
मायानगरी – 12
सेंट्रल लाइब्रेरी की ओपनिंग के बाद जो कार्यक्रम पहले से प्रायोजित थे वह होते चले गए लेकिन झनक का दिमाग उसी आदमी की बातों में उलझा रहा, और रंगोली का राजा अजातशत्रु में।।
लाइब्रेरी का काम निपटने के बाद राजा अजातशत्रु अपने सभी परिवार जनों के साथ महल वापस लौट गए और इसके साथ ही वहां उपस्थित सभी विद्यार्थियों के मन और आंखों को एक सुंदर सपना देकर चले गए।
वैसे तो माया नगरी का हिस्सा बनने के बाद हर एक विद्यार्थी स्वयं को भाग्यवान समझ ही रहा था लेकिन आज राजा अजातशत्रु को देखने के बाद जो गर्व की भावना पैदा हुई थी उसका कोई मुकाबला नहीं था।
महल वासियों के लौटने के बाद सभी विद्यार्थी भी अपने अपने हॉस्टल वापस लौट गए। सभी को शाम की दावत का इंतजार था।
आज यूनिवर्सिटी का इतना बड़ा कार्यक्रम होने से सभी कक्षाएं आज के लिए रद्द कर दी गई थी।
झनक और रंगोली भी बाकी छात्राओं के साथ हॉस्टल पहुंच गई। राजा अजातशत्रु से मिलने के बाद आज मेडिकल गर्ल्स हॉस्टल का माहौल कल की अपेक्षाकृत काफी उमंग भरा था। कल का पूरा दिन सभी का बेहद ठंडा और अवसाद भरा बीता था। लेकिन आज सबके मन से कल की अदिति वाली घटना की धुंध कुछ हद तक छंटने लगी थी।
आज कार्यक्रम होने के कारण सभी छात्र-छात्राओं का सुबह का भोजन भी यूनिवर्सिटी में ही था इससे झनक और रंगोली भी कुछ थोड़ा बहुत वहीं से खा कर चली आई थी आज उनके हॉस्टल का मेस बंद था।
कमरे के सामने पहुंचने के बाद उन दोनों को याद आया कि उन दोनों के साथ कमरे में कोई और भी मौजूद थी जो आज यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में शामिल होने नहीं गई थी।
झनक ने हीं आगे बढ़कर दरवाजे पर दस्तक दे दी। दो बार दस्तक देने पर भी जब कोई आवाज नहीं हुई तो झनक ने हल्के से दरवाजे को अंदर की तरफ धक्का दे दिया। दरवाजा एक झटके में खुल गया।
प्राची कमरे में नहीं थी।
” हद है यार! मैडम कमरे को बिना लॉक किये कहां चली गई? हमारा सारा सामान पड़ा था कमरे में। “
तब तक रंगोली ने इधर-उधर झांक कर देख लिया था कि प्राची बालकनी में खड़ी सिगरेट पी रही है। रंगोली ने अपने होठों पर उंगली रखकर झनक को चुप रहने का इशारा किया और बालकनी की तरफ उसका ध्यान दिला दिया।
“ओह्ह तो ये यहाँ खड़ी हैं!”
झनक ने धीमे से कहा और रंगोली ने हां में सिर हिला दिया।
रंगोली ने आगे बढ़ कर देखा , एक किनारे रखी टेबल पर चाय के बर्तन में जली हुई मैगी चिपकी पड़ी थी। देख कर यूं लग रहा था जैसे किसी ने उस बर्तन में मैगी बनाने की असफल कोशिश की और जब मैगी पूरी तरह से जलकर बर्बाद हो गई तब उस बर्तन को वैसे ही पटक कर गुस्से में छोड़ दिया।
रंगोली ने बर्तन उठाकर झनक को दिखाया और उसे साफ करने बाथरूम में चली गयी।
रंगोली के बाथरूम से आते तक में झनक ने सिंगल गैस के चूल्हे को साफ करके वहां टेबल पर फैले तामझाम को भी समेट लिया था।
रंगोली ने वापस आने के बाद एक गहरे तले का बर्तन निकालकर गैस पर चढ़ाया और प्राची के लिए वापस मैगी बनाने लगी।
कुछ देर में ही तीनों के लिए तीन कप चाय और प्राची के लिए मैगी का बाउल लेकर झनक और रंगोली बालकनी में चली आई।
प्राची बालकनी में रखी कुर्सी पर आंखे मूंदे बैठी थी।
“एक्सक्यूज़ मी मैडम ! “
झनक के इतना कहते ही प्राची ने आंखें खोल दी..
” आ गई तुम दोनों? कैसा रहा आज का प्रोग्राम?”
अब तक रंगोली ने प्राची के सामने बाउल बढ़ा दिया था। बाउल पर नजर पड़ते ही प्राची ने उन दोनों को देखा और उनके हाथ से बाउल लेकर चुपचाप खाने लगी।
” मुझे भूख लग रही थी इसलिए ट्राई किया था, बट पता नहीं कैसे वह जल गया। इसे कुकर में बनाते हैं क्या?”
प्राची के सवाल पर रंगोली को हंसी आ गई पर उसने अपनी हंसी रोक कर धीमे से मुस्कुरा कर जवाब दिया…
” नो मैम !! कुकर में पकाने की जरूरत नहीं होती इसे पकाने के लिए इसमें पानी डालना होता है।”
” ओह्ह शिट!!शायद इसीलिए जल गया।”
तब तक झनक ने उसकी कुर्सी के सामने रखी टेबल पर चाय भी रख दी थी।
रंगोली और झनक अपनी कप उठाकर चुपचाप पी रहे थे।
प्राची कल से ही भूखी थी, इसलिए वो बिना कुछ बोले चुपचाप खाती रही। अपनी चाय खत्म करने के बाद वो बर्तन लिए अंदर चली गयी।
“कुछ अजीब नही है ये मैंम?” झनक के कहने पर रंगोली ने जोर से श्श्श्.कह कर उसे चुप करवा दिया। कि उसी वक्त प्राची का फोन जो वो बाहर कुर्सी पर ही भूल गयी थी बजने लगा….
प्राची एकदम तेज़ कदमों से बाहर आई और अपना फ़ोन उठा लिया… ” हम्म आ रहीं हूँ।”
बस इतना बोल कर वो बाहर जाने लगी कि अचानक कुछ सोच कर वो ठिठक कर रुकी और झनक की तरफ देखने लगी
” उस आदमी से दूर रहना।”
इतना बोल कर वो वापस बाहर निकल गयी। प्राची के कमरे से बाहर निकलते ही रंगोली भाग कर दरवाज़ा बंद कर आई।
“हे भगवान !! मुसीबत छूटी।।”
“छूटी नही है। बस मुसीबत कुछ देर के लिए घूमने गयी है, वो भी अधिराज सर के साथ!”
“तुझे कैसे पता?”
“जब उसका फ़ोन बज रहा था तब उसके उठाने के पहले मैंने देख लिया था, अधिराज सर का नाम दिख रहा था।”
“ओह्ह ! तो ये बात है। तू बड़ी स्मार्ट हैं झनक।”
झनक मुस्कुरा उठी….
“मैं तो ये सोच रही हूं रंगोली कि ये प्राची उस आदमी को कैसे जानती है? जो उसने मुझे उससे दूर रहने की सलाह दे डाली?”
“अरे हाँ ! ये तो मैंने सोचा ही नही? पर एक बात बता झनक, उसे पता कैसे चला कि हमें वहाँ वो आदमी मिला था…!”
झनक ने एक नज़र रंगोली पर डाली और आंखें छोटी कर कुछ सोचती हुई उससे कहने लगी…
“मुझे लगता है कुछ देर को ही सहीं ये यूनिवर्सिटी आयीं थी। और या फिर इसने उस आदमी का दिया विजिटिंग कार्ड देख लिया होगा। वो कार्ड मैंने यहीं टेबल पर रख छोड़ा था और जब हम बालकनी में चाय पी रहे थे तब वो बर्तन रखने रसोई में आई थी।”
“हाँ यही हुआ होगा। क्योंकि यूनिवर्सिटी आती तो हमें कैसे नही दिखी? वैसे ये अधिराज सर का क्या मैटर होगा?”
“पता नही पर मालूम चल जाएगा धीरे धीरे। “
रंगोली और झनक बातें कर रही थीं कि झनक का फ़ोन बजने लगा। वो फ़ोन उठाये कमरे से बाहर बालकनी में चली गयी।
*******
यूनिवर्सिटी के हर एक होस्टल का हर एक विद्यार्थी आज अति उत्साहित था क्योंकि आज सबको महल में आमंत्रित किया गया था।
ठीक शाम छै बजे हर एक हॉस्टल के बाहर वहाँ की वॉल्वो खड़ी थी,जिसमें छात्र छात्राओं का दल अपनी जगह बनाता बैठता चला जा रहा था। कुछ एक लड़कों का अपनी बाइक्स पर ही महल तक जाने का प्रोग्राम था।
लेकिन प्रोफेसर्स के सख्त निर्देश थे कि अपनी गाड़ी से जाने वाले छात्र भी कॉलेज वॉल्वो के आगे पीछे ही चलेंगे जिससे सभी सुरक्षित जाना और आना कर सकें।
यूनिवर्सिटी रियासत और शहर के बीचोबीच स्थित थी। इसी से यूनिवर्सिटी से लेकर रियासत तक का रास्ता जंगल के बीच से होकर गुजरता था। इसलिए यूनिवर्सिटी गेट पर ही सभी विद्यार्थियों की उपस्थिति लेने के बाद ही वहाँ से गाड़ियां रवाना की गयीं थीं।
रंगोली भी झनक के साथ गाड़ी में सबसे पीछे जाकर बैठ गयी…. सभी जूनियर्स लड़कियां पीछे ही बैठी थी। आगे बैठी सीनियर लड़कियां किसी न किसी जूनियर को पकड़ी गाने सुन रही थीं। एक के पीछे एक गाड़ियां निकलकर यूनिवर्सिटी गेट पर रूकती चली गई वहां पर उपस्थिति होने के बाद सारी गाड़ियां आगे बढ़ गई।
रंगोली ने देखा उनके बाजू वाली सीट पर गौरी बैठी थी। शायद उसने अपनी दोस्त के लिए जगह रखी थी पर प्रिया किसी दूसरी बस में सवार होकर निकल चुकी थी। इसलिए गौरी अकेली ही बैठी रह गयी थी।
रंगोली ने ध्यान दिया तो उसे समझ में आया कि गौरी कानों पर ईयरफ़ोन लगाए कुछ सुन रही थी। रंगोली दूसरी तरफ देखते हुए हल्के से गौरी की तरफ अपने कान लगाए सुनने की कोशिश करने लगी…
“दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं
शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है ।।
दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जायेंगे, ऐसा लगता है।।”
गाने के बोल सुनते ही रंगोली को अजीब मातमी सा माहौल लगने लगा। उसे उस गजल को सुनते ही अपने घर की याद आने लगी और उसकी आँखे भर आईं।
“अब तुझे क्या हो गया? रोने क्यों लगी?”
“मैं कहाँ रो रही, वो तो बस ऐसे ही हवा से उड़ कर कुछ चला गया आंख में!”
“हाँ मेरे माथे पर लिखा है न कि मैं उल्लू हूँ।”
एक तो रंगोली को रोना आ रहा था उस पर झनक नाराज़ हुई जा रही थी, वो झनक को समझा नही पा रही थी कि उसे अपने घर और परिवार की इतनी याद आ रही थी कि लग रहा था गले में कुछ आकर अटक गया है, और अगर वो अपनी ये बात झनक को बताएगी तो भरभरा कर रो पड़ेगी जिससे उसे ही शर्मिंदगी का सामना करना होगा। और बस इसलिए वो अपने ही अंदर बड़ी मुश्किल से अपने आंसू रोकने की कोशिश में लगी थी कि उसके कांच के ठीक बाजू से एक बाइक लहराते हुए चलने लगी..
“बेड़ागर्क !! इसी डायनोसोर की कमी थी, आ गया वो भी अपने मगरमच्छ के साथ!”
रंगोली ने झनक कि ओर देख आंखों से इशारा किया तो झनक ने अपनी खिड़की वाली सीट से उठ कर रंगोली को उधर सरका दिया…
“इस सिरफिरे को तू ही झेल रंगोली!”
रंगोली कुछ समझ पाती तब तक में अभिमन्यु उसे देख मुस्कुरा उठा। अभिमन्यु के साथ ही सामने बाइक चलाता अधीर भी रंगोली को देख मुस्कुरा रहा था। उसी गड़बड़ में उसका ध्यान गाड़ी पर से हटा और गाड़ी सामने पेड़ से टकराते टकराते बची । दोनो का संतुलन बुरी तरह से बिगड़ने के बावजूद हवा में लहराती बलखाती बाइक गिरने की जगह सम्भल गयी और ये सारी नौटंकी देख रंगोली के चेहरे पर हंसी खेल गयी…..
“थैंक गॉड !! इस लंगूर को देख तुझे हंसी तो आयीं। वैसे तेरा मूड ठीक कर ही गया तेरा पति!”
“शट अप यार झनक! कुछ भी कह जाती है तू!”
बातों ही बातों में वो लोग लगभग घंटे भर का सफर तय कर महल पहुंच ही गए। महल के बाहर के बड़े से उद्यान में ही सारा प्रबंध किया गया था।
उस बड़े से मैदान के बीचों बीच एक बड़ा स्टेज बना था। और उसके चारों तरफ गोल घेरे में छै- सात कुर्सियों का घेरा था। हर घेरे के बीच एक गोल बड़ी टेबल लगी थी, जिसमें पानी की छोटी बोतल के साथ ही पेय पदार्थों की बोतल भी रखी थीं।
थोड़ी थोड़ी दूरी पर खाट पड़ीं हुईं थीं जिनके पास कुछ लकड़ी के पाटे भी पड़े थे। एक तरफ राजा साहब के अस्तबल के घोड़े सजे धजे तैयार खड़े थे।आज राजा साहब ने अपना महल ही एक तरह से खोल रखा था। जो विद्यार्थी चाहे वो घोड़े की सवारी भी कर सकता था। कुछ इसी तरह महावतों के साथ हाथी और ऊँट भी इधर उधर घूम रहे थे।विद्यार्थियों को यूं लग रहा था जैसे वे राजस्थान के किसी शानादार से गांव में घूम रहे हैं।
एक तरफ ठेठ देसी खाना मिल रहा था तो दूसरी तरफ शानदार फाइव स्टार होटल का सेवन कोर्स मील परोसा जा रहा था। कहीं इटालियन तो कहीं मेक्सिकन खाने की बहार थी। और इस सब के साथ बीचोबीच स्थित स्टेज पर कठपुतली का शो चल रहा था। रंगोली खोई हुई सी कठपुतलियों को देख रही थी कि झनक उसका हाथ पकड़े उसे दूसरी तरफ खींच कर ले गयी। उस तरफ कुछ आंचलिक गीतों पर राजस्थानी वेशभूषा में औरतें आंचलिक नृत्य कर रहीं थीं। उनके साथ ही झनक की कुछ सीनियर्स और साथ कि लड़कियां भी थिरक रहीं थी।झनक ने रंगोली का हाथ पकड़ा और वो भी ठुमके लगाने लगी। रंगोली भी उसका साथ देती नाचने में मगन हो गयी। दोनों हंसी से दुहरी होती नाचने में मगन थी की झनक की नज़र उसी सुबह वाले आदमी पर पड़ गयी।
लेकिन इस वक्त ये आदमी अकेला नही बल्कि मेडिकल की ही एक औरत के साथ था। झनक ने उस औरत को ध्यान से देखना शुरू किया लेकिन फिर भी वो याद नही कर पा रही थी कि उस औरत को झनक ने मेडिकल में कब और कहाँ देखा था।
“क्या हुआ झनक? पुरोहित मैडम को काहे घूर रही हो?”
झनक के कंधे पर हाथ रखे वृंदा और भूमि खड़ी हो गईं…
“कुछ नही मैडम! मैं पुरोहित मैडम को पहचान नही पा रही थी।”
“अरे ये हमारे यहाँ के फिजियोलोजी डिपार्टमेंट में टेक्नीशियन हैं ना।तुम लोगों की क्लासेस तो शुरू हो गईं है ना। प्रैक्टिकल यही करवाएंगी।”
झनक को ये तो समझ आ गया कि मैडम मेडिकल की ही है ,लेकिन वो सुबह वाला आदमी जिस ढंग से मैडम के साथ बाहों में बाँहे डाले घूम रहा था… ऐसे लग रहा था जैसे दोनो का काफी करीबी रिश्ता हो। लग रहा था जैसे वो मैडम का पति था!
झनक उसे घूर ही रही थी कि उस आदमी की नज़र भी झनक पर पड़ गयी और वो उसे देखते ही एक कुटिल मुस्कान देकर आगे बढ़ गया।
क्रमशः
aparna…….

Superb and intresting part
Wonderful experience to read again…. welcome Didi…👌⭐💐🙏