मायानगरी -18

मायानगरी – 18

    बोझिल कदमों से चलती झनक क्लास रूम के बाहर निकल गई। इस वक्त वह अपने दर्द के साथ अकेले रहना चाहती थी उसे इस वक्त ना रंगोली की जरूरत थी ना अनस की।
   रह रह कर उसके दिमाग में बस एक ही ख्याल आ रहा था कि वह जो आज तक हमेशा अपनी हर क्लास में पहली पोजीशन पर रहती आई थी आज मेडिकल प्री टर्म में तीसरे स्थान पर लुढ़क गई थी।
    और तीसरे पर भी उसे लुढ़काने  वाली थी उसी की रूममेट रंगोली जिसे उसने रात में जाग जाग कर पढ़ाया था।
   वही रंगोली जिसे ग्रे की एनाटॉमी की किताब देखकर बुखार चढ़ जाया करता था। उसे बीडी चौरसिया से एक एक पेज रटवाया था, वह भी सभी कठिन इंग्लिश शब्दों के हिंदी शब्द लिख लिख कर।
   वह फूहड़ लड़की जो अट्रियम और वेंट्रीकल को अलिंद और नीलय बोला करती थी आज एनाटॉमी में पूरे में से पूरे नंबर लेकर क्लास में मुस्कुराती खड़ी थी। और तो और क्लास रूम में उसकी कॉपी भी दिखाई जा रही थी कि उसने कितनी सुंदरता से और सुंदर हैंडराइटिंग में पेपर बनाया था।
     अरे हो गया बस बस आ गई फर्स्ट एक बार, अब उस बात को किनारे रखो। लेकिन नहीं क्लास टीचर के सर पर तो जैसे भूत सवार था । जैसे आज के पहले ऐसी कॉपी कभी उन्होंने देखी ही नहीं। उसके डायग्राम्स को खोल खोल कर टीचर सरेआम दिखा रही थी, और सारे बच्चों से कह रही थी अपने अपने फोन में फोटो लेकर रख लो। ऐसी ही कॉपी फाइनल में तैयार करनी है मतलब बिल्कुल ही हद है।
    इस टीचर को पक्का रंगोली ने कोई ना कोई रिश्वत दी होगी, वरना मेडिकल की कौनसी टीचर स्टूडेंट का इतना गुणगान करती है। खैर छोड़ो मुझे क्या?

    भारी कदमों से और दुखी मन से झनक कैंटीन की तरफ बढ़ गई। वह बढ़ ही रही थी कि पीछे से भागती हुई रंगोली ने आकर उसे पकड़ लिया रंगोली के साथ ही अनस और दो चार और लोग भी थे…..

” अच्छा बच्चू तेरी रूममेट ने टॉप किया तो तू पहले ही उससे ट्रीट लेने कैंटीन की ओर चल दी।”

अनस की बात पर उसे एक बार घूर कर देखने के बाद झनक धीरे-धीरे आगे बढ़ती रही। रंगोली को पता नहीं कैसे लेकिन समझ में आ गया कि झनक अपनी थर्ड पोजिशन से कहीं ज्यादा दुखी उसकी फर्स्ट पोजिशन से हैं।
   उसने झनक से उस वक्त कुछ भी नहीं कहा और चुपचाप एक दूरी बनाकर उसके साथ साथ ही चलने लगी। उन लोगों के कैंटीन पहुंचते तक में उनके साथ चल रहे  बाकी लोग तितर-बितर होकर कहीं और निकल गये, और कैंटीन में रंगोली झनक और अनस के साथ ही प्रवेश कर गयी।

   अपनी परीक्षाओं में फंसा अभिमन्यु भी बहुत दिन से कैंटीन के चक्कर नहीं लगा पाया था। आज बहुत दिन बाद वह भी अधीर के साथ कैंटीन में बैठा रंगोली का ही इंतजार कर रहा था कि उसी वक्त वह लोग वहां पहुंच गई।

” बधाई हो जी डॉक्टर!!! आप लोगों का रिजल्ट आ गया है सुनने में आया। “

” तुम्हारे कान यहीं मेडिकल में लगे रहते हैं क्या?  जो दिन भर डॉक्टरों की खबर ही सुनते रहते हो।”

अभिमन्यु के सादे से मजाक पर झनक का यूं बिफरना अभिमन्यु को अखर गया। उसने रंगोली की तरफ देखा रंगोली ने अपनी बड़ी बड़ी आंखों से अभिमन्यु को देखा और ऐसा लगा जैसे आंखों से ही उसने अभिमन्यु को झनक की तकलीफ बता दी…

” मेरी तो वैसे कौन सी रैंक है मालूम नहीं, लेकिन हां पास हो गया हूं। तुम गधों का भी तो रिजल्ट आ गया है।”

  अनस की बात पर अधीर ने गुस्से में उसे घूरा …

“अबे ओये चिन्दी डॉक्टर, गधा किसको बोला बे? हम से पंगा मत लेना वरना वो हाल करेंगे कि तुझे खुद दांतो के डॉक्टर की ज़रूरत पड़ जाएगी। “

  अभिमन्यु ने तुरंत अधीर के गले में बाहें लपेटी और उसके कान के पास झूल गया…”, अबे छोड़ ना, साला है मेरा। वो हमारी पैदाइश के पहले का एक गाना था ना …”

जितनी धीमी आवाज़ में अभिमन्यु ने कहा उतनी ही धीमी गुनगुनाहट में अधीर ने पूछ लिया…” कौन सा!”

  उसे आंखों से इशारा कर अभिमन्यु कैंटीन के काउंटर की तरफ मुड़ गया…

“अरे चच्चा वो गाना लगाओ न रेडियो पर..
  सासु तीरथ, ससुरा तीरथ, अरे तीरथ साला साली हैं,
   दुनिया के सब तीरथ छूटे,चारों धाम घरवाली है।।

  काउंटर पर बैठे आदमी ने गुटखा चबाते हुए एक बार उपेक्षित सी नज़रों से अभिमन्यु को देखा और फिर पीछे वेटर के लाये गरम पानी के भगोने को सांभर में पलट दिया… “छोटू थोड़ा नमक भी और डाल दे।”
    कैंटीन की भीड़ और सांभर का खाली होता भगोना अभी उनकी प्रायरिटी में था और ये लड़का बैठा उटपटांग गानों की फरमाइश कर रहा था।

  झनक इन सब से बेखबर खुद से नाराज़ बैठी अपनी फिल्टर कॉफी के स्टील ग्लास को गोल गोल घुमाती अपनी सोच में गुम थी। अभिमन्यु अधीर रंगोली और अनस भी चुपचाप बैठे थे…

  आखिर खुद को समेट कर पूरी हिम्मत से रंगोली ने कहना शुरू किया…”झनक थैंक्स !! मैं तो कहीं से फर्स्ट आने लायक थी ही नही, अगर तूने मुझे पढ़ाया सिखाया नही होता तो मैं तो फेल हो जानी थी। तेरी मेहनत रंग लाई जो मैं फर्स्ट आ पाई हूँ।”

  रंगोली की बात सुनते ही अभिमन्यु के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान छा गयी… “गज़ब ”  उसने रंगोली को देखते हुए कहा… रंगोली ने उसे देखा और तभी खुशी से चौड़ा होता अभिमन्यु अपनी जगह खड़ा हो गया…

“भाई आज कैंटीन में सभी को मेरी तरफ से फिल्टर कॉफी पीनी पड़ेगी। एक वही चीज़ तो इस कैंटीन की पीने लायक है , लेकिन ….लेकिन पैसे आप सब अपने अपने चुका सकते हैं। “

  और वो वापस मुस्कुराता बैठ गया। सभी ने एक बार उसे घूर कर देखा, कुछ दो चार ने तो आंखों ही से उस पर गोलियां भी चला दी और अभिमन्यु तृप्त चेहरे से वापस बैठ गया।
। बैठते ही उसकी नज़र सामने बैठी झनक पर चली गयी ,वो आंखों से अंगारे बरसाती उसे ही देख रही थी…

“तुझे ज्यादा महानता दिखाने की ज़रूरत नही है। हो जाता है कभी कभी… की ज्यादा एलिजबल को भी उतना सहीं सब मिलता नही। इसलिए प्लीज़ मेरे सामने मुझ पर दया दिखा कर महान बनने की कोशिश मत कर , समझी।”

  रंगोली अचंभित सी झनक को देखने लगी उसी वक्त बम बैठी झनक के फ़ोन पर किसी का कॉल आया और वो उठा कर बात करती बाहर चली गयी….

   रंगोली की आंखें भर आयीं, वो भी उठ कर उसके पीछे ही निकल गयी।। अनस ने घूर कर अभिमन्यु और अधीर को देखा, …-“अबे ओये अनानास !! ज्यादा घूर मत…!”
अधीर के ऐसा कहते ही अभिमन्यु हंसने लगा..
“अबे घूर नही रहा है। असल में इसकी आंखें इतनी छोटी हैं कि साफ साफ देखने के लिए आंखे चौड़ी करनी पड़ती हैं और तब लगता है कि ये घूर रहा है।”

  दोनों दोस्त वापस हंसते खिलखिलाते बाहर निकल गए।
   रंगोली तेज़ कदमों से झनक के पीछे चली जा रही थी। झनक कैंटीन से निकल कर मैडिकल एडमिन ऑफिस की तरफ बढ़ गयी। और सीढ़ियों के एक तरफ खाली जगह में ओट में खड़ी होकर बातें करनी लगी…

“आपने साफ साफ कहा था ,अगर मैं आपका काम कर दूंगी तो मेरी फर्स्ट रैंक पक्की है, फिर ये कैसे हो गया? “

सामने वाले ने उसे कुछ समझाने की कोशिश की लेकिन वो कुछ सुनने को तैयार नही थी…

“मैं क्या समझूँ? बल्कि आप समझिए… मिड टर्म है तो क्या हुआ? इसके भी मार्क्स फायनल में जुड़ते हैं। तो मतलब आपके कहने का मतलब है कि फायनल में मेरे इतने ज्यादा मार्क्स रहेंगे की अभी के मार्क्स के जुड़ने घटने के कोई फर्क नही पड़ेगा।
    लेकिन ये क्या बात हुई। शक जिन्हें करना होगा वो तो उस समय भी उन्हें इसी बात पर शक हो जाएगा कि मेरे बाकी लोगों से इतने ज्यादा मार्क्स फायनल में कैसे आ गए…

  झनक लगातार किसी से बहस में उलझी हुई थी और रंगोली बाहर खड़ी सब सुनती सन्न होती जा रही थी। उसकी समझ से परे था कि झनक किस से बात कर रही है और ये सारा क्या माज़रा है।
    उसे मालूम था कि झनक पढ़ाई के लिए बहुत समर्पित और होशियार लड़कीं है, उसने उसे मेहनत और लगन से पढ़ते देखा भी था, इसलिए वो इस बात को अच्छे से समझ पा रही थी कि पहले स्थान पर न आ पाने का दुख तो उसे होना ही था लेकिन इस पहले स्थान के लिए उसने किसी से किसी प्रकार का कोई करार कर रखा था ये रंगोली के लिए बहुत आश्चर्य की बात थी।
   वो डूबे मन और थके कदमों से वापस हॉस्टल की ओर चल पड़ी, उसे ये समझ में आ गया था कि अब झनक उससे इस बारे में कुछ भी नही बताएगी।

  वो हॉस्टल में अपने कमरे में पहुंची की उसे ध्यान आ गया कि प्राची मैडम अब भी उन्हीं के कमरे में ठहरी हुई हैं।
    वो कमरे में नॉक कर के दाखिल हो गयी। प्राची बालकनी की खिड़की से लगे अपने पलंग पर बैठी अपनी गिटार पर कोई धुन बजा रही थी।
    धुन बहुत मार्मिक सी थी पर रंगोली को उस वक्त बहुत अच्छी लग रही थी।
   प्राची के रंग ढंग में अब भी कोई बदलाव नही आया था। वो अब भी रंगोली और झनक से सीधे मुहँ बात नही किया करती थी। उसका कमरा महीना बीत जाने पर भी सील्ड ही था। अदिति की मौत के रहस्य की गुत्थी भी जस की तस अटकी पड़ी थी।
     प्राची खुद में डूबी सी किसी धुन को बजाती जा रही थी  कि खिड़की से बाहर एक बाइक आकर रुकी। बाइक में बैठे लड़के ने हॉर्न मारना शुरू कर दिया…

   रंगोली ने खिड़की से नीचे झाँक के देखा, बाइक पर अधिराज सर बैठे थे। उन्होंने रंगोली को इशारे से प्राची को भेजने कहा। रंगोली ने डरते हुए धीमे से प्राची के कंधे पर हाथ रखा और प्राची ने इतनी देर से बंद रखी अपनी आंखें खोल दी।

   उसने भौंह चढ़ा कर रंगोली से उसे डिस्टर्ब करने का कारण पूछा और रंगोली ने खिड़की से बाहर की ओर इशारा कर दिया।
    प्राची ने देखा बाहर अधिराज बाइक पर बैठा उसी का इंतज़ार कर रहा था। उसे देखते ही प्राची कूद कर पलंग से उतरी और बाहर जाने लगी।

“मैम आप ऐसे ही चली जाएंगी। “

  प्राची की आधे गले की टीशर्ट और शॉर्ट्स के साथ बालों का खूब ऊंचा बना जूड़ा उसका हुलिया कुछ अजीब ही दिखा रहा था…

“सो व्हाट? “

  प्राची ने कंधे उचका कर रंगोली को जवाब दिया और कमरे से बाहर स्लीपर्स पहने ही निकल गयी।
  रंगोली ने एक गहरी सांस ली और अपने लिए एक कप कॉफी बनाकर कप और अपना फ़ोन उठाये अपनी मम्मी को फ़ोन लगाने चली गयी…
    घर से बाहर उसने पहली बार कदम रखा था और कैसे कैसे नमूनों से उसका पाला पड़ता चला जा रहा। उसने कॉफी की एक सिप ली, कॉफी आज कुछ ज्यादा ही डार्क बन गयी थी। आज के दिन की शुरुआत उसके शानदार रिज़ल्ट से हुई थी लेकिन उसके बाद दिन भर होने वाली घटनाओं के बाद उसका आज मन और मुहँ दोनों ही कसैले हो गए थे।

   वो यही सब सोच रही थी कि उसकी माँ ने फ़ोन उठा लिया… दूसरी तरफ से खूब शोर शराबे की आवाज़ आ रही थी…

“कहाँ हो मम्मी? घर पर नही हो क्या?”

“नही बेटा, तेरी बड़ी मम्मी के घर आयीं हूँ। डिंकी को देखने लड़के वाले आ रहे हैं ना! तो बस उसी सब तैयारियों के लिए तेरी ताई जी ने मुझे बुला लिया था। तेरे पापा बाहर हैं ताऊजी के साथ मेहमानों की आवभगत में , ले मेहंदी तुझसे बात करना चाहती है। बात कर ले।”

अपनी छोटी सी खुशखबरी भी रंगोली अपनी माँ को नही बता पायी, और माँ ने हड़बड़ी में फ़ोन मेहन्दी को दे दिया।

” क्या बात है डॉक्टर? कैसी है तू,क्या हाल चाल हैं।”

“मैं ठीक हूँ मेहन्दी। तू बता? वहाँ सब कैसे हैं।”

“सब मस्त हैं। डिंकी को लड़का देखने आने वाला है तो ताई ने पूरे कुनबे को जमा कर लिया है। मम्मी से कहा तुम छोले अच्छा बनाती हो आकर रसोई सम्भाल लेना। मेहन्दी को भी लेते आना,मेहमानों की आवभगत लगेगी न। मतलब हद पार करतें हैं ये लोग। मेरी पढ़ाई से ज्यादा इन्हें डिंकी के रिश्ते की फिक्र है। अब बोल मेरा खून खौलेगा की नही।”

“धीरे बोल कहीं किसी ने सुन लिया तो? और डिंकी को दीदी बोल यार, मुझसे पांच छैह साल तो बड़ी होगी ही। “

“हां सामने तो दीदी ही बोलती हूँ, पर नखरे देख कर न जी बहुत जलता है। अब आज लड़का देखने आने वाला है उसके लिए मैडम सुबह से पार्लर में बैठी मेक’प पुतवा रही है चेहरे पर।भई कल को शादी के बाद जब लड़का इनका असली चेहरा देखेगा तब उसका कलेजा मुहँ को अ गया तो कौन जिम्मेदारी लेगा भाई? अब इतना भी अत्याचार सही नही है ना!”

” बकवास बंद कर मिहू । किसी ने सुन लिया न तो बैंड बजानी है तेरी।”

“तू बहुत डरपोक है यार,चल रखती हूं मेरा बुलावा आ गया। पकौड़ों की गरम प्लेट होने वाले जीजू तक पहुंचानी है।”

“अरे मिहू सुन तो… एक बात बतानी थी, मेरा रिज़ल्ट मतलब मैं फर्स्ट…”

  रंगोली की बात पूरी होने से पहले ही मेंहदी ने फ़ोन रख दिया।
   बुझे मन से अपनी काली कड़वी कॉफी को एक किनारे रख वो बालकनी पर खड़ी हो गयी।
   कुछ सोच विचार के बाद अचानक उसे गाजर का हलुवा याद आ गया और वो लपक कर उस डिब्बे को उठा लायी।
  एक चम्मच हलुआ मुहँ में डालते ही उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गयी…

” थैंक यू आंटी इस हलुवे के लिए भी और इसके साथ जो मैं अकेले अपनी सक्सेस सेलिब्रेट कर रही हूं उसके लिए भी।”

…….

वो मुस्कुराते हुए हलुवा खा रही थी कि वापस उसका फ़ोन बजने लगा… वो डब्बे को हाथ मे लिए ही फ़ोन उठाने चली गयी।

फ़ोन मेहन्दी का था….

क्रमशः

aparna…..

   दिल से …..

    बचपन की  सर्दियां और गाजर का हलुवा….

     सभी के जीवन का सुनहरा समय उनका बचपन ही हुआ करता है मेरा भी था।
    उस स्वर्णिम बचपन की ढेर सारी यादों में एक है गाजर का हलुवा।
   सर्दियों के समय विंटर वेकेशन पर हम अक्सर ताई जी के घर ही रुक जाया करते थे। वहाँ साथ ही हमारी बुआ जी भी रहा करती थीं। बुआ जी कायदे कानूनों की गजब पक्की थीं।
  उनके कुछ नियम थे जो घर भर के बच्चों को मानना ज़रूरी था। समय पर सोना-जागना, समय पर खाना, खाने की टेबल पर घर के सभी सदस्यों का एक साथ बैठना, छुट्टियों में भी रोज़ की पढ़ाई करना, समय से खेलने जाना और छैह बजे वापस आकर दिया लगाना।  उस समय तो वो सब मानना ज़हर लगता था पर अब लगता है मुझ में जो कुछ एक आध गिनती के सद्गुण हैं वो उन्हीं के पुण्य प्रताप का फल है।
     
   उन सर्दियों की रातों में गाजर का हलुवा बनना भी एक अनुष्ठान हुआ करता था। सिंगल गैस स्टोव पर गहरे तले के बड़े से कड़ाहे को चढ़ा कर ढेर सारे घी में धीमी धीमी आंच में भुनता हुआ गाजर का हलुवा हम सब के धैर्य की परीक्षा लेता मजे से जैसे हमें चिढ़ाया करता था।
    उसके बाद वहीं बैठी बुआ जी उसमें खोया डाला करती और फिर नाप जोख कर चीनी।
    डॉयफ्रूट्स कतरने के लिए ताऊ जी की बेटियों की ड्यूटी लगती और हम छोटी बहनें बड़ी हसरत से उस प्लेट को आंखों ही आंखों में पीती जातीं।
  बुआ जी का टेरर ऐसा होता कि उनकी अनुपस्थिति में भी मजाल की कोई एक भी काजू उठा कर मुहँ में डाल लें।
   और इतनी सारी तपस्या के बाद बना हलुवा भी हमें तुरंत चखने को भी नही मिलता। मेरी तो खैर कभी उनसे मांगने की हिम्मत भी नही होती थी, पर मेरी बहन अपने लालच पर ज़रा कम कंट्रोल कर पाती थी। और हर बार उसे एक ही सधा सा जवाब मिलता..
…. “कल सुबह ठाकुर जी को भोग लगने के बाद ही सबको हलुवा मिलेगा तब तक कोई उस ओर देखे भी नही।”
   और अगले दिन जब भोगभण्डारे के बाद हमारे पास हमारी कटोरियाँ आती तब पहले चम्मच को मुहँ में रखते ही जो अमृत स्वाद मिलता उसका वर्णन अनिर्वचनीय है।

  आज जब मैं अपनी रसोई की खुद मालकिन हूँ, अपना गाजर, अपना घी, अपना खोया अपने डॉयफ्रूट्स… सब कुछ होने पर भी न वो अमृत स्वाद है और न वो खाने के बाद की तृप्ति…
…. लेकिन अब भी एक बात वैसी ही है कि अब मैं खुद हलुवा बनाने के बाद न खुद चखती हूँ और न घर पर किसी को छूने देती हूं।
   पहले मेरे ठाकुर जी का ही भोग लगता है…. और बाद में घर भर का।

   तो ये था मेरे यादों की गुल्लक का एक छोटा सा किस्सा, अगर आपकी यादों में भी कोई ऐसा किस्सा है तो समीक्षा में ही बता दीजिएगा….
…. कभी आप सभी के किस्सों को अपने दिल से का हिस्सा बना लुंगी…

मुझे पढ़ते रहने के लिए दिल से आभार शुक्रिया नवाज़िश!!!

aparna….

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Mandeep kaur
Mandeep kaur
2 years ago

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