
जीवनसाथी – 3
भाग -1
वो एक बड़ा सा महलनुमा बंगला था..
चारों तरफ एक से बढ़ कर एक देसी विदेशी फूलों से सजा बगीचा, बगीचे के एक तरफ छोटा सा कृत्रिम तालाब, जिसमे कमल खिले थे और एक्का दुक्का बतखें तैर रहीं थी… बगीचे के फूलों फलो से लदे पेड़ों पर पंछी चहक महक रहें थे..
कुल मिला कर किसी सुंदर प्राकृतिक दृश्य का मज़ा आ रहा था उस परिसर को देख कर…
घर के बनाने में भी प्राकृतिक पत्थरों का ज्यादा उपयोग किया गया था…
मुख्य दरवाज़ा लगभग दस फुट ऊँचा था.. जहाँ दरवाज़े से टक्कर लेता मजबूत प्रहरी खड़ा था..
अंदर के आलीशान बैठक में उतना ही आलीशान सोफा सज़ा था और उस हॉल के एक तरफ कांच की दीवारों के पार एक ऑफ़िस बना था..।
हॉल से होकर ऊपर की तरफ गोलाई में सीढ़ियां जाती थी…
ऊपर लकड़ी का बना फ्लोर था जिसमे गलियारे के दोनों पार कमरे बने थे..।
उस गलियारे के अंत में एक बड़ा सा कमरा था.. ऊपर बने कमरों में शायद वो सबसे बड़ा और हवादार था। बावजूद उस कमरे की सारी खिड़कियां बंद थीं.. रोशनदान से सूरज की रौशनी आ रहीं थी… पूरे कमरे में एक तरफ दीवार से लग कर एक अस्पतालों में उपयोग में लाया जाने वाला बेड रखा था…
और उस बेड पर एक लगभग चालीस बयालीस साल की औरत पड़ी थी..
यूँ लग रहा था जैसे वो गहरी नींद में डूबी पड़ी हो..
उसके शरीर में किसी तरह की कोई हलचल नहीं थी…
पहली नज़र देखने पर यही लगता था कि वो ज़िंदा नहीं है। पर बहुत ध्यान से देखने पर मालूम चलता था कि उसकी साँसे बहुत धीमी गति से चल रहीं थी…
यानी वो ज़िंदा थी….
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समय अपने दो नहीं दसों पैरों से चलता है….
ये और बात है कि किसी के लिए ज़िंदगी इतनी कठिन हो जाती है की एक एक पल साल बराबर हो जाता है, और किसी का साल पलक झपकते गुज़र जाता है!
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हे निभाते हुए जीने में जिंदगी ख्वाबों सी मालूम होती है.. यथार्थ के धरातल की कंकरीली ज़मीन भी नहीं चुभती, अगर हाथ उस रिश्ते ने थाम रखा हो जो आपसे बेइंतिहा प्यार करता हो..
जैसे राजा अजातशत्रु और बाँसुरी का रिश्ता !
मुहब्बत और आपसी विश्वास से बंधा एक ऐसा रिश्ता जहाँ कभी एक दूसरे के लिए सम्मान और प्रेम में कमी नहीं आई..।
दोनों की ज़िंदगी में उथल पुथल नहीं थी, ऐसा नहीं था बावजूद दोनों ने एक दूजे का हाथ थामे हर कठिनाई को पार किया और अब तक कर रहें हैं…!
लेकिन कुछ रिश्ते कभी दिल से नहीं जुड़ पाते बावजूद उन्हें भी ज़िन्दगी भर लेकर चलना ही पड़ता है..!
कुछ रिश्ते प्यार से पलते हैं, तो कुछ को ढोना पड़ता है… लेकिन लोग निभा ही ले जाते हैं… जैसे रेखा और विराज का रिश्ता..।
ये जुड़ा ही एक स्वार्थ की नींव पर था ! ना रेखा को विराज पसंद था और ना विराज को रेखा लेकिन सत्ता की दावेदारी, रियासत का लालच इन दोनों के रिश्ते को जोड़ गया…
और एक बार जुड़ा ये रिश्ता फिर कैसे भी कर के ये दोनों भी निभा ही गए…
कुछ निस्वार्थ जुड़े रिश्ते भी होते हैं जिनमे जुड़ते समय प्यार ना भी रहा हो तो, बाद में उस रिश्ते के भीतर एहसास और प्रेम का वो अमृत बहने लगना लगता है जो, इस रिश्ते को स्वर्गीय बना देता है जैसे प्रेम और निरमा का रिश्ता..
इस रिश्ते की नींव जो भी रही हो दोनों ने इस रिश्ते को बखूबी निभाया…!
जब दोनों में जो कमज़ोर पड़ा दूसरा उसका सहारा बन खड़ा हो गया…
और हँसते मुस्कुराते कभी आंसुओं की बारीश में भीगते इनकी ज़िन्दगी के पल बीतते चले गए..
लेकिन जो भी हो वक्त गुज़र जाता है… कभी अच्छी कभी मीठी कभी तीखी या फीकी यादों के साथ वो चला जाता है और रह जाती है एल्बम में कैद तस्वीरें !!
बाँसुरी अपनी शादी का एल्बम खोले बैठी थी…
आज बड़े दिनों बाद निरमा और वो एक साथ बैठे थे..
निरमा का महल आना अक्सर ही हुआ करता था, लेकिन महल में आकर अकेले बाँसुरी से मिल कर जाना नहीं हो पाता था..
महल में निरमा की सबसे दोस्ती थी, इसलिए वो जब आती रेखा, जया और रूपा से भी मिलती ही थी..
इसीलिए जब कभी दोनों सखियों को अकेले मिलना होता बाँसुरी निरमा के पास चली जाया करती थी..
आज महल की बाकी औरतें पहाड़ी वाले मंदिर गयीं थी, किसी कारण वश बाँसुरी नहीं जा पायी और निरमा के आने पर दोनों सखियाँ बाँसुरी के कमरे में बैठी पुरानी अल्बम देख रहीं थी..
बाँसुरी की शादी की एक एक रस्म की तस्वीर नज़र आ रहीं थी..
एक तस्वीर में बाँसुरी की माँ ने उसे पीछे से आकर पकड़ा हुआ था, दोनों माँ बेटी मुस्कुरा रहीं थी….
तस्वीर बहुत प्यारी थी, बाँसुरी अपनी माँ सी लग रहीं थी.. उस तस्वीर पर हाथ फेरते हुए बाँसुरी की ऑंख भर आई..
अब बाँसुरी की माँ नहीं थी..।
उसने और राजा ने उसके पिता से कई बार अपने साथ आकर रहने को कहा लेकिन वो राज़ी नहीं हुए..
बाँसुरी के पिता के घर के पास ही उनके बड़े भाई का पूरा परिवार रहता था, इसलिए सुबह शाम वो अपने भाई से मिलते जुलते रहते थे..।
घर के एक बड़े हिस्से को उन्होंने छोटे बच्चो के स्कूल के लिए दे दिया था और बाकी के हिस्से में खुद रहते थे..।
बाँसुरी एक एक कर पन्ने पलटती जा रहीं थी…
राजपूतानी शादी की ढ़ेर सारी रस्मो की ढेरों तस्वीरें थी.. किसी तस्वीर में राजमाता ढोलियों को कलश के नेग दे रहीं थी तो, किसी तस्वीर में सासरे से आई धनिया पुदीना को देख ताई हाथ मटकाते हुए उसका कारण पूछ रहीं, और अपनी रंगीन बँधेजी पाग संभालते हुए समर सा उस धनिये पुदीने को भेजने का कारण बता कर मुस्कुरा रहे।
किसी तस्वीर में दुल्हन के लिए भेजा सिंगार बड़े से बरामदे में सजा था और समर और प्रेम मुस्कुरा रहे थे तो, किसी में राजपूती बारात की भव्य तस्वीर में हाथी घोड़े भी नज़र आ रहें थे..
एक तस्वीर में राजा जोधपुरी कुर्ती में सर पर साफा बांधे कमर में तलवार लटकाये हौले से सर झुकाये अपनी होने वाली सास से माथे पर तिलक लगवा रहा था..
ये तस्वीर बहुत सुंदर थी..
बाँसुरी ने अपनी हथेली उस तस्वीर पर से गोल घूमा कर उँगलियाँ अपनी कनपटी पर रख फोड़ ली..
“ओहो.. अब भी नज़र उतारी जा रहीं है अपने साहब की ?”
“हाँ फिर ? वो हैं ही ऐसे.. मैं तो अब भी रोज़ नियम से उनके काम पर निकलने से पहले उनके कान के पीछे काजल का छोटा सा टीका ज़रूर लगाती हूँ.. !”
“क्या बात है ? और राजा भैया मान जाते हैं ?”
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“कैसे नहीं मानेंगे भला ? “
“मानना पड़ेगा राजा भैया को, अपनी बाँसुरी के कहे पर चलते है पूरी तरह से !”
“हाँ जैसे प्रेम भैया तो पड़ोसन के कहने पर चलते है..? है ना ? प्रेम भैया का तो ये हाल है की तुझसे पूछे बिना साँस भी ना लें.. सुबह आँख खोल कर पूछते होंगे नीरू मैं उठ जाऊं.. जब मैडम बोलती होंगी, हाँ उठ जाओ तब भैया आँख खोलते होंगे ?”
“ऐसे भी कोई सीधे नहीं है आपके प्रेम भैया ! वो दुनिया भर को ऐसा ही लगता है,कि घर पर निरमा की चलती होगी, निरमा हिटलर है पर ऐसा कुछ है नही… बस ये दोनों बाप बेटी ने बदनाम कर रखा है मुझे ! जब कभी ये नाराज़ हो गए तो मनाना मुश्किल हो जाता है, और ज़िद्दी तो इतने हद दर्ज़े के हैं की क्या कहूं..?
मामा जी के जाने के बाद मामी अकेली रह गयी थी, तब मैंने कितना कहा उनसे मेरे पास आ जाओ…लेकिन उनकी वहीं बात कि जिस घर में शादी होकर आई थी उसे कैसे छोड़ दूँ..?
जहाँ डोली में बैठ कर आई हूँ, वहीं से अर्थी उठेगी, वहीं दकियानूसी विचार उनके..
अरे वहाँ कौन आपकी देखभाल करेगा? मैं समझा समझा कर हार गयी.. मामी ने दो नौकर रख लिए थे..! एक तो आकर झाड़ू पोंछा कर जाती थी और दूसरी लड़की सारा दिन रहा करती थी.. ।
इन्होने भी समझाया मामी जी यहाँ आ जाइये लेकिन मामी मानने को तैयार नहीं थी, आखिर जो सारा दिन रहती थी, वो एक दिन भाग गयी …
उसके बाद भी मामी यहाँ आने को राज़ी नहीं हो रहीं थी..।
मेरे ख़ूब मनाने पर कहने लगी दामाद के घर जाकर रहना अच्छा लगता है क्या ? जमाई जी क्या सोचेंगे, इससे अच्छा अकेली पड़ी रहूँ, ज़िंदगी के गिने चुने दिन बचे है, राम राम कर के काट लूंगी..।
मैं मामी से स्पीकर पर बात कर रही थी, ये भी वहीं थे, सब सुन लिया..
अगले दिन काम से जा रहा हूँ बोल कर निकले और तीसरे दिन मामी को साथ लेकर लौटे..।
इनकी ज़िद का क्या बोलूं बंसी.. ? मामी भी डर जाती है इनसे..
मैं बस फ़िज़ूल में बदनाम हो रखी हूँ, बाकी चलती इन्हीं दोनों बाप बेटी की है…।
वैसे तो इन्हें गुस्सा कम ही आता है पर अगर आ गया तो समझो महादेव की तीसरी ऑंख खुल गयी… !
वैसे बंसी आज बड़े दिनों बाद हम दोनों को साथ बैठने मिला है ना..
कितने साल बीत गए… जब हम दोनों पहली बार मुंबई में मिले थे.. याद है ?”
“कैसे याद नहीं होगा नीरू? मेरा फर्स्ट डे था, मुझे ज्वाइन करने के बाद सबसे मिलवाने माला बाहर लेकर गयी थी, और सबसे पहले हम तेरी क्यूबिकल में ही खड़े हुए थे.. वहाँ खड़े खड़े ही माला ने सबसे परिचय करवा दिया था..
हम दोनों के क्यूबिकल आसपास ही तो थे.. कितना मज़ा आता था आर्टिकल ड्राफ्ट करने में..।
याद है, मैं शुरू में जो भी लिखती थी, तुझसे एक बार ज़रूर चेक करवाती थी.. !”
“हाँ.. और वो याद है विलासिनी मैम… यार क्या दबंग लेडी थी ! स्टाफ के मेल मेंबर्स को भी क्या गज़ब चमका के रखती थी ना… !”
“हाँ और सबसे ज्यादा चमकाती थी माला को… कितना डपटती थी यार उसे, तभी तो शादी के बाद नीदरलैंड्स जो भागी तो वापस लौटी ही नहीं !”
“हाँ डांटती तो भास्कर को भी थी, लेकिन बंदा सुन लेता था…!”
“क्या सुन लेता था.. बाहर आकर तो हम पर पूरी भड़ास निकाल लेता था.. !”
“हम्म… जो भी था लेकिन अदिति के आने के बाद काफ़ी सुधर गया यार.. सही कहते हैं जोड़ियाँ ऊपर से बन कर आती है!
अदिति के बारे में उस वक्त सुन कर बहुत बुरा लगा था, लेकिन अब वो दोनों खुश हैं ये अच्छी बात है.. !
तुझे पता है ना अदिति की प्रेग्नेंसी के वक्त उसका एक्सीडेंट हो गया था और सांतवे महीने में बेबी ख़त्म हो गया था। उसके बाद अदिति के शरीर में बढ़ने वाली कॉम्प्लीकेशंस देख कर डॉक्टर ने उसे दूसरा बेबी प्लान करने से मना कर दिया था…
और फिर बाद में दोनों ने एक बच्चा गोद ले लिया.. !”
“हाँ मैं मिली हूँ भास्कर और अदिति की बेटी से.. बहुत प्यारी है !” बाँसुरी ने कहा
“कितना वक्त बीत गया ना… पीछे पलट कर देखो तो लगता है, कितना लम्बा सफर तय कर आये है और सोचने बैठो तो लगता है अभी अभी की ही बात है.. मुझे तो अब भी ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात थी, जब मुझे भयानक दर्द उठने शुरू हुए थे और प्रेम जी मुझे अस्पताल ले गए थे…
मुझे याद है जब स्ट्रेचर पर मुझे अंदर लेकर जा रहे थे, मैंने प्रेम जी का हाथ कस कर पकड़ लिया था..
वो जगह जहाँ जाकर मुझे आराम महसूस होना था घबराहट सी हो रही थी…!
और उस वक्त सिर्फ एक ही चेहरा था जिसे देख कर राहत मिल रहीं थी और वो चेहरा था इनका..।
ये भी मेरे साथ कितना डरे हुए थे, लेकिन फिर भी मुझे ढांढस बंधा रहें थे…।
और फिर कुछ घंटो की तकलीफ के बाद जब मीठी मेरी गोद में आई ऐसा लगा जैसे संसार की हर ख़ुशी मेरी मुट्ठी में चली आई है..
सारी तकलीफे, सारे कष्ट जैसे कहीं उड़ कर चले गए.. उस वक्त ऐसा लगा संसार में मुझसा सुखी कोई नहीं…।
एक माँ बनना क्या होता है, उस वक्त समझ आया.. जब अपनी जान अपने हिस्से को मैंने अपने हाथों में थामा..
और उससे भी बढ़ कर स्वर्गीय क्षण था जब इन्होने मीठी को गोद में लिया..।
इनकी ऑंख से आँसू टपक पड़े…
प्यार से मीठी को चूमने के बाद ये मेरे पास आये और पहली बार मेरे माथे को चूम कर मुझे थैंक्स बोला..।
बता नहीं सकती बंसी, वो पल मेरी ज़िन्दगी का सबसे सुखद पल था…
अब आज देखो,देखते ही देखते मीठी पूरे चौबीस साल की हो गयी है….
समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहा है.. !”
“हाँ और नहीं तो क्या… अगले हफ्ते शौर्य का इक्कीसवाँ जन्मदिन होगा… मुझे भी लगता है जैसे अभी अभी तो शौर्य मेरी गोद में आया था और अब मुझे गोद में उठा कर गोल चक्कर घूमा देता है !”
“बच्चे कब बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता.. है ना ?”
“लेकिन हम रॉयल लेडिस हमारे बच्चों के बड़े हो जाने पर भी बूढ़ी नहीं हुई… !”
निरमा और बाँसुरी की बातों की बीच रेखा भी वहाँ आ पहुंची..
उसने हाथ बढ़ा कर प्लेट में अपने साथ लाया प्रसाद निरमा और बाँसुरी की तरफ बढ़ा दिया…
“अरे तो अभी बूढ़ी होने की उम्र भी तो नहीं हुई… पैंतालीस छियालीस की उम्र में कौन बूढ़ा होता है भला ?”
निरमा के सवाल पर हामी भरती रेखा भी वहाँ बैठ गयी.. सामने रखें चाय के प्याले को उसने उठा लिया…
“वैसे हमारे राजा साहब और रानी बाँसुरी आज भी किसी नवेले जोड़े से कम नहीं लगते.. !”
“दोनों जिम में पसीना भी साथ साथ बहाते हैं.. !”
निरमा ने वापस बाँसुरी को छेड़ दिया…
“साहब मेरे बिना जाते ही नहीं.. कहते हैं इसी बहाने थोड़ा और साथ रह लेंगे.. !”
“हे भगवान… मन नहीं भरता तुम दोनों का क्या एक दूजे से.. ! हर जगह साथ ही जाना आना.. वो तो अच्छा है संसद भवन नहीं ले जाते तुम्हें !”
“हाँ जैसे तुम दोनों तो बड़े अलग अलग रह लेते हो… प्रेम भैया भी तो अब इनके केबिनेट में मंत्री हो गए हैं.. पर्यटन विभाग क्या देख रहें हैं जब देखो तब निरमा मैडम अपने पतिदेव के साथ क्वालिटी टाइम मनाने छुट्टी पर निकल जाती हैं.. !”
“जी नहीं.. मैं भी यूनिवर्सिटी के काम से ही जाती हूँ.. !”
“हाँ हाँ सब पता है !”
तीनों सखियों की बातों के बीच मीठी का फ़ोन आ गया..
क्रमशः
aparna…..

Agar mein sahi hu toh starting mein jis lady ke bare mein bataya kya woh Neha hai kya. Time kaise nikal jata hai sach mein pata nahi chalta kab bacche bade ho jate hai. Very nice part
Aj kafi purana part aya js ka..fir bi padh li accha lga