
मायानगरी – 20
शेखऱ ने जाते हुए अधिराज की ओर इशारा कर सवाल किया और बचे हुए दोनो गुंडे बिलख पड़े…
” नही साहब लड़का तो बड़ा शरीफ था। ये तो उस रणचण्डी का किया धरा है साहब।”
शेखऱ ने आश्चर्य से नज़रों से ओझल होती बाइक पर एक नज़र मारी और गाड़ी की तलाशी लेने आगे बढ़ गया…
गाड़ी में पड़ी शराब के बोतलें देख कर शेखऱ ने उन सभी को एक नज़र घूरा, और वहीं से पोलिस को फ़ोन लगा दिया….
पुलिस के आते ही शेखऱ ने उन सबको पुलिस के हवाले किया और उस गुंडे को घूर कर अपने मन की बात कह ही दी….
“उस जैसी रणचण्डी अगर हर घर में पैदा हो जाये न तो तुम जैसों से समाज को ऐसे ही मुक्ति मिल जाये। “
“साहब आप जानते नही हो उसे। डायन थी साब डायन … ” आगे वो कुछ कहता उसके पहले ही शेखऱ के हाथ का एक करारा थप्पड़ उसका गाल लाल कर गया….
शेखऱ ने इशारा किया और पुलिस की गाड़ी उन गुंडों को लिए आगे निकल गयी।
हॉस्टल गेट पर अधिराज ने प्राची को उतारा। प्राची बाइक से उतरी और अंदर की ओर बढ़ गयी, अधिराज अब भी सदमे में था, उसने प्राची को आवाज़ लगा दी..
“प्राची !!”
वो पलट कर खड़ी हो गयी…
“मुझे मालूम नही था कि तुम फाइट भी कर लेती हो।”
वो मुस्कुरा कर अधिराज के पास चली आयी…
“आज के ज़माने में लड़की को रोटी गोल बनाना आये या नही अपनी रक्षा करना आना बेहद ज़रूरी है।”
अधिराज ने मुस्कुरा कर हाँ में अपनी गर्दन हिला दी।
” बहुत हिम्मती हो प्राची । जब शरीर से इतनी हिम्मती हो तो मन से क्यों इतनी कमज़ोर पड़ जाती हो। थोड़ा अपने मन को कठोर कर लो तो सारी जंग जीत जाओगी। “
” अधिराज ! जिसकी मॉम ने अपने प्रेमी के कारण अपनी बेटी का बचपन नरक कर दिया हो उस बेटी के लिए जिंदा रह जाना ही बहुत हिम्मत का काम है। वो बेटी जो अपने बाप के प्यार के लिए तड़पती रही लेकिन तलाकनामे पर किये अनुबंध के कारण उस बाप ने अपनी बड़ी बेटी को ही अपने साथ रखा और दूसरी बेटी को यूं ही छोड़ दिया हो ऐसी लड़की का ज़िंदा रहना ही बहुत हिम्मत का काम है…
” आई एम सो सॉरी प्राची…
“नही अधिराज इसमें तुम सॉरी क्यों हो रहे हो। जब मुझे पैदा करने वाले मेरे माँ बाप सॉरी नही हैं तो तुम क्यों सॉरी हो?
बचपन में मेरे बार बार रोने से मेरे सौतेले डैड परेशान हो जाया करते थे और मुझे चुप करवाने मेरे मुहँ में दो घूंट शराब डाल दिया करते थे वो भी महज सात साल की उम्र में। वो कभी इस बात के लिए सॉरी नही हुए तो तुम क्यों सॉरी हो?”
अधिराज चुपचाप सिर झुकाए खड़ा था,उसे समझ आ गया था कि प्राची ने जो कुछ झेला है उसके बाद ही उसके स्वभाव में इतनी कड़वाहट भर गई है। वो बिना कुछ बोले चुपचाप अपनी बाइक स्टार्ट कर जाने वाला था कि प्राची उसके और नज़दीक आ गयी…
“अधिराज !!! तुम अच्छे दोस्त हो मेरे, इसलिए आज भावुकता में ये सब तुमसे कह गयी वरना तो अदिति को भी मेरे बारे में इतना सब नही पता था। जब से कॉलेज में आयीं हूँ मेरा रंग ढंग देख लड़कियाँ मुझसे सीधे मुहँ बात नही करती और मैं सीधे मुहँ बात कर सकूं ऐसे लड़के मिलते नही। ले देकर एक तुम ही से दोस्ती हुई और आज तुमसे भी मैं क्या क्या बक गयी। पर इसका ये मतलब हरगिज़ नही है कि तुम मुझ पर तरस खाओ,क्योंकि मुझे सबसे ज्यादा नफरत इसी बात से है कि कोई मुझ पर तरस खाये।
मेडिकल कॉलेज तक अपने बलबूते पहुंचने वाली लड़की अपनी ज़िन्दगी की लड़ाई भी अकेले लड़ सकती है ये तो तुम समझ ही गए होंगे।”
प्राची ने अपनी बात खत्म की और जाने को थी कि अधिराज ने उसका हाथ पकड़ लिया…
प्राची मुड़ कर वापस उस की ओर देखती खड़ी हो गयी….
“प्राची एक बात पूछना चाहता था..?”
“हां पूछो!”
“तुमने वो दोनो बोतले छुपायीं कहाँ ? मतलब उस समय तो तुमने अपने हाथ पीछे कर लिए थे लेकिन अभी तो तुम्हारे हाथ में भी बोतल नही है।”
इतने गंभीर हो चले माहौल को हल्का करने ही अधिराज ने ऐसा बेसर पैर का सवाल किया था और उसके सवाल पर प्राची ठठा कर हँस पड़ी…
“वो तो तुम्हारे पीछे बैठे बैठे ही मैंने खत्म कर दी। तभी तो इतने जोश में तुम्हें अपनी सारी कथा कह सुनाई। वरना बच्चू आज तक किसी ने प्राची को भावुक होते या रोते नही देखा है,समझे। “
वो वापस मुड़ कर जाने को थी कि अधिराज ने उसकी हथेली पलट कर उसकी उंगलियों को चूम लिया।
एक पल के लिए प्राची ठिठक कर कांप कर रह गयी और फिर तेज़ कदमों से एक तरह से भागती सी अपने होस्टल की सीढ़ियां चढ़ गयीं।
कमरे का दरवाजा खोल कर प्राची अंदर चली आयी। उसने देखा झनक अपने पलंग पर सोई हुई थी और रंगोली शायद कुछ पढ़ती हुई अपनी टेबल पर सिर रखे ही लुढ़क गयी थी।
प्राची ने उसे धीरे से जगाया, रंगोली आंख मलती बैठ गयी…
“आपको कुछ चाहिए मैंम ?”
“हां !!! मेरी बॉटल में पानी भर कर ले आओ!”
रंगोली ने प्राची की बोतल उठायी और कमरे के बाहर के कॉरिडोर में लगे आर ओ से पानी भर कर ले आयी और प्राची के हाथ में थमा कर वापस टेबल पर बैठने जा रही थी कि प्राची ने उसे टोक दिया…
“आधी रात में टेबल पर क्या करने जा रही हो। चुपचाप पलंग पर लेटो और सो जाओ। समझी!!”
हां में सिर हिला कर रंगोली पलंग पर जा लेटी उसने मुड़ कर देखा झनक आराम से सो रही थी। उसे ये देख बड़ा आश्चर्य हुआ कि झनक ने कमरे में आने के बाद उस जगाने की जगह चुपचाप अपना कोना पकड़ा और सो गई।
उसका मन वापस कड़वा हो गया और वो आंखें बंद किये झनक के बारे में सोचती सोचती सो गई।
गर्ल्स हॉस्टल के मेस के मुख्य खानसामा आंध्रा के रहने वाले थे और उन्हें सारी लड़कियां अन्ना ही कहा करती थी। वो सुबह पाँच बजे से नीचे मेस में सुब्बुलक्ष्मी का सुप्रभातम चला दिया करते थे। वो उनका कॉफी टाइम हुआ करता था।
उस समय जो भी लड़कियां मेस में पहुंच जाती उन्हें खालिस आंध्रा स्टाइल फिल्टर कॉफी मिल जाया करती थी।
ये बात झनक ने ही रंगोली को बताई थी। और एक बार उस कॉफी को चखने के लालच में दोनों सुबह पाँच बजे उठ कर नीचे पहुंच भी गयीं थी।
कॉफी का अमृत स्वाद चख दोनों को ही इतनी सुबह जाग कर अपनी हीरे मोती सी नींद त्यागने का मलाल न रहा था।
आज भी सुबह सुबह सुप्रभातम कान में पड़ा और रंगोली की नींद खुल गयी। उसने कमरे में नज़र दौड़ाई झनक का बेड खाली पड़ा था। प्राची सिर से लेकर पैर तक ब्लैंकेट में घुसी सोई पड़ी थी।
रंगोली उठ कर बाथरूम की तरफ बढ़ी तो उसे समझ आ गया कि झनक अंदर है। वो तुरंत नीचे मेस की ओर भागी। और फटाफट अन्ना से दो फिल्टर कॉफी लेकर वो तेज़ कदमों से वापस आ गयी।
उसके कमरे में पहुंचते में झनक अपनी टेबल पर बैठी किताब खोले पढ़ाई में लगी थी।
रंगोली ने कॉफी का कप ले जाकर झनक के सामने रख दिया। झनक ने कॉफी देखी और फिर रंगोली को देख मुस्कुरा उठी…
“थैंक्स रंगोली।”
झनक के चेहरे पर मुस्कान देख रंगोली के मन के काले बादल छंट गए। उसने पीछे से उसके गले में अपनी बाहें डाल दी…
“तेरे मेरे बीच कैसा थैंक्स झनक?”
झनक ने मुस्कुरा कर उसे सामने खींच लिया…
“थैंक्स की भी और सॉरी की भी ज़रूरत है। कल के लिए दिल से सॉरी रंगोली। “
“सुबह सुबह क्या बकवास लेकर बैठ गयी। चल।कॉफी पी ले वरना ठंडी हो गयी तो मेरी दौड़भाग बेकार हो जाएगी। “
दोनों सहेलियां हंसती खिलखिलाती पहले की तरह संग बैठी कॉफी पीने लगीं।
प्राची अब भी सोई पड़ी थी। रंगोली और झनक कॉलेज के लिए तैयार होकर निकल गईं।
हॉस्टल से बाहर निकलते ही रंगोली को रात वाली बात याद आ गयी जब अभिमन्यु ने बधाई वाला होर्डिंग दिखाया था। उस बात को याद करते हुए रंगोली ने उसी होर्डिंग की तरफ शरमा कर नज़रें उठायीं…. दिन का उजाला हो जाने से होर्डिंग अब पूरा नज़र आ रहा था।
वहाँ लगा बड़ा सा होर्डिंग प्रज्वला गैस योजना का था। जिसमें एक तरफ एक गांव की युवती अपने सिर से पल्लू लिए दांत दिखती मुस्कुराती बैठी थी। और उसके एक तरफ कितनी निर्धन महिलाओं को गैस योजना के तहत गैस चूल्हा मुफ्त मिला है ये लिख कर बीच में बड़े बड़े अक्षरों में कोंग्रेचुलेशन्स लिखा हुआ था।
रंगोली की आंखें फटी की फटी रह गईं। तो इसका मतलब रात के अंधेरे का फायदा उठा कर अभिमन्यु ने उसे उल्लू बना दिया था।
झनक को रात वाली ये बात बताने का सारा उत्साह उड़नछू हो गया और वो चुपचाप झनक के साथ कॉलेज के लिए निकल गयी।
*****
वो लोग कॉलेज पहुंचे की उनसे लग कर कुछ आगे जाकर एक जीप रुकी। जीप पार्किंग में थी, झनक और रंगोली उधर से गुज़र रहे थे कि गाड़ी से एक लंबा चौड़ा स्मार्ट सा आदमी बाहर निकल आया…
” एक्सक्यूज़ मी!! ये एडमिन ऑफ़िस किस तरफ होगा? “
झनक ने उसे ऊपर से नीचे देखा और फिर उस बिल्डिंग से हट कर बनी दूसरी बिल्डिंग की ओर इशारा कर दिया।
दूसरी बिल्डिंग भी ज्यादा दूर नही थी इसलिए शेखऱ उस तरफ पैदल ही बढ़ गया।
वो अभी उस बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ रहा था कि सामने से तेज़ी से सीढियां उतरती एक लड़की से लगभग टकराते टकराते बचा….
” आई एम सॉरी मिस….? क्या आप मुझे एडमिन ऑफ़िस कहाँ है बता सकती हैं?”
“एडमिन ऑफ़िस क्यों ? “
उस लड़की के सवाल पर वो आश्चर्य से उसे देखने लगा , शेखऱ की सवालिया नज़र भांप कर वो ज़रा झेंप गयी …
“मेरा मतलब है एडमिन ऑफ़िस में आज कोई नही मिलेगा, सब छुट्टी पर हैं।”
“प्रभार में कोई तो होगा..!” शेखऱ की आवाज़ में अब आई ए एस वाला रौब शामिल हो चुका था।
“प्रभार वाले भी छुट्टी ….”
“आप कौन है..?”
उस लड़की की बात आधे में ही काट कर वो उससे सवाल पूछ बैठा जिसे अनसुना करती वह लड़की एक तरह से कूदती फांदती वहाँ से निकल गयी।
सफेद साड़ी में बने हल्के रंग के फूल और बेलबूटे बहुत सुंदर लग रहे थे। लड़की खुद भी बहुत सुंदर थी।लेकिन शेखऱ उसे ठीक से देख कर कुछ और समझ पाता इतनी देर में वो वहाँ से निकल गयी….
शेखऱ ने उसे देखा और अपना फ़ोन निकाल लिया…
” आई एम सॉरी मैडम, आप भले ही मुझे टाल कर चली गईं पर मैं आपको टलने नही दे सकता। मुझे जो मालूम करना है वो तो आज ही करना है।”
खुद में बड़बड़ाते हुए उसने निरमा को फ़ोन लगा दिया…
“जी बोलिये शेखऱ जी!”
“आप से कुछ पूछना था निरमा जी। मेडिकल एडमिन आज शायद बंद है, और मुझे वहाँ ज़रा एडमिन से मुलाकात करनी थी।”
“आप मुझे बस पांच मिनट दीजिये, मैं तुरंत आपको कॉल बैक करती हूं।”
निरमा के फ़ोन रखने के बाद शेखऱ धीमे कदमों से भीतर चला गया। सामने पहला ऑफ़िस ही एडमिन ऑफिस था। बाहर चपरासी की स्टूल भी खाली पड़ी थी। शेखऱ ने हाथ बढ़ा कर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की और एक बार में ही दरवाज़ा खुल गया।
वो अंदर गया, कमरा अच्छा खासा बड़ा था। जिसमें टीक वुड के फर्नीचर के पीछे रखी बड़ी सी रिवॉल्विंग चेयर के पीछे सफेद एप्रन लटक रहा था। सामने टेबल पर काफी सारी चीज़ें बड़े करीने से रखी थी। एक तरफ स्टेथोस्कोप के साथ ही बीपी मेजरिंग इंस्ट्रुमेंट भी पड़ा था।
कमरे में एक मीठी सी खुशबू घुली हुई थी जो कमरे को अस्पताल का हिस्सा दिखने से रोक रही थी। शेखऱ इधर उधर देखता एक कुर्सी खींच बैठ ही रह था कि तेज़ आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला और वही लड़कीं हड़बड़ाती हुई भीतर चली आयी……
