जीवनसाथी- 2/32

जीवनसाथी -2 भाग -32

     बांसुरी शाम के वक्त तैयार हो रही थी की सपना उसके कमरे में चली गई…-” हुकुम आपके लिए कुछ चाय कॉफी ले आऊं.. ?”

” नहीं, अभी मन नहीं है सपना! और सुनो तुम भी तैयार हो जाओ! आज मुझे एक पार्टी में जाना है तो तुम भी मेरे साथ चलो..!”

सपना ने मुस्कुराकर हां में गर्दन हिला दी -” हुकुम आप पार्टी में जाने वाली है तो फिर महाराज जी को खाने के लिए क्या बोलूं..?”

” घर में और भी तो लोग है ! तुम्हारे अलावा दो हेल्पर हैं,  चार बॉडीगार्ड है,  सब का खाना तो बनेगा ही ना !”

” हां लेकिन हुकुम बॉडीगार्ड तो आपके साथ ही जाएंगे ना..!”

” हां जाएंगे मेरे साथ,  लेकिन उनका कोई फॉर्मल इन्विटेशन तो होता नहीं है! इसलिए  मैं सोच रही हूं सिर्फ एक ही बॉडीगार्ड को लेकर जाऊंगी.. तुम तो रहोगी साथ में..!”

सपना ने हां में गर्दन हिलाई और अपने कमरे में तैयार होने चली गई….
    अपने कमरे में जाकर सपना ने अपना फोन निकाला और दरवाजे को बंद करने के बाद किसी को फोन करने लगी…!

   लगभग 15 मिनट में बांसुरी और सपना तैयार होकर एक ही बॉडीगार्ड के साथ पार्टी वाली जगह के लिए निकल गए….

पार्टी एक शानदार और बहुत खूबसूरत होटल में दी गई थी !  उस होटल को बहुत खूबसूरती से सजाया गया था !  यह होटल शेखावत का ही था और उस शहर के शानदार पांच सितारा होटलों में से एक था…

बाहर के लॉन के साथ-साथ अंदर का हॉल भी सजाया गया था, लेकिन ज्यादातर भीड़ बाहर के लॉन में ही मौजूद थीं…
  ढेर सारी धूमधाम के बीच एक तरफ स्टेज पर लाइव ग़ज़ल कार्यक्रम चल रहा था,  वहां मौजूद ग़ज़ल गायक वहाँ बिछे गद्दे पर बैठकर एक के बाद एक खूबसूरत ग़ज़लें गा रहा था…..

सरकती जाये है रुख से, नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता निकलता आ रहा है, आफ़ताब आहिस्ता आहिस्ता

जवां होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा..
हया यकलख़्त आई और, शबाब आहिस्ता आहिस्ता..

   बाँसुरी बाकी लोगों से मिलने के बाद एक गोल टेबल पर बैठे ग़ज़ल सुन रही थी, उसके ठीक बगल में सपना बैठी थी और उसके ठीक पीछे उसका बॉडीगार्ड खड़ा था…
उसकी टेबल से दूर एक ऊंची टेबल से पीठ टिकाए वासुकी खड़ा था.. दोनों हाथ बांधकर वह एकटक बाँसुरी को देख रहा था….

उसी वक्त दर्श ने उसके सामने एक गिलास बढ़ा दिया…

” ग़ज़ल भी सुन लें भाई… बड़ी दूर से मोटी रकम देकर शेखावत ने इतने बड़े सेलेब्रेटी ग़ज़ल गायक जसरीत सिंह को बुलाया है… !”

दर्श की बात सुनकर वासुकी एक पल को झेंप गया.. और उसने दर्श के द्वारा लाई गिलास को अपने हाथ में थाम लिया… कांच की गिलास में कोई मॉकटेल था…

” ये क्या है…?”

” वही जो तुम पीते हो, वर्जिन मोइतो…!!  मेरी भाषा में बोले तो नींबू पानी..! वैसे तुम्हारा स्टाइल अच्छा है बात को घुमाने का…
    मैं यह कह रहा था कि ग़ज़ल को देखने के साथ-साथ गजल सुनने पर भी थोड़ा ध्यान दे दो…!”

” सब कुछ जानते हुए भी मुझे छेड़ने का कोई मौका नहीं चूकते ना तुम..!”

” नहीं कतई नहीं और छोडूंगा भी नहीं… वैसे अनिर मैं तुझे 100 बार समझा चुका हूं और अब मैं समझा समझा कर थक गया हूं, लेकिन फिर भी मन है कि मानता नहीं… ऐसा लगता है कि तुझे फिर से एक बार कहूं कि जो तेरा नसीब नहीं,  उसे इतनी तवज्जो ना दें कि कल जब वह तेरे सामने से हट जाए तो तू पागल हो जाए…!”

” पागल तो हो चुका हूं, दर्श ! क्या तुझे अब भी लगता है कि मेरे पागल होने में कोई कमी बाकी है..?
    और रही बात जो चीज किस्मत में नहीं है उसकी तो चांद चातक की किस्मत में नहीं होता, लेकिन चातक चांद को देखते हुए ही जिंदा रहता है… !”

” यह सब किस्से कहानियों में अच्छा लगता है अनिर…  हमारी असली दुनिया इन सब ख्वाबों  खयालो से बहुत अलग है!  तूने अपने बलबूते पर, अपनी ताकत पर अपना एक साम्राज्य बनाया है! और अब इन बेवकूफ़ियों के चलते तू अपना साम्राज्य अपने हाथों बहा देगा…!”

” किसने कहा तुझसे कि वासुकी का सम्राज्य बहने वाला है… औरों की कमजोरी होता होगा उनका इश्क लेकिन मेरा तो मेरी ताकत है..! 
   मुझे वो मेरी बाहों में, मेरे कमरे में और मेरे बिस्तर पर नहीं चाहिए मुझे वह बस मेरी निगाहों के सामने चाहिए सही सलामत.. वह अपनी दुनिया में खुश रहे मुस्कुराती रहे मेरे लिए बस इतना ही काफी है.. उसे देखकर पूरी जिंदगी बिता लूंगा..!”

” उसे उसके पति से अलग रखकर तू उसे कौन सी  खुशी दे रहा है..?”

” तू नहीं समझेगा..!”

” तू तो बहुत समझदार है, तू ही बता दे..!”

” अभी नहीं बता सकता… जिस दिन वक्त आएगा उस दिन तुझे क्या सारी दुनिया को पता चल जाएगा…!”

” तेरी अजूबा बातें और तू….
वो देख वो भी चली आई… !

अनिरुद्ध ने पलट कर देखा नेहा उसी की तरफ मुस्कुराती चली आ रहीं थीं.. !
   गहरे हरे रंग की साड़ी पर उसने बालों का ऊँचा सा जुड़ा बना रखा था… कानों में मोरपंखी झुमके सज रहें थे, नेहा को एक झलक देख बिल्कुल ऐसा लगता था जैसे बाँसुरी चली आ रहीं हो…
   नेहा को देखने के बाद अनिरुद्ध की नजर दूसरी तरफ बैठी बाँसुरी पर चली गयीं… इत्तेफाक से उसने भी गहरे हरे रंग की साड़ी ही पहन रखी थीं,  लेकिन हमेशा की तरह उसके बाल खुले थे और कानों में छोटे  छोटे हीरों के कर्णफूल दमक रहें थे…
   वो एक बार फिर उसे देख कर खो सा गया…

  इस शहर में किससे मिले, हम से तो छूटी महफिले,
  हर शख्स तेरा नाम ले, हर शख्स दीवाना तेरा…
   कल चौदहवी की रात थीं, शब भर रहा चर्चा तेरा..
   कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा…

अनिरुद्ध अपलक बांसुरी को निहार रहा था और तभी नेहा उसके करीब पहुंच गई..
  उसने अनिरुद्ध के चेहरे के सामने अपना हाथ ले जाकर चुटकी बजाई और वह चौंक कर नेहा को देखने लगा…

” कहां खोए रहते हो वासुकी.. ?”

” तुम बताओ, तुम यहां कैसे..?”

” बस तुम्हारे कदमों के निशान ढूंढती चली आयी… !”

अनिरुद्ध ने कंधे उचका दिये…. -“कुछ ज्यादा ही फ़िल्मी नहीं हो रहा ये… ?”

   वो लोग खड़े बातें कर रहें थे की शेखावत भी वहाँ चला आया…

” मुझे बिल्कुल यकीन नहीं था कि तुम यहां आओगे वासुकी… ?”

” बिना यकीन के तुमने मुझे बुलाया था.. मतलब तुम चाहते नहीं थे कि मैं आऊं..?”

” मैं दिल से चाहता था कि तुम आओ, क्योंकि तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है..!”

शेखावत मुस्कुराते हुए पीछे पलटकर बांसुरी की तरफ देखने लगा और वहां से गुजरते एक वेटर को अपने पास बुला लिया… उसकी ट्रे में से व्हिस्की  की गिलास उठाकर उसने वासुकी की तरफ बढ़ा दिया…

” तुम अभी मेरे बारे में कुछ नहीं जानते हो शेखावत इसलिए मुझे सरप्राइस देने की सोच रहे हो..! वैसे तुम्हें बता दूं कि मैं पीता नहीं हूं..!”

” कोई बात नहीं..! आज यहां मेरी पार्टी में पी लो..!
मुफ्त की शराब तो हर कोई पीना चाहता है वासुकी.. तो तुम भी पी लो..!”

” अभी चाहूँ तो खड़े-खड़े तेरे इस होटल को यहीं के यहीं खरीद सकता हूं.. इसलिए अपने पैसों का रुआब  मुझे मत ही दिखाना…!”

” पैसों का रुआब देखना है ना, तो आजा मेरे पीछे..
जा रहा हूं कलक्टरनी के पास, जंगल वाले उस  प्रोजेक्ट के लिए पेपर साइन करवाने…

शेखावत एक तिरछी सी जहरीली मुस्कान देकर बांसुरी की तरफ बढ़ गया… उसे  उस तरफ बढ़ते देख दर्श ने वासुकी से कहा भी…

” तू नहीं जा रहा..!”

वासुकी ने बड़ी लाचारगी से भरकर दर्श  की तरफ देखा और दर्श ने  उसकी बात समझ ली और तेज कदमों से चलते हुए शेखावत के पीछे पीछे ही बांसुरी की टेबल पर पहुंच गया..
शेखावत ने बांसुरी के सामने की कुर्सी खींची  और उसके सामने बैठ गया… बांसुरी ने  एक फीकी सी मुस्कान उसे देने के बाद उसके ठीक पीछे खड़े दर्श  की तरफ देखा और मुस्कुरा उठी..
शेखावत ने अपने हाथ में रखे प्रोजेक्ट के पेपर बांसुरी के सामने रख दिये…

” आप सोच भी नहीं सकती आपको इस प्रोजेक्ट पर साइन के बदले कितना कुछ मिलेगा..?  आपके वजन के बराबर सोने से तोल के रख दूंगा आपको…!”

” राजा अजातशत्रु का नाम सुना है आपने…?”

माथे पर पड़ते बल के साथ वह सामने बैठी बांसुरी को घूरने लगा और बांसुरी मुस्कुरा उठी…

” मगध के सम्राट हर्यक वंश के राजा अजातशत्रु की बात नहीं कर रही हूं मैं…!  मेरे पति राजा अजातशत्रु सिंह बुंदेला की बात कर रही हूं…
   विजय राघवगढ़ रियासत के राजा और उसी स्टेट के चीफ मिनिस्टर राजा अजातशत्रु सिंह और  मैं उनकी धर्मपत्नी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह हूँ…
  राजा साहब के जन्मदिन पर उनके माता-पिता उनके वजन के बराबर सोना रियासत में बांट दिया करते थे… आपको यह जानकर बहुत खुशी होगी कि हमारी रियासत में एक भी घर गरीबी रेखा के नीचे नहीं आता….
राजा साहब के राज में रियासत के हर घर का बच्चा स्कूल जाता है पढ़ने, और हर घर की औसत आय अट्ठारह हज़ार महीना से ज्यादा है…  हमारी रियासत के किसी किसान ने कभी आत्महत्या नहीं कि..
    हमारी रियासत में कभी पानी ना गिरने के कारण खेत या फसल चौपट नहीं हो जाती, हमारी रियासत में लड़कियां आराम से रात में बारह  बजे भी अपने मनचाहे कपड़े पहन कर घूम सकती हैं.. लड़के उन पर आकर अटैक नहीं करते, उनकी इज्जत नहीं लूटी जाती !  ना ही उन पर एसिड फेंका जाता है !

    और इन सारी सुव्यवस्थाओं के पीछे जो खड़ा है उसका नाम है राजा अजातशत्रु…

रियासत में कुछ लोग यह भी कहने लग गए हैं, कि ऐसा लगता है जैसे राम राज्य आ गया है वापस..

          सोने चांदी की हमें जरूरत तो है क्योंकि रियासत के पालन पोषण के लिए राजा साहब अक्सर अपना खजाना खाली करते रहते हैं…
अब आप बताइए कि आप हमारे राजा साहब के खजाने को भरने के लिए कितना मूल्य  लगाना चाहते हैं…?
   मुझे यहां नौकरी करते हुए देखकर यह सोच लेने की गलतफहमी मत पाल लीजिएगा कि मैं अपनी जीविकोपार्जन के लिए इस नौकरी से जुड़ी हूं..!  यह नौकरी मेरे लिए बेहद जरूरी है लेकिन यह मेरी आय का साधन नहीं है…!
   मेरी सारी सैलरी मैं मेरी मां के नाम पर बनाए ट्रस्ट पर दान कर देती हूं.. ! आप चाहे तो मेरे वजन के बराबर सोना जोड़कर उस ट्रस्ट को दान कर दीजिए..
लेकिन एक बात का ध्यान रखिएगा आप चाहे कितना भी खर्चा कर ले लेकिन अगर मुझे आपके यह पेपर साइन करने लायक नहीं लगे तो मैं साइन नहीं करूंगी..!
   मैं अपनी जिद से यह काम कर रही हूं और मुझे यह काम करना पसंद है… !
   मैं जिनकी अर्धांगिनी हूं, उनके नाम पर मेरी वजह से कभी कलंक नहीं लग सकता..!
आपसे शायद दूसरी बार इस विषय पर चर्चा हो रही है, फिर से मैं आपको स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि, यह जमीन सरकार की है..! और मैं यहां की जमीन पर से पेड़ो की कटाई और यहां पर बसने वाले लोगों को यहां से विस्थापित करने के पक्ष में नहीं हूं….
मैं आपके बनाए इस प्रोजेक्ट को पास नहीं करती..!”

” आप यह अच्छा नहीं कर रही है मेरे साथ..!”

” कोई बात नहीं ! जरूरी नहीं कि मैं हर किसी के साथ अच्छा ही करूं! मेरी गुड बुक का हिस्सा बनने के लिए आप डिजर्विंग भी नहीं है…!”

” बांसुरी जी…..

” मेरा पूरा नाम लीजिये बाँसुरी राजा अजातशत्रु सिंह !”

” कलेक्टर बन गई हैं, इसलिए इतना घमंड में इतरा  रहीं है ना..!”

बांसुरी जोर से हंस दी…

” अब भी नहीं समझे आप..! राजा अजातशत्रु का नाम जुड़ा है मेरे साथ इसलिए घमंड है मुझे… और जिस दिन आप उनसे मिल लेंगे ना आप खुद ब खुद मेरे घमंड का कारण समझ जाएंगे…! मैं चलती हूं यहां से.. धन्यवाद कि आपने अपनी पार्टी में बुलाने के योग्य समझा मुझे!”

बांसुरी ने खड़े होकर अपना पर्स उठाया और उसके वहां से मुड़ते ही सपना भी उसके साथ मुड़  गई…

बांसुरी आगे बढ़ रही थी कि तभी गहनों से लदी फदी चमकीले चेहरे वाली एक महिला उस तक चली आयी और बड़े ही नाज़ से उसने बाँसुरी का हाथ पकड़ लिया…

” कलेक्टर साहिबा ऐसे नाराज होकर ना जाईए.. इनकी तो आदत ही है हर जगह कामकाज घुसा देते हैं..! आप बिना खाना खाए चली गई तो हमें बुरा लगेगा !”

बांसुरी ने पलटकर उस औरत की देख तरफ देखा और उस औरत ने बांसुरी के सामने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए…

” बड़ी तमन्ना थी हमारी आपसे मिलने की और बहुत इसरार से हमने आपको बुलवाया था… हम मेहमानों की आवभगत में इस कदर लगे थे कि आप से मिलने ही ना सके और देखें आप रूठ कर जाने भी लगी..!
यह मर्द क्या जाने, औरतों के मन की बात…  आइए थोड़ा सा कुछ खा लीजिए, फिर चले जाइएगा ! देखिए हम पहली बार आपसे मिल रहे हैं, और आप पहली बार हमारे घर आई हैं, इसलिए आपको ऐसे खाली तो नहीं जाने देंगे..!”

बाँसुरी ने ठंडी सांस भरी और शेखावत को घूरकर देखने के बाद उस महिला को मना करने लगी.. लेकिन वह औरत भी अपनी जिद पर अड़ी थी और एक तरह से बांसुरी की हथेली पकड़ उसने खींचकर उसे अपने साथ आगे बढ़ा लिया…
दूर से यह सब देखता अनिरुद्ध अंदर ही अंदर क्रोध से तप रहा था..  उसे शेखावत का बांसुरी से इस तरह बदतमीजी करना सहन नहीं हो रहा था लेकिन उसकी बांसुरी के सामने जाकर शेखावत को कुछ बोलने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी…
जाने उसके साथ ऐसा क्या था जो पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाने वाला वह बांसुरी के सामने पड़ते ही सूखे पत्ते सा थरथर कांपने लगता था…..

बल्कि वह उसका आमना-सामना होने से खुद को बचाता ही था…

बांसुरी ने जैसे ही वहां से जाने का निर्णय लिया था वासुकी के चेहरे पर राहत चली आयी थीं, और वो भी वहाँ से उठ गया था, लेकिन उस औरत ने वापस बाँसुरी को रोक लिया और अपने साथ खाने की टेबल पर लें गयीं……

   एक बार  फिर वासुकी दूर खड़ा बांसुरी को देख रहा था…
…नेहा अपने लिए खाना लेने गए हुए थीं…
   दर्श हाथ में स्टार्टर की प्लेट लिए किसी के साथ कुछ काम की बातों में लगा था उसी वक्त नेहा अपनी प्लेट  लिए वासुकी के पास चली आई..
उसने प्लेट वासुकी के सामने बढ़ा दी !  वासुकी ने प्लेट देख कर मना किया तो नेहा जिद करके अपने हाथ से उसे कुछ खिलाने लगी… वासुकी नेहा को देख कर मना कर रहा था, लेकिन नेहा उसकी बात सुने बिना उस को  जबरदस्ती कुछ ना कुछ खिलाने को मजबूर कर रही थी… आखिर  वासुकी ने अपना मुंह खोल कर एक निवाला मुंह में ले ही लिया…

” इतने बड़े हो गए हैं आप, लेकिन इतनी भी तमीज नहीं कि अगर हमने आपको कुछ खिलाया है तो आप भी बदले में हमें कुछ खिला दीजिए..!”

” खुद खा लो..!”

“हद है ये तो… !”

” हद नहीं बेहद हूं मैं.. ! मेरी हर बात हद से ज्यादा होती है!”

” तो  मुझसे प्यार भी कर लो ना बेहद वाला..!”

वासुकी ने नेहा की तरफ घूर कर देखा और..-” तुम्हें एक बार में समझ में क्यों नहीं आती मेरी बात नेहा,  मैं तुमसे इस जन्म में कभी प्यार कर ही नहीं सकता..!”

” और तुम्हें क्यों नहीं समझ आता वासुकी कि, मैं इस जन्म में तुम्हें नहीं भूल सकती..! तुमसे वैसे भी मांगा ही क्या है मैंने..?”

” अच्छा किया, कुछ नहीं मांगा, क्योंकि मैं तुम्हें कुछ दे ही नहीं सकता..!”

” भूलो मत उस दिन तुमने मुझसे प्रॉमिस किया था..! मैं बराबरी से अपना प्रॉमिस निभाते हुए तुम्हारे दिए हुए वीडियो फोटो सब कुछ देख रही हूं.. हर बात की प्रैक्टिस कर रही हूं और तुम इतनी जल्दी भूल गए..!”

एक गहरी सी साँस छोड़कर वासुकी ने नेहा की तरफ देखा..-” चाहती क्या हो मुझसे..?”

” तुम्हें चाहती हूं..!  तुम्हें पाने की जो कसक है वह मुझे हर बांध तोड़ने को मजबूर कर रही है..क्या करूँ.. दिल के हाथों मजबूर हूँ… तुम नहीं समझोगे वासुकी.. !”

“मैं भी तो उसी दिल के हाथों मजबूर हूँ.. !” वासुकी ने ऐसा कहते ही वापस उस टेबल पर नजर फिरा ली  जहां बांसुरी बैठी थी लेकिन बांसुरी अब वहां मौजूद नहीं थी…
चौंक कर वासुकी गार्डन में चारों तरफ ध्यान से देखने लगा.. लेकिन उसे बांसुरी कहीं नजर नहीं आई ! वह नेहा को वहीं छोड़ कर आगे बढ़ गया, लोगों की भीड़ को काट कर आगे बढ़ते हुए इधर से उधर वो  हर जगह बांसुरी को ढूंढने लगा…
बांसुरी की हेल्पर सपना एक कुर्सी पर बैठी थी, जहां कुछ देर पहले बांसुरी भी उसके साथ थी..!  वासुकी भाग पर उसके पास पहुंच गया..-” यहाँ जो बैठी थीं वो मैडम कहां गई…?”

“उनका फ़ोन आया था, वो फ़ोन अटेंड करने उठ कर चली गयीं… !”

“और तुम साथ में क्यों नहीं गए… ? मैडम के साथ ही रहना है ना तुम्हें.. ?”

वासुकी पीछे खड़े गार्ड के ऊपर फट पड़ा और गार्ड फटी फटी आंखों से वासुकी को देखने लगा…

****

कथा और पूजा पाठ निपट चुका था सभी लोगों के खाने की व्यवस्था समर के घर के बाहर के बगीचे में थी!  वहां पर  बड़े-बड़े डाइनिंग टेबल लगे थे…  कुछ में घर के बड़े बुजुर्ग बैठे थे.. कुछ में औरतों का जमावड़ा था और कुछ में समर और पिया के दोस्त बैठे थे..
समर और पिया भी उसी टेबल पर आ बैठे… पिया के ठीक बगल में पंखुड़ी बैठी थी और समर के दूसरी तरफ शेखर बैठा था… शेखर के साथ ही रिदान और लीना भी वहां आए हुए थे… इन सबके अलावा समर की बुआ की बेटी उसके मामा चाचा के लड़के वगैरह  लोग भी उन्हें घेर कर बैठे थे…
पंखुड़ी के मोबाइल पर उसी वक्त कोई मैसेज आया और वह अपना मैसेज देखने लगी…
पंखुड़ी ने अपने आप को जिस डेटिंग एप पर रजिस्टर किया था और वहां जिस एक लड़के से उसकी बातचीत हो रही थी उसी का मैसेज था..
  उसने पूछा था कि पंखुड़ी आज सुबह से कहां व्यस्त है उसका आज कोई मैसेज नहीं आया..?  पंखुड़ी उसका जवाब लिखने लगी…
  समर पिया के ठीक सामने बैठा था और उसकी पूरी नजर पिया पर थी.. उसने धीरे से पिया को एक मैसेज लिख दिया…
”  आज बहुत खूबसूरत लग रही हो, तुम पर से मेरी नजर नहीं हट रही..क्या करूँ.. ?”

” हटा लें .. क्योंकि इस वक्त नजर मारने का कोई फायदा नहीं है..!”

” तो कब फायदा मिलेगा..?”

” रात में ही मिलेगा, जो भी मिलेगा..!”

” पूरा दिन कैसे काटूँगा.. ?”

” आपके पास तो दिन काटने के 556 बहाने है…  पूरी रियासत के जाने कितने सारे काम मिल जाएंगे आपको तो..!”

” मजाक उड़ा रही हो ना मेरा..! रात में तुम्हारी खबर लूंगा..!”

पिया ने मुस्कुराकर मोबाइल बंद कर टेबल पर रख दिया ! उसी वक्त समर ने  धीरे से अपना पैर पिया के पैरों की तरफ बढ़ाया…
लेकिन उसका पैर पिया की जगह पंखुड़ी के पैरों से टकरा गया और पंखुड़ी का मोबाइल झटके के कारण उसके हाथ से गिरते गिरते बचा.. ! उसने सामने नजर उठा कर देखी,  उसके ठीक सामने शेखर बैठा था.. जो उस वक्त पंखुड़ी को ही देख रहा था…

पंखुड़ी को लगा कि यह काम शेखर ने किया है और यह सोच कर उसे शेखर के ऊपर थोड़ी नाराजगी होने लगी… लेकिन उसी वक्त उसके मोबाइल पर वापस मैसेज चला आया… -” कैसी हो दोस्त आज तो तुम से बात ही नहीं हो पाई..?”

” सॉरी दोस्त मैं आज अपनी एक फ्रेंड के यहां पूजा में आई हुई हूं..?”

” अच्छे से मन लगाकर पूजा करना, जिससे तुम्हें एक  सॉलिड अच्छा लड़का मिले..!”

” पूजा पाठ से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता..! मुझे लगता है व्रत करने से ही कुछ होता है..!
     पर खैर छोड़ो अभी मैं तुमसे बात नहीं कर पाऊंगी थोड़ा मूड ऑफ है!”

” क्यों क्या हो गया..?”

” कभी-कभी आईफोन के बॉक्स में से नोकिया 3310 निकल आता है बस वैसा ही कुछ हुआ है … !”

“मतलब.. !”

“मतलब ये कि  अगर कोई अच्छा खासा डीसेंट लड़का आपसे  बदतमीजी कर दे तो कैसी फीलिंग आती है ना बस वैसे ही लग रहा है मुझे..!”

” किसने बदतमीजी की है दोस्त..?  कमीने का नाम बताओ मैं उसका मुंह तोड़ दूंगा..!”

” मुंह तो मैं खुद तोड़ सकती हूं लेकिन.. इस वक्त भूख लग रही है और खाना आ गया है तो सोचा मैं पहले खा लेती हूं उसके बाद… “

उसी वक्त समर ने वापस पिया की तरफ पैर बढ़ाया और पंखुड़ी के पैरों पर समर की टांगे ऊपर की तरफ रेंगने लगी…

  गुस्से के मारे पंखुड़ी से रहा नहीं गया और वह अपनी जगह पर खड़ी हो गई उसी वक्त पिया समर को देख रही थी,और समर पिया को…
  समर ने मुस्कुरा कर पिया को इशारा किया टेबल के नीचे देखने का और पिया को अचानक समझ में नहीं आया, उसका ध्यान बाजू में खड़ी पंखुड़ी पर चला गया… उसने पंखुड़ी कि तरफ देख कर उससे धीरे से पूछा.. -” क्या हुआ पाखी.. ? अचानक खड़ी क्यों हो गयीं.. ?”

पंखुड़ी ने सामने बैठे शेखर कि तरफ देखा जो चुपचाप सर झुकाये अपना खाना खा रहा था… और एक ठंडी सी साँस भर कर पिया को टेबल के नीचे की तरफ इशारा कर दिया…
पिया ने झांक कर नीचे देखा और उसे तुरंत ही माज़रा समझ आ गया… वो अपनी हंसी रोकती सीधे बैठ गयीं…
  उसे हँसता देख पंखुड़ी ने आश्चर्य से उसे घूर कर सवाल कर लिया.. और पिया मुस्कुरा कर धीमे से गाने लगी…

“कहीं पे निगाहे कहीं पे निशाना, छोड़ो जी छोड़ो अब गाओगे क्या गाना.. !

उसने समर की तरफ देखते हुए धीमे से ये गुनगुनाया और पंखुड़ी का हाथ पकड़ कर नीचे बैठा दिया..

“हाँ सही बात है हम कहाँ गा पाएंगे, आपके बाद आपकी सहेली ही गाएंगी.. क्यों  पंखुड़ी… ?”

समर की इस बात पर पंखुड़ी को पिया भी गाने के लिए मनाने लगी, और आखिर पिया की बात मान कर पंखुड़ी भी गाने लगी…

“बच के रहना रे बाबा, बच के रहना रे
बच के रहना रे बाबा,तुझ पे नजर है…

वो गुस्से में गा रहीं थीं की हँसते हुए पिया ने उसे हल्का सा झुकाया और पंखुड़ी की नजर समर के पैरो पर चली गयीं…
  और दूसरे ही पल वो चौंक कर सामने बैठे शेखर को देखने लगी… वो अब भी चुपचाप बैठा खाना खा रहा था….

******

वासुकी का पूरा ध्यान वहाँ बाँसुरी पर था, लेकिन वो जैसे ही जूस लेकर पलटा बाँसुरी अपनी जगह से गायब थीं…..
   इतनी बड़ी पार्टी में इतने सारे लोगों के बीच उसने अपना पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ बाँसुरी पर रखा था,  और अब वो अचानक गायब हो गयी थीं…
     अब तक शांत बैठा वासुकी अचानक अपनी जगह
से उठा और तुरंत पार्टी हॉल की उस भीड़ में घुस इधर से उधर उसे ढूंढने लगा….

बाँसुरी जहाँ बैठी थीं वो उस जगह पर पहुँच गया… बाँसुरी ने इतनी देर से जो काला पर्स पकड़ रखा था वो वही पड़ा था…

  तो बाँसुरी कहाँ चली गयी ? अगर वो पार्टी से निकल कर घर गयी होती तो अपना पर्स भी ले जा चुकी होती.. मगर पर्स यहाँ रखा था तो बाँसुरी कहाँ थीं….
  पार्टी में एकतरफ गीत संगीत की महफ़िल सजी थीं… दूसरी तरफ लोग खाते पीते पार्टी का लुत्फ़ उठा रहें थे… पार्टी में घूम घूम कर शेखावत हर किसी से बातें कर रहा था.. उसी से पूछ लेना चाहिए सोच कर वासुकी उसे ढूंढने लगा…
   पर ये देख कर उसका दिमाग सांतवे आसमान पर पहुँच गया की शेखावत का भी वहाँ कोई अता पता नहीं था…
ये शानदार होटल शेखावत का ही था.. यहाँ का चप्पा चप्पा उसका जाना चिन्हा था… अगर वो बाँसुरी को किसी ऐसे तहखाने में ले गया जिसके बारे में बाक़ी लोगो को पता ही न हो तो कोई उस तहखाने को कभी खोज तक ना पायेगा….
  सोच सोच कर वासुकी के दिमाग की नसे तनने लगीं… माथे पर उलझन भरी रेखाएं लिए वो बाँसुरी को ढूंढने आगे बढ़ रहा था की नशे में धुत चरण उसके सामने पड़ गया….

“क्या हुआ वासुकी…..  तुम भी बाँसुरी बजाना चाहते हो क्या … ?”

नशे से लटपटाती ज़बान में उसने जैसे तैसे कहा…और उसका वाक्य पूरा होने के पहले एक ज़ोरदार तमाचा उसका गाल लाल कर गया….

वासुकी ने ज़मीन  पर गिरे चरण की कॉलर पकड़ी और उसे खींचते हुए बाहर की तरफ ले गया….

क्रमशः

aparna……

  
अगले भाग की झलक…






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