
मायानगरी – 15
गाड़ी भागती चली जा रही थी। पुरोहित मैडम इधर उधर के किस्से सुनाने में व्यस्त थीं और झनक पूरी तन्मयता से उनके किस्से सुन रही थी। उसे मालूम था प्रैक्टिकल मार्क्स का भी रिज़ल्ट में बहुत बड़ा योगदान होता है। अगर थिओरी के मार्क्स आधा रिज़ल्ट तय करते हैं तो बाकी का आधा प्रैक्टिकल।
उसे ये भी मालूम था कि अगर कॉलेज का कोई भी एक प्रोफेसर उसके पाले में आ गया तो नम्बर स्कोर करना बहुत आसान हो जाएगा।
वो किसी भी तरीके से पुरोहित मैडम को अपने पाले में कर लेना चाहती थी। वो चाहती थी कि पुरोहित मैडम उससे इस कदर प्रभावित हो जाएं कि फर्स्ट ईयर में उसकी चांदी हो जाये। अगर एक बार उसने फर्स्ट ईयर में पहला स्थान बना लिया तो आगे के साल उसके लिए आसान हो जाएंगे।
पुरोहित मैडम सारे रास्ते उन्हें उनकी पढ़ाई से जुड़ी बातें ही बताती रहीं। पर उनकी बातों से अलग रंगोली का ध्यान पूरी तरह से साथ चलने वाली बाइक पर ही थी। रास्ते में घना अंधेरा था, और अचानक उसे बाइक नज़र आनी बंद हो गयी। वो घबराई सी इधर उधर देख रही थी, की अचानक उसके कांच के पास से बाइक गुजरी और अपनी जुल्फें उड़ाता मुस्कुराता अभिमन्यु उसे नज़र आ गया।
कार में धीमी आवाज़ में एफ़ एम चल रहा था, जिसपे एक रोमांटिक धुन बज रही थी, जो साथ चलते अभिमन्यु को भी सुनाई पड़ रही थी….
आते जाते, हँसते गाते
सोचा था मैंने मन में कई बार
वो पहली नज़र, हल्का सा असर
करता है क्यूँ इस दिल को बेकरार?
रुक के चलना, चलके रुकना
ना जाने तुम्हें है किसका इंतज़ार?
तेरा वो यकीं कहीं मैं तो नहीं
लगता है यही क्यों मुझको बार बार?
यही सच है, शायद मैंने प्यार किया…..
अभिमन्यु ने उसे देख कर एक प्यारी सी मुस्कान दी और “लफ़ंगा” कह कर रंगोली दूसरी ओर देखने लगी।
इसी आगे पीछे में वो लोग यूनिवर्सिटी के अंदर पहुंच गए।
दोनों लड़कियों को उनके हॉस्टल के सामने उतार कर पुरोहित मैडम की गाड़ी प्रोफेसर्स कॉलोनी की तरफ मुड़ गयी। हॉस्टल की तरफ झनक और रंगोली आगे बढ़ने लगी। उनके गेट से आगे बढ़ते ही अभिमन्यु के बिना कहे भी अबीर ने गेट पर गाड़ी खड़ी कर दी….
“अब तू ज़रूर ये बोलेगा, कि बेटा ‘राज’ अगर वो तुझसे प्यार करती है तो एक बार जरूर पलट कर देखेगी। है ना?”
अधीर की इस बात पर अभिमन्यु हँस दिया…
“अबे नही यार! ये वाला फंडा अब पुराना हो गया है। लड़कियों ने भी तो डी डी एल जे देखी है ना। तो वो आजकल नही पलटती। “
“तो मेरे लवगुरु आजकल का क्या साइन है? वो भी बता दीजिए।”
“आजकल का डायलॉग कुछ ऐसा होता है… अभि अगर ये लड़की तुझसे प्यार करती है तो ये ऊपर अपने कमरे में जाकर बालकनी का दरवाज़ा खोल कर किसी बहाने से बाहर ज़रूर आएगी। और किसी बहाने तुझे एक बार देख अंदर चली जायेगी।”
“अति आत्मविश्वासी स्वत: घाती! “अधीर के ऐसा कहने पर अभिमन्यु ने उसे देखा…
“वाह गुरु तुम तो संस्कृत में मुहावरे बोल लेते हो।”
“अबे तेरी कारस्तानियां देख कर अभी अभी खुद बनाया है, समझे?”
उसी समय रंगोली के कमरे की लाइट्स जल गई। और कुछ पांच मिनट बाद ही रंगोली बालकनी का दरवाज़ा खोले प्रकट हो गयी…
अधीर ने हैरत से अभिमन्यु को देखा….
“साले टुच्चे इंसान मतलब तूने प्यार मुहब्बत में ही पी एच डी कर रखी है? साले ये बहुत सीधी सी लड़की है, इसे फंसा के गच्चा मत दे देना … !
“तुझे बड़ी सिम्पथी है रंगा से ! मुझे तो साले शक होता है तुझ पर।”
“अब ये रंगा कौन ? रंगोली अगर रंगा है तो तू बिल्ला है?”
अभिमन्यु ने अदा से सिर को झटका दिया और एक नज़र रंगोली पर डाल कर बाइक अपने हॉस्टल की ओर मोड़ ली…
*****
गौरी की सुबह अपने अलार्म से पहले ही नींद खुल गयी। ये उसकी रोज़ की आदत हो चुकी थी। उसकी दोस्त प्रिया उससे कहा भी करती की वो अलार्म क्यों लगाती है पर गौरी को भी एक आदत सी हो चुकी थी या शायद उसे खुद पर उतना यकीन नही था।
उसने समय देखा, घड़ी सुबह के पांच बजा रही थी। फ्रेश होने के बाद अपना ट्रैक पेंट पहन कर जूते डाल कर वो धड़धड़ाती हुई सीढ़ियां उतर गई…
बाहर गेट पर बैठा चौकीदार ऊँघ रहा था। उसके पास जाकर गौरी ने धीमे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया…
“,भैया !! गार्ड भैया उठो! “
गौरी की आवाज़ सुन गार्ड आदत के अनुसार उठा और मुस्कुराते हुए उसने गेट खोल दिया…
“मुर्गे की बाग से पहले उठ जाती हो बिटिया!”
मुस्कुरा कर गौरी गेट से बाहर यूनिवर्सिटी कैंपस में बने जॉगिंग ट्रैक पर बढ़ गयी। कुछ एक लोग भागते हुए नज़र आ रहे थे।
गौरी ने अपने कानों में हेडफ़ोन लगाए और धीरे धीरे दौड़ने लगी… ज़मीन की तरफ देखती हुई हेडफ़ोन पर चलते हुए गाने को गुनगुनाते वो आगे बढ़ने लगी
जिसे भी देखिए वो अपने आप मे गुम है..
जुबां मिली है, मगर हमजुबाँ नही मिलता।।
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता
कहीं ज़मीं तो कही आसमाँ नही मिलता।
कि उसी वक्त तेज़ शोर करती जिप्सी आकर ठीक गौरी के सामने रुक गयी। जिप्सी में आर्ट्स कॉलेज के पीजी स्टूडेंट्स बैठे थे। गाड़ी वेदांत की थी लेकिन चला उसका एक दोस्त रहा था।
ये सारे लड़के रात भर कहीं से पार्टी कर के नशे में धुत वापस लौट रहे थे। और यही इकलौता ऐसा गैंग था जो मायानगरी के नाम पर कालिख पोतने के लिए काफी था।
वेदांत के पिता नारायण दत्त विधायक थे और उनके विराज से अच्छे सम्बन्ध थे, इसी वजह से उनके बेटे और उसकी टोली अपनी हरकतों के बावजूद यूनिवर्सिटी में अब तक टिकी हुई थी।
गाड़ी के सामने आकर रुकते ही गौरी ने चौंक कर उन सब को एक बार देखा और एक तरफ होकर आगे बढ़ने लगी…
“अरे रुक जाइये डॉक्टर साहब ! ज़रा हम बीमारों का भी इलाज कर दीजिए।”
वेदांत का एक चेला चिल्लाया…तभी दूसरा गाड़ी से कूद कर गौरी के सामने पहुंच गया और उससे उसका हेडफ़ोन मांगने लगा…
“डॉक्टर साहब ज़रा दीजिये न। हम भी सुने आप क्या सुन रहीं है।”
“अनन्त चलो यार वापस ! कहाँ माथा फोड़ रहे हो। “
वेदांत ज़ोर से गरजा पर उसके दोस्त पर कोई असर नही हुआ,उल्टा उसने नशे की हालत में डगमगाते हुए हेडफ़ोन निकाल कर अपने कानों में लगा लिया
तेरे जहाँ मे ऐसा नही के प्यार ना हो
जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नही मिलता!!
कभी किसी को मुकम्मल….
ज़ोर ज़ोर से गाने की पंक्तियों को दोहराता अनन्त हँस हँस के दुहरा हो गया…..
“अरे डॉक्टर साहब को प्यार चाहिए, और तुम लोग खाली मगज मारी कर रहे हो…”
अभी वो और भी कुछ बड़बड़ा रहा था कि वेदांत कूद कर गौरी के सामने आ खड़ा हुआ…
“बड़ा मजा आ रहा है तुमको, अपनी इन्सल्ट करवाने में। अरे चुपचाप भाग क्यों नही जाती यहाँ से। डॉक्टरी पढ़ रही हो इतना समझ नही आ रहा कि लड़के नशे में धुत्त हैं, इनके सामने नही पड़ना ठीक है। “
गौरी अब तक डर से सदमे में थी। वेदांत ने अपने बड़बड़ाते हुए दोस्त के कान से गौरी का हेडफ़ोन निकाल कर गौरी के हाथ में रखा और वापस दहाड़ उठा…
“जाओ डॉक्टर भागो यहाँ से। किसी ने कोई बदतमीजी कर दी तो शिकायत मत करना। “
गौरी ने अपनी आंखों से गिरते ऑंसू पोंछे और तेज़ कदमों से आगे बढ़ गयी।
वो तेज़ी से आगे बढ़ती जा रही थी। उसे अपने पीछे अब भी उन लड़कों की हंसी की आवाज़ सुनाई पड़ रही थी और डर के मारे उसका कलेजा मुहँ को आ रहा था। वो क्यों ऐसी है? क्यों वो ऐसी किसी भयानक परिस्थिति का सामना नही कर पाती और घबरा कर पत्थर के समान बुत बन जाती है।
उसकी जगह कोई और लड़की होती तो अब तक उस लड़के को थप्पड़ मार चुकी होती। इतना नशे में थे वो लोग की उसे हाथ लगाने की हिम्मत कतई नही करते पर वो डरी सहमी सी खड़ी की खड़ी रह गयी।
आखिर कब वो अपने बचपन के सदमे से बाहर निकल पाएगी? क्या उसका काला बचपन उसकी जिंदगी के सारे रंग ऐसे ही धूमिल करता जाएगा।
अपने खयालों में मगन उसे होश ही नही रहा की वो कितना तेज भाग रही थी…
“अरे स्टॉप ! स्टॉप पी टी उषा जी। आज तो आप एकदम मैराथन रनर बन गयी हैं।”
मृत्युंजय की आवाज़ सुनते ही इतनी देर से खुद को रोकने की कोशिश करती गौरी बिखर गई….
उसे यूँ बिलख बिलख कर रोते देख मृत्युंजय घबरा गया। उसने धीमे से गौरी के कंधों पर हाथ रख कर उसे सांत्वना देनी चाही लेकिन गौरी खुद में सिमटी ऑंसू बहाती रही।
मृत्युंजय जानता था कि अवसाद के मरीज़ों के साथ अक्सर ऐसा होता है और ऐसे में उन्हें किन्ही मज़बूत सहारे की ज़रूरत होती है।
मृत्युंजय ने एक बार इधर उधर देखा और फिर भाड़ में गयी दुनिया कह कर गौरी को अपने सीने से लगा लिया।
दोनों वहीं ऐसे ही चुपचाप खड़े रहे। गौरी मृत्युंजय के सीने से लगी रोती रही और वो उसके बालों में हाथ फिराता उसे चुप कराता रहा कि तभी वेदांत की जीप वहाँ से गुजरी। बाकी लड़के तो आपस में हंसी मजाक में लगे थे पर वेदांत ने मृत्युंजय को देखा और उसी वक्त मृत्युंजय की भी नज़र वेदांत पर पड़ गयी।
जय को थम्स अप करता वेदांत मस्ती करता दोस्तों के साथ आगे बढ़ गया।
उन लोगों के वहाँ से निकलते ही जय को सब समझ आ गया…
“गौरी !! वेदांत की गैंग ने तुम्हें परेशान किया है?”
गौरी के कोई जवाब न देने पर उसने कंधों से पकड़ कर गौरी को खुद से अलग किया और उसके चेहरे की ओर देख वापस अपना सवाल दुहरा दिया
” आप जल्दी नही आ सकते थे? मैं अकेली हो गयी थी…” बोलते बोलते गौरी के शब्द जैसे अटक कर रह गए। मृत्युंजय ने उसे देखा वो समझ रहा था कि इस वक्त गौरी को एक भरोसे की ज़रूरत है…
“गौरी !! कल से जब तक मैं तुम्हारे गेट पर न आऊँ तुम मॉर्निंग वॉक के लिए नही निकलोगी। समझ गयी?”
गौरी ने चुपचाप हाँ में गर्दन हिला दी। रोने से उसका मासूम सा चेहरा और खिल उठा था उस पर सुबह की सूरज की किरणें उसके चेहरे को एक अलग ही रंगत से रंग रही थी, कुछ देर को मृत्युंजय उसे देखता ही रह गया…
“चलो हमारा ट्रैक पूरा हो गया है, तुम्हे तुम्हारे होस्टल छोड़ दूं। “गौरी को उसके गेट पर छोड़ कर वो अपनी कैंटीन में जा बैठा, वहाँ उसका दोस्त बैठा उसका इंतेज़ार कर रहा था…
“आज बड़ी देर तक जॉगिंग की है जय भाई ? क्या बात है?”
उसने छेड़ते हुए जय को कहा, उसने गौरी के साथ उसे देख लिया था…
“और क्या समझाया जा रहा था, कि जब मैं आऊँ तभी गेट से बाहर निकलना …. वाह गुरु !! सही है।”
“अरे नही भाई, मैं तो समझाना चाहता था कि उसे अकेले को दुनिया से लड़ना है, ऐसे हिम्मत नही हारना है। लेकिन अभी उसकी हालत ऐसी नही थी कि उसे दुनियादारी का पाठ पढ़ाया जाए। बस इसीलिए फिलहाल के लिए उसे समझाना ज़रूरी था कि वो अकेली नही है। इसीलिए इतनी जवाबदारी दिखाना ज़रूरी हो गया था…
अपनी बात के साथ ही मृत्युंजय ने वहीं पड़ा अखबार भी उठा लिया था…
“आज तो सियासत किस करवट बैठेगी ये फैसला होने वाला है!”
जय के दोस्त ने उसकी तरफ देखा…
“आज राजा अजातशत्रु का भविष्य तय होने वाला है कि उनकी पार्टी किस पार्टी से फिलहाल हाथ मिला कर सत्ता में आएगी…
“तो ऐसे कहो न कि हमारा सब का भविष्य तय होने वाला है!”
“हां! यही समझ लो ! “
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अभिमन्यु कॉलेज से वापस आ कर आराम कर रहा था, की तभी अधीर भी धड़धड़ाते हुए कमरे में घुसा…
“यार कसम से हमारे एग्जाम की डेट कौन डिसाइड करता है? उसके दिल जिगर नही है क्या? या फिर बिल्कुल ही दीन दुनिया से अनजान किसी दूसरे ग्रह का एलियन है क्या?”
“क्यों बे !अब काहे भड़क रहे हो? पहले तो सारा सारा दिन वीडियो गेम में घुसे रहोगे अब जब परीक्षा सर पे आयीं की तुम्हारा तांडव शुरू।”
“परीक्षा से कौन सा माई का लाल डर रहा है बेटा। हम तो इस बात पे जले बैठे हैं कि साला एक हफ्ते बाद त्रिकोणीय श्रृंखला शुरू होने जा रही है, अब इंडिया को जिताएं या पढ़ाई करें। ये जो भी हमारे एग्जाम की डेट निकाला है न है ना पक्का क्रीड़ा प्रेमी नही होगा बल्कि अव्वल दर्जे का गधा है साला एलियन कहीं का। मतलब हद है यार पढ़ाई लिखाई एकेडमिक ज़रूरी है पर शरीर सौष्ठव भी तो बालकों के लिए उतना ही ज़रूरी है। “
“हॉं तो बालक मेस की कुर्सी तोड़ते हुए टीवी पर क्रिकेट देख कर आप कितना शरीर सौष्ठव बनाने वाले हैं…. अभिमन्यु अधीर की बात पर हँसता हुआ उसे छेड़ रहा था कि उसका फ़ोन बज उठा…
अधीर के पास फ़ोन पड़ा था, फ़ोन पर “पंडित जी” लिखा आ रहा था, उसने उठा कर अभिमन्यु की तरफ बढ़ा दिया…”तुम्हारे अब्बा का फ़ोन है।”
“हां पापा! अरे कैसे? कब ? टेस्ट करवाये थे? अच्छा अच्छा.. ठीक है भेज दीजिये फिर!”
अधीर की सवालिया नज़रें देख अभिमन्यु ने मुहँ लटका लिया और अपने बिस्तर पर बैठ गया…
“अम्मा को शुगर निकल आयी है यार!! वही पापा परेशान हो रहे थे, कह रहे थे तुम्हारी मायानगरी का अस्पताल बड़ा है । एक बार वहाँ भी दिखवा दो, तो कह दिया कि भेज दो।
अबे यार अम्मा को शुगर काहे हो गयी। इतनी प्यारी है हमारी अम्मा!”
“अबे तो क्या हुआ? शुगर बीपी आजकल नॉर्मल है… पर अचानक पता कैसे चला। मतलब एकदम अचानक …!”
“पापा बता रहे थे घर पर चींटियां खूब घूमने लगी थी तो मेरी बुआ है ना भदोही वाली उन्होंने कहा जिसके घर किसी को शुगर की बीमारी या जाए तो चींटियां सूंघते पहुंच जाती है। बस पापा तुरंत अम्मा को टेस्ट करवाने ले गए।
हालांकि उनका सब कुछ शुरू कर दिए हैं।”
“क्या सबकुछ? दवाई?”
“हां वही सब, करेले का जूस, जामुन की गुठली, गुड़मार का चूर्ण, नीम की दातुन, पामदेव बाबा वाला योगा…”
“हां तो बस फिर काहे इतने चिंतित हो अभिमन्यु भाई। अब अम्मा को ठीक होने से ब्रम्हा भी नही रोक सकते। और कल जब यहाँ आएंगी तब तुम उन्हें उनकी होने वाली बहु से भी मिलवा देना। अबे सही है यार, घर पे डॉक्टर रहेगी तो बीपी शुगर जांच के लिए तुम्हें बाहर जाने की ज़रूरत भी नही रहेगी… है ना पते की बात। वैसे अम्मा आ किस के साथ रहीं हैं?”
“हमारे घर के कॉकरोच के …
“विभु आ रहा है? यार उसका तो इस साल बोर्ड होगा ना… मतलब बेटा अब वो भी यहीं आ जायेगा तुम्हारा जूनियर बनके।”
“हां यार !! इसी बात का तो रोना है। मैं चाहता ही नही मेरा भाई इस कॉलेज में आये। “
“वैसे एक बात बता अभिमन्यु जब उसका नाम अनुराग है तो घर पर तुम सब उसे विभु क्यों बुलाते हो?”
अभिमन्यु अधीर की बात सुन मुस्कुरा उठा…
“अबे यार बचपन से मैं और वो कोई भी शैतानी करें , बाद में जाकर वो माताजी के सामने सब बक देता था। माँ का लाड़ला बना रहने के लिए, और इसलिए मैं उसे विभीषण कहने लगा, और देखते ही देखते वो विभीषण से विभु हो गया फिर तो अम्मा पापा सब ये भूल कर की विभु विभीषण का शार्ट फार्म है उसे विभु ही बुलाने लगे। बस ऐसे ही नामकरण हो गया, वैसे उसके लक्षण यहाँ आने के नही हैं भाई… उसकी परीक्षा के पहले पंद्रह दिन की छूट्टी लेकर घर जाऊंगा और उसको मैथ्स पढ़ाऊंगा तब कहीं जाकर उसके पास होने के आसार बनेंगे। “
“अच्छा मतलब दिमाग में तुझसे उल्टी खोपड़ी है उसकी। सही है….
“मैंने तो पहले ही उसे बोल रखा है बेटा चाहे जहाँ पढ़ने चले जाना, बस मेरी कॉलेज लाइफ में चरस बोने मत आ जाना। चल अब जरा सीपी सर से नोट्स ले आते है, अगले हफ्ते से एक्सआम हैं।”
दोनों एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखे अपने सीनियर्स के कमरों की ओर बढ़ गए…..
क्रमशः
aparna….
दिल से…
यूँ बेमकसद सोते रहना
भी अच्छा लगता है।
कभी कभी यूँ बीमार पड़ना
अच्छा लगता है।
तेरा वो पल पल आकर
मेरे माथे पर हाथ रखना
थर्मामीटर मे पारे का
ज़रा ज़रा सा हिसाब रखना
अच्छा लगता है
कभी कभी यूँ बीमार पड़ना
अच्छा लगता है।
कविता सटीक नही बनी है बस मन के गुनगुने से भाव है…..
आप सब बहुत बार शिकायत कर चुके थे कि अब दिल से नही लिखती, तो सोचा अब जब मौका मिलेगा लिख दूँगी।
समिधा का अगला भाग भी आज रात तक देने की कोशिश रहेगी और भी बहुत कुछ है मेरे किस्सों की गुल्लक में।
नए साल में आप सभी के लिए ढेर सारे किस्से हैं , कहानियां हैं। धीरे धीरे आती जाएंगी, आप पढ़ते जाएं और अपना साथ बनाये रखें।
मुझे पढ़ने और सराहने के लिए दिल से आभार शुक्रिया नवाज़िश !!!
aparna ….
