी ज़रूर बदली थीं लेकिन कायदे अब भी सारे वही थे..
सुबह नौ बजे सभी को एक साथ नाश्ते की टेबल पर मौजूद रहना ही होता था,  हाँ अगर कोई शहर से बाहर गया है तब और बात है…
   मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी राजा तक के लिए इस नियम में कोई छूट नहीं थीं..
   बाँसुरी अब तक अपने नए तबादले में गयी नहीं थीं.. आज सुबह भी वो महल के शाही घंटे के बजने के पहले ही तैयार होकर शौर्य को लेकर नीचे पहुँच चुकी थीं.. राजा पहले ही अपने ऑफिस में बैठा कुछ काम देख रहा था…
रूपा सबके आते ही नौकरों को सब परोसने का बोल कर खुद दादी हुकुम की प्लेट लगाने लगी….
   रेखा भी चुप बैठी अपने मोबाइल पर कुछ ज़रूरी ऑर्डर देख रही थीं…
    रूपा, रेखा और जया के बच्चे स्कूल जा चुके थे..  शौर्य अब ढ़ाई साल का हो रहा था,और अपनी व्यस्तता के कारण ही बाँसुरी उसे इस बार राजपरिवार के स्कूल में डालने की सोच रही थीं.. लेकिन अचानक आयी इस तबादले की चिट्ठी ने मसला बदल दिया था.. उसके चेहरे पर दिखती परेशनी को भांप कर रूपा ने ही उसे टोक दिया…

“क्या हुआ बाँसुरी.. ? बहुत परेशान लग रही हो.. ?”

“भाभी सा, मैं शौर्य को लेकर कुछ भी तय नहीं कर पा रही हूँ,  उसे साथ लेकर जाना ठीक रहेगा या नहीं.. !”

“बाँसुरी हमारी मानो तो बच्चे को यहीं हमारे पास छोड़ जाओ, यहाँ इतने लोग हैं देखने वाले, फिर सुबह शाम उसके आगे पीछे घूमने चार नौकर भी रहेंगे, अपने भाई बहनों के साथ आराम से रह लेगा..वहाँ तुम अकेले अपना दफ्तर देखोगी या बच्चे को देखोगी ? बोलो तो..?
    चलो मान लिया नौकर चाकर तो यहाँ से भी साथ चले जायेंगे लेकिन वहाँ तुम अकेली होंगी इसे देखने वाली और यहाँ हम इतने सारे लोग.. !”

“आप सही कह रही हैं भाभी सा !यहाँ शौर्य के पापा भी तो होंगे,  उनके बिना तो इसे नींद तक नहीं आती.. क़भी शहर से बाहर इन्हे दौरों पर जाना पड़ता है तब शौर्य बहुत परेशान हो उठता है !”

राजा ने बाँसुरी को मुस्कुरा कर देखा..

“मेरे बिना सो नहीं पाता पर तुम्हारे बिना तो रह ही नहीं पाता..!
    अगर छोड़ के जाओगी तो सोच समझ कर छोड़ना,  क्योंकि उसके साथ तो हम सब रहेंगे,  मालूम चल रहा है तुम खुद वहाँ से रो रोकर उसे याद करने लगी.. !”

राजा हँसने लगा,  पर बाँसुरी वापस दुविधा में फंस गयी… उसे समझ नहीं आ रहा था की शौर्य का क्या करें… !
   उसे बाजु वाली कुर्सी से उठा कर उसने गोद में बैठा लिया, और धीरे धीरे खिलाने लगी.. रेखा ने उसकी तरफ देखा और उसके कांधे पर हाथ रख दिया..  

“डोंट वरी बाँसुरी,  यहाँ हम सब हैं.. और फिर तुम्हें कौन सा वहाँ गृहस्थी बसानी है..? हम तो कहते हैं जॉइन करने से पहले ही छुट्टी लेकर बैठ जाओ और तबादला रद्द करने की एप्लिकेशन दे दो… !
   राजा साहब स्वयं मुख्यमंत्री है,  कितने आराम से तुम्हारा तबादला रुक जायेगा..|  हमें तो समझ में नहीं आता की आप लोग इस तबादले को इतना गंभीरता से ले क्यों रहें हैं.. !”

” रेखा तुम क्या इनका स्वभाव नहीं जानती हो.. नियम विरुद्ध जाकर ये क़भी कोई काम नहीं करेंगे.. !”

“ट्रांसफर तो पूरी दुनिया के लोग रुकवाने की कोशिश करते ही हैं अगर मनचाहा नहीं हुआ हो तो.. इसमे कौन से नियम का विरोध हो गया.. ?
   हमें तो ये सब किसी का किया धरा लग रहा है.. जानबूझ कर तुम्हें इतनी दूर ले जाकर पटका है | “

“अब वो जो भी बात रही हो,  हमें जाना तो होगा ही,  एक बार जाकर वहाँ का काम धाम तो समझें उसके बाद देखते हैं की ट्रांसफर का क्या हो सकता है.. !”

  सब बातें करते खाने में लग गए,  राजा ने फटाफट नाश्ता ख़त्म किया और एक बार फिर आपने ऑफिस के लिए निकल गया… किसानों की कर्ज माफ़ी से जुडी कोई फाइल उसके पास पड़ी थीं.. वित्त विभाग के पास इतना बजट नहीं हो पा रहा था की एकाएक इतना बड़ा निर्णय ले लिया जाये, दूसरी तरफ अगर वो अपना खजाना खोल कर मदद करने की सोचे तब भी उस पर वोट बैंक खरीदने का इल्जाम लग सकता था..|  इन सब मुसीबतों से कैसे निकला जाये इसी उधेड़बुन में वो ऑफिस में बैठा दिमाग के घोड़े दौड़ा रहा था..|
    दो दिन पहले ही समर और प्रेम उस बीहड़ का हाल चाल जानने निकलने वाले थे पर काम की अधिकता के कारण वो दोनों ही निकाल नहीं पाए थे..| समर ने अपने दो आदमियों को भेज दिया था… |
  और अब समर ने यही सोचा था की बाँसुरी को छोड़ने राजा के साथ वो खुद भी चला जायेगा और आसपास जाँच पड़ताल कर आ जायेगा… |
  रेखा ने भी फटाफट अपना नाश्ता पूरा किया और दादी सा का आशीर्वाद लेकर अपने काम पर निकल पड़ी….
  बाँसुरी को भी अपने पुराने ऑफिस रिलीव होने जाना ही था.. वो भी निकल गयी|   इसी सब के बीच समर लगातार इस बात का पता करने में लगा था की आख़िर ये तबादला पूरी तरह प्रशासनिक है या इस के  पीछे कोई है.. हालाँकि उसे अब तक कहीं से कोई सुराग नहीं मिल पाया था कि इस तबादले के पीछे अनिरुद्ध वासुकी का हाथ था.. ….. |

*****

  सुबह का काम निपटा कर निरमा तैयार हो रही थीं.. की तभी प्रेम कमरे में चला आया… उसे मुस्कुराते देख निरमा के माथे पर बल पड़ गए..

“क्या हुआ, आज बड़े खुश नज़र आ रहें हैं.. !”

“हाँ बस ऐसे ही.. ! अब क्या मैं खुश भी नहीं रह सकता ?”

“नहीं,  कोई बात तो है.. !सच बताइये न क्या हुआ है. !”

“बस मौसम खूबसूरत है,  मीठी स्कूल जा चुकी है.. सुमित्रा अपना काम निपटा के जा चुकी है,  अम्मा भी आज छुट्टी पर हैं.. तो.. !”

“तो क्या.. ? आपकी भी छुट्टी है क्या.. ?”

“नहीं छुट्टी तो नहीं है लेकिन ले लेंगे अगर हमारी बेगम चाहेंगी तो.. !”

“न बाबा,  आप तो ले लेंगे लेकिन मैं तो यूनिवर्सिटी से छुट्टी नहीं ले सकती न.. !”

“क्यों.. ?क्यों नहीं ले सकती.. ?”

” काम बहुत है प्रेम साहब ! यूनिवर्सिटी में परीक्षाएं चल रही हैं…. !”

“ये तो गलत बात है,  अगर क़भी बीवी गुज़ारिश करें और पति छुट्टी न ले पाए तो बीवियाँ रो रो कर गाने लगती है ‘तेरी दो टकियाँ दी नौकरी मेरा लाखों का सावन जाये’ और अगर क़भी पति चाहे की बीवी छुट्टी ले ले तो फिर देखो इनके नखरे.. छोड़ो हटो ! मत लो छुट्टी.. जाओ तुम काम ही करो… !”

  प्रेम उसे सुना कर मुड़ कर जाने को था की निरमा ने पीछे से जाकर उसे बाँहों में भर लिया…

“सॉरी बाबा,  अभी छुट्टी के लिए कॉल कर देती हूँ.. फिर बाहर चलते है.. ओके ! पहले शॉपिंग जायेंगे फिर बाहर से ही लंच कर के वापस आ जायेंगे,  उस वक़्त तक मीठी भी आ जाती हैं.. “

प्रेम ने मुस्कुरा कर निरमा की बाहें थाम ली… -“चलो फटाफट तैयार हो जाओ.. “

” तैयार तो हूँ.. !”

“ऐसे जाओगी… यूनिवर्सिटी की खड़ूस सीइओ लग रही हों अपनी इस तांत की साड़ी में.. अरे कुछ अलग पहन लो.. कोई सूट ही डाल लो..या फिर कोई जींस,  अरे वो तुम्हारा एक मरून टॉप है न वही पहन लो,  जंचता है तुम पर  !”

निरमा ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया…. प्रेम को नीचे भेज वो कपडे बदलने चल दी .. आज बहुत दिन बाद उसने अपनी जींस और टॉप निकाल ली.. वाकई जब से यूनिवर्सिटी जाना शुरू किया था उसने,  उसके वॉडरोब में साड़ियाँ बढ़ती जा रही थीं.. उसे वहाँ इतने बड़े लड़कों के बीच साड़ी ही पहनना अच्छा लगता था.. प्रेम को भी तो वो अक्सर साड़ी में ही पसंद आती थीं.. और अपने प्रोफेशन और काम के बीच वो अपने अंदर की लड़की को जैसे भूल ही गयी थीं…..
    अलमारी के उस हिस्से को जहाँ उसके आधुनिक तरीके के कपड़े रखें थे खोल कर वो कुछ देर को देखती रह गयी थीं… हालाँकि प्रेम ने तो शुरू से ही उसे क़भी कपड़ो के लिए नहीं टोका था पर घर पर  काम करने वाली अम्मा जरूर शुरुवाती दिनों में उसके घर पर पहने जाने वाले लोअर टीशर्ट के लिए उसे टोक दिया करती थीं…
   उस समय मीठी होने वाली थीं इसलिए उससे और कुछ पहना भी नहीं जाता था.. और बाद बाद में तो वो कॉटन के गाउन ही पहनने लगी थीं.. वो सारे मेटरनिटी वाले गाउन आज भी उसने अलमीरा में सबसे नीचे संभाल रखें थे…
    निरमा वहीं जमीन पर बैठकर एक-एक कर अपने कपड़ों पर ममता से हाथ फेरने लगी.. मेटरनिटी गाउन हाथ में लेते ही उसे पहली बार मीठी को गोद में जब लिया था, वो एहसास याद आ गया…

कितनी अजीब बात है ना आपके कपड़े भी आपकी यादों को सहेज कर रखते हैं…

उसने उस मेटरनिटी गाउन को  अपनी नाक के पास ले जाकर सूंघ लिया ….
     कुछ ऐसा लगा जैसे मीठी के पास से आने वाली मीठी मीठी सी खुशबू आज भी इन कपड़ों में समाई हुई है |  उसे एक-एक कर मीठी से जुड़ी सारी बातें याद आने लगी और साथ ही याद आने लगा प्रेम का  उसका  हद से ज्यादा ध्यान रखना,  प्रेम कितना ध्यान रखता था उसका उस वक्त…|
   प्रेम का बस चलता तो वह उसे पलंग से उतरने ही नहीं देता..| उसे क्या पसंद था क्या नापसंद था उसी के अनुसार घर का खाना बना करता था| सुमित्रा और अम्मा को प्रेम ने स्पेशल अलर्ट जारी कर रखा था कि जब कभी प्रेम घर से बाहर रहे तो अम्मा निरमा के साथ हर वक्त घर पर मौजूद रहे…|
   अपने बढ़ते वजन और हाथ पैर में होने वाले दर्द के कारण उसका वॉक करने का कहाँ मन होता था ? लेकिन वह उसे जबरदस्ती पकड़कर अपने साथ सुबह और शाम दोनों वक्त वॉक के लिए ले ही जाया करता था |  वॉक से लौटने के बाद अनार के जूस का एक बड़ा गिलास उसे ज़बरदस्ती पिलवाया करता था…| उसके लिए सुमित्रा से कह कर गरम पानी का टब मंगवा दिया करता था,  जिसमे सेंक लेते ही उसे कितना आराम मिल जाया करता था.. |

     यह पति भी अजीब होते हैं, वैसे तो सारा समय खुद बच्चे बनकर अपनी सेवा करवाएंगे | लेकिन जैसे ही बीवी माँ बनने वाली होती है,  खुद उसकी माँ बन कर उसके सर पर सवार होकर उसकी तीमारदारी में लग़ जायेंगे… |

..लेकिन क्या सारे पति ऐसे होते है..?

उसके साथ यूनिवर्सिटी में काम करने वाली मिसेस श्रीवास्तव के पति तो बिलकुल ऐसे नहीं है.. वो अक्सर लंच टाइम में निरमा के साथ बैठ अपने पति की बेपरवाही का रोना रोती रहती हैं… खैर ये उनका मामला है, इस पर वो क्या कर सकती है.. ?
   उसे उस अलमीरा को टटोलते हुए अपनी पिछली प्रेग्नेंसी की रिपोर्ट्स हाथ लग गयी…
  मीठी के बाद जब दुबारा वो माँ बनने वाली थीं तब प्रेम एक बार फिर बच्चों सा चहक उठा था, उसका  बहुत मन था की निरमा ये बच्चा ले लेकिन जाने किस बात से डर कर निरमा नहीं लेना चाह रही थीं.. |
   शायद उसके मन में ये डर बैठा था की अपना खुद का बच्चा आ जाने के बाद कहीं प्रेम ने मीठी से मुहँ मोड़ लिया तो,  और बस इसलिए वो तैयार नहीं हो पा रही थीं.. |
   पर आख़िर प्रेम की ज़िद के आगे उसे झुकना ही पड़ गया था,  लेकिन भगवान ने भी शायद उसे उसकी सोच के लिए सजा दे दी थीं… दो महीने बीतने पर जब वो और प्रेम डॉक्टर के पास गए तब सोनोग्राफी में बच्चे की धड़कन नहीं सुनाई पड़ी थीं…
  हालाँकि ये दो महीने उसने रात दिन अपने अंदर साँस लेने वाली नन्ही सी जान की धड़कने महसूस करते हुए ही निकाले थे, लेकिन डॉक्टर के ऐसा कहते ही वो टूट कर बिखर सी गयी थीं… !
   कहाँ तो वो प्रेम के सामने ये दिखा रही थीं की उसे बच्चा नहीं चाहिए और कहाँ डॉक्टर के ऐसा कहते ही कहर सा टूट पड़ा था उस पर.. |

प्रेम ने ही तो संभाला था उसे तब भी… हमेशा कि तरह !

  उन दो महीनो की असफल प्रेग्नेंसी से उबरने में उसे महीनों लग गए थे… वो तो ये अच्छा था की यूनिवर्सिटी का काम उसके सर पर था इसी कारण थोड़ा सा समय बीत जाता था वरना पता नहीं क्या होता….

“क्या सोचती बैठी हो.. ? तैयार नहीं होना क्या.. ?”

प्रेम कब आकर चुपके से उसके पीछे खड़ा उसे ही देख रहा था वो जान ही नहीं पायी…. उसने फटाफट अपनी ऑंखें पोंछ ली !

प्रेम की ज़िद पर उसने अपनी एक ग्रे कलर की जींस  और मरून टॉप निकाल लिया.. ..

“बहुत दिनों बाद पहन रही हूँ पता नहीं कैसी लगूंगी.. ?”

“अच्छी ही लगोगी.. तुम पर तो सब खिलता है.. चलो फटाफट तैयार हो जाओ,  मैं जाकर गाड़ी निकलता हूँ !”

प्रेम के बाहर जाते ही निरमा बाथरूम में मुँह धोने घुस गयी.. लगातार रोने से उसकी आँखे गुलाबी सी हो गयी थीं…
  तैयार होकर वो फटाफट नीचे उतर आयी.. उसके गाड़ी में बैठते ही प्रेम ने गाड़ी भगा दी…
गाड़ी से ही उसने अम्मा को फ़ोन कर दोपहर मीठी के आने के वक़्त पर घर पर रहने को बोल कर अपनी छुट्टी के लिए भी यूनिवर्सिटी में फ़ोन कर दिया….
   आज बड़े दिनों बाद निरमा ने जो टॉप पहना था वो अब पहले की तुलना में जरा चुस्त हो गया था.. इसलिए उसने ऊपर से एक स्टॉल भी ले लिया था….
कितना भी वो चाहे लेकिन पहले की तुलना में शारीरिक बनावट में फर्क तो आ ही गया था…

“सुनो,  मोटी लग रहीं हूँ क्या.. ?”

“उसमे लगने वाली क्या बात है.. ?

“मतलब… ?”

“मतलब मोटी हो.. !”

“छी कितने गंदे हो न तुम.. ?”

“तुम मोटी हो इसमे मैं कैसे गंदा हो गया.. सच को सच बोल दिया इसलिए.. !”

निरमा मुहँ फुला कर बैठ गयी…

“इसलिए तो आजकल नहीं पहनती ये सब ! सारी सच्चाई सामने आ जाती है.. !साड़ी में मैं एकदम फिट दिखती हूँ |  ये थोड़ा बहुत पेट जो इस टॉप में पता चल रहा साड़ी में जाने कहाँ गायब हो जाता है.. वैसे मुझे लगता है टॉप बहुत दिन से रखी थीं न श्रिंक हो गयी होगी.. !”

“नहीं मैडम ऐसी बात नहीं है, आप ही मोटी हो गयी है.. !”

“अरे तो क्या हो गया.. ? हर एक उम्र की अपनी खूबसूरती होती है,  मुझे तो वैसे भी अगरबत्ती सी लड़कियां पसंद नहीं आती.. ! और फिर काम का बोझ देखो न,  कितना सारा है.. घर देखना है यूनिवर्सिटी भी देखनी है उस पर तुम दोनों बाप बेटी मेरी नाक में दम किये रहते हो.. !मुझे फुर्सत ही कहाँ मिलती है की खुद के लिए टाइम निकाल पाऊँ.. !और वैसे भी मुझे कौन सा इन कपड़ों में काम पर जाना है.. साड़ी में तो अच्छी ही लगती हूँ… !”

“इसलिए तो आज जानबूझ कर तुम्हें ये कपडे पहनाये की तुम खुद को देख कर महसूस कर पाओ की तुम खुद को कितना अवॉयड करने लगी हो.. बात मोटापे की बिलकुल नहीं है निरमा.. बात बस तुम्हारी फिटनेस की है.. |
       अगर हम सब का ध्यान रखने के चक्कर में तुम अपना  ही ध्यान नहीं रखोगी तो उसमे नुकसान तो हमारा ही है न.. |
  मानता हूँ आज तुम्हारा वजन उतना ज्यादा नहीं है, पर अगर इसी तरह खुद की तरफ से लापरवाह रही तो एक एक कर बीपी डायबिटीस मोटापा जैसी बिमारियों की कैद में रह जाओगी हमेशा के लिए… |
बस ज्यादा कुछ नहीं चाहता हूँ अपनी बीवी से, बस इतना ही चाहिए की कल सुबह से वो अपनी पहले वाली वॉक शुरू कर दे… !

  प्रेम ने खचाक से गाड़ी रोक दी… निरमा ने देखा किसी स्पोर्ट्स एम्पोरियम के सामने उसने गाड़ी खड़ी की थीं बाजु में ही जूतों की दुकान थीं…
निरमा कुछ समझ पाती उसके पहले वो उसे लेकर दुकान के अंदर दाखिल हो गया.. एक जोड़ी वजन में फूल से हल्के स्पोर्ट्स शूज़ लेने के बाद उसने स्किपिंग रोप, बैडमिंटन के लिए रैकेट और कुछ दो चार समान खरीदने के बाद गाड़ी आगे बढ़ा दी…
     कुछ दूर बढ़ने पर उसने किचन गार्डन रेस्टोरेंट के सामने गाड़ी पार्क कर दी… निरमा ने उतर कर उसकी तरफ देखा…

“अभी तक तो मोटापे पर लेक्चर दे रहे थे, अब यहाँ खिलाने क्यों ले आये..? बाहर का खाने से भी तो मोटापा बढ़ता है.. !”

“जी हाँ ! इसलिए तो आज लाया हूँ,  आज की डेट मोबाइल पर सेव कर लो,  आज के बाद महीना भर तुम बाहर का कुछ नहीं खाओगी.. !”

निरमा का चेहरा रुआंसा हो गया….

“ये तो ज्यादती है, सरासर ज्यादती.. !”

“लेकिन मुझे करनी पड़ेगी.. अब चलो अंदर और आज मन भर कर खा लो, जो भी खाना चाहो !

निरमा खाने पीने की शौकीन तो थीं ही नौकरी और घर की ज़िम्मेदारियों के साथ बीच बीच में बाहर से खाना मंगवाने की कैफियत भी उसे मिल जाती थीं…|  प्रेम बहुत दिनों से निरमा के स्वभाव में बदलाव महसूस कर रहा था जैसे वो अब वॉक करने से बचने लगी थीं.. रात में देर तक काम करने के कारण सुबह भी अक्सर देर से उठ पाती थीं.. और उठते ही मीठी को तैयार कर स्कूल भेजने के बाद खुद की तैयारी के बीच उसे व्यायाम आदि के लिए समय ही नहीं मिल पाता था…
….पर वो ये भी समझता था कि चाहें तो समय निकाला जा सकता था.. और बस इसलिए उसने आज ये तरीका निकाला था निरमा से अपनी बात मनवाने का..|

दोनों रेस्टोरेंट के सबसे ऊपरी फ्लोर पर पहुँच गए.. ऊपर वाले फ्लोर पर तंदूर बुफे मिला करता था,  जहाँ अनलिमिटेड खाना मिलता था…. .. और यहाँ का खाना निरमा को बेहद पसंद था.. उन दोनों के बैठते ही वेटर ने आकर उनकी टेबल पर लाइव तंदूर लगा दिया और एक एक कर पनीर टिक्का, मशरूम, मसाले वाले  आलू, अनानास के टुकड़े सींक में फंसा फंसा कर लगाने लगा…
   लम्बी लम्बी कांच कि ग्लास में छांछ रख कर जाने के बाद वो बाकी चीज़े भी ला लाकर रखने लगा…
   निरमा मुस्कुरा कर एक एक चीज़ अपनी और प्रेम की प्लेट में परोसने लगी,  और दोनों ही एक दूजे को देख मुस्कुरा उठे…

  वहीँ उस टेबल से कुछ दूर हट कर कुछ सहेलियों का एक ग्रुप बैठा किसी का जन्मदिन मना रहा था…
  ये सब पंखुड़ी की सखियाँ थीं और उन्हीं में से एक लड़की हयात का जन्मदिन था…  उसका ये जन्मदिन इसलिए भी खास था क्योंकि इस जन्मदिन के महीने भर बाद ही उसकी शादी होनी थीं…

“चल भाई,  अब तो तू भी टाटा बाई बाई बोलने वाली है,  एक हम ही हैं जो “शादी डॉट कॉम” के लाइफटाइम मेंबर बने बैठें हैं.. ! लगता है कहीं कोई ढंग का लड़का बचा ही नहीं है… !”

“अरे अभी तेरी एज ही क्या है यार पाखी !पच्चीस की भी नहीं हुई है और ऐसे शादी के लिए रोना मचाये है जैसे शादी न हुई जाने कौन सा स्वर्ग का खज़ाना हो गया.. !”

इस बार पंखुड़ी कि जगह जवाब उसकी दूसरी दोस्त ने दिया….

“होता ही है यार स्वर्ग का खज़ाना !भई मैं भी पाखी कि तरह साफ बात करना पसंद करती हूँ.. मैं जानती हूँ मेरी उम्र में लड़कियों के मन में शादी के अरमान जागने लगते हैं लेकिन कुछ लोग इसे छुपा कर जबरदस्ती में दिखावा करती हैं की हम तो भैया वेल्ले ही ठीक है.. तो रहो न पर  फॉल्स रिबेल तो न बनो..
हम तो भई जानते है की सही समय पर शादी ब्याह न होने से लड़कियों ही क्या लड़को के दिमाग में भी हॉर्मोनल चेंजेस के कारण केमिकल लोचा शुरू हो जाता है और फिर ये लोचा उन्हें फ़्रस्टेशन की तरफ मोड़ने लगता है.. हर एक सुखी गृहस्थ को देख इनका खून जलने लगता है और मुहँ से हाय निकलती है..
   बावजूद ये खुद को दुनिया में सबसे सुखी इंसान दिखाते हैं.. ये और कुछ नहीं इनका मेन्टल डिस्बैलेंस है.. !”

“अरे बस बस ज्ञानवती देवी जी !  आपका इतना ज्ञान देने का जो भी अर्थ हो, मुझे तो बस शादी इसलिये जल्दी करनी है कि अगर सही समय पर ब्राइडल कोर्स न पूरा किया, भारी सा लहंगा नहीं पहना,  चेहरे पर केक की आइसिंग वाला मेकअप नहीं किया तो उम्र निकलने के बाद इस सब का कोई फायदा नहीं.. !”

“मतलब तुझे एक अदद लड़का इसलिए चाहिए की तू उससे शादी के बहाने अपना ब्राइडल कोर्स ले सके,  भारी लहंगा पहन सके और मेकअप कर सके.. !”

“और क्या.. ? हालाँकि एक बात और है मुझे न सीरियल वाली शादीशुदा हीरोइने बहुत पसंद हैं.. मैं भी शादी के बाद दोनों हाथों में चार दर्जन चूड़ियाँ पहन कर मांग में मोटा सा सिंदूर भर कर गहरी लाल लिपस्टिक लगा कर हॉस्पिटल जाउंगी.. इस बात का भी शौक है.. !”

“डॉक्टर नहीं तू कोमोलिका लगेगी ! और ‘रसोड़े में कौन था’ की तर्ज पर तुझे देख कर तेरे साथी पूछेंगे ऑपरेशन थियेटर में कौन था…?”

पंखुड़ी उन सब की बात पर खिलखिला कर हंस पड़ी उसी समय होटल का स्टाफ भागता हुआ सा ऊपर चला  आया…

“सर कलेक्टर साहब का औचक निरीक्षण हो गया है.. नीचे जाँच कर रहें हैं.. वहाँ के बाद यहाँ भी आने वाले है… !

ऊपर मौजूद मैनेजर ने फटाफट उस स्टाफ के साथ रसोई की तरफ दौड़ लगा दी… और कलेक्टर साहब सुनते ही पंखुड़ी के कान खड़े हो गए….

क्रमशः

aparna……

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments