मायानगरी -27

मायानगरी-27

   कॉफ़ी  के आते तक शेखर और पंखुड़ी आमने सामने चुप चाप बैठे थे ..दोनों को ही समझ में नहीं आ रहा था की क्या बात करे .आखिर पंखुड़ी ने ही बात शुरू की …

“और, कितने बच्चे हैं आपके ?”

शेखर उस वक़्त बोतल खोल कर पानी पी रहा था  उसके गले में घूंट अटक सी गयी ….किसी तरह खुद को सम्भाल कर उसने बोलना शुरू किया ..

“एक  !”

“बेटी?” पंखुड़ी ने वापस पूछ लिया..

“हम्म..!”

” नाम क्या है?”

शेखर के सिर  के उपर से पानी बहता चला जा रहा था पर इसके लिए जिम्मेदार वो खुद था … उसने धीमे से गले का  थूक निगल कर खुद का सूखता गला तर किया और धीमे से जवाब देने लगा …

” पाखी।।!”

” पाखी ? ओह ये तो गज़ब का इत्तेफाक हो गया , मेरा भी घर पर बुलाने का नाम पाखी ही है… पंखुड़ी जितना बड़ा नाम घर पर कौन लेता हैं? आपकी वाइफ भी आपकी ही तरह आईएएस  हैं?”

” नहीं वो हाऊस वाइफ है …”

” ओह मगर क्यों ? मेरा कहने का मतलब है कि जब आप जॉब वाले हैं इतना पढ़े-लिखे हैं, फिर वाइफ हाऊस वाइफ क्यों ? माइंड मत कीजिएगा, बस मन  में एक सवाल जगा तो पूछ लिया ?”

” पढ़ाई तो उसने भी बहुत की हैं लेकिन हर पढ़ाई के पीछे का कारण अर्निंग ही हो ये जरूरी तो नहीं .. और आपको एक मजे की बात बताता हूं ..वो घर पर रह कर भी मुझसे कहीं ज्यादा कमा लेती है ..

” अच्छा घर से ही अपना काम करती हैं ?”

” हाँ वो घर पर रह कर मेरा पूरा घर सम्भाल रही है , बच्चों  की पढ़ाई लिखाई देखना , उनका स्कूल-कालेज उनकी फीस उनका सब कुछ देखना , घर की देखभाल करना , रिश्तेदारों से निभाना , पड़ोसियों से मिल जुल कर रहना , मेरी देखभाल करना.. इतना सब कुछ वो करती है तभी तो मैं शांत मन से अपना काम देख पाता हूं .. तो मेरा मेंटल पीस मेरी खुशी ये सब तो वो ही कमा रही है जो मेरी अर्निंग से कहीं ज्यादा है !”

” वाह !! आप ने तो बड़ी फिलासफ़ी वाली बात बोल दी.. काश ऐसा दुनिया का हर हसबैंड ये बात समझता तो लाइफ कितनी असान हो जाती! आपकी वाइफ बहुत लकी हैं.. एक दूसरे के लिए परफेक्ट जोड़े मिलना कितना कठिन हो जाता है कभी कभी। …
    अब मुझे ही लीजिए मम्मी को जो मेरे लिए ठीक लगता है मुझे सही नहीं लगता और …

“और जो आपको सही लगता है वो मम्मी को नहीं लगता होगा?”

“नहीं , मुझे तो अब तक कोई सही लगा ही नहीं .. कभी कभी सोचती हूं मेरी उम्मीदे  कुछ ज्यादा ही तो नहीं है कहीं।
       ..और मजे की बात ये है कि मैंने आज तक कोई रिश्ता मना नहीं किया …. मालूम नहीं कैसे लेकिन जो  मुझे नहीं जमते वो लड़के खुद ही घर जाकर मना कर देते हैं…”

“हाँ  क्योंकि लड़के समझ जाते हैं कि आप उनसे कहीं ज्यादा स्मार्ट है और फिर कांप्लेक्स में की आप रिजेक्ट करें उसके पहले ही मना कर के अपनी नाक बचाने की कोशिश कर लेते हैं….”

पंखुड़ी धीमे से मुस्करा उठी …

” ऐसे तो मैंने कभी सोचा ही नहीं … आप वाकई बहुत सुलझे हुए हैं… आपकी वाइफ बहुत लकी हैं…”

अब तक दोनों की कॉफ़ी आ चुकी थी , कॉफ़ी  पीते  हुए शेखर मुस्कराता  रहा.. और सामने बैठी पंखुड़ी मन ही मन सोचती रही … “लगता है भगवान ने भी सारे अच्छे लड़कों की शादी पहले ही कर दी है “

“अरे हाँ,  मुझे एक बात याद आयी.. अभी आपके आने से कुछ देर पहले ही आपके नाम से हमारे पास एक फोन आया था , और वो कह रहा था कि नेता जी के बेटे का ठीक से ध्यान रखना .. क्या आपने ही किया था या किसी से करवाया था क्या ?”

“नहीं बल्कि मुझे तो मालूम भी नहीं की नेता जी का कोई भांजा भतीजा यहाँ  तुम्हारे अस्पतालों में भर्ती है ।”

” मुझे लगा ही था कि ये कोई फेक कॉल है..!

शेखर सोच में डूबा था कि वो असल में जिस काम से आया है क्या वो उसे पंखुड़ी से पूछ लेना चाहिए कि तभी पंखुड़ी  का फोन बजने लगा ….

“हाँ बोल पिया ? मैं बस कॉफ़ी शॉप पे थी,  ओके आ जाऊँगी, आज शाम को ही ना? ठीक है…”

  शेखर  की सवालिया नजरों को देख पंखुड़ी मुस्करा उठी ….

” मेरी दोस्त का फोन था , पिया का … उसकी शादी है नेक्स्ट  मंथ,  तो वहीं सारी तैयारियाँ  चल रही हैं.। उसकी फैमिली भी दिल्ली रहती है ना … तो इसलिए उसने मुझे मदद करने बुलाया है ..
  आज शाम  5 बजे मुझे उसे शौपिंग के लिए झवेरी गली में मिलना है .. बस वहीं बात हो रही थी ! “

शेखर  मुस्करा कर नीचे देखने लगा…

” चलें वापस .. मेरी कॉफी खत्म हो गई है। “

पंखुड़ी के सवाल पर बिल के पैसे टेबल प़र रख कर शेखर खड़ा हो गया…

“चलिए नेक्स्ट टाईम बिल मैं पे करूंगी , अगर आपको बुरा ना लगे तो ?”

“नहीं मैं क्यों बुरा मानूँगा , आप एक इंडिपेंडेंट गर्ल हैं अपने ख़र्चे उठाना जानती है,  आजकल वैसे भी सही मायनों में लड़का लड़की सभी बराबर हैं ।”

पंखुड़ी मुस्करा कर खड़ी हो गई … दोनों कॉफ़ी शॉप  से बाहर आ गए.. बाहर आने पर  दोनों आगे अपनी अपनी गाड़ियों की ओर बढ़े ही थे कि रोड के एक तरफ़ जमीन पर एक बुजुर्ग सा आदमी ढेर सारी किताबें बिछाये  बैठा था…
   एक से एक नामी साहित्यकार की किताबें जमीन पर फैली पडी थीं.. शेखर और पंखुड़ी दोनों ही रुक गए…

“दादा क्या मूल्य लगा रहें हैं किताबों का ?”

“बेटा किताबें तो अनमोल हैं, बाकी आज का ज़माना मोबाईल का हो गया है , तो लोग अब किताबें नहीं खरीदते, अपने मोबाईल पर ही पढ़ लेते हैं..”

“बात तो आपकी वाजिब है .. पर ये किताबें जल्दी से हर जगह मिलती नहीं, खास कर ये तो मैं बहुत दिनों से ढूँढ रहा था ।”

शेखर ने एक किताब की ओर इशारा किया और पंखुड़ी ने उस किताब को उठा लिया ।

” ‘कगार की आग’ कुछ खास है क्या ये किताब?”

” हाँ बस पढ़ने का दिल था , पर कभी फुर्सत ही नहीं मिली, अब सोच रहा हूँ रात में अकेले पड़े पड़े टीवी देखने से अच्छा है किताब ही पढ़ लूँ ।”

” क्यों आपकी वाइफ मायके गई है क्या?”

“हाँ वो मायके में है अभी! दादा कैसे दी ये किताबें?”

” जो आपके हाथ मे है, साहब वो 200 रुपये की है।”

“बस इतना कम मूल्य ? हमें जीवन का मूल्य सिखाने वाली इन किताबों का बस इतना ही मूल्य रह गया है आज बाजार में …. “

“क्या करेंगे साहब, ज़माना भी तो बदल गया है। अब लोग दुनिया की सच्चाइयों समाज की सच्चाइयों को दिखाने वाली आँख खोलने वाले किताबें पढ़ना नहीं चाहते,  अब सबको सपनीली दुनिया के अजूबे भाते हैं क्या कीजे?”

“दादा आप ये किताबें कहाँ से लेकर आए हैं? मेरा मतलब है क्या यही आपकी रोजी-रोटी है?”

” साहब मैं पहले शहर की पुरानी लाइब्रेरी में लाइब्रेरियन का काम किया करता था.. जिंदगी आराम से कट गयी , कमाई इतनी नहीं थी कि गृहस्थी जमा सकता इसलिए शादी नहीं की. अकेले के लिए ये पैसे बहुत होते थे… फिर साहब मैं बूढ़ा हो गया,  आंखों से दिखना कम हुआ इसके साथ ही लोगों का लाइब्रेरी आकर पढ़ना भी कम होता गया…
    नगर निगम से मिली इमारत थी। निगम के अधिकारियों को जब लगा कि यहां पर लाइब्रेरी अब नहीं चल रही है तब उन्होंने वहां से लाइब्रेरी हटाकर उसे महिला एवं गृह उद्योग वालों को लीज पर दे दी। मेरे सामने उन्होंने हाथ जोड़ दिया कि आपको एक छोटी रकम हर महीने पेंशन के तौर पर जब तक आप जिंदा रहेंगे हम देते रहेंगे। लेकिन साथ ही हमारा एक छोटा सा काम कर दीजिए यह सारी किताबें भी आप अपने साथ ले जाइए हम इनका कोई मूल्य आपसे नहीं लेंगे…
   बस अब ये किताबें मेरी जिम्मेदारी बन गई थी, और मैं उन्हें संभाल कर रखे हुए था लेकिन फिर अचानक इन्हें बेचने की जरूरत आन पडी ..”

” ऐसी कौन सी मजबूरी आ गई जो आपको अपने प्यारी किताबों को बेचना पड़ रहा है।”

” मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता था साहब। बाप बेटा ही थे। मां बच्चे के पैदा होने के समय सही देखभाल ना होने से और घर पर ही जचकी होने से मर गई। उसके बाद से उस बच्चे के बाप ने अपनी बीवी के गम को भुलाने के लिए खुद को नशे में डुबो दिया। बच्चे की दादी गांव से बच्चे की देखभाल के लिए उनके पास आकर रहने लगी। बच्चा चार-पांच साल का था कि दादी भी गुजर गई। अब बच्चा खुद अपनी भी देखभाल करता था और अपने बाप की भी । मैं उनके बाजू वाली खोली में ही रहता हूं , तो अक्सर बच्चे को कुछ पैसे तो कभी कुछ खाने की चीजें दे दिया करता था। बच्चा पढ़ने का बहुत शौकीन रहा, अक्सर दोपहर के समय मेरे घर पर आकर मुझसे पढ़ना सीखा करता था और इसीलिए मेरी और उसकी बहुत गहरी दोस्ती भी हो गई थी!
   बस एक बात मुझे शुरू से खलती थी, कि बच्चा कुछ भी ठीक से खा पी नहीं पाता था। मैं बाहर से अगर कुछ भी लेकर आऊं तो खाते साथी उसे उल्टियां हो जाती थी। वह घर पर ही घर का ही बना बहुत सादा भोजन वह भी बहुत कम मात्रा में खा पाता था।
   अभी पिछले महीने उस बच्चे का बाप भी नहीं रहा। अब वो  बच्चा इस पूरे संसार में अकेला पड़ गया, इसलिए मैंने उसे अपने साथ रख लिया है । जिस दिन से वह मेरे साथ है उसी दिन से मैं उसे देख रहा हूं । बच्चा अपने साथ के बच्चों से बहुत कमजोर है। कुछ खाया पिया उसे पचता नहीं है। उसे एक बार शहर के अस्पताल लेकर गया था, डॉक्टर ने जांच करके कहा कि बच्चे का लीवर कमजोर लग रहा है, और हो सकता है कि उसके इलाज में काफी रुपया लग जाए ।उन्होंने उस समय ढेर सारी जांच बताइ, लेकिन सच कहूं तो उन सारी जांच को करवाने के लिए भी मेरे पास पैसे नहीं थे, बस उसी वक्त दिमाग में आया कि यह अनमोल खजाना जो मैंने इतने प्यार से संजो कर रखा है , मेरे मरने के बाद किस काम आएगा? ज्यादा से ज्यादा मेरे  पड़ोसी मेरा अंतिम संस्कार करते वक्त एक आधा किताब मेरे ऊपर रखकर जला देंगे। जिससे मेरी आत्मा को संतुष्टि मिल जाए, लेकिन बाकी किताबें तो वह उठाकर कबाड़ी को ही बेच देंगे। और कबाड़ी वाला किसी चना जोर गरम या भेल वाले को यह किताबें 10 रुपये के भाव में बेच देगा। और कुछ समय बाद इन अनमोल किताबों के पन्नों में रखी भेल खाकर कोई बच्चा इन्हीं पन्नों से हाथ पोंछ कर उसे रोड पर फेंक जाएगा…
… इससे तो अच्छा है कि इन किताबों को बेचकर मिले पैसों से मैं उस बच्चे का इलाज शुरु करवा सकूं। कम से कम जांच हो जाने से सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए जा तो सकता हूं।”

उस बुजुर्ग की बातें सुनती पंखुड़ी की आंखें भीग गई.. उसने तुरंत अपने पर्स से पैन निकाली और उन बुजुर्ग के सामने बिखरी पड़ी किताबों में से एक किताब उठाकर उसके सबसे पीछे के पन्ने पर अपना नाम और नंबर लिखकर उस बुजुर्ग के हवाले कर दिया…

” दादा मैं डॉक्टर हूं, यहां मायानगरी यूनिवर्सिटी का आपने शायद नाम सुना होगा। वहां के अस्पताल में काम करती हूं।आप कल ही उस बच्चे को लेकर मेरे अस्पताल में आ जाइए। वहाँ  आकर आप मुझे एक बार फोन कर लीजिएगा, अस्पताल में ही आपको फोन मिल जाएगा। मैं खुद उस बच्चे की सारी जांचों को हमारे अस्पताल में निशुल्क करवा दूंगी। और उसके बाद उस बच्चे को जिस भी इलाज की जरूरत है वह पूरी तरह से निशुल्क करवाने की कोशिश करूंगी। “

” यह डॉक्टर साहब ठीक कह रही हैं। आप कल बच्चे को लेकर अस्पताल पहुंचीये , आपका सारा काम वहां पर हो जाएगा। अगर बाहर से किसी इलाज की जरूरत पड़ती है, तो आप एक छोटा सा आवेदन बनाकर मेरे ऑफिस में भेज दीजिएगा। मैं निर्धन कल्याणकारी योजना में आपके एप्लीकेशन लगाकर पास करवा दूंगा । जिससे आप बाहर जाकर भी इलाज करवा सकें और उसके साथ ही कल आप भी अपना पूरा चेक अप इन के अस्पताल में करवा लीजिएगा।  मैं यहां का कलेक्टर हूं, आपको कभी किसी तरह की कोई जरूरत हो आप मुझे भी निसंकोच फोन कर सकते हैं यह रहा मेरा फोन नंबर।”

शेखर ने पंखुड़ी के लिखे नाम और नंबर के नीचे अपना नाम और नंबर भी लिख दिया और उस बुजुर्ग आदमी के हवाले कर दिया। उन दोनों की भलमनसाहत देखकर उन बुजुर्ग व्यक्ति की आंखें छलक उठी,  उन्होंने उन दोनों के सामने अपने हाथ जोड़ लिए….

पंखुड़ी ने शेखर की तरफ देखकर उसकी खरीदी किताब उसके हाथ में रख दी…

” कभी वक्त निकालकर मैं भी जरूर पढ़ लूंगी।”

” आपको जब फुर्सत हो मुझसे यह किताब ले लीजिएगा।”

हां में सर हिला कर और शेखर को बाय का इशारा कर पंखुड़ी ने अपनी स्कूटी निकाली और अस्पताल की ओर मोड़ ली…

शेखर कुछ देर तक उसे जाते देखता रहा फिर अपनी गाड़ी में बैठ कर वह भी अपने ऑफिस की तरफ निकल गया।

*****

  अभिमन्यु और अधीर पूल साइड में बैठे अपनी अपनी जींस को घुटनों तक उठाए पानी में पैर डालें गप्पे मारने में लगे थे कि तभी अधिराज उन दोनों को ढूंढता वहां चला आया…

” अभी खाना पीना नहीं है तुम दोनों को, चलो उधर लंच लग रहा है! और यह लंच कॉमन है!तुम लोगों का भी और हमारा भी एक साथ। तो अब  चलो।”

” क्या बात है अधिराज!! तू एक एक बंदे को जाकर ऐसे बुला रहा है , तुम लोग तो यार फ्रेशर्स को एकदम ही सर पर चढ़ा लेते हो फिर।”

” अबे सालों तुम दोनों दोस्त हो इसलिए तुम लोग को ढूंढता चला आया। फ्रेशर्स तो सारे वही भिनभिना रहे हैं। उनकी हिम्मत है?  कि हम सीनियर्स को छोड़कर इधर-उधर भटके, मटरगश्ती करें?
… वह तुम ही दोनों नमूने हो जो इधर बैठे हुए हो। और फिर जब पार्टी के पैसे दे चुके हो हो तो फिर काहे को खाने से शरमा रहे हो बे?”

” अबे हम लोगों से बढ़कर फोकटिया और कौन होगा? हमारे मायानगरी कॉलोनी के बाहर जो मारवाड़ी शादी घर है ना, वहां की हर शादी का खाना हम लोगों के चखे बिना पास थोड़े ना होता है… खाने पीने में हम नहीं शर्माते समझा? वह तो तुम लोगों का मौका दे रहे हैं तुम्हारी फ्रेशर्स के सामने अपनी इम्प्रेशन जमा लो वरना क्या है कि अगर हम दोनों वहां आ गए ना तो सारी की सारी बंदियाँ कल से इंजीनियरिंग हॉस्टल की तरफ मुंह करके ही सूर्य देवता को जल चढ़ाएंगी”

    अधीर और अभिमन्यु खुद की ही बात पर हंसने लगे और अधिराज उन लोगों को साथ लिए अंदर बढ़ गया…

  अन्दर सब अपनी अपनी खाने की प्लेट लेकर बैठे थे , और वृंदा एक एक कर माईक लेकर सब के सामने जा कर किसी से कोई सवाल पूछ रही थी तो किसी को जोक सुनाने कह रही थी..
   खाने के बीच में चलता ये छोटा सा गेम भी मजेदार लग रहा था…
   अभिमन्यु के प्लेट लेकर आते ही वृंदा उसके सामने माईक लेकर पहुंच गई..

” चलिए अभिमन्यु जी, अब खाने से पहले जरा अपने गले को साफ कर लीजिए और एक गीत सुना दीजिए”

अभिमन्यु ने बड़ी अदा से हाथ में माईक लिया और गाना शुरू कर दिया….

    दिल से मिलेगा जो दिल तो महकने लगोगे
      तुम मेरी बाहों में आ के बहकने लगोगे

      ये होश खो जाएगा, प्यार हो जाएगा
    दिलबर मेरे कब तक मुझे,ऐसे ही तड़पाओगे
         मैं आग दिल में लगा दूँगा वो,
              के पल में पिघल जाओगे
   एक दिन आयेगा, प्यार हो जाएगा… मैं आग..

   अभिमन्यु ने गाते हुए बस एक बार रंगोली की तरफ़ देखा और बाकी समय प्राची के पास खड़े होकर ही पूरा गाना गा लिया…
   उसके गाने के बाद तालियों से पूरा हॉल गूंज गया..

  वृंदा ने माईक प्राची की ओर बढ़ा दिया, और प्राची ने माईक ले जाकर रंगोली के हाथ में थमा दिया….

  रंगोली ने एक नजर अभिमन्यु की ओर देखा और गले को साफ़ कर उसने गाना शुरू कर दिया….

             तुम्हे हो ना हो,
         मुझको तो इतना यकीं है
         मुझे प्यार तुमसे नहीं है, नहीं है ….

   रंगोली ने जैसे ही गाना शुरू किया,  अधीर को जोर की हंसी आ गई और वो पानी पीने के बहाने उठ कर बाहर चला गया,अभिमन्यु ने उसे घूर कर देखा और अपनी प्लेट में देखते हुए गाजर का टुकड़ा उठा कर खाने लगा….

क्रमशः

aparna…

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