
मायानगरी – 14
यूनिवर्सिटी के बच्चे खुद में मगन इधर से उधर झूमते गाते मंडरा रहे थे। खाते पीते समय बीतता गया और सब के वापस लौटने का वक्त हो गया…
शुरुवात में जहाँ रंगोली के उत्साह का ठिकाना नही था,अब उसे कुछ अच्छा नही लग रहा था। उसे ये सब कुछ महल का दिखावा सा दिखने लगा था। सब खराब और बुरा लग रहा था और सबसे बुरी लग रही थी महल की रानी की तस्वीर।
हुंह !! ऐसा भी क्या, अगर उसे इतनी सुंदर तरीके से सजा कर ऐसे बैठा दिया जाए तो वो इस रानी से कहीं ज्यादा सुंदर लगेगी। मन ही मन सोचती रंगोली खुद पर ही लजा गयी। सुंदर भले ही लग जाये पर रानी बाँसुरी के चेहरे पर का आत्मविश्वास कहाँ से लाएगी? यही तो उसकी सबसे बड़ी कमी है, जहाँ भीड़भाड़ देखी उसकी सिट्टीपिट्टी गुम हो जाती है। लोगों के सामने उससे ठीक से बोलते तक तो बनता नही है, कहाँ वो रानी की कुर्सी पर बैठेगी।
….. लेकिन राजा जी!!! उनके लिए इतनी मेहनत की जा सकती है पर खाक फायदा होगा। वो तो शादीशुदा हैं फिर उनके लिए अपने आप में कोई भी बदलाव लाने का क्या फायदा?
वो मन ही मन गुणा भाग करती बैठी थी कि झनक हाथ में प्लेट लिए चली आयी…..
“ले पकड़ अपनी प्लेट!”
“मुझे भूख नही है झनक?”
झनक आश्चर्य से उसे देखने लगी…
“इतना टेस्टी फ़ूड स्टॉल देख कर तेरी भूख भाग गई क्या? चल फटाफट खाती जा फिर हॉस्टल वापस जाना है।”
झनक के बहुत ज़िद करने पर रंगोली ने प्लेट पकड़ ही ली पर उससे ज्यादा कुछ खाया नही गया। थोड़ा बहुत चुगने के बाद उसने प्लेट सरका दी ,लेकिन अब उसके पेट में गुड़गुड़ाहट शुरू हो गयी थी…
उसने झनक की तरफ देखा,झनक तुरंत उसका चेहरा देख समझ गयी…
“क्या हुआ? फ्रेश होना है?”
हां में गर्दन हिलाती वो इधर उधर देखती तुरंत पीछे की तरफ भागी।
भीड़भाड़ से एक तरफ हट कर पीछे की तरफ बढ़ते ही उसके पेट में ज़ोर की गुड़गुड़ाहट हुई और उसे ज़ोर की उल्टी हो गयी।
पेट में ऐसी भयानक मरोड़ उठी की वो अपना पेट पकड़ कर झुकने को थी कि किसी की मज़बूत बाहों ने उसे थाम लिया।
रंगोली को होश ही नही था कि किसने उसे पीछे से पकड़ रखा है। बस रह रह कर उसे थोड़ी थोड़ी देर में उल्टी सी हुई जा रही थी। उसके आंख नाक से पानी बह रहा था। और पीछे से उसे संभाल रखे इंसान का हाथ उसके बालों को सहलाता जा रहा था। पीछे से उसने रंगोली के चेहरे माथे पर आते बालों को समेट पीछे कर उसी का क्लच बालों में फंसा दिया जिससे रंगोली को बालों से होने वाली उलझन से आज़ादी मिली, उसकी पीठ पर फिरते हाथ से उसे कुछ राहत सी लगी कि उसके सामने एक पानी की बोतल आ गयी।
उसने बोतल लेकर खूब सारा कुल्ला करने के बाद अपने पूरे चेहरे पर खूब सारे छींटे मारे और तब जाकर सीधी खड़ी हो पाई।
उसने बोतल एक ओर बढ़ाई और मुड़ कर देखा तो सामने अभिमन्यु खड़ा था। अब तक रंगोली सोच रही थी कि उसके पीछे झनक खड़ी है, लेकिन अभिमन्यु को सामने देख वो थोड़ा चौंक गयी। चौंकने से ज्यादा वो अब उसके सामने झेंप सी गयी थी।
सत्यानाश नही बल्कि सवा सत्यानाश !!
छी किसी लड़के के सामने उसकी ये कैसी हालत हो गयी थी। वो भी क्या सोच रहा होगा। आज तक वो इसके सामने हमेशा अच्छे से ही आयीं थी। आज तो उसका जो हाल हुआ था, और उस पर वो बिना किसी घिन या झिझक के उसे संभाले हुए था। उसके जूतों पर भी पानी उसी ने डाल कर साफ किया था।
रंगोली को थामे हुए अभिमन्यु ने उसे वहाँ से कुछ दूर लगी एक बेंच पर बैठा दिया…
लेकिन इतने पर भी उसके छूने में कहीं कोई गलत भाव नही छिपा था। जाने क्यों उस छुअन में रंगोली को बहुत अपनापन ही महसूस हुआ …
“क्या हुआ अचानक? वोमिटिंग कैसे हो गयी तुम्हें? सुबह से कुछ खाया नही था क्या?”
रंगोली को याद आया, उसने सच सुबह से ठीक से कुछ खाया पिया नही था, और इसी कारण शायद उसे एसिडिटी हो गयी थी।
अभिमन्यु उसे वहीं छोड़ कहीं चला गया।
“अजीब लड़का है? अब तक इतनी देखभाल करने के बाद अब अचानक कहाँ चला गया?”
वो अपने माथे पर की पानी की बूंदों को पोंछ रही थी कि वो एक हाथ में गिलास थामे भागता सा लौट आया।
“ये पी लो। तुम्हे आराम लगेगा।”
रंगोली का इस वक्त अभिमन्यु से कोई सवाल करने का मन नही हुआ। उसे यूँ लगा कि उस वक्त वो जो भी देगा सही ही होगा। उसने धीमे से गिलास लिया और अपने मुहँ से लगा लिया…
“बहुत तेज़ी से मत पीना, धीरे धीरे सिप कर के पीना।”
किसी अच्छी बच्ची की तरह हां में गर्दन हिला कर वो धीरे से पीने लगी। निम्बू पानी था,वो भी बहुत मीठा और हल्का नमकीन। लेकिन स्वाद वाकई उसके गले और ज़बान को राहत दे रहा था।
वो चुपचाप बैठी पीती रही और वो सामने खड़ा उसे देखता रहा..
उसकी आंखें अब भी अपनी बेबसी पर भरी आ रहीं थीं। ऐसे कैसे उसे अचानक वोमिटिंग हो गयी और वो भी इसी के सामने होनी थी? ऐसे सारे स्यापे उसी के साथ क्यों होतें हैं?
अकेले में भी तो वो मैनेज कर सकती थी? हॉं कर तो सकती थी लेकिन जब वो उसकी पीठ और बालों पर हाथ फिरा रहा था तब उसे सुकून भी तो मिल रहा था।
एक बार फिर अभिमन्यु का हाथ उसके सिर पर चला आया। धीमे से सिर पर हाथ फिरा कर वो वहीं खड़ा रहा…
” अभी कुछ ठीक लगा?”
हां में गर्दन हिला कर वो नीचे देखने लगी। निम्बू पानी का गिलास वो एक तरफ रखने को थी कि अभिमन्यु ने उससे गिलास ले लिया…
“अरे पूरा क्यों नही पिया? मेरी अम्मा कहतीं हैं जब बहुत देर तक भूखे रहो तो ऐसे ही पित्त भड़क जाता है और उसका उपाय नींबू ही है।
हॉस्टल में भी नींबू रखा करो अपने पास। और बीच बीच में लेती रहा करो। या फिर सबसे आसान है नींबू का अचार। वो ले लिया करो। अगर तुम्हारे पास नही है तो मैं दे दूंगा। मेरी अम्मा का बनाया वर्ल्ड फेमस नींबू का अचार !”
उसकी बात सुन रंगोली के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी…
“नही ! फिलहाल तो ज़रूरत नही लग रही। अब मुझे ठीक लग रहा है। झनक कहाँ चली गयी है, उसे ही ढूंढ रही थी….
रंगोली इधर उधर देखती कहने लगी तो अभिमन्यु भी इधर उधर झनक को ढूंढने लगा… उसी वक्त दूर से पुरोहित मैडम के साथ गप्पे लड़ाती झनक उन्हीं की तरफ आती दिख पड़ी।
“रंगोली ये पुरोहित मैडम हैं, हमारे कॉलेज के फिजियोलॉजी डिपार्टमेंट में लैब टेक्नीशियन हैं। “
रंगोली ने उन्हें देख कर अपने दोनो हाथ जोड़ दिए।
“आज हम इन्ही की गाड़ी में हॉस्टल तक चलते हैं। और वैसे तू अब तक यहाँ क्या कर रही है? वहाँ सब वॉल्वो में लोड होने लगें हैं।”
झनक ने बोलते हुए एक नज़र साथ खड़े अभिमन्यु पर डाली और रंगोली का हाथ पकड़ पुरोहित मैडम के साथ आगे बढ़ गयी।
रंगोली को ऐसे किसी और के साथ वहां से जाना अच्छा नहीं लग रहा था इसने झनक की तरफ देखकर आंखों के इशारे से पूछा और झनक ने आंखों ही आंखों में उसे सब ठीक है, का इशारा कर दिया। अभिमन्यु हाथ बांधे खड़ा रंगोली को झनक के पास जाते देखता रह गया। जाते जाते रंगोली एक पल को वापस मुड़ी और अभिमन्यु को देखकर धीरे से मुस्कुरा गई।
अभिमन्यु ने मुस्कुराकर अपने बालों पर हाथ फिराया और झूमते हुए उन लोगों के पीछे धीरे धीरे चलते हुए आगे बढ़ गया।
” अबे कहां गायब हो गए थे तुम?
खुद में खोए गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते अभिमन्यु को अधीर ने बीच में ही पकड़ लिया….
“अरे कुछ नही यार। बस यहीं था।”
“यहाँ कहाँ ? मुझे तो कहीं नही दिखे?”
“अरे तू तो ऐसे घबरा रहा जैसे अशरफ अली ने आकर तुझसे शिकायत कर दी है कि मैं पाकिस्तान में जाकर हैण्डपम्प उखाड़ रहा हूँ।”
“साले जब तेरी सकीना यहीं मंडरा रही तो तू पाकिस्तान क्या करने जाएगा?”
“अच्छा तो वो तुझे दिख गयी और मैं जो उसी के साथ था वो तुझे नही दिखा। साले शक तो मुझे तुझ पर पहले से था अब यकीन होने लगा ! बाइक कहाँ है बे, फटाफट लेकर आ। तुरंत भागना है!”
“पर भागना कहाँ है? वॉल्वो तो उधर से निकलेंगी और अभी पांच मिनट है निकलने में। “
“नही इस बार तेरी भाभी किसी की कार में जाने वाली है।तो वॉल्वो नही कार का पीछा करना है।”
अधीर ने आंखें गोल गोल कर एक बार उसे घूर कर देखा और बाइक लेने चला गया।
अभिमन्यु की आंखें झनक और रंगोली पर ही थीं। अब एक एक कर मेहमान वापस निकलने लगे थे। वॉल्वो भी विद्यार्थियों को भर भर कर निकलने लगी थी।
झनक पुरोहित मैडम से इतनी देर में काफी खुल चुकी थी। उनसे गप्पे लड़ाती वो उन्ही की गाड़ी की तरफ बढ़ गयी। रंगोली भी चुपचाप उसके साथ ही आगे बढ़ गयी।उसकी तबियत अभी भी सही नही लग रही थी।पर वो झनक से कुछ भी कह कर उसे परेशान नही करना चाहती थी।
पुरोहित मैडम ने एक नज़र रंगोली पर डाली और फिर झनक को देखने लगी….
“ये लड़कीं कौन है?”
रंगोली को उनका इस तरह साफ साफ पूछना बहुत अजीब लगा, पर वो बिना कुछ बोले चुप रही..
“ये मेरी रूम मेट है रंगोली। डोंट वरी मैडम इससे किसी तरह का कोई डर नही है। बहुत सीधी है ये।”
उसे ऊपर से नीचे देख पुरोहित मैडम ने एक भौंह चढ़ा ली…
“पढ़ने में कैसी है?”
“बहुत अच्छी है। बहुत होशियार!”
“अभी मेडिकल एंट्रेंस में क्या स्कोर था?”
“जी मेरा वेटिंग क्लियर हुआ है मैडम!”
रंगोली ने झनक के पहले ही जवाब दे दिया जबकि झनक वहाँ पर कुछ तो गोलमोल जवाब देने वाली थी। वेटिंग क्लियर सुन कर पुरोहित मैडम का मुहँ बन गया।
“ठीक है लेकिन मैं तुम्हें जो बताने वाली हूँ वो सब लीक तो नही कर देगी ना?”
“नही मैंम आप निश्चिंत रहें।”
“ठीक है। आओ, तुम दोनो पीछे बैठ जाओ गाड़ी में। “
उनके कहे मुताबिक झनक के साथ रंगोली कार में पीछे बैठ गयी, और पुरोहित मैडम ड्राइवर के बाजू वाले सीट पर बैठ गयीं। ड्राइविंग सीट पर वही आदमी बैठा था जो सुबह झनक को मिला था।
उस आदमी को देखते ही रंगोली को कुछ अजीब सा लगने लगा, उसने अपना मोबाइल निकाल कर झनक को मैसेज कर दिया…
“,ये कौन है? मुझे ये आदमी बहुत अजीब लग रहा है।”
“रूम पे चल कर सब बताती हूँ।”
“मुझे बहुत निगेटिव वाइब्रेशंस आ रही झनक!”
“ऐसा कुछ नही है रंगोली, ये पुरोहित मैडम बहुत अच्छी हैं।”
रंगोली और कुछ टाइप करने जा रही थी कि पुरोहित मैडम ने कहना शुरू कर दिया।
“झनक तो तुम हो और तुम्हारा क्या नाम है?”
“जी रंगोली!”
“,ओके ! झनक और रंगोली। अब मैं तुम दोनो को अपना परिचय देने वाली हूँ , और साथ ही तुम दोनों के फायदे की बात भी बताने वाली हूँ। ध्यान से सुनना। और अगर कोई डाउट आये तो पूछ लेना। “
“जी मैडम !” बहुत उत्साह से झनक ने पुरोहित मैडम से कहा लेकिन जाने क्यों रंगोली का दिल डूबने लगा।
उसी वक्त उस आदमी ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी, महल के मुख्य द्वार पर खड़े गार्ड्स ने एक नज़र गाड़ी पर मारने के बाद पुरोहित मैडम को पहचान कर गाड़ी आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी।
गाड़ी महल परिसर से आगे बढ़ते ही सामने की सीट पर बैठी पुरोहित मैडम पीछे घूम गयी….
” मुझे तो अब तुम दोनो जान ही गयी हो, और ये हैं मेरे हसबैंड मिस्टर जीवंत पुरोहित!!”
झनक ने मुस्कुरा कर उन्हें नमस्ते बोला लेकिन रंगोली मुहँ उतारे ही बैठी रही। उसे मैडम से ज्यादा अब झनक के उत्साह पर नाराजगी उमड़ने लगी थी।
उसे डर सा लग रहा था कि इतने लंबे रास्ते वो दोनों बिना किसी जान पहचान के इनकीं गाड़ी में चलीं आयीं हैं। वो हैरान सी खिड़की से बाहर नज़र जमाये रास्ते को घूर घूर कर देखती अंधेरे में भी पहचानने की कोशिश में थी कि बाजू से एक बाइक निकलने लगी।
उसने देखा बाइक अधीर चला रहा था, और उसके पीछे बैठा अभिमन्यु अधीर से बातों में लगा था। इसी बीच अभिमन्यु की ऑंखे रंगोली से मिलीं और उसके चेहरे पर राहत के भाव चले आये।
बाइक थोड़ा आगे बढ़ कर फिर धीमी हो गयी और कार के पीछे से एक चक्कर लगाती आगे बढ़ गयी।
बाइक को अपनी गाड़ी के आगे पीछे चलते देख रंगोली के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान चली आयी….
…… इधर झनक दुगुने जोश और उत्साह से पुरोहित मैडम की बात सुनने को तैयार थी…
क्रमशः
aparna….
