
जीवनसाथी 2 भाग -21
पिया अपने अस्पताल के केबिन में बैठी मरीज़ देख रहीं थी… आज मरीज़ों की संख्या और दिनों से ज्यादा ही थी.. वो एक एक कर सबको निपटाती जा रहीं थी… अब मरीज़ लगभग पुरे हो चुके थे..
सर झुकाये वो मरीज़ की पर्ची लिख रहीं थी की अगला मरीज़ आकर सामने बैठ गया… उसने बिना आंख उठाये ही पुराने मरीज़ की पर्ची उसे समझायी और उसके हाथ में रख कर वापस नयी वाली पर्ची को देखने लगी…..
“जी बताएं.. ! क्या तकलीफ है आपको.. ?
” दिल की बीमारी है… !”
अब भी पिया सर झुकाये सामने बैठे मरीज़ से सवाल पूछती पर्ची भर रहीं थी….
“क्या लगता है आपको… धड़कन बढ़ती हैं या ज्यादा चलने फिरने में पसीना आने लगता है,साँस लेने में दिक्कत आती है….. कैसा लगता है.. “
“ये सब कुछ होता है, लेकिन सिर्फ तब जब वो सामने होती है… “
आवाज़ भी जानी पहचानी सी थी…. पिया ने तुरंत चेहरा ऊपर उठा कर देखा सामने समर बैठा था.. उसे इस तरह अपने सामने बैठे देख वो चौंक गई…
” आप यहाँ… ?
“हाँ तो.. ? और कहाँ जाऊं… ?”
“क्यों आये हैं यहाँ.. ?”
“सारा सच जानने.. अब बहुत हुआ ! मैं भी व्यस्त था और तुम भी.. मुझे लगा था बातचीत समय के साथ सुलझ जाएगी, लेकिन मुझे लग नहीं रहा कि हमारे बीच कुछ भी सुलझ रहा है….
बल्कि मेरे ध्यान ना देने से बातें और भी ज्यादा उलझती जा रही है.. मैंने आज तक इन बातों को बहुत हल्के में ले लिया था! मुझे लगा था मजाक मजाक में बिगड़ी बात एक दिन अपने आप ही सुलझ जाएगी लेकिन अफसोस कि वह नहीं सुलझी… बल्कि अब तो लग रहा है कि अगर अब हमने मिलकर सुलझाने की कोशिश नहीं की तो यह बात उलझती ही चली जाएगी…
. पिया सच सच बता दो कि आखिर ऐसी क्या बात हो गई है कि तुम इस कदर मुझसे रूठी बैठी हो …
कभी तुम्हें देखकर लगता है कि तुम मुझसे नहीं रूठी हो और कभी लगता है कि मुझसे बात नहीं करना चाहती मुझे सच कुछ समझ नहीं आ रहा.. !”
” अगर आप को नहीं समझ में आ रहा तो प्लीज मत समझिये मंत्री जी… आपकी समझ से बाहर है सब कुछ.. !”
” ऐसा मत कहो पिया… मिल बैठ कर सुलझाने से उलझने दूर हो जाती हैं.. !”
“लेकिन अगर उलझन खुद पैदा की गई हो तो कितना भी सुलझा लो वो हर बार और उलझती चली जाती हैं.. !”
“वही तो जानना चाहता हूँ, कि आखिर बात क्या हो गई.. क्योंकि मुझे ये भी पता हैं कि किसी छोटी मोटी बात से तुम इतना अपसेट नहीं हो सकती.. !”
“तो जब मुझ पर इतना विश्वास हैं तो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिये.. क्योंकि मेरी समस्या का हल किसी के पास नहीं हैं.. !”
“मतलब तुम मुझे अब इस लायक भी नहीं मानती कि अपनी समस्या मुझे बता… !
समर की बात पूरी होने से पहले ही पिया उठी और अपना एप्रन और स्टेथो संभाले कमरे से बाहर निकलते बाहर निकल गई… समर भी उसके पीछे हो लिया….
पिया ने अपनी स्कूटी निकालने के लिए उसमे चाबी घुमाई ही थी कि समर ने आकर चाबी निकाल ली..
“अब तुम अपनी हदें पार कर रहीं हो पिया.. !”
“मेरी हदें डिसाइड करने वाले आप होते कौन हैं.. ? अच्छा ही हुआ कि आपसे शादी टूट गई वरना आप और आपका परिवार, आपकी माँ मिल कर तो मुझे कितने कदम चलना हैं, कैसे बोलना हैं, कितना खाना हैं, कितना सोना हैं ये सब भी सिखाने लगते..
समर के चेहरे पर अब नाराज़गी नज़र आने लगी थी… अंदर ही अंदर वो पिया के लिए कितना तड़प रहा था यह शब्दों में वो उसे बता नहीं पा रहा था और पिया बिना उसकी तड़प समझे उसे और ज्यादा तड़पाए जा रही थी…
” तुम वाकई लिमिट्स क्रॉस कर रहीं हो पिया.. मेरी माँ तक जाने कि क्या ज़रूरत थी.. उन्होंने आज तक तुम्हें किसी बात के लिए नहीं टोका, बेवजह उनका नाम हमारे झगड़े के बीच न ही घसीटो तो अच्छा रहेगा…”
“मैंने बेवज़ह कोई बात नहीं करी, जो सच है मैं वही कहती हूं..!”
” कैसी बातें कर रही हो तुम?
” मैं जानती हूँ आप सच नहीं सुन सकते, इसलिए मैं बात ही नहीं करना चाहती हूं!”
पिया ने एक नज़र समर को घूर कर देखा और समर के हाथ से चाबी छीनने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि समर ने चाबी उसकी गाड़ी कि सीट पर रखी और वहाँ से मुड़ कर तेज़ कदमों से अपनी गाड़ी कि तरफ बढ़ गया….
उसे जाते देखती खड़ी पिया कि आँखों से दो बून्द आंसू ढुलक कर उसके गालों तक चलें आये….. वो भी अपनी गाड़ी पर बैठ अपने फ्लैट के लिए निकल गई…
***
महल में शाम कि तैयारी हो चुकी थी… दोपहर के खाने के बाद दर्श और अनिरुद्ध को रियासत घुमाने के लिए गाड़ी और ड्राइवर के साथ भेज दिया गया था… खुद को लाख रोकने के बावजूद अनिरुद्ध का मन महल में ही कहीं अटका पड़ा था, पर बहुत सी अपनी आरज़ू हमेशा पूरी हो जाए यह जरूरी भी तो नहीं….
महल के बगीचे में जिस तरफ रूपा ने सारी तैयारियां करवाई थी वहां एक-एक कर लोग जमा होने लगे थे… सर्दियों के दिन शुरू हो चुके थे और इसीलिए खुले आसमान के नीचे एक तरफ बोनफायर लगाया गया था उसके चारों तरफ आरामदायक मोटे कारपेट बिछाकर उस पर काफी सारे तोशक लगा दिए गए थे.. जिससे सारे लोग जमीन पर ही आराम से बैठ सके ! उसकी दूसरी तरफ दो बड़े बड़े बार्बीक्यू लगे हुए थे…
कुछ नौकर वहां पर खड़े, किनारे रखे बर्तनो से खाने-पीने के सामान उठाकर बार्बीक्यू पर सेट कर रहे थे….
एक-एक करके लोगों का आना शुरू हो चुका था… सभी के बच्चे वहीं पास में गार्डन में खेल रहे थे.. रूपा ने प्रेम और निरमा को भी साग्रह बुला लिया था….
आखिर निरमा बांसुरी की सबसे करीबी दोस्त जो थी…
वहीं एक तरफ बच्चों के खेलने की सारी व्यवस्थाएं भी रूपा ने करवा रखी थी…..
इन सभी के बच्चे एक साथ वहां पर खेल रहे थे, इनमें सबसे बड़ा रूपा का ही बेटा था! रूपा का बेटा हर्षवर्धन लगभग आठ नौ साल का था, उससे छोटी थी जया कि बेटी परिधि जो लगभग सात साल की हो चुकी थी ! सब उसे प्यार से परी बुलाया करते थे.. इनके बाद थी, मीठी जो अब लगभग छै साल की हो चुकी थी और उससे छैः सात महीने छोटा यशवर्धन जो रेखा और विराज का बेटा था और बचपन से ही अपनी शैतानी से महल भर को नाकों चने चबवाये था.. और सबसे छोटा था बाँसुरी और राजा का बेटा शौर्य प्रताप.. जो दो महीने बाद तीन साल का होने वाला था….
सारे बच्चे इधर से उधर भागते दौड़ते शैतानियों में डूबे थे.. इन सब की भी अपनी विशेषताएं थी.. युवराज का बेटा हर्ष जहाँ अपनी माँ जैसे सुन्दर सजीला था वहीँ अपने पिता की गढन और बुद्धिमानी लिए था, बिलकुल वही गंभीर और प्रेमी स्वभाव था उसका ……
बचपन से अपने सारे भाई बहनों पर उसका अपूर्व प्रेम था लेकिन शौर्य के लिए वो प्यार कुछ अलग ही था..
.. बहुत बार उसका शौर्य के लिए विशेष प्रेम देख कर यश उससे झगड़ भी पड़ता था, लेकिन हर्ष अपनी बुद्धिमानी भरी बातों से उसे मना लिया करता था…..
परी अपनी माँ जैसी ही नाज़ुक और सौम्य थी वहीँ मीठी इन सब में सबसे तेज़ दिमाग की बच्ची थी… वो कई बार अपने दिमाग से कहीं आगे की बातें कह जाया करती थी कि लोग उसकी प्रतिभा देख दांतो तले ऊँगली दबा लिया करते थे..
उसकी वाक्पटुता और बुद्धिमानी ही थी कि वो जहाँ जाती वहाँ सारे बच्चे खुद ब खुद उसकी बातें मानते हुए उसे अपना कैप्टन घोषित कर दिया करते थे… शौर्य इन सबमें सबसे छोटा और सभी का लाड़ला था… वो हर तरह से अपने पिता कि प्रतिमूर्ति था… रंग रूप मुस्कान चाल ढ़ाल हरकतें आदतें सब कुछ उसका अपने पिता की तरह का था.. उसे एक बार देख कर सहज ही पहचाना जा सकता था कि ये राजा अजातशत्रु का बेटा हैं….
बच्चे आपस में खेल रहें थे.. मीठी और हर्ष उन सबके टीचर बने थे और बाकी बच्चे विद्यार्थी बने उनकी बातें सुन रहें थे कि, तभी मीठी ने शौर्य के हाथ में लगी ढ़ेर सारी मिटटी देख कर उसे सजा देने बुलाया और शौर्य उसकी सजा से बचने भागने लगा… मीठी रूलर लिए उसके पीछे भाग रही थी और शौर्य खिलखिलाते हुए आगे भाग रहा था…
उसी समय अनिरुद्ध और दर्श सामने से चले आ रहे थे…
शौर्य खिलखिलाते हुआ भागा और सामने से आ रहे अनिरुद्ध से टकरा गया…. ! अनिरुद्ध की सफेद कमीज पर शौर्य की दोनों हाथों की मिट्टी का छाप बन गया… !
अनिरुद्ध ने हंसते हुए उसे गोद में उठा लिया……
और शौर्य के बदले अपने दोनों कान पकड़कर मीठी से माफी मांगने लगा… मीठी ने एक नजर घूर कर शौर्य को देखा और रूलर से धीमे से उसकी कमर पर वार करके वापस अपनी शैतान मंडली में शामिल हो गई…
” थैंक यू अंकल.. ? आपका नाम क्या हैं.. ? आप कौन हो.. ?”
“मेरा नाम अनिरुद्ध हैं.. और मैं आपका दोस्त हूँ.. !”
“लेकिन आप तो बहुत बले (बड़े ) हो.. ! मेले दोस कैसे हो सकते हो.. ?”
“नहीं बेटा.. मैं छोटा ही हूँ.. आपके पापा के सामने तो बहुत छोटा हूँ.. बस ज़रा लम्बा ज्यादा हो गया हूँ.. !”
मुस्कुराते हुए अनिरुद्ध ने जवाब दिया और उसी समय बाँसुरी वहाँ चली आयी… गुलाबी शिफॉन में उसका रंग जैसे घुल मिल जा रहा था… सम्मोहित सा खड़ा वासुकी उसे देखता रह गया…
उसने हँसते हुए आकर शौर्य को वासुकी के हाथ से ले लिया..
वासुकी कि कांपती हथेलियों में बाँसुरी कि उँगलियाँ ज़रा सी छू गई और वो पिघल कर रह गया….
उसे पहले भी मालूम था कि बाँसुरी शादीशुदा हैं.. लेकिब फिर भी दिल में एक आस थी कि शायद उसे ऐसा लगा हो और हो सकता है बांसुरी की शादी ना हुई हो ! दूसरी बात उसे यह भी लग रही थी कि, हो सकता है बांसुरी अपने पति से अलग रहती हो…
प्रेमी ह्रदय अगर किसी को पाना चाहता है, तो वह मन ही मन उससे जुड़ी ढेर सारी कल्पनाएं करके उसे अपने संसार में लाने के लिए सौ तरह के बहाने सोचने लगता है ! और जहां संभावनाएं ना हो वहां भी संभावनाओं को प्रकट कर लेता है..!
इसी तरह की ढेर सारी संभावनाओं के बीच उसका प्रेम कुलांचे भर रहा था कि, तभी उसे राजा अजातशत्रु के दर्शन हो गए, और इसके बाद उसकी सारी संभावनाएं एक साथ कांच के गिलास सी टूट कर चकनाचूर हो गई…
राजा और बांसुरी को एक साथ देखने के बाद वासुकी समझ चुका था कि, उसके प्रेम का अब इस दुनिया में कोई अस्तित्व नहीं है! वह खुद दिल से इसी प्रयास में था कि बांसुरी को अपने दिल दिमाग से निकाल कर पूरी तरह बाहर कर दें, लेकिन वह जितना ही बांसुरी को भूलने की कोशिश करता वह उतनी ही ज्यादा मजबूती से उसके अंदर समाती जा रही थी…
उसे पता था कि उसके इस एकतरफा प्रेम का कोई परिणाम नहीं निकलना था और अब वो जान चुका था कि उसके इस प्रेम कि नियति उसे जीवन भर का अकेलापन ही देने वाली थी….
लेकिन भगवान की लिखी उसकी किस्मत को भी क्या उसका अकेलापन मंजूर था…?
बांसुरी के शौर्य को लेते ही वो पल भर के लिए भी बाँसुरी के पास खड़ा नहीं रहा और तुरंत आगे बढ़कर रूपा और बाकी लोगों की तरफ चला गया ! दर्श ने बांसुरी को मुस्कुराकर नमस्ते किया और वह भी अनिरुद्ध के पीछे चला गया…
शाम गहराने के साथ ही उनकी महफिल भी रंगीन होने लगी थी…
सारे लोग एक साथ बैठे बातों में लगे हुए थे, आसपास मौजूद सहायक सभी की प्लेटों में कुछ ना कुछ खाने की चीजें परोसे जा रहे थे…
राजशाही की दावत थी तो खाने के साथ-साथ पीने का भी उम्दा प्रबंध था.. एक से बढ़कर एक महंगी शरबा लोगों के सामने परोसी जा रही थी ! अनिरुद्ध के सामने जब एक सहायक ने महंगी वेलमोर की बोतल से उसके लिए गिलास भरकर उसके सामने परोसा तो अनिरुद्ध ने पूरी विनम्रता से उसे मना कर दिया..
” क्या बात है वासुकी साहब आप ड्रिंक नहीं करते..?”
जय के इस सवाल पर वासुकी मुस्कुरा उठा..
” नहीं !! बस एक यही काम छोड़कर दुनिया के बाकी सारे गलत काम करता हूं..!”
” यह भी बढ़िया है! वैसे आदमी आप बड़े इंटरेस्टिंग हैं..!”
” यह आप सब का बड़प्पन है कि, आप हम जैसे साधारण लोगों को भी इतना मान सम्मान दे रहे हैं ! वरना मुझे तो यहां आने से पहले यही लगा था कि मैं इस रियासत के राजा के पीए तक ही पहुंच पाउंगा | उसके आगे पहुंचने की तो मैंने सोची भी नहीं थी | लेकिन आप सबके दिए इस मान सम्मान के लिए मैं वाकई आप सभी का शुक्रगुजार हूं..!”
” इसके लिए आप शुक्रगुजार मत होइए, बल्कि अगर आप हमारा आभार व्यक्त करना ही चाहते हैं, तो एक अच्छा सा गाना सुना दीजिए..!
भले ही हमारा राज परिवार है लेकिन जब कभी हम परिवार के गिने-चुने लोग साथ होते हैं, तब हम अपनी राजशाही को भूलकर गाने बजाने अंताक्षरी खेलने, हौज़ी खेलने जैसे मनोरंजक कामों में लग जाते हैं.. |
उस वक्त हम बिल्कुल किसी साधारण संयुक्त परिवार की तरह ही व्यवहार करते हैं..| और आपको एक मजे की बात बताये हम सब में सबसे बेहतरीन राजा अजातशत्रु ही गाते हैं…
और इनकी हुकुम बांसुरी..!”
रूपा की बात सुनकर अनिरुद्ध हंसते हुए नीचे देखने लगा! उसका मन तो बार-बार कर रहा था कि वह बांसुरी की तरफ देखे, लेकिन अपने मन को संयत करें वो इधर-उधर की बातें सुनने और कहने में अपने आप को व्यस्त रखे हुए था…!
वह लोग अभी अपनी बातों में लगे थे कि समर हाथ में किसी फाइल को पकड़े वहां चला आया..
और उसके आते ही बांसुरी ने उसे पकड़कर राजा साहब के पास बैठा दिया…
” अब आज के दिन आप अपनी मंत्रीगिरी थोड़ी देर के लिए भूल जाइए समर सा ! आज आपको भी हमारे इस गाने बजाने के कार्यक्रम में शामिल होना पड़ेगा.. मैं बस अभी आई..!”
बांसुरी वहां से उठकर अपना फोन लिए उन लोगों से थोड़ी दूर चली गई और किसी से फोन पर बात करने लगी…
इसके कुछ देर बाद ही वहां पिया हाथ में एक बड़ा सा गिटार थामे चली आई.. पिया को वहां देखते ही समर चौंक गया.. उसके ठीक बगल में प्रेम बैठा था | समर ने प्रेम की तरफ देखा और प्रेम ने ‘मुझे कुछ नहीं पता’ वाले हाव-भाव दर्शाते हुए कंधे उचका दिए..
प्रेम से लग कर ही निरमा बैठी थी, वह समर की तरफ थोड़ा झुक कर उसे बताने लगी…
” आपकी डॉक्टर साहिबा को बुलाने का प्लान बांसुरी और मेरा था..! राजा साहब की गिटार के तार सही करवाने थे! अब आप कहेंगे कि पुरानी गिटार के तार क्यों सही करवाए.? नई क्यों न खरीद ली.. तो उसका कारण यह है कि, यह गिटार राजा साहब की सबसे खास और पसंदीदा गिटार है! जिसे वह कभी छोड़ना नहीं चाहते ! तो बस मैंने और बांसुरी ने उस गिटार को उसी दुकान में बनवाने के लिए भेजा जो दुकान पिया के अस्पताल के ठीक बाजू में थी..
आज सुबह ही बांसुरी ने पिया को फोन करके उस गिटार को लेकर शाम को इस महफिल में आने की गुजारिश कर दी थी..
अब रानी साहिबा का हुकुम टालने की तो आपकी डॉक्टर साहिबा में भी हिम्मत नहीं थी ! बस इसीलिए वो गिटार थामे यहाँ चली आयी, अब प्लीज आप उसे रूठने मत देना..!”
” आप तो ऐसे कह रही हैं, जैसे सारी गलती मेरी ही है | एक बार उससे भी तो पूछ कर देखिए कि बात क्या है..!”
” अब बात जो भी हो, आज शाम बात खुलकर रहेगी और बांसुरी और मैं महीने भर के अंदर अंदर आप दोनों की शादी करवा कर रहेंगे.. !”
समर ने मुस्कुराकर एक गहरी सी सांस ली और फिर सर को धीरे से झुका कर निरमा को थैंक यू बोल दिया…
पिया वहां पहुंचते ही सबके अभिवादन में लग गई… सबको नमस्कार करते हुए उसकी नजर समर पर जैसे ही पड़ी वह चौंक कर अपनी जगह ठिठक गई और बांसुरी ने उसे खींच कर अपने पास बैठा लिया…
” रूपा भाभी आज का कार्यक्रम कौन शुरू करने वाला है..?
बांसुरी के इस सवाल पर रूपा मुस्कुराते हुए गिटार उठाकर राजा के पास ले चली, और उसके हाथ में थमा कर उसने वही रखा माईक उठा लिया…
” जैसा कि आप सभी जानते हैं कि, राजा साहब ने गिटार बजाना पहले किन्ही कारणों से छोड़ दिया था ! लेकिन अभी फिलहाल कुछ सालों से वह गिटार वापस बजाने लगे हैं | और इसलिए हम सबका उन से अनुरोध है कि हमें एक कोई प्यारा सा गीत सुना दें…!
” भाभी साहब ! शुरुआत आपको युवराज भाई सा से करनी चाहिए ऐसा आपको नहीं लगता..!”
” इनके गाने सारा सारा दिन सुन सुन कर हम थक गए हैं इसलिए आप से ही शुरुआत होगी… !”
” तो ऐसा कीजिए शुरुआत आप कर दीजिए, आपकी भी बोली और आवाज बहुत मीठी है..!”
” हमें बनाओ मत कुमार! हम जानते हैं कि हम कितना बुरा गाते हैं | अब तुम बिना भाव खाए चुपचाप गाना शुरू कर दो..!”
अनिरुद्ध और दर्श अचरज से उस परिवार के सदस्यों की बातचीत देख रहे थे… बिल्कुल किसी सामान्य सा आम परिवार लग रहा था उनका, जिसमें देवर भाभी आपस में हंसी ठिठोली कर रहे हैं… पूरा परिवार साथ बैठा एक दूसरे को परोसते हुए खा रहा हैं… एक दूसरे से हालचाल ले रहा हैं.. !
दर्श ने अनिरुद्ध की तरफ झुक कर उसके कान में धीरे से कुछ कहा…
” अनिर!! तूने जो सोच रखा है.. क्या अब भी वह पूरा करना चाहता है..? भाई एक बार और सोच ले..?”
” सोच लिया है दर्श.. ! मैंने सब सोच लिया है जो पहले से सोच रखा था अब उसमें कोई फेरबदल नहीं हो सकता..!”
” लेकिन इस सब में किसी का बहुत नुकसान हो जाएगा..!”
दर्श की नजर वहीं खेलते शौर्य पर चली गई और जाने क्यों उसका मन कसैला सा हो गया…
उसी वक्त राजा अजातशत्रु की गहरी सी आवाज वहाँ गूंज उठी…
” भाभी साहब!! मैं अच्छे से जानता हूं, आप पहले मुझे चढ़ा कर मुझसे गाने सुनती हैं और बाद में मुझे छेड़ने लगती हैं कि मैं बहुत बेशर्म पति हूं और अपनी ही पत्नी के लिए प्रेम प्रदर्शन का कोई मौका नहीं छोड़ता..!”
” अब ये तो सौ प्रतिशत सच हैं कुमार ! बाकी अब ये सब छोड़ो, अभी बिना भाव खाए आप सबसे पहले एक अच्छा सा गाना सुना कर इस महफिल की शुरुआत तो कीजिए…!
देखिये समर प्रेम सारे लोग बैठकर रास्ता देख रहे हैं कि कब उन्हें मौका मिले अपने दिल की भड़ास निकालने का…!
और हम अच्छे से जानते हैं कि प्रेम कौन सा गाना गाने को तैयार बैठे हैं…!”
निरमा के चेहरे पर यह बात सुनकर हंसी खेल गई और वह तुरंत रूपा भाभी से पूछने लगी..
” भाभी साहब बताइए ना यह कौन सा गाना गाएंगे..?”
” डोंट टेल मी निरमा, तुम्हें वाकई नहीं पता कि प्रेम कौन सा गाना गाएंगे ..?”
निरमा ने मुस्कुराकर ना में सिर हिला दिया.. रूपा भाभी माइक लेकर कुछ तो भी गाने लगी..-
मुझे मेरी बीवी से बचाओ, अकड़ती हैं बिगड़ती हैं!
हमेशा मुझसे लड़ती हैं! मुझे मेरी बीवी से बचाओ….
जो दिल हो प्यार करने का, तो सौ नखरे दिखती हैं
गले लिपटना अगर चाहूँ, तो सुसरी टाल जाती हैं
ना मेरी बात सुनती हैं ना, मेरे पास आती हैं….
मुझे मेरी बीवी से बचाओ…
निरमा ने बनावटी गुस्से से प्रेम को देखा और प्रेम को जोर से हंसी आ गई…
” आप भी भाभी साहेब ! यह आपकी और आपके देवर के बीच की बात थी अब आपने उनकी मैडम के सामने कह दिया है अब आज तो प्रेम की खैर नहीं..!”
प्रेम वैसे भी स्वभाव से ही शर्मीला था, वो तो चुप बैठा रहा लेकिन समर ज़रूर उसके बदले बोल गया और समर की बात के बाद निरमा प्रेम को देख बनावटी गुस्से से उसे ताना मारने लगी…
” अच्छा!! तो इस तरह मेरी इमेज खराब की गई है, सबके सामने! सब यहीं सोचते हैं कि मैं वाकई बहुत रूलर और सनकी हूं, और आपको कूट पीट के रखती हूं..!”
निरमा की बात सुनकर समर जोर से हंसने लगा..
” अच्छी बात है ना भाभी, इसीलिए तो यह अब तक कितना सही शरीफ बना हुआ है वरना…!”
” वरना क्या…? क्या कहना क्या चाहते हो वरना..?”
अबकी बार जय समर से उलझ पड़ा और समर और जय हंसते हुए प्रेम को छेड़ते रहे ….
” लो भई, इसी बहाने हम ने ही शुरुआत कर दी.. भले ही प्रेम साहब के मन का गाया हो लेकिन गाया तो हमने ही! तो अब हमारे प्यारे देवर साहब आप से गुजारिश है कि अब तो कुछ गा दीजिए.. अपनी हुकुम के लिए ही गा लीजिये.. !”
राजा अजातशत्रु ने मुस्कुराकर माइक अपने हाथ में थाम लिया…
” जैसा कि आप लोग जानते हैं कि, मैं जो भी गाने जा रहा हूं वह मेरी हुकुम के लिए ही है..उन्ही के लिए गाता था, गाता हूँ और गाता रहूँगा… !”
“अच्छा ! ये बात हैं ! और जब हम नहीं रहेंगे तब.. ?”
बाँसुरी ने मजाक मे ही कहा लेकिन राजा के चेहरे का रंग कुछ पलों के लिए बुझ सा गया…
“वो पल कभी आएगा ही नहीं.. अगर तुम नहीं रहीं तो मै कहाँ रह जाऊंगा… ?”
एक गहरी नजर बांसुरी पर डाल कर राजा ने गाना शुरू किया… बांसुरी मुस्कुराते हुए उसे ही देख रही थी…
“तुम बिन जाऊँ कहाँ, के दुनिया में आके
कुछ न फिर चाहा कभी, तुमको चाहके,
तुम बिन …
रह भी सकोगे तुम कैसे, हो के मुझसे जुदा,
ढह जाएंगी दीवारें, सुन के मेरी सदा
आना ही होगा तुम्हें मेरे लिये साथी मेरे,
सूनी राह के …..”
क्रमशः
aparna….
