जीवनसाथी- 2/11

जीवनसाथी 2- भाग 11
   

नेहा अनिरुद्ध को छोड़ने को तैयार नहीं थी और अनिरुद्ध खड़े-खड़े यही सोच रहा था कि किस तरीके से इस लड़की से पीछा छुड़ाया जाए आखिर उसने नेहा से दो टूक शब्दों में कह दिया….

” मुझे इतनी देर तक जागने की आदत नहीं है, इसलिये अब मैं इजाजत चाहता हूं..!”

” क्या वाकई आप मेरी इजाजत चाहते हैं ? या सिर्फ दिखावे के लिए कह रहे हैं..!” नेहा की ऑंखें चमकने लगी

अनिरुद्ध को ऐसा अंदेशा नहीं था कि लड़की इस तरीके से उसकी बात पकड़ लेगी, क्योंकि उसने तो बस कहने भर को कह दिया था और यह सिर्फ एक औपचारिकता ही थी और उसे पूरा अनुमान था कि इस बात को सुनकर वह लड़की उसे जाने को हां कह देगी लेकिन उस लड़की ने तो उसकी बात ही पकड़ ली थी….

आखिर अनिरुद्ध ने हथियार डाल दिए..

” क्या चाहती हैं आप..?”

” बस थोड़ा सा वक्त आपका!
   और कुछ नहीं… अगर आपको सही लगे तो यही पास में मेरा फ्लैट है आप मेरे साथ चल सकते हैं..?”

अनिरुद्ध का दिल किसी हाल में गवाही नहीं दे रहा था लेकिन जाने क्या सोचकर वो उस लड़की के साथ चल पड़ा…

” मैं अपनी गाड़ी निकाल कर ले आता हूं..!”

हां में सिर हिला कर अपनी एक बाजू पर दूसरे बाजू को समेटे वो वहां खड़े होकर उसका इंतजार करती रही ..

इस तरह कभी किसी लड़की के साथ जाने के लिए उसने दर्श को अकेले नहीं छोड़ा था, इसलिए उसने तुरंत उसको फोन करके उस लड़की के बारे में बताना शुरू कर दिया…
    दर्श अपनी हंसी दबाए चुपचाप अनिरुद्ध की बात सुनता रहा और आखिर में अपने मन की बात उसके सामने रख दी…

” अनिऱ मैंने आज तक कभी तुझे किसी भी काम से रोका नहीं है, आज भी नहीं रोकूंगा..
   जा अच्छा सा क्वालिटी टाइम स्पेंड कर.. मैं घर पर तेरा इंतजार नहीं करूंगा..!”

      लाख रोकने पर भी दर्श की खिलखिलाहट की आवाज अनिरुद्ध के कानों पर भी पड़ गई और शर्म से उसके कान लाल हो गये…
       वो ऐसा कुछ थोड़ी चाहता है..? ऐसा कुछ तो उसने बांसुरी से भी नहीं चाहा ? पता नहीं यह दर्श का बच्चा क्या कुछ गोलमाल अपने दिमाग में लिए बैठा है..!
सोचते सोचते अनिरुद्ध ने अपनी गाड़ी उस लड़की के किनारे ले जाकर खड़ी कर दी, वह मुस्कुराकर अनिरुद्ध के ठीक बगल वाली सीट पर बैठ गयी !
    यह पहली बार था जब अनिरुद्ध की बाजू वाली सीट पर कोई लड़की बैठी थी, अनिरुद्ध ने गाड़ी उस लड़की की बताई हुई दिशा में आगे भगा दी कुछ देर में  ही वो लोग नेहा के फ्लैट के सामने खड़े थे…
    दोनों एक साथ फ्लैट में दाखिल हो गये, हालांकि अनिरुद्ध को बहुत संकोच हो रहा था, लेकिन पता नहीं उसके दिमाग में ऐसा क्या चल रहा था जो वह चुपचाप उस लड़की की कई सारी बातों को मानता चला जा रहा था |
      वह लड़की उसे अपने लिविंग एरिया में बैठाकर रसोई में जाने के लिए मुड़ गई, जैसे ही वो मुड़कर आगे बढ़ी उसे पीछे से देखते हुए अनिरुद्ध का दिल धक से रह गया….
    तो यह कारण था जो उस जैसा बिगड़ैल और घमंडी गर्म दिमाग वाला लड़का इस लड़की की उंगलियों की कठपुतली बन कर रह गया था…  लड़की पीछे से बिल्कुल बांसुरी जैसी लग रही थी…
         बस उसके गोल गोल घुमावदार बालों के छल्लो को अगर किसी गर्म इस्त्री  से दबा कर सीधा स्ट्रेट कर दिया जाये तो उसके खुले रेशमी बाल बाँसुरी के बालों की याद दिला जाते..
   अनिरुद्ध अपलक उस लड़की को देख रहा था, उसी पल उसे लगा जैसे बांसुरी ही उसके सामने खड़ी है |  मतलब इस लड़की के बाल ही ऐसे थे जो बांसुरी जैसे नहीं थे वरना पीछे से वह बिल्कुल बांसुरी लग रही थी….
           तो यह बात थी जो अनिरुद्ध उसकी बातों में खिंचा यहां तक चला आया था…
     अनिरुद्ध झटके से अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ….
    अब उसके लिए खुद के जज्बातों पर काबू पाना बेहद मुश्किल था… 
       वो एक झटके में उस लड़की के पास पहुंच गया और पीछे से ही उसने उसे अपनी बाहों में खींचकर भर लिया ! उसके कंधे पर अपना चेहरा रखकर उसके कानों के पास अपना मुहँ ले जाकर उसने उससे पूछ लिया…

” तुम्हें दर्श ने मेरे पास भेजा है ना..?”

नेहा चौक गई, लेकिन उसने अपने चेहरे पर यह भाव नहीं आने दिया कि उसकी चोरी पकड़ी गई है |  वह चुपचाप अनिरुद्ध की बाहों पर अपनी बाहें सरकाने लगी….
    दर्श ने आख़िर उसे यही सब करने के लिए तो कहा था.. हां सीधे तौर पर दर्श ने भी कुछ ज्यादा नहीं बताया था लेकिन वह भी लड़की थी, वह समझती थी कि अगर एक लड़के का मन बहलाना है तो उसे क्या करना होगा….?
    वह अपनी कमर के चारों ओर फैले अनिरुद्ध की बाहों के घेरे पर अपनी उंगलियां धीरे-धीरे सरका रही थी कि तभी अनिरुद्ध ने उसे कसकर अपनी तरफ घुमा लिया….
    अपने दिमाग में बांसुरी की छवि याद करता अनिरुद्ध नेहा के चेहरे को अपनी बाहों में थाम कर उस पर झुकने जा रहा था कि नेहा ने अपनी बंद रखी आंखें खोल दी…
     वह अपनी मदहोशी से भरी आंखों से अनिरुद्ध की आंखों में देखने लगी और अनिरुद्ध की आंखों का रंग बदलने लगा….
      कुछ देर पहले तक जहां मदहोशी से भरे रंगीन डोरे तैर रहे थे, अब अचानक से गुस्सा नजर आने लगा था ! उसने एक झटके से नेहा को खुद से दूर किया और इतनी जोर से धक्का दिया कि वह पास ही रखें सोफे पर गिर पड़ी….
    अनिरुद्ध गुस्से में मुड़कर बाहर निकलने लगा कि नेहा ने पीछे से उसे अपनी बाहों में पकड़ कर रोक लिया…

” प्लीज रुक जाओ अनिरुद्ध..!”

” नहीं रुक सकता, अब तो किसी हाल में भी नहीं..!”

” अच्छा सुनो !!…
….     तुम्हारे दोस्त दर्श ने ही मुझे फोन करके तुमसे मिलने को कहा था..!”

अनिरुद्ध ने आंखें बंद कर ली ! एक गहरी सांस छोड़ने के बाद उसने अपने चारों ओर लिपटा नेहा की बाहों का घेरा खुद से दूर कर दिया….

अनिरुद्ध का गुस्सा सातवें आसमान पर था, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें..?  उसका यह गुस्सा यह नाराजगी दर्श या नेहा के ऊपर नहीं बल्कि उसके खुद के ऊपर थी कि आखिर क्यों उसने अपनी बाहों में किसी दूसरी लड़की को लिया…?
   आज तक किसी लड़की की हिम्मत नहीं हुई थी, जो अनिरुद्ध के कंधे पर हाथ रख सके, उसके चेहरे के करीब आने की, उसे अपनी बाहों में लेने की आज तक किसी लड़की ने ज़ुर्रत नहीं की थी !
         क्योंकि इसके पीछे कहीं ना कहीं अनिरुद्ध का कठोर चरित्र भी था! उसने खुद आज तक आगे बढ़ कर किसी लड़की को अपने इतने करीब आने ही नहीं दिया था ! लेकिन आज उसकी खुद की बेवकूफी के कारण नेहा इस कदर उस पर हावी होती जा रही थी….
    सिर्फ बांसुरी की एक झलक मिलने के कारण वह नेहा को क्यों इतना छूट देता जा रहा था…?
    अगर बांसुरी की एक झलक देखकर वह नेहा के इतने करीब आ गया तो कहीं बांसुरी सच में उसके सामने आ जाए तो उसका क्या होगा..?
   उसे खुद पर काबू रखना होगा, यूँ बांसुरी के नाम पर शताब्दी से होड़ लेती अपनी धड़कनों को उसे अपनी  हद में रखना ही होगा….!
     ऐसा कैसे हो सकता है…?
           ये आख़िर उसकी जिंदगी थी और अपनी ही ज़िंदगी अब वो उस लड़की की मर्जी से जी रहा था.. !  बांसुरी ने उसके रात दिन का चैन तमाम कर रखा है…

    गुस्से में अनिरुद्ध के दिमाग की नसें फटने लगी और उसने वही डाइनिंग टेबल के ऊपर रखी सारी क्रोकरी को अपने दोनों हाथों से एक तरफ गिरा दिया |  उसके इस रूप को देखकर नेहा चौक कर एक तरफ अपने मुंह पर दोनों हाथ रखे खड़ी रह गई…
  दर्श ने उसे अनिरुद्ध के गुस्से के बारे में तो कुछ भी नहीं बताया था.. |
      वो किन लोगों के चक्कर में फंस गयी थी..? दर्श ने उसे सिर्फ अनिरुद्ध से दोस्ती बढ़ाने के लिए कहा था, ये और बात थी की अनिरुद्ध को देखने के बाद नेहा खुद दो कदम आगे बढ़ गयी थी…. |

  नेहा को लगा अगर इस वक़्त उसने अनिरुद्ध को नहीं रोका तो फिर क़भी उसे देख भी नहीं पायेगी..| वो एक बार फिर उसके सामने जाकर उसका रास्ता रोक कर खड़ी हो गयी….

“प्लीज़ तुम मुझे ऐसे छोड़ कर नहीं जा सकते.. !”

अनिरुद्ध का गुस्से के मारे कुछ कहने का मन नहीं था| उसने नेहा की तरफ से मुहँ फेर कर दूसरी तरफ गरदन मोड़ी और एक गहरी साँस ले ली….

नेहा ने उसकी तरफ पानी का गिलास बढ़ा दिया.. नेहा के बढे हुए हाथ को झटक कर अनिरुद्ध दरवाजे की तरफ बढ़ गया…..

” मुझसे दूर रहो.. मैंने पहले ही कहा था मुझमे ऐसा कुछ भी नहीं जो तुम्हें पसंद आये उल्टा मेरी संगत में तुम मुझसे नफरत करने लगोगी… !”

“मंजूर है !!  पर अपनी संगत से दूर मत कीजिये.. !
   मै मानती हूँ कि दर्श के कहने पर मै यहाँ आई थी, लेकिन आप पहली ही नज़र में मुझे अच्छे लगने लगे हैं, कम से कम हम दोस्त तो बन ही सकते है..! “

बिना उसकी बात का जवाब दिए अनिरुद्ध जाने लगा

“कम से कम हाँ तो बोल दीजिये.. प्लीज़ अनिरुद्ध !”

उसकी इतनी मिन्नतों के बाद भी अनिरुद्ध बिना कोई जवाब दिए वहाँ से निकल गया……
  अनिरुद्ध के घर पहुँचने के पहले ही नेहा ने दर्श को फ़ोन पर सब बता दिया था…

अनिरुद्ध घर पहुँच कर बाहर वाले सोफे पर ही पसर गया… अपने सीने पर दोनों हाथ बांधे वो छत की तरफ मुहँ किये ऑंखें बंद किये पड़ा था की दर्श वहीँ चला आया…

” आखिर तू चाहता क्या है अनिऱ, मैंने सोचा तेरी कुछ मदद कर दूँ | और इसीलिए उस लड़की को तेरे पास भेजा था कि, शायद उससे मिलकर तेरे मन की जलन कुछ कम हो सके लेकिन तूने उल्टा उसे ही सुना दिया और उसके  घर से निकल आया….
इस दुनिया इस समाज में रहना है, तो यहां के नियम कायदों को भी मानना पड़ेगा | तू एक शादीशुदा औरत के पीछे अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं कर सकता वह लड़की तुझे कभी नहीं मिल सकती…|”

” दर्श तुझे ऐसा क्यों लगता है कि मुझे……
मुझे फिजिकली उसकी चाह नहीं है……  बिलकुल भी नहीं….
    मैं नहीं चाहता कि वह…. मेरे साथ…, मेरे कमरे में, मेरे बिस्तर पर…. “

  इतने खूंखार दिल लड़के से भी कहा नहीं जा रहा था, बहुत अटक अटक कर उसने अपनी बात कही…

   “उसका साथ चाहता हूं बस ! यह चाहता हूं कि वह मेरे सामने बनी रहे ! मेरे घर पर ना भी रहे तो भी चलेगा, बस ऐसी किसी जगह वो मौजूद हो जहां मै  सुबह शाम उसे देख सकूं…
     मन भर कर, अपनी आत्मा के तृप्त होने तक देख सकूँ !  बस और इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए… !
     मै उसे बिना देखे मर जाऊंगा दर्श ! कुछ ऐसा कर दे कि वह मेरे सामने आ जाए..!”

    दर्श अपने माथे पर हाथ मार कर रह गया !  उसकी समझ से बाहर था कि वह अनिरुद्ध को कैसे समझाएं..? वह दोनों अभी बात कर रहे थे कि तभी काका उन लोगों के पास चले आए…..
  
   ”  दर्श यह दिल्ली से तुम्हारे लिए फोन आया है..!”

    दर्श एक रसूखदार परिवार का लड़का था और उसके पिता की जान पहचान बहुत ऊंची थी.. आज भले ही उसके पिताजी जीवित नहीं थे, लेकिन उनका नाम अब भी संसद भवन तक में बहुत इज्जत के साथ लिया जाता था |  दर्श ने उसी पहचान का फायदा उठाया था और संसद भवन से बात करके डायरेक्ट बांसुरी के तबादले की चर्चा चला दी थी…|
  हालांकि जिसके द्वारा यह तबादला करवा रहा था उससे उसने साफ तौर पर कह दिया था कि तबादला किसने और क्यों करवाया है यह चर्चा कहीं पर भी, किसी को भी मालूम नहीं होनी चाहिए…

प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले एक सामान्य सी बात थी और इसलिए ऊपर से आदेश आने के बाद बाँसुरी का तबादला कर दिया गया था….

फोन में बात करके रखने के बाद दर्श अनिरुद्ध के पास चला आया…

” अनिर तेरे ज़िंदा रहने का ठिकाना करवा दिया है ! तेरा काम हो गया है ! उस लड़की बांसुरी का तबादला हो गया है और अगर उसने तबादला रुकवाने कि अर्ज़ी नहीं डाली तो जल्दी ही वो हमारे इसी शहर में आ जाएगी …!”

खुशी से अनिरुद्ध ने उठकर दर्श  को गले से लगा लिया था!
      और इस बात के बाद वह एक बार फिर अपनी सामान्य दिनचर्या में डूब गया था! अपने काम धंधे में ध्यान देता हुआ अनिरुद्ध दर्श के साथ दून वाली हवेली के लिए भी चर्चा कर रहा था….
    दून वाली हवेली के लिए दर्श की दो तीन बार समर से बात हो चुकी थी लेकिन समर ने हर बार उन दोनों को इसके लिए टाल दिया था और अब अनिरुद्ध खुद दून वाली हवेली में जाकर वहां के मालिक से बात करना चाहता था…
     समऱ से हुई बातचीत में भी समर ने दर्श को किसी तरह की भी कोई हिंट नहीं दी थी कि दून की हवेली का मालिक खुद एक राज्य का मुख्यमंत्री है और एक रियासत का राजा भी…!
देखा जाए तो उस हवेली के मालिक के बारे में ना तो दर्श को ज्यादा कुछ मालूम था और ना ही अनिरुद्ध को और इसीलिए उन दोनों ने उस हवेली के मालिक से मिलने का मन बना लिया था |  और दून के रास्ते पर निकल चले थे, उसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए अचानक अनिरुद्ध को बांसुरी की बेहद याद आने लगी थी और उसने बांसुरी के नंबर पर फोन लगा दिया था…
     हालांकि अनिरुद्ध के साथ चलता दर्श हर कदम पर अनिरुद्ध की गलतियों के आगे चाणक्य सा अपना कूटनीतिज्ञ दिमाग चला कर उसकी ढाल बना खड़ा रहता था ! उनके रास्ते पर आगे बढ़ने पर जब अनिरुद्ध ने बांसुरी को लेकर अपने मन की बात दर्श  से कही,तब दर्श ने तुरंत एक लोकल मार्केट से उसके लिए एक लोकल फोन खरीद कर उसे दे दिया था…. जिसे उपयोग में लाने के बाद अनिरुद्ध ने वहीं बैठे एक बच्चे के हवाले कर दिया था..!

और इसके बाद वह दोनों दून के रास्ते पर आगे बढ़ गए थे |  वह दोनों आगे बढ़ ही रहे थे कि, कुछ देर बाद समर का फोन दर्श के मोबाइल पर आने लगा.

” ये क्यों फोन कर रहा है इस वक्त..?”

दर्श के माथे पर बल पड़ गए, उन्हें देखकर अनिरुद्ध ने उसके फोन पर एक झांक लगाई और उससे पूछ बैठा
” है कौन ये जिसका फोन आ रहा है..?

” दर्श ने फोन को अनिरुद्ध की ओर घुमा दिया उस नंबर को दर्श ने ‘हवेली’ नाम से सेव कर रखा था… असल में आज तक इन दोनों का दून जाना एक ही बार हुआ था, जब वह लोग उस होटल की डील को फाइनल करके आए थे |  उस होटल को खरीदने के बाद ही वहां मौजूद किसी आदमी से उसने उस हवेली के बारे में सुना था, और होटल की सबसे ऊपरी मंजिल की छत पर खड़े होकर उसने उस हवेली को देखा था और तब से अनिरुद्ध के दिल दिमाग में हवेली बस गई थी…
समय की कमी के कारण वहां मौजूद लोगों से उस हवेली के मालिक के बारे में कुछ भी पूछ नहीं पाया और उसे निकलना पड़ गया लेकिन दर्श ने वहां से निकलते निकलते हवेली से संबंधित किसी का नंबर देने की इच्छा जाहिर की तो वहां मौजूद एक आदमी ने समर का नंबर लिख कर दे दिया, उसका नाम पता बताएं बगैर..
   और दर्श ने समर के नंबर को हवेली के नाम से सेव करके रख लिया..
   इस घटना के बाद दर्श ने दो एक मर्तबा समर को फोन करके हवेली के बारे में जानने की कोशिश की लेकिन समर में हर बार दो टूक शब्दों में यह कह कर की ‘हुकुम हवेली नहीं बेचना चाहते’ फोन रख दिया था!  इससे ज्यादा ना समर ने कुछ कहा और न दर्श कुछ सुन पाया.. इसीलिए अब उन दोनों लड़कों ने दून  जाकर हवेली के मालिक से सीधे मिलने का मन बना लिया था…
   
    दर्श ने अनिरुद्ध को फोन दिखाने के बाद फोन उठा लिया दूसरी तरफ समर था |  उसने महल का पता ठिकाना बताकर दर्श और अनिरुद्ध को महल में आमंत्रित कर लिया…

   दर्श ने जैसे ही यह बात बताई अनिरुद्ध ने जोर से गाड़ी रोक दी और और आश्चर्य से दर्श की तरफ देखने लगा…

   उन दोनों का राजा की रियासत के इलाके से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था इसीलिए उन दोनों ने आज तक राजा अजातशत्रु के बारे में कुछ भी नहीं सुना था |  वह दोनों वाकई नहीं जानते थे कि राजा अजातशत्रु नाम का कोई राजा उस रियासत में वाकई राजपाट करता है |  और उस रियासत के साथ-साथ उस पूरे प्रदेश का मुख्यमंत्री भी बन चुका है | यह सारी बातें ना जानते हुए, वह दोनों उस महल की तरफ जाने के लिए तैयार हो गए |  अनिरुद्ध को लगा कि उसका पिछली बार का समर से किया सौदा शायद इस सो कॉल्ड राजा जी को पसंद आ गया था और उन्होंने हवेली बेचने का मन बना लिया था बस इसीलिए उन्होंने उन दोनों को बुला लिया था…

मन ही मन अपनी जीत पर खुश होता अनिरुद्ध दर्श  के साथ दून के आधे रास्ते से वापस लौट गया था |  अब उसे राजा अजातशत्रु से मिलने उनके महल जो जाना था…

*****

   नाइट शिफ्ट करके वापस लौटी पिया नहा धोकर बिना कुछ खाए पिए ही सो गई थी!  एक गहरी नींद पूरी करने के बाद दोपहर में अलार्म से उसकी नींद खुली और अपने लिए कॉफी बना कर वो अपनी एक मोटी सी किताब खोले पढ़ने बैठ गई थी…
    उसी वक्त उसके फोन पर भावेश का कॉल आने लगा…

” सुनो पिया !  मम्मी आई हुई है, तुमसे एक बार मिलना चाहती है..?”

पिया के पास ना बोलने का कोई भी वाजिब कारण ही मौजूद नहीं था..! उसने भावेश से मिलने की जगह और वक्त पूछा और मिलने आने के लिए सहमति दे दी!

    गहरे सलेटी रंग की जींस के ऊपर काली टॉप पहनकर वह तैयार हो गई.. आईने के सामने खड़ी वह अपने बालों को बनाते हुए जाने क्या सोच रही थी कि तभी उसके मन को एक  खटका सा हुआ और उसने जाकर टॉप उतार कर उसके बदले एक सफेद रंग का बंद गले का कुर्ता पहन लिया…
    उस कुर्ते के ऊपर एक रंग बिरंगी राजस्थानी हाफ  जैकेट डालने के बाद उसने ढेर सारे रंगों की छोटे-छोटे पत्थरों से बनी एक माला भी गले में डाल ली…
     अपनी आंखों में गहरे काजल की रेखा आंजने के बाद उसने खुद को ही आईने में देखा और मुस्कुरा उठी… क़भी क़भी आँखों में काजल डाल लेना भी लड़कियों कि ख़ुशी का कारण बन जाता है…
           जाने आज ऐसी क्या बात थी कि उसका इतना तैयार होने का मन कर रहा था!

अपने मोबाइल को अपने पर्स में डाल कर उसने अपना बैग अपनी बाहों में तिरछा टांग लिया और अपनी स्कूटी उठाए भावेश से मिलने निकल गई…
    भावेश,उसकी मां उसके पिता और भावेश की   छोटी बहन पहले से ही रेस्टोरेंट में पहुंचे उसका इंतजार कर रहे थे..

पिया ने वहां पहुंचते ही सबको सादर अभिवादन किया और भावेश की मां के सामने की कुर्सी खींचकर बैठ गयी |  भावेश की माँ ने पिया को देखते ही मुस्कुरा कर उसकी तरफ कॉफी बढ़ा दी…

” और बेटा डॉक्टरी के अलावा क्या-क्या कर लेती हो..?”

पिया के मन में आया जोर से कह दे… और कुछ नहीं आता आंटी जी! लेकिन वह चुपचाप बैठी रही..

” अच्छा यह बताओ कि खाना बना लेती हो ? क्या-क्या बना लेती हो खाने में ? वैसे हमारे भावेश को खाने पीने का बहुत शौक है..?”

बस यही वो जानलेवा सवाल था जिससे शादी के लिए तैयार हर लड़की बिदकने लगती थी… शादी के लिए तैयार लड़कों की माता जी लोगों का यह सबसे खास पसंदीदा सवाल था ..
     पिया को लगने लगा था कि देश के हर कोने में छिपे बैठें कुंवारो कि ममियों का यूनिवर्सल प्रश्न था.. ‘खाना बनाना आता है.. !’
  उसका दिल किया चीख कर कह दे.. नहीं आता आंटी, बिलकुल नहीं आता.. जब आप एक ऐसी लड़की को अपने बेटे के लिए देख रही हैं, जिसे घर से बाहर नौकरी के लिए जाना ही होगा फिर ये फ़िज़ूल सवाल की यहाँ क्या ज़रूरत है.. ?आपको तो अपने बेटे को इस बात के लिए ट्रेनिंग देनी चाहिए कि खाना कैसे बनाते है .. ? और अगर उसे भी खाना बनाना न आता हो तो उसे ये सीखा कर रखिये कि हफ्ते में कम से कम दो दिन डिनर में उसे मैगी और चाय के साथ ख़ुशी ख़ुशी समझौता करना होगा….. ‘

   इतना सब दिमाग में चलने पर भी वो बिना कोई पत्थर जवाब दिए रह गयी.. बस धीरे से हाँ में गर्दन हिला दी और फिर आगे कहने लगी..
 
” खाने पीने लायक थोड़ा बहुत खाना बना लेती हूँ आंटी, लेकिन कुकिंग का ऐसा कोई खास ज्यादा शौक नहीं है मुझे..?”

” कोई शौक नहीं है लेकिन भावेश को तो खाने पीने का बहुत शौक है बेटा..!”

”  मैं पूरी कोशिश करुँगी कि मैं सीख जाऊं!”
  इस छोटे से वाक्य को बोलने के लिए भी पिया को अपना पूरा ज़ोर लगाना पड़ा था, क्योंकि वो जानती थी ये बात झूठ है और वो ऐसा कुछ नहीं करने वाली है..

  वो लोग अभी बातचीत में लगे थे की समर की माँ दो और औरतों के साथ उसी रेस्टोरेंट में चली आयीं.. उन्हें आते देख पिया के मन में उनके लिए एक अजब सी हिलोर उठने लगी..
   उसकी नज़र उन पर से हट नहीं रही थी और उसका जी कर रहा था की जाकर सबके सामने ही उनके पैर छू ले…
   अपने मन को समझाती पिया खुद पर आश्चर्य भी कर रही थी कि आख़िर क्योँ वो समर कि माँ कि तरफ इतना आकृष्ट हो रही थी |  आख़िर ये भी तो समर से उसके अलगाव का एक कारण थी | लेकिन आज उन्हें देख कर ऐसे उसके दिल में ऐसी मुहब्बत कुलबुला रही थी जैसे सामने समर कि माँ नहीं समर खुद खड़ा हो …

  हाय ये प्यार ! इंसान से जो ना करवा ले…

    पिया से रहा नहीं गया और अपनी सारी हिम्मत समेटे वो उनसे मिलने के लिए उठ खड़ी हुई… वो धीमे क़दमों से उन तक पहुँच गयी.. समर कि माँ ने पिया को देखा और पिया ने उन्हें… पिया कि आँखों में जहाँ याचना थी वहीँ समर कि माँ कि आँखों में भर्तस्ना …
   उन्हें अपने बेटे कि काबिलियत पर पूरा विश्वास था और वो अब तक इस सगाई के टूटने के लिए पिया को माफ़ नहीं कर पायी थी…
   पिया ने उनकी आँखों के तेज़ से घबरा कर मुहँ फेरा और झट से झुक कर उनके पांव छु लिए…

“ठीक है, ठीक है, खुश रहो.. !”

  बस इतना कह कर वो चुप हो गयीं और पिया इसी बात कि तसल्ली करती अपनी जगह पर खड़ी हो गयी…
   लेकिन जैसी ही वो सीधे खड़ी हुई उसके ठीक सामने समर खड़ा था..
   एकाएक समर को सामने देख वो अपना संतुलन खो कर लड़खड़ा गयी और उसने उसकी बांह पकड़ कर उसे संभाल लिया…..

रेस्टोरेंट में उसी समय ट्रैक बदला और गाना बजने लगा..

बावरा मन राह ताके तरसे रे ,नैना भी मल्हार बन के बरसे रे आधे से अधूरे से, बिन तेरे हम हुए,
फीका लगे है ,मुझको सारा जहां……

मैं कागज़ की कश्ती, तू बारिश का पानी
ऐसा है तुझे अब ये रिश्ता मेरा
तू है तो मैं हूँ, तू आए तो बह लूँ
आधी है दुनिया मेरी तेरे बिना
जी उठी सौ बार तुझपे मर के रे..
नैना भी मल्हार…

क्रमशः

aparna….

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