जीवनसाथी -2/5

अब तक आपने पढ़ा…

    अनिरुद्ध वासुकी से उसका एक विशेष आदमी दर्श खड़े होकर बताता है कि उससे मिलने वाले कुछ लोग बाहर बैठे उसका इंतजार कर रहे हैं ! लेकिन अनिरुद्ध को किसी और खुशखबरी का इंतजार है | दर्श जब उसे बताता है कि बांसुरी का ट्रांसफर हो चुका है लेकिन अब तक बांसुरी ने जॉइन नहीं किया,  तब अनिरुद्ध इस बात को अपनी आधी ही खुशी बताता है, और कहता है कि जब तक बांसुरी जॉइन नहीं कर लेती,  तब तक कुछ नहीं हो सकता | इसके बाद वह बाहर बैठे लोगों से मिलने का मन बना कर अपने ऑफिस से उठकर बाहर की तरफ निकलता है, अब आगे……

••••••••

“वो भी हो ही जायेगा, अभी चलो बाहर वो लोग मिलने आ गए हैं.. ! प्रोटेक्शन मनी उन्हें थोड़ा ज्यादा लग़ रही है, कम करवाना चाहते हैं !”

“मैं क्या यहाँ भिंडी गोभी टिंडे बेचने बैठा हूँ जो मुझसे बार्गेन करने आये हैं, उन सालों की जन्म कुंडली निकालो, मैं आ रहा हूँ !”

“ओके !”

  दर्श अनिरुद्ध से पहले उसके कमरे से निकलकर सीढ़ियां उतर कर नीचे चला आता है,  उसके आते ही वह चारों लोग सवालिया नजरों से दर्श की तरफ देखने लगते हैं! वह इशारे से उन्हें सूचना देता है, कि अनिरुद्ध आ रहा है | उसी वक़्त सीढ़ियों पर सबसे ऊपर खड़ा अनिरुद्ध उन लोगों को नजर आने लगता है…
   लेकिन उनमें से किसी को भी अनिरुद्ध  का चेहरा साफ साफ नजर नहीं आता, वैसे भी हॉल में और सीढ़ियों पर बहुत ज्यादा रोशनी नहीं होती, जिसके कारण अनिरुद्ध का चेहरा भी साफ साफ नजर नहीं आता !  उसने सिर पर वैसे भी काफी ऊंची सी हैट  लगा रखी होती है, और आंखों पर काला चश्मा चढ़ा होता है ! गहरी दाढ़ी मूछ के कारण वैसे ही अनिरुद्ध का आधा चेहरा बालों से ढका होता है……

   बहुत ही आलीशान तरीके से चलते हुए अनिरुद्ध सीढ़ियां उतरकर नीचे चला आता है.. उसके आते ही उसके व्यक्तित्व का जादू ऐसा होता है कि वह चारों के चारों शहर के धनकुबेर भी अपनी अपनी जगह पर हाथ बांधे खड़े हो जाते हैं ! यह वही लोग हैं जो एक से बढ़कर एक महलों में निवास करते हैं और इनके आगे पीछे नौकरों की फ़ौज हाथ बांधे चलती है ! लेकिन आज अनिरुद्ध के बुलावे पर यह सारे लोग उसके महल में दौड़े चले आए थे….

   यह सारे के सारे लोग इलीगल तरीकों से दो नंबर की काली कमाई से अपना घर और अपनी तिजोरी भरते जा रहे थे….
पहली बार जब इन लोगों के पास अनिरुद्ध के आदमी  का फोन गया,  तब इन लोगों ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया ! दूसरी बार फिर फोन आने पर इन लोगों ने वापस उस फोन को इग्नोर कर दिया ! लेकिन तीसरी बार ऐसा कुछ हुआ कि इन सब को अनिरुद्ध की शरण में आना ही पड़ा…
असल में दो बार पहले जब इन लोगों ने अनिरुद्ध के फोन को हल्के में लिया और उस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी,  तब अनिरुद्ध ने ढूंढ ढूंढ कर इन चारों की कोमल और कमजोर नस को पहचान कर उसे दबा दिया और जिसके कारण यह चारों लोग आज यहां अनिरुद्ध के दरबार में उससे मिलने के लिए लगभग डेढ़ घंटे से उसका इंतजार कर रहे थे…

इतने घने जंगल के बीच में इस किले नुमा घर में रहने वाला अनिरुद्ध एक अजीब विचित्र सा प्राणी था..
     वो कौन था, कहां से आया था? क्या काम करता था? इस बारे में पूरे शहर में किसी को भी कुछ खास मालूमात नहीं थे! यहां तक कि उसका कोई पुलिस रिकॉर्ड भी नहीं था! उसके आधार कार्ड, पासपोर्ट किसी के बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता था! बस शहर में अचानक से एक हवा चली थी और उस हवा का नाम था अनिरुद्ध वासुकी!!
    क्या यह कोई खानदानी रईस था जो अपने बाप दादों के पैसे पर अकड़ता हुआ उन से कहीं दूर आकर इस छोटे से शहर में बस गया था? या फिर यह कोई बहुत बड़ा क्रिमिनल था, जो अपनी अथाह संपत्ति को कहीं किसी गहरे समंदर में छुपाकर यहां पुलिस से बचने रह रहा था…. ?

…  अनिरुद्ध के बारे में एक से बढ़कर एक अफवाहें शहर में उड़ रही थी.. लेकिन इन अफवाहों के पीछे की सच्चाई क्या थी इसके बारे में कोई नहीं जानता था? लेकिन एक बात तो पक्की थी कि अनिरुद्ध के पास खूब सारा पैसा था और वह उस पैसे से ही और पैसा बनाता जा रहा था…
  वहां मौजूद लोगों को एक बात अच्छे से समझ में आ गयी थीं कि अनिरुद्ध सिर्फ एक ही बोली जानता और समझता था और वह थीं, पैसे की बोली !
      उसे जब जितना पैसा चाहिए वह  सामने वाले से प्रोटेक्शन मनी के नाम पर मांग कर बैठता था, और उसके बदले वो उस सामने वाले रईस को ज़िंदगी भर खुद से प्रोटेक्ट करने का वचन भी दिया करता था..
  यानी पहले तो सामने वाले को डराओ धमकाओ फिर इन धमकियों से निजात पाने उससे पैसे वसूलो और अगर सामने वाले ने देने में आनाकानी की तो वो सीधे उसे अपनी गन से उड़ा देता था!

   उसके जन्म और परिवार के बारे में भी अफवाहों का बाजार गर्म था  ….
    वहाँ ऐसा कहा जाता था कि अनिरुद्ध के पिता किसी पोर्ट में काम किया करते थे..
यह कोई ऐसा बंदरगाह था, जहां पर समंदर पार करके विदेशों से माल आया और जाया करता था| उस पोर्ट के मुनीम थे अनिरुद्ध के पिता!
     उस पोर्ट से आने जाने वाले सामान के मालिक अक्सर वहां पर आया जाया करते थे, और अपने लीगल सामानों के बीच में कई तस्करी के सामान भी विदेशों में बेचने और खरीदने का काम  किया करते थे..  एक दिन अचानक अनिरुद्ध के पिता को किसी ऐसे ही रईस आदमी दुग्गल के तस्करी के कामों के बारे में मालूम चल गया था….
   हालाँकि इसके पहले उनके दुग्गल से काफी अच्छे संबंध रह चुके थे….
पर वो अपने काम में इतने ईमानदार थे, कि इस जान पहचान का कोई फायदा दुग्गल को नहीं मिला | और
उन्होंने उसके सारे सामान की तस्वीरें उतारकर पुलिस को देने के लिए सबूत जमा कर लिए  |
    वो पुलिस के पास सब कुछ पहुंचाने वाले थे.. लेकिन वो यह नहीं जानते थे कि उस आदमी ने वहाँ की पुलिस को भी खरीद रखा था |  पुलिस ने उल्टे उन  पर ही गलत आरोप लगाकर उन्हें जेल दाखिल कर दिया |  इन सारी बातों के समय अनिरुद्ध महज सत्रह  साल का था…
अपने पिता की बेगुनाही को साबित करने के लिए वो  पुलिस वालों के सामने गिड़गिड़ाता रहा लेकिन उन पुलिस वालों के कान में जूं तक नहीं रेंगी..
      पुलिस की तरफ से निराश होने के बाद वो दुग्गल की कोठी में पहुँच गया और उस आदमी के सामने भी उसके पैरों में गिर कर उससे अपने पिता की बेगुनाही की फरियाद करने लगा लेकिन दुग्गल ने उसकी एक न सुनी, उल्टा उसे तरह तरह से और अपमानित करने के बाद अपने पैरों पर झुके अनिरुद्ध को उसने लात मार के दूर फेंक दिया…
 
      इस वक़्त दुग्गल के साथ वहाँ उसके तीन दोस्त और भी मौजूद थे, जिनमे से एक किसी बाहर शहर से आया कोई रईस खानदानी था.. उसे भी दुग्गल का ये सारा कारनामा देखने में बड़ा मजा आ रहा था.. अनिरुद्ध ने बारी बारी सबके पास जाकर मदद की गुहार लगायी थीं…
जब अनिरुद्ध ने उस आदमी के पास मिन्नते करते हुए उसके घुटने पर अपने हाथ रखें तब उस आदमी ने अपनी महंगी सी सिगार को अनिरुद्ध की हथेली पर बुझा दिया.. और अपने जूते की नोक से उसे पीछे की तरफ धक्का दे दिया था…

अपने लाख अपमान के बाद भी अनिरुद्ध उन सबके  सामने हाथ बांधे गिड़गिड़ाता रहा की वो एक बार पुलिस वालों से कह कर उसके पिता को निर्दोष बता कर छुड़वा ले.. लेकिन दुग्गल और उसके साथियों  के सर पर शैतान सवार था.. अपने विजय के नशे में चूर दुग्गल उस सत्रह साल के लड़के पर ज्यादती ऊपर ज्यादती करता चला गया…..
    अनिरुद्ध के चेहरे पर थूकने के बाद दुग्गल ने अनिरुद्ध को धक्के मार कर अपने घर से निकाल दिया…

    और यही उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित  हुई …… |

   किसी मजलूम पर इतना अत्यचार भी ठीक नहीं की वो खुद पर तरस खा कर खुद को औरों से अलग समझ बैठें और अपनी जिंदगी की इबारत अपनी ही कलम से लिख बैठें…
  
     उस रात को दुग्गल जो सोया तो फिर क़भी उठ नहीं पाया…
    उसकी लाश उसके कमरे से बरामद हुई थी, लेकिन किसी को भी उसकी हत्या किसने की इस बारे में कुछ मालूम नहीं चल पाया !  लेकिन उसके  कुछ खास नौकरों ने अनिरुद्ध की तरफ इशारा जरूर किया था लेकिन अनिरुद्ध वहाँ होता तब तो पकड़ा जाता, दूसरे उसके खिलाफ कोई सबूत भी नहीं था..  इसी सब  में अनिरुद्ध को पुलिस नहीं पकड़ पाई थी….
    दुग्गल के दोनों साथी दुग्गल की मौत के पहले ही चार्टड प्लेन से अपने अपने घर निकल चुके थे, शायद इसलिए उनकी जान बच गयी थीं..
     और अनिरुद्ध की कसम बाकी रह गयी थीं..

साल बीतते बीतते अनिरुद्ध ने किसी तरीके से पैसे जोड़कर अपने पिता को छुड़ाने की कोशिश की लेकिन उसके पिता अपने माथे पर लगे कलंक को सह नहीं पाए और कोर्ट से छूटकर आने के बाद उसी पोर्ट के  समंदर में कूदकर उन्होंने आत्महत्या कर ली….

  कहा जाता है इसके बाद अनिरुद्ध ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और वह साल बीतते बीतते उसने वहां पर से सामानों की आवाजाही में अपना हिस्सा वसूलना शुरू कर दिया था…

अपने तगड़े डीलडौल और ऊंची कद काठी के कारण वैसे भी वह छुटपुट लेबर्स को डरा धमका कर अपना हिस्सा वसूल लिया करता था…..
    मजदूरों से कहीं अधिक उसे उनके मैनेजर को तंग करने में मजा आता था…
  अनिरुद्ध ऐसा हो चला था की अब उसके दिल दिमाग में किसी के लिए सहानुभूति की कोई जगह नहीं बची थीं..

       वो अक्सर बड़े-बड़े कंसाइनमेंट में छोटी-मोटी चोरियां करके सामान इधर-उधर करके उन्हें लोकल मार्केट में बेचकर पैसे कमाने लगा था.. धीरे-धीरे उसने कंसाइनमेंट पर हाथ मारना जारी रखा और पहले जो कम मात्रा में चुराया करता था उसे ज्यादा मात्रा में चुराने लगा.. इसी तरह पैसे जोड़ते जोड़ते एक समय ऐसा आया जब उस पोर्ट से आने जाने वाली सभी वस्तुओ पर वो अपना हिस्सा महसूल के रूप में उन व्यापारियों से वसूलने लगा और आख़िर वो दिन भी आ गया जब वहाँ मौजूद सभी व्यापारियों के सर के ऊपर चढ़कर राज करने लगा था …
        अनिरुद्ध वासुकी !!
    एक बार जब किसी को गलत तरीके से पैसे कमाने की लत लग जाती है, तब उसके लिए ईमानदारी के सारे रास्ते पूरी तरह से बंद हो जाते हैं |  और उसे बेईमानी की कमाई में मजा आने लगता है | वैसा ही कुछ अनिरुद्ध के साथ हुआ | उसे रोकने टोकने वाला भी घर पर अब कोई मौजूद नहीं था | उसकी माँ उसके बचपन में ही चल बसी थीं !  इसलिए उसने अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया था पैसे कमाना…
   इसी के साथ उसने अपनी पढाई भी जारी रखी,  क्योंकि उसे गुंडा या तस्कर बन कर नहीं रह जाना था.. उसे तो पैसों के दरिया में एक कॉर्पोरेट की तरह तैरना था…….

    ऐसा नहीं था की वह कभी पकड़ा नहीं गया !  कई बार उसे थाने और जेल के चक्कर भी काटने पड़े, लेकिन वो क़भी अपने पीछे सबूत छोड़ता ही नहीं था कि कोई उसे पकडे रख पाता.. …

  ऐसे ही इत्तेफाक से उसकी मुलाक़ात दर्श से हुई थीं !

  दर्श उस की तरह गरीबी से उठकर पैसे जोड़ने वाला आदमी नहीं था, बल्कि वह खानदानी रईस पैदा हुआ था ! उनके पिता का ढ़ेर सारा काम था, उसके पिता का कारोबार इतना फैला हुआ था कि उनमें से कुछ थोड़ा बहुत पैसा गायब कर देने पर भी उन्हें मालूम नहीं चलता था…!
अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था दर्श!  लेकिन परिवार उनका छोटा होने के बावजूद उनका खानदान  बहुत बड़ा था !  उसके महलनुमा घर पर ढेर सारे लोग रहा करते थे..
   दर्श एक सुखी जीवन बिता रहा था कि अचानक एक रात को उसके माता पिता की  किसी ने हत्या कर दी….
     दस बारह दिन बीत गए,  सभी रिश्तेदार साँत्वना  देकर निकल गए, वो खुद सदमे में था कि ये अचानक क्या हुआ…
    कि एक सुबह उसके पिता के लॉयर ने आकर उनकी वसीयत पढ़ी कि, जब तक दर्श इक्कीस का नहीं हो जाता सारी प्रॉपर्टी उसके ताऊ जी संभालेंगे.. 
      
       वह अभी इन बातों को कुछ समझ पाता इसके पहले ही उसके ताऊ और फूफा जी ने मिलकर उसे घर से धक्के देकर निकाल दिया ….
    न  उसकी बुआ और ना ही ताई किसी ने भी अपने-अपने पतियों को रोका टोका नहीं और एक  उन्नीस बीस साल का लड़का दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो गया …

अगली सुबह जब दर्श अपना एकमात्र बैकपैक और अपनी माँ कि निशानी अपने गिटार को कंधे से टांगे बस स्टॉप पर बैठा बस का इंतजार कर रहा था..कि  तभी वहां से निकलते अनिरुद्ध की नजर उस पर पड़ी  और जाने उसने दर्श के चेहरे में  ऐसा क्या देखा कि  अपनी गाड़ी रोक कर उसे लिफ्ट ऑफर कर दी…
दर्श तो बस खाली बैठे बस का इंतजार कर रहा था, बाकी उसे खुद नहीं मालूम था अब उसकी मंजिल क्या है ?और उसे कहां जाना है ?इसलिए जब अनिरुद्ध ने उसे बुलाया तो वह भी जाकर उसकी बाइक पर पीछे बैठ गया |  जब अनिरुद्ध ने गाड़ी बढ़ाने के बाद उससे पूछा कि उसे जाना कहां है? तब दर्श ने पता नहीं बोल कर न में सर हिला दिया…

अनिरुद्ध भी उसकी उम्र का लड़का था वह समझ गया इस लड़के ने कहीं ग़ुम गहरी चोट खा रखी है.. अनिरुद्ध उसे अपने साथ अपने ठिकाने पर ले गया…
    दोनों लड़के हम उम्र थे,  दोनों का दर्द एक समान था… एक ने अपने पिता को खोया था तो दूसरे ने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया था..
     एक कि जिंदगी बिगड़ने का कारण जमाना था तो दूसरे की जिंदगी नर्क का कारण उसके अपने रिश्तेदार थे..
    लेकिन दोनों की ही चोट कहीं ना कहीं एक बराबर थीं..
    दोनों के दर्द एक से थे और दोनों ने एक दूसरे को गले से लगा लिया…
   इसके लगभग हफ्ते भर बाद किसी फॅमिली ट्रिप में दर्श के ताऊ ताई, बुआ फूफा एक साथ किसी गहरी खाई में गिर पड़े… 
   खाई ऐसी गहरी थीं कि खूब ढूंढने पर उनके अलग अलग हिस्से अलग अलग जगह बरामद हुए.. बच्चे उनमे से किसी के नहीं थे और शायद इसी बात कि दर्श को सबसे ज्यादा चोट लगी थीं कि उसके माता पिता के समने उसे खुद कि संतान कहने वाले उसके रिश्तेदार कैसे स्वार्थी निकलें थे… ?

   इस घटना के बाद दर्श के लॉयर अंकल ने उसे ढूंढ़ कर उसका सब कुछ उसके हवाले कर दिया था !
  
       इसके बाद अनिरुद्ध और दर्श का साथ क़भी  नहीं छूटा !  बड़ी से बड़ी परेशानियां भी आई, लेकिन वह दोनों एक दूसरे के सामने ढाल बनकर खड़े रहे ! दर्श ने कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई विदेश से कर रखी थी, इसलिए वह बहुत अच्छा हैकर भी था…
अनिरुद्ध जहां अपने तेज दिमाग और बाहुबल का प्रयोग करता था वही दर्श उसके साथ मिलकर अपने दिमाग के सहारे उसकी कोई परेशानियों को चुटकियों में दूर कर देता था…
..   इस तरह इन दोनों ने मिलकर दर्श के पिता के व्यापर को भी संभाल लिया और उस पूरे शहर पर राज करना शुरू कर दिया….
       और सिर्फ इक्कीस साल की उम्र में अनिरुद्ध वासुकी ने उस पूरे पोर्ट पर अपना कब्जा जमा लिया …
   यहां पर कब्जा जमाने के बाद अब उसकी नजर पोर्ट से हटकर शहरों की तरफ बढ़ने लगी थी..  उन दोनों ने
पोर्ट पर चलने वाले अपने काम के लिए कुछ चुनिंदा मैनेजर रखें और दोनों ही अपनी जमा पूंजी समेटे शहर की तरफ निकल पड़े….
   

    यह सारी बातें जो अनिरुद्ध और दर्श से जुड़ी हुई थी, यह उन चारों आदमियों को वहां बैठा बूढ़ा दरबान
सुना रहा था ! उसी ने  अनिरुद्ध वासुकी की जीवन कथा को इस तरह से बढ़ा चढ़ा कर सुनाया था कि वह चारों वहीँ बैठे-बैठे डर गए थे…
    उन लोगों को समझ में आ गया था कि यह दोनों हत्यारे दोस्तों की जुगलबंदी अब उनके शहर पर अपना परचम लहराने चली आई है!..
…. और उन दोनों की लिस्ट में टॉप फाइव में आने वाले रईसों में वह चार लोग आते हैं..
        उन चारों ने आपस में बातचीत की और  सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि अनिरुद्ध वासुकी फिलहाल जितनी प्रोटेक्शन कि मांग कर रहा है, उतनी एक बार में देना संभव नहीं है इससे अच्छा अगर थोड़ा रुपया कम कर दे तो बात बन सकती है…
पिछले आधे घंटे से अनिरुद्ध के सामने क्या बोलना है कैसे बोलना है, का लगातार अभ्यास करते बैठें उन  चारों ने  जैसे ही अनिरुद्ध को देखा उन चारों की बोलती बंद हो गई….
       वो अपने विकराल महामानवी रूप में जब आकर उन चारों के सामने खड़ा हुआ तो उनको लगा जैसे वह सामान्य अपने पैरों पर नहीं बल्कि सीढ़ी लगाकर खड़ा है…
उसकी साढ़े छैः फुट की असामान्य लम्बाई के  सामने वह चारों बौने से नजर आ रहे थे…

    अनिरुद्ध का रुआब ऐसा था कि वह चारों पत्ते की तरह कांपने लगे, कुछ तो अनिरुद्ध के व्यक्तित्व की झलक और कुछ उसके बारे में सुनाई गई कहानी का असर था कि वो चारों उससे जो बोलना चाहते थे वो भूल गए और जब दर्श ने उनके सामने आकर प्रोटेक्शन मनी की बात कहीं तो चारों ने एक स्वर में हामी भर दी..
  उन चारों से रुपयों के बैग्स वहाँ रखवा कर उनकी छुट्टी करने के बाद दर्श जब उन रुपयों को गिनने बैठा तब अनिरुद्ध अपने कमरे की तरफ जाने के बजाय वहीँ बैठ गया….

“क्यों काका इस बार कौन सी कहानी सुना कर डराए हो इन लोगों को.. !”

“बिटवा इस बार इनको तुम्हारी पोर्ट वाली कहानी सुना दिए है.. !”

“और खून कितने करवाये  हैं इस बार .. ?”

“अरे नहीं बचुवा, वो तो बस इत्ते से में डर कर कांपने लगे तो और ज्यादा क्या बताते और वैसे भी पिछली बार हम वो पहले वाले तस्कर का खून तुमसे करवा दिए रहें तब वो दोनो व्यापारी तो शहर ही छोड़ कर भाग गए रहे न.. तभी दर्श बाबू बोले रहें की ज्यादा डराया न करो कक्का,  कहीं सारे रईस व्यापारी अपना माल मत्ता समेट कर बिदेस भाग गए तो हम कहाँ से कमायंगे फिर.. बस यही के लाने इस बार तुम्हरे हाथों मर्डर नहीं कराये.. “

दरबान साफ़ मुकर गया,  और ये बात वहाँ बैठें दोनों दोस्त समझ कर हंस पड़े…

अनिरुद्ध ज़ोर से हंस पड़ा,  उसे हँसते देख दर्श भी मुस्कुरा उठा…

“कॉफी पियेगा या चाय.. !”

“चाय ही पिएंगे वो भी काका की चाय एकदम कड़क !”

अनिरुद्ध की बात पर काका उन दोनों के लिए चाय बनाने भीतर चले गए……

” दर्श इन चारो के अड्रेस पर ये रूपये वापस भिजवा दे.. !”

“क्यों क्या हो गया.. ?”

“अब प्रोटेक्शन मनी नहीं कंपनी में हिस्सेदारी चाहिए मुझे.. !

दर्श थोड़ी देर अनिरुद्ध का चेहरा देखता रहा,  और फिर अपने माथे पर अपनी ऊँगली से स्क्रेच करता वो अपने फ़ोन को उठा कर किसी को कॉल करनेे में लग गया..

क्रमशः

aparna…..

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