मायानगरी -13

मायानगरी – 13

   मायानगरी यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के लिए महल में दी गयी पार्टी शानदार थी। पार्टी अपने पूरे शबाब पर थी।
     राजा अजातशत्रु के साथ बाकी महलवासी भी वहाँ मौजूद थे। स्टेज पर नृत्य गीत के कार्यक्रम के दौरान झनक चुपके से आकर उस आदमी की कुर्सी के ठीक पीछे बैठ गयी।
   उसने इधर उधर देखा और धीमे से सामने की ओर झुक कर उस आदमी के कान से ज़रा दूर ही रुक गयी..

“अंकल सुनिए!”

  झनक की आवाज़ पर वो चौंक गया। उसने पीछे मुड़ कर झनक को एक नज़र देखा और वापस मुड़ गया…

“अंकल जी !! सुनिए तो, वो आप ही सुबह मिले थे ना।

  वो आदमी अचानक उठा और वहाँ से तेज़ कदमों से चलते हुए एक तरफ को चला गया। झनक भी धीरे से उसी के पीछे चली गयी। उस आदमी के साथ बैठी औरत ने एक नज़र उन लोगों को देखा फिर इधर उधर देख कर जब तसल्ली कर ली कि कोई उसे नही देख रहा वो वापस स्टेज पर चलने वाले कार्यक्रम को देखने लगी।
     उसी समय उस औरत के मोबाइल पर किसी का फ़ोन आने लगा…
उस औरत ने नम्बर देखा और ज़रा सी घबराहट उसके चेहरे पर रेंगने लगी।

“हेलो! जी मैडम !!”

“आप कहाँ हैं पुरोहित मैडम?”

” जी मैं यही हूं कार्यक्रम स्थल पर, आप कहां हैं निरमा मैडम?”

” हूँ तो मैं भी यहीं, लेकिन आप मुझे कहीं नजर नहीं आ रही है?”

” जी मैडम मैं स्टेज के पास हूं।”

” मैं स्टेज से ज़रा दूर हूं। जिस तरफ घोड़ों को खड़ा किया गया है आप उस तरफ तुरंत आ जाइए, मुझे आपसे कुछ जरूरी बात चीत करनी है।”

निरमा काफी सारे प्रोफ़ेसर लेक्चरर और कॉलेज स्टाफ से उम्र में जरूर छोटी थी लेकिन उसका रुतबा और स्वभाव ऐसा था कि उसका एक वाक्य कि “मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी है , तुरंत मेरे पास आ जाये।”कह देने पर ही अच्छे अच्छों के पसीने छूट जाते थे इस वक्त भी वही हुआ ।
    पुरोहित मैडम को अपने सारे देवी देवता याद आने लगे वह सोच में पड़ गई कि निरमा को इस वक्त कैसे टाला जाए, उनकी तरफ से कोई जवाब ना पाकर निरमा ने ही वापस उन्हें याद दिला दिया कि वह कहां पर खड़ी है…

” मैं स्टेज से दाहिनी और खड़ी हूं। अगर आपको यहां तक चल कर आने में तकलीफ है, तो मैं ही आपके पास चली आती हूँ। “

निरमा का “मैं खुद ही चली आती हूं” कहना तो और भी बड़ा वज्रपात था पुरोहित मैडम एकदम से हड़बड़ा गई…

” नहीं मैडम आप क्यों कष्ट करेंगे?  मैं आ रही हूं आपके पास।”

गिरते पड़ते तेजी से भागते हुए पुरोहित मैडम निरमा के पास पहुंच गई….

” पुरोहित मैडम आप समझ ही गई होंगी, कि मैंने आपको यहाँ किसलिए बुलाया है? मेडिकल गर्ल्स हॉस्टल ए विंग में जो हुआ है, वो मेरी कल्पना से बिल्कुल ही बाहर की बात है। यह मेरे आज तक के जीवन में देखी पहली ऐसी घटना है जिसमें किसी हॉस्टल में लड़की ने इतना बड़ा कदम उठाया है । और मैं अपनी यूनिवर्सिटी में यह सब नहीं देख सकती। राजा भैया ने बहुत विश्वास से यह जिम्मेदारी मेरे कंधों पर सौंपी है। और मैं मेरी निगरानी में चल रहे विश्वविद्यालय में ऐसा कुछ भी नहीं होने देना चाहती जिससे मायानगरी का नाम खराब हो।
  क्योंकि मायानगरी सीधे तौर पर राजा अजातशत्रु सिंह हुकुम से जुड़ी हुई है। मायानगरी का नाम खराब होना हुकुम का नाम खराब होना है। आप भी जानती हैं, कल चुनाव के नतीजे आने वाले हैं। और हम सब जानते हैं, कि राजा भैया जीतने वाले हैं। भले ही वह मुख्यमंत्री बने या ना बने लेकिन उनका विधायक बनना तो तय ही है। अब अगर ऐसे में  उनकी यूनिवर्सिटी में यह सब होता है तो क्या उनका नाम खराब नहीं होगा?”

” मैं सच कह रही हूं निरमा मैडम इस बारे में मैं कुछ भी नहीं जानती।”

” वो तो आप जानेंगी भी कैसे? क्योंकि आप उसकी रूम मेट तो थी नहीं, ना ही आप उसकी अभिभावक हैं। आपके तो वह किसी तरह भी कांटेक्ट में थी नहीं तो फिर आप उसके बारे में जानेंगी कैसे? मेरा यह सारी बातें आपसे कहने का सिर्फ और सिर्फ एक कारण यह था कि आप मेडिकल हॉस्टल की सेकंड वार्डन है। ऐसे में आपका और वार्डन मैडम का पूरा फर्ज बनता है, कि लड़कियों को इतना सुरक्षित माहौल दीजिए कि वह अपनी सारी समस्याएं आपसे साझा कर सकें। अगर अदिति किसी परेशानी में नहीं होती तो वह इतना बड़ा कदम नहीं उठाती यह तो आप भी मानती हैं। है ना”?

“जी मैडम !”

” तो फिर ऐसा सुरक्षित माहौल क्यों नही दिया जा रहा बच्चों को? “

” निरमा मैडम… वो बात ये है कि..

“मुझे ऐसे आधा अधूरा नही जानना की बात क्या है? आप कल मेडिकल स्टाफ की मीटिंग बुलाइये । सिर्फ कॉलेज के लेक्चरर प्रोफेसर ही नही हॉस्पिटल के रेजिडेंट डॉक्टर्स, डीन सभी को बुला लीजियेगा। मीटिंग अरेंज कर के मुझे सुबह इन्फॉर्म कर दीजिएगा। मैं टाइम पर पहुंच जाऊंगी। “

   निरमा ने इतने तल्ख और रूखे शब्दों में कहा कि पुरोहित मैडम के पास हाँ में सिर हिलाने के अलावा और कोई चारा नही था।
   निरमा ने एक नज़र घूर कर उन्हें देखा और मुड गयी, फिर अचानक उसे कोई बात याद आ गयी और उसने वापस उन्हीं मैडम का रुख किया…

“अच्छा सुनिए! एक और ज़रूरी बात !  ये बात ज्यादा फैलनी नही चाहिए। वरना हॉस्टल की बहुत बदनामी होगी।”,

  अब हल्के से राहत के बादल पुरोहित मैडम के चेहरे पर मंडराने लगे।

“मैडम लेकिन कल तो आप मीटिंग बुलाने बोल रहीं हैं”

“कॉलेज स्टाफ बाहर के लोग हैं क्या?”

“लेकिन इन्हीं लोगों से कहीं बात बाहर चली गयी तो? निरमा मैडम बात पुलिस तक पहुंची तो बहुत बदनामी होगी।”

“लेकिन बात तो पुलिस तक पहुंच ही चुकी है।”

“जी निरमा मैडम! लेकिन उसके आगे आप रोक सकती हैं। पोस्टमार्टम वगैरह करवाने से अच्छा है उसकी बॉडी घर वालों को देकर मामला रफा दफा करवातें हैं। बेकार बात बढ़ाने से कोई फायदा नही है। लड़की वैसे भी सहीं नही थी।”

“अच्छा ! कैसे?”

“अब आजकल के बच्चों का क्या बोलें मैडम। किसी लड़के वड़के का चक्कर था सुना है। दिन दिन भर उसी के साथ घूमती रहती थी। बस कुछ ऊंच नीच हो गयी होगी। सुझा नही क्या करें तो आत्महत्या कर लीं।”

  निरमा गहरी नज़रों से उन्हें देखती रही..

“कल आपको पुलिस स्टेशन जाना होगा पुरोहित मैडम, ज़रा देख लीजियेगा।”

“लेकिन मुझे क्यों मैडम?”

” सभी को जाना ही पड़ेगा , आप परेशान न हों… आप के बाद मेरी भी थाने में पेशी है।”
   निरमा ने मुस्कुरा कर बात खत्म की और आगे बढ़ गयी। उसके दिमाग में जो चल रहा था , सिर्फ वो जानती थी…. पुरोहित मैडम की समझ से बाहर था कि इस वक्त भी निरमा ने उनकी बात का समर्थन किया था या नही।

   ******

“अरे अंकल जी …. सुनिए तो” उस आदमी के पीछे जाती झनक ने जैसे ही उसे आवाज़ दी..

“क्या अंकल अंकल लगा रखा है बेवकूफ लड़कीं?”

  वो आदमी एकदम से बौखला कर झनक पर झुंझला उठा….
   भीड़भाड़ से निकल कर वो ज़रा एक सुनसान से किनारे की ओर बढ़ गया था…

“मैं कौन सा तुम्हारा अंकल लगता हूँ।”

“सॉरी सॉरी सर! मुझे अचानक समझ में नही आया कि आपको क्या बुलाऊँ?”

“क्या काम है बोलो?”

“आप तो ऐसे बात कर रहे जैसे मुझे पहचानते तक नही, अभी सुबह ही आपने अपना कार्ड दिया था,भूल गए क्या?”

“हाँ तो? मेरा कार्ड तो मैंने जाने कितनों को देता हूँ,याद थोड़े न रहता है।”

“अच्छा ये बात है। मुझे लगा मैं अकेली वो खुशकिस्मत हूँ जिसे पढ़ाई के साथ साथ कमाई का मौका भी मिल रहा है।”

उस आदमी ने इधर उधर देखा…

“वाकई कमाई करना चाहती हो। “

“हां सर , ,पैसों की बहुत तंगी रहती है। मेरे पेरेंट्स डॉक्टर है पर जेबखर्च कुछ सही मिलता ही नही।”

अब उस आदमी के चेहरे पर कुटिल सी मुस्कान थी…

“काम ऐसा है कि पैसों में खेलोगी। लेकिन ये बहुत लंबा चौड़ा सिस्टम है। कल यहाँ आकर मिलो, शाम पांच बजे पहुंच जाना। “

  झनक ने उस आदमी के हाथ से कार्ड अपने हाथ में ले लिया…

“रंजीत एकेडमी !! ये तो शहर में है?” झनक के ऐसा बोलते ही उस आदमी ने हाँ में सिर हिला दिया।
    उसी वक्त झनक का फ़ोन बजने लगा। उसने देखा रंगोली का फ़ोन था… उसने फ़ोन साइलेंट में कर के वापस अपनी पॉकेट में डाल लिया।

“हां ! मायानगरी से गाड़ियां निकलती तो रहतीं हैं शहर के लिए।”

“लेकिन शहर जाने के लिए वार्डन परमिशन लगती है सर?”

“पुरोहित मैडम सेकंड वार्डन हैं। उनसे मिल जाएगी परमिशन। उन्हें कल कॉलेज में ही अपना एप्लिकेशन दे देना। वो तुम्हे कैसे शहर जाना है कहाँ से गाड़ी मिलेगी ये सब बता देंगी।”

“सर ! एक सवाल था मन में?”

“पूछो?”

“पैसे कितने मिलेंगे?”

“तुम्हारी सोच से कहीं ज्यादा? पैसों की बारिश होगी तुम पर। अब जाओ,कोई तुम्हें यहाँ देख न ले।”

  उस आदमी की बात पर हाँ में गर्दन हिलाती झनक वहाँ से निकल गयी।

****

   इधर रंगोली स्टेज के सामने लगी कुर्सियों पर बैठी कार्यक्रम देखने में तल्लीन थी,उसे मालूम भी नही चला झनक कब उठ कर निकल गयी। झनक से कुछ बताने के लिए रंगोली ने जैसे ही उसकी तरफ मुहँ किया तो अपनी सीट पर उसे न पाकर वो चौंक गयी।
  उसे ढूंढने की सोच वो भी वहाँ से उठ कर  एक तरफ को निकल गयी।
  उसे कोई अनुमान नही था कि झनक कहाँ और किस तरफ गयी है। उसने अपना फ़ोन निकाला और झनक का नंबर लगा लिया। इतनी भीड़ भाड़ और कोलाहल में झनक ने शायद उसका फ़ोन सुना नही। दो बार पूरी पूरी रिंग जाने पर भी जब झनक ने फ़ोन नही उठाया तो रंगोली उसे इधर उधर देखती आगे बढ़ गयी।
      वो आगे बढ़ रही थी कि सामने लगा राजा अजातशत्रु का आदमकद कटआउट देख कर ठहर गयी। उस तस्वीर को देखती कुछ सोच रही थी कि पीछे से एक आवाज़ उसके कानों में पड़ी…

“जो तस्वीरों में सुंदर दिखते हैं , वो असलियत में बहुत बुरे दिखतें हैं।”

  अभिमन्यु की आवाज़ सुन रंगोली ने उसे एक नज़र देखा और वापस सामने देखने लगी।

“अरे सच कह रहा हूँ मैं। चाहे तो अधीर से पूछ लो। ” अधीर जो अपने फ़ोन पर मैसेज चेक करने में व्यस्त था ,अपना नाम सुन हड़बड़ा गया।

“मुझे किसी से पूछने की ज़रूरत नही है। मैंने सुबह इन्हें देखा है, यूनिवर्सिटी में। बल्कि आप लोगों ने नही देखा तो दर्शन कर लीजियेगा, शायद कुछ अच्छा फल मिल जाये।”

रंगोली की बात पर अभिमन्यु मुस्कुराता खड़ा उसे निहारता रहा….

“क्या पागलों के समान आंखें फाड़े देख रहे हो? तुमसे पहले ही कहा था न मुझसे दूर रहना। चलो निकलो यहाँ से ।”

हां में सिर हिला कर अभिमन्यु एक तरफ हो गया।  रंगोली आगे बढ़ने को थी कि, अपने बॉडीगार्ड्स से घिरे राजा अजातशत्रु तेज़ कदमों से उधर से निकलते हुए आगे बढ़ गए….

“अरे ये तो राजा साहब हैं।”  रंगोली की चहकती आवाज़ राजा के कान में भी पड़ गयी। उसने हंसते हुए आवाज़ की दिशा में देखा तो रंगोली को खुद की तरफ देखते पाया। उसे देख वो मुस्कुरा कर आगे बढ़ गए…

“राजा साहब !” आखिर रंगोली से रहा नही गया और उसने उन्हें आवाज़ लगा दी…

उसकी पुकार सुन राजा रुक गया…और वो भाग कर उस तक पहुंच गई..
  बॉडी गार्ड्स के बीच से जगह बनाती वो उस तक आने की कोशिश में थी कि राजा के इशारे पर गार्ड्स एक ओर सरक गए…..

“सर क्या आपका ऑटोग्राफ मिल सकता है?”

रंगोली कि इस बात पर राजा ज़ोर से हँस पड़ा…. और उसकी धवलमुक्त हंसी रंगोली के दिलो दिमाग पर छा गयी… वो अपलक उसे देखती खड़ी थी..

“सीरियसली सर!! आई वांट योर ऑटोग्राफ!”

  और रंगोली ने अपने पर्स से कॉपी के साथ पेन निकाली और राजा की ओर बढ़ा दी।

  राजा ने उसकी नोटबुक हाथ में ले ली…

“आपका नाम क्या है? “

  राजा के सवाल पर शरमाती सी रंगोली ने धीमे से अपना नाम बता दिया…

“,रंगोली, रंगोली तिवारी!”

“ओहो तो आप भी तिवारी हैं?”

” सर आप भी तिवारी हैं क्या?” रंगोली के बचकाने सवाल पर राजा एक  बार फिर उन्मुक्त सी हंसी में खो गया…

“नही ! मेरी पत्नी शादी से पहले तिवारी थी। बाँसुरी तिवारी। अब लेकिन रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह बन चुकीं हैं। वो रही उनकी तस्वीर।”

  राजा ने एक तरफ लगे बाँसुरी के कटआउट की ओर इशारा कर दिया….

   गुलाबी सितारों से सजी पोशाक में महाराजा कुर्सी पर अपने एक पैर पर दूसरा पैर चढ़ाए बैठी बाँसुरी ने एक हाथ कुर्सी के हत्थे पर रख रखा था,वहीं दूसरा हाथ उसकी गोद में रखा था।
   गर्दन ज़रा एक ओर को ऊंची किये होने से दूसरी तरफ का मोर बना सुनहरा झुमका गरदन पर आकर गालों को छू रहा था। हल्का झिलमिल सा आँचल कंधों पर से आकर नीचे ज़मीन तक जा रहा था। चेहरे की मुस्कान और आंखों की रंगत बता रही थी कि तस्वीर उतरवाते समय भी सामने राजा साहब ही खड़े थे, जिन्हें देखती बाँसुरी उन्हीं के रंग में रंगी नज़र आ रही थी।

  रंगोली ने तस्वीर देखी और मुस्कुरा कर पलकें झुका लीं। कुछ पल पहले का राजा साहब का ऑटोग्राफ़ लेने का उत्साह जाने कहाँ उड़नछू हो गया। उसे खुद भी समझ में नही आया कि अचानक उसे सब कुछ खराब सा क्यों लगने लगा था……

क्रमशः

aparna….

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