मायानगरी -21

मायानगरी -21

वो अंदर गया, कमरा अच्छा खासा बड़ा था। जिसमें टीक वुड के फर्नीचर के पीछे रखी बड़ी सी रिवॉल्विंग चेयर के पीछे सफेद एप्रन लटक रहा था। सामने टेबल पर काफी सारी चीज़ें बड़े करीने से रखी थी। एक तरफ स्टेथोस्कोप के साथ ही बीपी मेजरिंग इंस्ट्रुमेंट भी पड़ा था।
   कमरे में एक मीठी सी खुशबू घुली हुई थी जो कमरे को अस्पताल का हिस्सा दिखने से रोक रही थी। शेखऱ इधर उधर देखता एक कुर्सी खींच बैठ ही रह था कि तेज़ आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला और वही लड़कीं हड़बड़ाती हुई भीतर चली आयी……

उसने आते ही अपनी कुर्सी संभाली और शेखऱ पर नज़र डालने से पहले ही अपना सवाल पूछ लिया…

“जी फरमाइए , मैं क्या मदद कर सकती हूं आपकी?”

शेखऱ उसे देख धीमे से मुस्कुरा उठा… अब तक में उस लड़की की नज़र भी उस पर पड़ चुकी थी। और शेखऱ को देखते ही उसके चेहरे पर निराशा झलकने लगी……..

“जी एडमिशन के बारे में जानकारी चाहिए थी..!”

“ओके !! मैं समझ गयी कि आप बहुत अर्जेन्सी में आये हैं। लेकिन मैंने आपको बाहर ही बताया था कि एडमिन वाले छुट्टी पर हैं।”

  शेखऱ की आंखों में सवाल छलकने लगा कि फिर आप कौन ?

“मैं बस दो दिन के लिए ओपीडी की जगह यहाँ बैठी हूँ। एक्चुली मैं डॉक्टर हूँ यहाँ । और मुझे बहुत ज्यादा कुछ मालूम नही है। वैसे आपको क्या जानना था?”

“मैनेजमेंट सीट्स के बारे में जानना था। “

“ओके उनकी फी, डोनेशन वगैरह..?”

उस लड़की ने एक पैम्फलेट दराज से निकाल कर शेखऱ की ओर बढ़ा दिया…

“इसमें सब लिखा है। आप देख लीजिए,वैसे एडमिशन किसका करवाना है?”

“,जी मेरी बेटी का..?

  वो लड़की आंखें फाड़े शेखऱ को देखने लगी…

“रियली…?”

“हां और तो क्या..? जल्दी शादी कर ली थी मैंने, जल्दी बेबी भी कर लिया। वैसे आपका नाम क्या है डॉक्टर…?

“पंखुड़ी…

शेखऱ ने मन ही मन नाम लिया और ब्रोशर को पढ़ते हुए सोचने लगा… आसान से नाम तो दिमाग से निकल जाते है ये नाम तो बोलने में ही भूल जाऊंगा । जाने क्यों लोग ऐसे कठिन नाम रख लेते हैं।

  उसके सामने बैठी डॉक्टर पंखुड़ी ये सोच सोच कर त्रस्त हुई जा रही थी कि वो अट्ठाईस की हो चुकी थी और अब तक उसकी शादी की शहनाई नही बजी थी। और ये सामने बैठा खुशकिस्मत बंदा जो उससे महज दो चार साल बड़ा नज़र आ रहा है अपनी बेटी के एडमिशन के लिए आया हुआ है। मतलब नाइंसाफी की भी हद है..?
   मातारानी आखिर क्या कमी है मुझमें, साला कोई भी चंगु मंगू आकर चाय समोसा खा कर रिजेक्ट कर के चला जाता है और इस खुशनसीब को देखो इतनी कम उम्र में बेटी के एडमिशन के लिए बैठा है।

  पंखुड़ी को ध्यान नही रहा कि वो जो सोच रही थी उसी के साथ उसके होंठ भी धीमे से बड़बड़ा रहे थे।
शेखऱ ने उसे देखा और ध्यान से आंखें गोल गोल कर उसे देखने लगा…

“आप ज़रा ज़ोर से बोलेंगी तो मैं भी सुन पाऊंगा।”

उसकी बात सुन पंखुड़ी झेंप गयी..

“अरे नही सॉरी। आपने देख लिया ब्रोशर? अब भी आप कुछ जानना चाहतें हैं..?

“हां !! अभी नेक्स्ट मन्थ ही एंट्रेंस होना है ना … मेडिकल एंट्रेंस..?”

“जी हाँ।”

“मैनेजमेंट सीट के लिए भी उसमें अपीयर होना ही पड़ेगा ?”

“बेशक …!”

“कोई उपाय है कि बिना एग्जाम में बैठे ही…”

” नही सर !! ऐसा कैसे हो सकता है..? आपकी बेटी को एग्जाम में बैठना ही नही होगा बल्कि मैनेजमेंट सीट्स के लायक क्वालिफाइंग मार्क्स भी लाने होंगे वरना मेडिकल कॉलेज भूल जाइए..”

“कुछ देखिए न डॉक्टर… शायद कुछ हो जाये।”

पंखुड़ी ज़ोर से हँस पड़ी…

“कहाँ इस सब में पड़ रहे हैं सर? मेडिकल एंट्रेंस तक देने में आपको दिक्कत है तो आराम से साइंस ग्रेजुएट करवाइए बेटी को। आराम से तेईस चौबीस की परफेक्ट एज में शादी कर दीजिए और सुख से अपना घर परिवार संभालने दीजिये। मेडिकल में झंझट ही झंझट है। पहले डॉक्टर बनने के लिए पढ़ो, फिर कॉलेज में नम्बर लाने के लिए पढ़ो, फिर पीजी करने के लिए पढ़ो, फिर जॉब में घुसने के लिए पढ़ो। और इतना पढ़ने के बाद हर साल चाइना नई नई बीमारियां ईजाद कर के हमारे मुहँ पे फेंक जाता है फिर उस बीमारी के बारे में पढ़ो…

शेखऱ को समझ में आ गया कि या तो ये डॉक्टर कुछ जानती नही और या फिर ये कुछ ज्यादा ही जानती है और उसे छिपाए रखने ही इतनी बकवास कर रही है।

” ओके तो मुझे इस बारे में कहाँ से मालूम चल सकता है?”

“किस बारे में ..?”

“वही बिना एक्सआम दिए ही …”

“वो तो पॉसिबल ही नही है। मेडिकल में तो हरगिज़ नही..!”

  “प्लीज़ कुछ देखिए न डॉक्टर …!”

पंखुड़ी का आज बाहर एक लड़के से मिलने का कार्यक्रम था। मेट्रीमोनियल साइट पर पिछले हफ्ते ही उसने दो लड़के शॉर्टलिस्ट किये थे उन्हीं में से एक था। और वो इस वक्त उसी से मिलने निकल रही थी कि शेखऱ टपक पड़ा था। आधी खीझ तो पंखुड़ी को उसी बात की थी। उसका ध्यान बार बार अपनी घड़ी पर जा रहा था। शेखऱ को समझ में आ गया कि लड़की जल्दी में है। वो अपनी जगह से उठ गया।
  
“ठीक है डॉक्टर मैं चलता हूँ। दो दिन बाद ही आऊंगा।”

हाँ में सिर हिला कर वो फटाफट अपना पर्स उठा कर निकल गयी। उसकी हड़बड़ाहट देख शेखऱ को कुछ ठीक से समझ नही आया। और वो भी बाहर निकल गया।
    वो जिस मकसद से आया था वो पूरा नही हो पाया था। पर जाने क्यों शेखऱ को लगा कि ये लड़की कुछ नही बहुत कुछ जानती है…. और कुछ सोच कर वो उसी के पीछे आगे बढ़ गया।

   कमरे से निकलते ही पंखुड़ी बाहर निकली और तुरंत उसने किसी को फ़ोन लगा दिया।
   शेखर उसके पीछे ही था , उसने पंखुड़ी को फ़ोन लगाते देख लिया। उसे लगा पंखुड़ी ज़रूर किसी को फ़ोन करके उसी की पूछताछ के बारे में बता रही है।
  वो सधे कदमों से उसका पीछा करता रहा।
  पंखुड़ी तेज़ कदमों से चलती हुई यूनिवर्सिटी के बाहर निकल गयी। बाहर पहुंच कर उसके एक ऑटो लिया और जहाँ उस लड़के को मिलने बुलाया था, वहाँ के लिए निकल गयी।
   शेखर ने अपनी जीप उसी तरफ घुमा ली।

एक रेस्टोरेंट में उतर कर पंखुड़ी ने ऑटो वाले को पैसे दिए और एक नज़र यूँ ही इधर उधर मार ली। शेखऱ को लगा वो शायद पुलिस या किसी जान पहचान वाले के डर से ऐसे देख रही है।
  छिपते छिपाते वो उसके पीछे अंदर दाखिल हो गया।
 

*******

  अपनी क्लास पूरी कर झनक और रंगोली वापस अपने कमरे में आ गए थे। उनके दरवाज़ा खोल कर अंदर आने की आवाज़ से प्राची भी उठ बैठी…

“गुड़ नून मैंम! आपकी दोपहर की नींद भी पूरी हो गयी हमारे कॉलेज से आते में।”

झनक की बात सुन प्राची ने मुहँ बनाया और अपना ब्लेंकेट फेंक कर उठ बैठी…

“मैं दोपहर में नही सोती। और मैं रात सोने के बाद अभी ही उठी हूँ।”

  वो अपना टॉवेल लिए बाथरूम् में घुस गई। झनक मुकुराते हुए रंगोली के पास चली आयी….

” दोपहर में नही सोती हूँ से क्या मतलब। भई जब आप दोपहर तक जागेंगी ही नही तो सोयेंगी कहाँ से। ” और झनक ज़ोर से हँस पड़ी, रंगोली उसे चुप रहने का इशारा करती मुस्कुरा उठी।
   उसने अपने और झनक के लिए चाय चढ़ाई हुई थी। फिर कुछ सोच कर चाय बढ़ा दी।
   प्राची के बाहर निकलते ही रंगोली ने एक कप चाय उसके आगे भी बढ़ा दी।

प्राची ने एक नज़र रंगोली को घूर कर देखा और चाय लिए अपनी पसंदीदा जगह पर जा बैठी। बालकनी के कांच से लगी बड़ी सी खिड़की के पास ही उसने अपना पलंग डाल रखा था। वहाँ से बाहर देखती वो चाय पीने लगी।
   रंगोली और झनक भी बातों में लगे चाय पी रहे थे कि झनक के मोबाइल पर किसी का फ़ोन आया। उसने अपनी कप नीचे रखी और अपने बैग से कुछ निकाल कर कमरे से बाहर निकल गयी… “मैं बस अभी आयीं रंगोली।”
   और वो भागती हुई सी बाहर निकल गयी।
  प्राची बाहर देखती बैठी चाय पी रही थी कि उसने देखा, उनके हॉस्टल गेट पर एक लंबी सी गाड़ी आ कर रुकी और उसी वक्त भागती हुई सी झनक वहाँ पहुंच गई।
  उसने अपने हाथ मे पकड़ रखे कुछ कागज़ कार में अंदर बैठे व्यक्ति के हवाले किये और कुछ देर वहाँ खड़े खड़े ही उससे बात करने के बाद वो मुड़ कर वापस हॉस्टल की ओर बढ़ गयी।
  प्राची अपनी जगह से उठ कर बाहर बालकनी पर चली आयी, उसने ध्यान देकर देखने की कोशिश की लेकिन ज्यादा कुछ नज़र नही आया। उसी वक्त गाड़ी स्टार्ट हुई और सामने की तरफ से घूमती हुई आगे बढ़ गयी, उसी वक्त प्राची ने गाड़ी की तस्वीर खींच ली।
   उसने ध्यान देने की कोशिश की लेकिन गाड़ी का नम्बर नज़र नही आ रहा था।

“कुछ नज़र तो आया नही मैडम, फिर तस्वीर लेने से फायदा?”

अब तक रंगोली भी वहाँ आकर खड़ी हो चुकी थी। उसने प्राची को तस्वीर लेते देख पूछ ही लिया।

प्राची ने एक नज़र रंगोली  को देखा और फिर फ़ोन में खींची तस्वीर को ज़ूम कर के कार की नंबर प्लेट रंगोली की तरफ कर दी…

“ये देखने के लिए मैंने तस्वीर ली थी। इतनी दूर से कुछ साफ दिख तो रहा नही था। इसलिए लगा तस्वीर को ज़ूम कर नम्बर देखा जा सकता है। “

  रंगोली के चेहरे पर प्राची के लिए तारीफ वाली मुस्कान चली आयी….

“इसी बात पर आपके लिए चाय बनाऊं?”

“नही !! मेरे किये मस्त कड़वी सी कॉफी बना देना। उसके साथ एक सिगरेट पी लुंगी। “

रंगोली कैसा तो भी चेहरा बनाते कॉफी बनाने चली गयी।
  जब जब रंगोली को लगता कि प्राची की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया जा सकता है, उसी समय वो कुछ ऐसा कांड कर जाती की रंगोली का संस्कारी चित्त हिल कर रह जाता।
    उसे लगता प्राची के साथ रहने के बाद अब जब वो अपने घर जाएगी, तब सबसे पहले तो उसे माँ के पूजा कमरे में पेप्सी की 1 लीटर की बोतल में भर कर रखी गंगा जल से नहाना पड़ेगा।
     वो कॉफी बना रही थी कि झनक वापस आ गयी। रंगोली की झनक से कुछ पूछने की हिम्मत नही थी, पर प्राची ने दूर से ही रंगोली को इशारा किया और आंखों ही आंखों में उससे कहा कि वो झनक से पूछे।
  रंगोली ने ना में गर्दन हिलाई लेकिन प्राची की घूरती आंखों से डर कर आखिर उसने  पूछ ही लिया…

“तुम नीचे किस से मिलने गयी थी झनक?”

झनक ने एक नज़र रंगोली को देखा और उसके हाथ मे एक कार्ड रख दिया।

रंगोली ने देखा गुलाबी रंग की तितली बने कार्ड में फ्रेशर्स वेल्कम पार्टी लिखा था।
   कार्ड खोल कर पढ़ने की जगह रंगोली वेल्कम पार्टी का सोच कर ही उछल पड़ी।
   और जाकर झनक के गले से लग गयी।
झनक भी खुशी से झूमती अपनी वेल्कम पार्टी के प्लान में लग गयी…

….. प्राची ने उन दोनों को एक नज़र देखा और बालकनी में जाकर अधिराज को उस गाड़ी की तस्वीर और ज़ूम किया नम्बर भेज कर गाड़ी किंसकी है पता लगाने को कह दिया।
   मेसेज करने के बाद कॉफी पीती वो कुछ सोच ही रही थी कि अधिराज का कॉल आ गया……

क्रमशः

aparna….

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments