
जीवनसाथी -2, भाग -36
पिया ने ऊपर चढ़ते हुए हल्के से नीचे झांक कर देखा और उसी वक्त समर की माँ ने भी ऊपर उसे देखा और पिया अपने कमरे में चली गयी…
समर कमरे में अपना लैपटॉप खोल कर किसी काम में लगा था…
उसे काम करता देख पिया भी उसके पास जाकर बैठ गयी…
और चाय का प्याला उसकी तरफ बढ़ा दिया..
“क्या हुआ कुछ परेशान लग रहें हैं आप.. ?”
“नहीं परेशान नहीं हूँ… कुछ देख रहा था.. !”
“क्या हुआ… ? कोई चिंता का विषय.. ?”
“हाँ थोड़ी सी चिंता कि बात तो है.. ?”
“क्या.. ?”
“महल कि तिजोरी से हुकुम के पार्टी कार्यालय के लिए मनमाने पैसे निकाले जा रहें हैं… पहले मुझे लगा था इस सब के पीछे विराज होगा लेकिन मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है कि इस सब के पीछे विराज का हाथ नहीं है.. !
“फिर… ? फिर किसका हाथ है.. ?
“इन सब के पीछे अपूर्व सिंह ठाकुर का हाथ है.. !”
“ये कौन हैं… ?”
“ये रेखा बाई सा के भाई हैं… !”
“लेकिन रेखा बाई सा का भाई कहाँ था.. वो तो बाद में पता चला था कि केसर और वो दोनों सगी बहने हैं, लेकिन ठाकुर साहब का कोई बेटा भी था, ये तो नहीं मालूम था.. !”
” अरे ठाकुर साहब के कारनामे तुम नहीं जानती पिया… उन्होंने हुकुम के खिलाफ इतना लम्बा चौड़ा षड्यंत्र रचा था, सोचो उनके दिमाग में हुकुम से बदला लेने का कैसा कीड़ा रहा होगा… और बदला भी किस बात का जो कभी हुकुम ने किया ही नहीं…
“सही कह रहें हैं आप… मुझे भी यही लगता है कि हुकुम ने तो सपने में भी किसी के साथ कभी कोई अन्याय नहीं किया, बावजूद लोग उनके भी दुश्मन हो गए, कहते हैं न जिसकी जितनी अक्ल होती है वो वैसे ही चीज़ों को तोलता है…
कुछ लोग ही ऐसे खोट भरे होते हैं कि खालिस सोना भी उन्हें पीतल नजर आता है ! लेकिन एक बात समझ नहीं आई कि रेखा बाई सा का भाई कहाँ से आ गया… वो तो आदित्य ही है न.. ?”
“नहीं आदित्य तो ठाकुर साहब कि बहन का बेटा है… और इसलिए उसमे ठाकुर साहब का अंश लवलेश भी नहीं है.. !
असल में ठाकुर साहब का बचपन में ही ब्याह हो गया था, उस समय ठाकुर साहब सिर्फ पंद्रह साल के थे… उनका ब्याह हुआ था रानी मधुलिका सिंह से… आसाम वाले इलाके कि अधिकतर जमींदारी उस वक्त रानी मधुलिका के पिता साहब कि थी…!
किसी छोटे मोटे राजा सा ही उनका रुतबा था…! ब्याह के समय रानी मधुलिका सिर्फ दस बरस कि थी… !
कहा जाता है उनके पिता ने ढ़ेर सारी ज़मीन, खेत खलिहान, हाथी घोड़े बग्घियां हीरे जवाहरात से ठाकुर साहब के पिता का घर भर दिया था, पर ब्याह के बाद अपनी बेटी को बिदा नहीं किया… |
ठाकुर साहब को इस बात का कोई मलाल न था.. वो अपनी पढाई पूरी करने शहर चलें गए… |
जहाँ कॉलेज में पढाई के दौरान ही उनकी दोस्ती विराज कि माँ यानी रानी साहेब और पिता यानी राजा साहब से हो गयी…|
कॉलेज जाने के पहले कुछ समय के लिए वो एक बार अपनी गांव वाली रियासत में घूमने गए, तब अपने पिता कि ज़िद में अपनी ससुराल भी चलें गए.. वहाँ उन्होंने मधुलिका को पहली बार देखा और अल्हड़ सी वो अट्ठारह साल कि किशोरी उनके दिल में घर बना गयी… |
ठाकुर साहब कुछ दिन वहाँ रुके और वापस लौटते समय अपने ससुर से मधुलिका को अपने साथ लें जाने कि ज़िद कर बैठे….उनकी ज़िद से हार कर मधुलिका के पिता ने मधुलिका को ठाकुर साहब के साथ विदा कर दिया… |
शुरुवात में ठाकुर साहब की हवेली में मधुलिका का अल्हड़ और बचकाना व्यवहार देख लोगों को लगा कि ये उनकी काम उम्र कि नासमझी होगी.. लेकिन धीरे धीरे परिवार और खुद ठाकुर साहब के सामने भी ये राज़ खुल गया कि रानी मधुलिका कि मानसिक स्थिति सही नहीं है… और इसलिए उनके पिता अब तक उन्हें ससुराल नहीं भेज पाए थे.. !
शुरू शुरू में उनकी जो भोली हरकतें ठाकुर साहब को प्यारी लगती थी, वही अब सर का दर्द बनने लगी और महीना बीतते बीतते ठाकुर साहब अपनी पत्नी से एकदम ही बेज़ार हो गए और अपने पिता से कह कर उन्हें उनके घर पहुंचवा दिया… |
लेकिन इस सब में उन लोगों से ये चूक हो गयी कि ठाकुर साहब को भी उस वक्त पता नहीं चला न उनके घर वालों को कि रानी मधुलिका उस वक्त माँ बनने वाली थी… |
खैर… मधुलिका के पिता स्वाभिमानी थे… उन्होने समाज को यह दिखाने के लिए ही ये शादी की थी कि उनकी बेटी सामान्य है, पर जब वही बात समाज के सामने गलत साबित हो गयी तो अब उन्हें किसी का डर नहीं रह गया था! और इसलिए उन्होंने ठाकुर साहब और उनके पिता को खुली चुनौती दे डाली कि अब वो किसी कीमत पर अपनी प्राणप्रिय मासूम सी बेटी को वापस नहीं भेजेंगे… ! और न अपने नवासे को भेजेंगे, साथ ही उन्होंने भर भर कर ठाकुर साहब को बद्दुआ दी कि ठाकुर चाहे कितनी शादी कर लें अब वो निपूता ही रहेगा.. !
इधर उस घटना के बाद ठाकुर साहब कॉलेज चले गए वहाँ उनकी मित्रता राजा साहब और रानी माँ से थी ही लेकिन उन दोनों का आपसी प्रेम देख वो किनारे हो चुके थे.. !
और मधुलिका के अपने घर लौटने के ठीक महीने भर बाद उन्हें वापस घर बुलवाया गया और ठाकुर साहब कि दूसरी शादी एक बार फिर ख़ूब सारे तामझाम के साथ कर दी गयी….
उधर नौ महीने पुरे होते ही रानी मधुलिका ने एक बेटे को जन्म दिया…
लेकिन बेटा भी पूरी तरह से सामान्य नहीं था….
ठाकुर साहब अपनी नयी पत्नी और अपने दोस्तों और अपनी कॉलेज कि ज़िन्दगी में मशगूल होते चलें गए…
लेकिन शादी के पांच साल भी जब उनकी पत्नी कि गोद न भरी तब उन्हें मधुलिका के पिता का दिया श्राप याद आया और उन्हें लगने लगा कि उनके ससुर का श्राप फलीभूत हो चुका है और तब उन्होंने अपने दीवान कि बेटियों में से रेखा बाई सा को गोद लें लिया… “
” लेकिन ठाकुर साहब का जैसा व्यक्तित्व है, मुझे इस बात पर बड़ा आश्चर्य होता है कि उन्होंने एक लड़की को गोद क्यों लिया..? जबकि वो तो पूरी तरह पितृ सत्ता पर भरोसा करने वाले लगते हैं… ! उनके लिए तो उनका बेटा ही उनके वंश का दीपक हो सकता था, फिर रेखा बाई सा को गोद क्यों लिया… ?”
“हम्म उसका भी उनका अपना कारण रहा होगा… पर अपने पुरे जीवन में उन्होंने अपना सारा वक्त हुकुम के पिता से बदला निकालने में लगा दिया…
लेकिन इस सब के बीच ही मुझे ये बात भी पता चली थी कि उन्होंने भले ही अपनी पहली पत्नी से सम्पर्क न रखा हो लेकिन जब वो दुबारा बाप नहीं बन पाए तब वो बराबर अपने बेटे के सम्पर्क में रहने लगे थे…
उसकी पढाई लिखाई और बाक़ी बातों के लिए उन्होने उसे बराबर खर्चा भी भेजा… विदेश से उसकी पढाई हुई और वापस आने के बाद उसने अपना खुद का काम शुरू कर लिया…
जिस साल ठाकुर साहब नहीं रहें उसी साल उसकी पहली मुलाकात हमारे हुकुम से हुई…!
“ओह्ह इसके पहले आप लोग उसके बारे में कुछ नहीं जानते रहें होंगे न.. !”
“नहीं…… उसके पहले कोई नहीं जानता था… लेकिन उस पहली ही मुलाकात में उसने हुकुम के साथ काम करने का प्रस्ताव रख दिया और हमारे भोले भंडारी राजा साहब ने बिना सोचे समझे उसे तथास्तु कह दिया… !”
“लेकिन आपकी नजर तो उस पर रहीं होगी.. !”
“बिल्कुल.. ! मै कैसे किसी को भी हुकुम के आसपास जाने दे दूँ.. ? इसलिए उसकी पूरी कुंडली निकलवानी पड़ी मुझे और तभी तो ये सारा सब पता चला है… !
“ये सब हुकुम को पता है.. ? मेरा मतलब अपने बताया उन्हें.. ?”
“हाँ बताया तो है, उन्हें ही क्या प्रेम, युवराज सा, काका साहेब सभी को बताया है लेकिन एक हमारे राजा साहब और एक उनके बड़े भाई, इन दोनों को दुनिया में हर किसी पर भरोसा है… ! हमारे राजा साहब को लगता है वो अपने प्रेमिल स्वाभव से सबको बदल सकतें हैं लेकिन हर बार ऐसा होता नहीं है न…!
जब ठाकुर साहब नहीं बदले तो उनका बेटा क्या बदलेगा.. !
भेड़िया खरतनाक होता है और पागल भेड़िया जानलेवा खतरनाक.. ! लेकिन ये बात हुकुम मानने को तैयार नहीं होते.. !
तुम्हें पता है हमारे ऑफ़िस में किसी का धमकी भरा पत्र मिला है जिसमे रानी बाँसुरी को जान से मार देने कि धमकी दी गयी है… !
पिया के हाथ से चाय के प्याले से चाय छलकते हुए बची… -“क्या कह रहें हैं आप.. ? उनके लिए ऐसी धमकी सुनने के बाद भी रानी बाँसुरी को इतना दूर क्यों भेज दिया हुकुम ने.. !”
“ये दोनों राजा और रानी निराले हैं… उन लोगों के अलग रहने के पीछे भी एक एक लम्बी कहानी है… जो मै तुम्हें बाद में सुनाऊंगा.. पहले उस अलमीरा में रखा अपना सरप्राइज़ तो देख लो… !”
पिया को इस वक्त रानी बाँसुरी कि चिंता सी हो गयी थी.. पर समर के मुस्कुराते ही वो भी अपनी जगह से उठ कर अलमारी तक चली गयी…
उसने अलमारी खोली और उसके सामने एक लम्बा चौड़ा सा सूटकेस रखा था, जिसके ऊपर दो टिकट्स रखी थी…
पिया ने टिकट्स उठा कर देखी… टिकट्स क्रूज़ पर से अंदमान जाने कि थी…
पिया ख़ुशी से उछल पड़ी….
“कब निकल रहें हैं हम मंत्री जी.. ?”
“आज… बल्कि अभी कुछ देर में हमारी फ़्लाइट है… फ़्लाइट से हम जहाँ उतरेंगे उसके आगे हमारा सफर क्रूज़ में होगा…
तीन दिन अंदमान द्वीप में गुज़ार कर हम वापस लौट आएंगे…
“बस तीन दिन.. !”
“हाँ जान क्योंकि मुझे आने के बाद हुकुम के साथ गुरु जी से मिलने जाना है… अब क्यों जाना है कैसे जाना है ये मत पूछ बैठना… तुम सीधे तैयार हो जाओ.. !”
“पर पैकिंग भी तो करनी है.. !”
“आपकी सारी पैकिंग हो रखी है मैडम.. आपकी नजर के सामने जो बड़ा सा बैग है वो आपका ही है… मेरा तो वो साइड में रो रहा छोटा सा बैग है.. !”
पिया ने मुस्कुरा कर समर को देखा और उसके गले से झूल गयी….
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पंखुड़ी अस्पताल से निकलकर हड़बड़ी में तेजी से अपने फ्लैट की तरफ निकल गई उसने अभी कुछ समय पहले ही हॉस्टल छोड़कर अलग से रूम ले लिया था ! अपने रूम में जाने के बाद वह फटाफट नहाकर डेट पर जाने के लिए तैयार हो गई….
उसे उस लड़के की सारी बातें अच्छी लग रही थी… लेकिन जाने क्यों कुछ अजीब सा मन में खटका बना हुआ था | पंखुड़ी को इस तरह ऑनलाइन डेटिंग में विश्वास कम था, लेकिन फिर भी उसे यूं लगा जैसे सामने वाले की बातें और विचार उससे काफी ज्यादा मिलते जुलते हैं.. और इसीलिए उसने अपनी मम्मी को बता कर इस लड़के से मिलने जाने की रजामंदी ले ली थी….
पंखुड़ी अपनी स्कूटी में हेलमेट लगाकर उस रेस्टोरेंट की तरह निकल गई…!
मन ही मन उसे पिछले दिन की सारी बातें याद आ रही थी जब वह समर और पिया के घर पर पूजा में गई थी और उस वक्त खाने के समय जब शेखर उसके ठीक सामने बैठा था, और उसे बार-बार यह गलतफहमी हो रही थी कि शेखर ही उसके पैरों पर अपना पैर मार रहा है..
उसे सोच कर ही हंसी आने लगी कि इतना धीर गंभीर लड़का ऐसी घटिया हरकत कर ही नहीं सकता फिर भी जाने क्यों पंखुड़ी के दिमाग में यह विचार आ गया था…!
शेखर को देखकर तो ब्रह्मा भी यह बात नहीं सोच सकते कि यह लड़का इतनी घटिया और गिरी हुई हरकत कर सकता है यह विचार मन में आते ही पंखुड़ी को हंसी आने लगी..!
सच ही तो है वह कोई देवी तो है नहीं कि एक बार शेखर को देखकर ही समझ जाएं !
हालांकि शेखर से वह पहली बार तो मिल नहीं रही थी… इसके पहले भी इत्तेफाक से उसकी तीन से चार बार शेखर से मुलाकात हो चुकी थी, और हर मुलाकात ऐसी थी जिसमें दोनों की ढेर सारी बातें हुई थी..! शेखर भी तो बिल्कुल उसी की तरह का लड़का था, हालांकि विचारों में और स्वभाव में दोनों में ही जमीन आसमान का फर्क था…
जहां वह बिना सोचे समझे खाने पीने की चीजों पर टूट पड़ती थी, वही शेखर हर कदम नापतोल कर उठाने वालों में से था….!
जहां वह एकदम ही मस्त मौला स्वभाव की थी वही शेखर बहुत ज्यादा धीर गंभीर था!
वह दोनों जब भी मिलते पंखुड़ी लगातार बोलती रहती थी और शेखर बिल्कुल ही शांत बैठा उसकी सारी बातें बड़े ध्यान से सुना करता था ! यह सब सोचते सोचते अचानक ही पंखुड़ी के मन में यह आने लगा कि शेखर की भी तो शादी नहीं हुई है…
एक आध बार पिया उसे शेखर का नाम लेकर छेड़ भी चुकी है लेकिन मजाक मजाक में छेड़छाड़ अलग बात है लेकिन सीधे किसी कलेक्टर को प्रपोज कर देना अलग बात है..
उसे शेखर पसंद तो था लेकिन कभी उसने शेखर को इस नजर से देखा ही नहीं… हालांकि वह मोस्ट एलिजिबल बैचलर है इस बात से इंकार तो नहीं किया जा सकता..
… लेकिन कोई भी लड़की खुद से होकर कभी सामने वाले लड़के को प्रपोज थोड़ी ना कर सकती हैं…
अपने विचारों में खोयी वो स्कूटी चला रहीं थी, कि सामने एक जगह उसने ख़ूब सारी भीड़ देख कर गाड़ी उस तरफ कर रोक दी…
भीड़ को चीर कर वो आगे बढ़ी तो देखा कि एक बारह तेरह साल कि बच्ची रास्ते पर बेहोश पड़ी थी… कुछ लोग उसके चारों तरफ घेरा लगाये उसे देख रहें थे.. !
उनमें से एक दो महिलाओं ने आगे बढ़ उस बच्ची के चेहरे पर पानी के छींटे देना शुरू किया…
बच्ची के कपड़े मिटटी से लथ पथ थे, पैरों में चप्पलें भी नहीं थी…
उसे देख कर साफ समझ आ रहा था कि बच्ची वही के सिग्नल पर भीख मांगती होगी…
पंखुड़ी उस बच्ची के पास पहुँच गयी… उसके पास ज़मीन में झुक कर पंखुड़ी ने उसकी ऑंखें खोल कर जांचनी शुरू कर दी.. उसने अभी बच्ची का हाथ पकड़ कर उसकी नब्ज़ टटोलनी शुरू की ही थी कि एक फटेहाल सी औरत भागती हुई उन लोगो तक चली आई…
” अरे ये क्या हो गया.. गुड्डो.. बेटा गुड्डो.. उठ जा बेटा.. !”
वो रोती हुई बच्ची को झिंझोड़ कर उठाने की कोशिश करने लगी…
वो इतने बुरे तरीके से बच्ची को हिला रहीं थी की पंखुड़ी ने उसका हाथ पकड़ कर दूर कर दिया…
“बच्ची कमज़ोरी की वजह से बेहोश हो गयी है, उसे ज़रा कोमलता से छुंए.. !”
“मैडम… मै माँ हूँ इसकी.. ! भीख मांग कर पेट भरते हैं हम लोग… गरीब लोग हैं.. समय पर खाना मिलता नहीं है, इसलिए मेरी बच्ची बेहोश हो गयी है…..”
“ठीक है आप बच्ची को उठाने में मेरी मदद कीजिये, इसे मेरी गाड़ी में पीछे बैठा कर आप बैठ जाइये मै इसे अस्पताल लें जाती हूँ… वहाँ इसका सही इलाज हो जायेगा और ये ठीक हो जाएगी.. !”
“अरे नहीं मैडम, आप लोग मदद करना ही चाहते हैं तो मुझे कुछ रूपये दे दीजिये, वैसे भी आज सुबह से कोई कमाई नहीं हुई है.. !”
“डोंट वरी, मै रुपये भी दे दूंगी, लेकिन फ़िलहाल इस बच्ची को बहुत कमज़ोरी है.. इसे फ्लूइड लगाने की ज़रूरत है ! उसी से इसकी कमज़ोरी जायेगी.. इसलिए आप इसे लेकर मेरे साथ अस्पताल चलिए.. !
“नहीं… मै अभी नहीं जा पाऊँगी.. !”
“क्यों.. ? बच्ची तो अभी बीमार है.. आप चलिए मेरा अस्पताल पास ही है.. बहुत पास में… अरे आप शायद ये सोच रहीं होंगी की अस्पताल में बहुत खर्चा लग जायेगा.. नहीं आप घबराये मत…. मै उसी अस्पताल में काम करती हूँ मेडिकल कॉलेज का अस्पताल है वहाँ इसका इलाज फ्री हो जायेगा…. !”
“नहीं नहीं मैडम हम लोग बहुत गरीब लोग हैं… हमारे लिए ये सब आम बात है, आप परेशान न हो.. बस रूपये दे दीजिये… मै बेटी के लिए थोड़े फल दूध ब्रेड खरीद लूंगी… !”
“आप इसे उठाने में मेरी मदद करेंगी या किसी और को बुलाऊँ… ?”
अबकी बार पंखुड़ी ने जरा सख्त लहजे में कहा और उस औरत के चेहरे पर हल्का सा डर नजर आने लगा…
” जाने दीजिए ना मैडम… आप समझती नहीं है.. ये अस्पताल का चक्कर हम भिखारियों के लिए नहीं बना है…
मेरा पति एक नंबर का शराबी जुआरी है ! जो पैसा हम लोग दिनभर जोड़ते हैं, वो अपनी दारू में पीके सब खत्म कर देता है..
आज ना मेरी कुछ कमाई हुई ना बेटी की! अब आपके साथ अस्पताल चले जाएंगे तो, रात में खाली हाथ लौटना पड़ेगा.. आप एक वक्त का खिला देंगी, लेकिन रात के लिए हमारे पास पैसे नहीं हुए तो मेरा पति मेरे साथ साथ इसे भी मारपीट के रख देगा..!”
पंखुड़ी कुछ देर को उसका चेहरा देखती रह गई… फिर धीरे से उसने बच्ची को सहारा देकर उठाया और एक दूसरी औरत की मदद से अपनी गाड़ी के पास ले जाने लगी…
” मैं इसे अस्पताल लेकर जा रही हूं.. अगर तुम आना चाहती हो तो आ जाओ, या फिर अपने घर का पता बता दो ! जब बच्ची होश में आ जाएगी और इसकी तबीयत सुधर जाएगी तो मैं खुद लाकर तुम्हारे घर पर छोड़ दूंगी ! मुझ पर इतना विश्वास तो कर सकती हो ना.. ? तुम चाहो तो मेरा कार्ड रख लो ! मैं यही पास के अस्पताल में जूनियर डॉक्टर हूँ.. !”
उस औरत की शक्ल से नजर आ रहा था कि उसे पंखुड़ी की यह बात जरा भी पसंद नहीं आ रही थी, लेकिन इतनी भीड़ भाड़ के बीच वह पंखुड़ी की बात ज्यादा देर तक काट भी नहीं सकती थी और मजबूरन पंखुड़ी की गाड़ी में अपनी बच्ची को बीच में बैठा कर उसे भी पीछे बैठना ही पड़ा, और पंखुड़ी उन दोनों को साथ लिये अपने अस्पताल की तरफ निकल गई…
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शेखर वैसे भी समय का पाबंद था और उससे रियान ने कह रखा था कि उसे अपने सही वक्त पर रेस्टोरेंट में पहुंचना है जहां वह लड़की उससे मिलने आने वाली थी… ..
शेखर को इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी उसे रियान ने ही सब कुछ बताया था.. और रियान और लीना ने अपनी दोस्ती की कसम दे देकर उसे जबरदस्ती रेस्टोरेंट भेज दिया था…
शेखर को उस लड़की का इंतजार करते वक्त बीतता चला जा रहा था !
शुरू में शेखर अपने मोबाइल पर कुछ देर तक अपना वक्त जाया करता रहा, लेकिन एक के ऊपर एक दो कप कॉफ़ी होने के बाद शेखर का धैर्य चूकने लगा और जब उसने देखा कि उसे यहां बैठे लगभग 45 मिनट बीत चुके हैं तब वह अपनी जगह से उठ गया…
शेखर का समय बहुत कीमती था और उस वक्त भी वह अपने किसी काम को पेंडिंग छोड़कर ही वहां आया था और इसीलिए उसकी नाराजगी और भी ज्यादा उभर कर आ रही थी…
लेकिन उसने इतने गुस्से के बावजूद रियान से कुछ नहीं कहा और चुपचाप अपना फोन उठाकर रेस्टोरेंट से बाहर निकल गया…
शेखर जिस वक्त अपनी जीप पर सवार होकर रेस्टोरेंट से निकलकर अपने ऑफिस की तरफ बढ़ रहा था…
उसी वक्त रास्ते के एक किनारे पर भीड़ के भीतर पंखुड़ी उस बच्ची की मां को यह समझा रही थी कि बच्ची को वह अपने साथ ले जाने दे दे…
वहां से गुजरने के बावजूद भीड़भाड़ के कारण शेखर पंखुड़ी को नहीं देख पाया और पंखुड़ी बच्चे और उसकी मां को अपनी गाड़ी पर बैठाते हुए वहां से गुजरते हुए शेखर को नहीं देख पायी….
दोनों ही अनजाने में एक दूसरे से विपरीत दिशा की तरफ आगे बढ़ गए…
क्रमशः
aparna…
