
मायानगरी – 11
यूनिवर्सिटी में ऐसी धूम मची थी लग रहा था, यूनिवर्सिटी दिवाली मना रही हो हर कॉलेज की मीनार लंबे-लंबे गेंदे के फूलों की मालाओं से सजी हुई थी। मुख्य द्वार से लेकर असेंबली हॉल तक पूरे रास्ते पर रेड कारपेट बिछाया गया था। जिसके दोनों और कुछ कुछ दूरी पर ऊँचे ऊंचे फाउंटेन लगे थे। जो अभी तो बंद थे लेकिन राजा जी के आते साथ ही यह सारे फाउंटेन एक साथ एक ही म्यूजिक पर शुरू होने वाले थे।
राजाजी से यूनिवर्सिटी कितना प्यार करती है यह कदम कदम पर दिखाई दे रहा था। यूनिवर्सिटी के कर्मियों ने जैसे पिछले 10 दिन से बिना खाए और सोए सिर्फ इन्हीं तैयारियों में अपना एक-एक पल बिता दिया था। और आज उनकी परीक्षा की घड़ी थी। सारे कर्मचारी बड़ी मुस्तैदी से इधर से उधर भागते तैयारियों को अंतिम अंजाम दे रहे थे , कि उसी समय एक हलचल सी मच गई कि राजा साहब आ गए।
यूनिवर्सिटी के मुख्य गेट पर से होते हुए एक के बाद एक 21 एसयूवी अंदर दाखिल हो गई। इन्ही के बीच राजा साहब की रॉल्स रॉयस भी अंदर दाखिल हुई।
एक एक कर गाड़ियों से राजा युवराज सिंह, रानी रूपा , राजा विराज सिंह रानी रेखा , राजा विराट सिंह के साथ समर, काका साहेब, फूफा साहेब, जय और जया उतर गए।
राजा अजातशत्रु सिंह के साथ ही प्रेम और राजा साहब के सशस्त्र बॉडीगार्ड्स की पलटन भी उतर कर उनके पीछे चल पड़ी।
प्रेम को पहले भी राजा ने अपने बॉडीगार्ड से अधिक ही माना हुआ था। और अब वो राजा साहब के साथ उनके और महल के हेड ऑफ सिक्योरिटी का पद भर संभाले हुए थे।
सजे हुए रेड कार्पेट से जैसे ही महल के सदस्यों का जाना शुरू हुआ यूं लगा जैसे आसमान से सितारे उतर आये हों।
एक के बाद एक महल के लोग जैसे जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे उनके सम्मान में कार्पेट के दोनों ओर खड़े लोग उन पर गुलाब की पंखुड़ियों की बरसात करते जा रहे थे।
महल के सदस्यों के बीच ही राजा साहब भी शान से आगे बढ़ते चले जा रहे थे।
वहाँ उपस्थित कर्मचारियों के मन में एक आशंका जाग रही थी कि राजा साहब बस अकेले क्यों आये हैं। रानी बाँसुरी कहाँ हैं?
लोगों में कानाफूसी भी शुरू होने लगी थी किसी ने सवाल किया तो किसी ने उसके मन की शंका का जवाब भी दे दिया।
रानी बाँसुरी को किसी आवश्यक कार्य की मीटिंग के लिए दिल्ली जाना पड़ गया था और इसलिए वो राजा साहब के कार्यक्रम में शामिल नही हो पाई थीं।
वहाँ मौजूद हर किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी।
सभी महल के सदस्यों को अपने इतने पास देख कर लोगों का रोमांच संभल नही रहा था।
राजा अजातशत्रु ने धीरे से अपने बाएं ओर झुक कर समर से कहा …
” समर इतना अधिक ताम झाम करवाने की क्या ज़रूरत थी? तुम जानते हो मुझे इतना ज्यादा पैसे बर्बाद करना पसंद नही है।”
.”जी हुकुम! ये सब यूनिवर्सिटी वालों का किया धरा है,मैंने मना किया था, लेकिन लोग अपने प्रिय राजा के स्वागत के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे। “
राजा ने एक नज़र समर को घूर कर देखा…
“अगर तुम इस रियासत में किसी को कुछ माना कर दो, तो मजाल है किसी की कोई तुम्हारे निर्णय के खिलाफ जा सकें?”
“नही हुकुम! मैं सच कह रहा हूं।”समर मुस्कुरा उठा
राजा साहब आगे बढ़ गए। उन्हें भी ये सब कुछ अच्छा लग रहा था पर इस सब के पीछे बहाया पैसा शायद उनकी आंखों को खटक रहा था। ऐसा ही तो निराला व्यक्तित्व था राजा साहब का, की वो भले दुनिया के लिए कितना कुछ कर जाएं पर कोई उनके लिए कुछ न करे।
स्टेज पर उनके पहुंचतें ही एक बार फिर स्टेज के ऊपर की गयी विशेष व्यवस्था से सभी महल वासियों पर पुष्पवर्षा होने लगी।
सामने बैठे सभी विद्यार्थी खड़े होकर तालियां बजाने लगे।
इन करतल ध्वनियों के साथ ही दक्षिण भारत का विशेष नादस्वरम एक तरफ बजाया जाने लगा।
राजा साहब ने अपना एक हाथ उठा कर उन सभी को रुकने कहा और अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गए।
उनके बैठते ही माइक पर उपस्थित व्यक्ति ने एक एक कर महलवासियों का परिचय देना शुरू कर दिया। जब उसने राजा अजातशत्रु का परिचय देना शुरू किया तब एक बार फिर राजा ने समर की ओर देखा..
“बस करवाओ समर! मुझे इतनी तारीफ सुनने की आदत नही है। “
समर मुस्कुरा कर रह गया, उसने जाकर उनसे कुछ कहा और वो भी मुस्कुरा कर रह गए।
कुछ ही देर में उसने स्वागत आदि निपटने के बाद उदबोधन के लिए राजा अजातशत्रु को मंच पर आमंत्रित किया….
…. अब तक छात्र छत्राओं की जो भी खुसुर फुसुर की आवाज़ें परिसर में गूंज रही थीं एकदम से माइक पर राज साहब को देखते ही शान्त हो गईं।
एकबारगी यूँ लगा जैसे हर एक जोड़ी आंखें सम्मोहित सी हुई राजा साहब पर अटक कर रह गईं हैं।
राजा साहब ने बोलना शुरू किया, तो ऐसा लगा लोगों की सांस सी रुक गयीं।
” मैं अजातशत्रु आप सभी का तहे दिल से स्वागत करता हूँ। “
राजा के इतना कहते ही लोगों में वापस इस बात की खुसफुसाहट शुरू हो गयी कि राजा साहब ने खुद को राजा सम्बोधित क्यों नही किया। खुसफुसाहट की आवाज़ इतनी तेज थी कि राजा साहब के कानों में भी पड़ी और वो मुस्कुरा उठे।
” भाई जब हम उस संसार बनाने वाले और चलाने वाले को राजा शिव, राजा विष्णु, राजा ब्रह्मा, राजा गणेश, राजा कृष्ण नहीं बोलते तो मैं अकिंचन सिर्फ एक इंसान ही तो हूं। मैं कैसे राजा हो गया? लेकिन फिर भी आप सब की खुशी और प्रसन्नता के लिए मैं एक बार फिर शुरू से शुरू करता हूं….
… मैं राजा अजातशत्रु सिंह बुंदेला…..
राजा का इतना कहना था कि जोर की तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा परिसर गूंज उठा । तालियों की आवाज इतनी तेज थी कि राजा को भी शांत होना पड़ा और वह मुस्कुरा कर कुछ घड़ी के लिए चुप रह गया।
आखिर सब को शांत करवाने के लिए उसे अपना हाथ एक बार वापस उठाना पड़ा । सबके शांत होते ही उसने एक बार फिर बोलना शुरू किया।
“मैं राजा अजातशत्रु सिंह बुंदेला…..
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन करता हूं…
जैसा कि आप सभी जानते हैं माया नगरी विश्वविद्यालय बनाने का सपना मेरे दादा साहेब हर्षवर्धन सिंह बुंदेला हुकुम ने देखा था।
उन्होंने अपनी जवानी में वह समय देखा था, जब अंग्रेज हमारे देश पर शासन कर रहे थे। उस समय उन्होंने हमारे यहां के कई विश्वविद्यालयों में सेंध लगाई और हमारे यहां की कई कीमती किताबों पर हाथ साफ कर दिया। मेरा यह मानना है कि पुस्तक प्रेमियों के लिए पुस्तकें कोहिनूर से भी अधिक कीमती होती हैं। यह विचार मेरे दादा हुकुम के भी थे। इसलिए उन्हें कोहिनूर गंवाने से ज्यादा दुख अपने विश्वविद्यालय की किताबों को गंवाने का था।
उनकी स्वयं की सारी पढ़ाई हिंदुस्तान से बाहर हुई थी और इसीलिए वह अपनी अमेरिकन यूनिवर्सिटी की तर्ज पर हिंदुस्तान में भी एक शानदार ऐसी यूनिवर्सिटी बनाना चाहते थे जहां एक ही कैंपस में हर एक कॉलेज मौजूद हो। जहां मेडिकल भी हो इंजीनियरिंग भी हो और आर्ट्स के बच्चे भी वहीं पढ़ते हों। सभी के बीच एक समानता और सहिष्णुता हो । इसके अलावा हर किसी की सुविधा के लिए यूनिवर्सिटी के बीचोंबीच एक सेंट्रल लाइब्रेरी मौजूद हो , जहां सिर्फ प्रोफेशनल कॉलेजेस की ही नहीं बल्कि हर एक किताब का मिलना मुमकिन हो।
मेरे दादा साहेब हुकुम के इस सपने को मेरी दादी हमेशा बचपन में मुझे सुनाया करती थी। मेरे पिता भी चाहते थे यूनिवर्सिटी बने और इसके लिए उन्होंने अपने तरीके से काफी सारी कोशिशें की भी और आखिर उनकी कोशिशों को रंग मिला जब मैंने और मेरे भाईयों यानी युवराज चंद्रगुप्त सिंह , राजा विराज सिंह, राजा विराट सिंह ने मिलकर उनके सपनों को पूरा कर दिया।
आप सबको लगेगा एक राज परिवार के लिए विश्वविद्यालय खोलना कौन सी बड़ी बात है? लेकिन ऐसा नहीं है, विश्वविद्यालय खोलना कोई हंसी खेल नहीं। इस विश्वविद्यालय के पीछे जाने हम सब की कितनी जागती रातें छिपी हैं।
अपने परिवार को अकेले कमरे में छोड़ हम सब भाई और हमारे मित्र समर और प्रेम जाने कितने कितने दिन कार्य योजनाएं बनाने और उनका पालन करने में ही लगा देते थे।
विश्वविद्यालय खोलने के पीछे हमने मेहनत जरूर की लेकिन आज आप इतने सारे विद्यार्थियों को यहां पर पिछले कुछ सालों से खुशी से पढ़ते और आगे बढ़ते देखकर हम लोगों को जो खुशी मिल रही है वह शब्दों में बयान नहीं की जा सकती।
हमारे यहां से पढ़ कर निकले बच्चे आज अच्छे संस्थानों में नौकरी कर रहे हैं। कितने ही बच्चे अपना खुद का बिजनेस डालकर आगे बढ़ रहे हैं, यह सब देख कर ऐसा लगता है कि हमने कुछ सालों पहले जो बीज बोए थे आज वो फसल सुनहरी खड़ी लहलहा रही है । और उस फसल को देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है।
वैसे तो सारे ही विभागों को खोलने के लिए हमें काफी मेहनत लगी लेकिन सबसे ज्यादा व्यवस्थाएं मेडिकल कॉलेज को खोलने के लिए करनी पड़ी । किसी भी जगह पर मेडिकल कॉलेज को खोलने के लिए उसके साथ लगा हॉस्पिटल होना बहुत जरूरी है। और इन्हीं सब बातों में काफी भारी कठिनाई का अनुभव हमने महसूस किया और आप समझ सकते हैं इसीलिए मेडिकल कॉलेज का नाम मैंने मेरी धर्मपत्नी के नाम पर रखा है क्योंकि जिस तरह मेडिकल कॉलेज कठिन होता है उसी तरह हमारी श्रीमती जी भी हैं।”
राजा के ऐसा कहते ही स्टेज पर बैठे युवराज और बाकी लोग ज़ोर से खिलखिला उठे। इसके साथ ही सामने बैठे प्रोफेसर लेक्चरर और विद्यार्थियों में भी खिलखिलाहट का एक दौर चल उठा।
” आप सब विद्यार्थी सोच रहे होंगे कि राजा अजातशत्रु यह सारी बातें हमें क्यों बता रहे हैं ? तो उसके पीछे मुख्य कारण यह है कि इस विश्वविद्यालय को खोलने का सबसे मुख्य उद्देश्य यही था कि बच्चे आसानी से और कम पैसों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। हमारे विश्वविद्यालय में बहुत सी फ्री सीट्स यानी निशुल्क सीट भी मौजूद है और जो बच्चे बहुत अच्छा स्कोर नहीं भी कर पाते लेकिन फिर भी वह यहां पढ़ना चाहते हैं वह हमारे यहां का एक बहुत सामान्य सा एंट्रेंस एग्जाम अलग से दे कर भी हमारी यूनिवर्सिटी का हिस्सा बन सकते हैं।
मैं खुद भी विद्यार्थी रहा हूं और जहां तक मुझे याद है मैं अपने कॉलेज में बहुत ही ज्यादा ब्रिलियंट विद्यार्थी नहीं था। लेकिन राज परिवार का होने के कारण मुझे कभी कहीं पर भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए कोई दिक्कत नहीं आई। लेकिन मेरे साथ पढ़ने वाले कई ऐसे विद्यार्थी भी थे, जो पढ़ने में अच्छे थे लेकिन बहुत ज्यादा अच्छे नहीं थे। इसके साथ ही वह सामान्य परिवार के थे। तो ऐसे बच्चों को आगे बढ़ने के लिए बहुत से दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उनकी कठिनाइयों को मैंने बहुत करीब से देखा है ।वह सारे मेरे दोस्त थे, अभिन्न मित्र थे। बावजूद उन्होंने मेरे द्वारा पढ़ाई के लिए पेश की गई मदद को ठुकरा दिया , क्योंकि इससे उनका स्वाभिमान आहत होता था। और उसी समय मेरे दिमाग में यह बात आई कि हमारे देश में तीन तरह के वर्ग मौजूद है और इनमें सबसे ज्यादा परेशान जो है वह मध्यमवर्गीय परिवार ही होते हैं। उनके बच्चों को सरकार की तरफ से भी कोई विशेष सुविधा नहीं मिलती, क्योंकि वह गरीबी रेखा से नीचे नहीं है। अगर उन्हें एक सम्मान भरी जिंदगी जीना है तो उनका बचपन सिर्फ और सिर्फ अच्छे नंबर पाने के लिए मेहनत करने में ही बीत जाता है। इसके बावजूद आज कंपटीशन इतना अधिक बढ़ गया है कि उनमें से अधिकतर युवा एक या आधे नंबरों से ही अच्छे कॉलेज की सीट या सरकारी नौकरियों से वंचित रह जाते हैं ।
तो क्या अच्छी जिंदगी पाने के लिए एक अच्छी नौकरी पाने के लिए एक मध्यमवर्गीय युवा को हमेशा ब्रिलियंट से भी ऊपर होना जरूरी है? और अगर वह नहीं हो पाया तो क्यों उसके हाथ से अच्छी शिक्षा और अच्छी नौकरियों के अवसर चूकते चले जाते हैं।
आज स्कूलों में जो बहुत होशियार बच्चे हैं वह बहुत ज्यादा अच्छा स्कोर करके अच्छे कॉलेज में अच्छी सीट पा लेते हैं। जो गरीबी रेखा के नीचे के बच्चे हैं उन्हें स्कॉलरशिप का फायदा मिल जाता है। लेकिन जो बीच में बचते हैं उनका कहीं कुछ नहीं हो पाता। यह वह बच्चे होते हैं जो 90% लाते लाते रह जाते हैं। 75% से 90% के बीच वाले यह बच्चे एक तरह से अधर में झूलते रह जाते हैं ।यह वह बच्चे हैं जिन्हें थोड़े से गाइडेंस की जरूरत है। और जिसके बाद यह अच्छे कॉलेज की अच्छी सीट तक पहुंचकर अच्छी पढ़ाई करके अपना भविष्य संवार सकते हैं। मायानगरी विश्वविद्यालय की स्थापना का एक सर्व प्रमुख उद्देश्य यही था, कि मध्यमवर्गीय परिवार के यह बच्चे जो कभी पैसों की कमी के कारण तो कभी 1-2 नंबरों के कारण अच्छे कॉलेज और अच्छी सीट्स को चूक जाया करते थे, उनके लिए उच्च शिक्षा का प्रबंध किया जा सके। और मुझे आज यहां यह देखते हुए खुशी हो रही है कि मेरी इस यूनिवर्सिटी में ऐसे सभी बच्चे पहुंचकर अपने सपनों को नया रंग दे रहे हैं।
इनके सपनों की उड़ान कभी बाधित ना हो इसी आशीर्वाद के साथ और ढेर सारे प्यार और दुआओं के साथ मैं राजा अजातशत्रु आप सभी नए बच्चों का अपनी यूनिवर्सिटी में स्वागत करता हूं ।
नन। और आप सभी से वादा करता हूं कि इस यूनिवर्सिटी में आपको किसी भी तरह की कमी महसूस नहीं होने दूंगा। बावजूद यूनिवर्सिटी काफी बड़ी है बहुत सारे विभाग हैं इसलिए कुछ ना कुछ कमी रह जाना लाजिमी है। तो अगर आप में से किसी को भी इस पूरे विश्व विद्यालय के किसी हिस्से में किसी भाग विभाग में कोई भी कमी कभी भी महसूस होती है , तो मेरे ऑफिस के दरवाजे आप सभी के लिए हमेशा खुले हैं। मैं एक बात और आप सब को बताना चाहता हूं, कि भले ही मुझसे मिलने के लिए लोगों को अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है, लेकिन अगर आप में से एक भी विद्यार्थी मुझसे मिलने आना चाहता है, तो उसे अपॉइंटमेंट लेने की कोई जरूरत नहीं है। आप सीधे मेरे ऑफिस में आ सकते हैं । अपने नाम की पर्ची आपका कॉलेज और विषय की लिखी पर्ची मेरे पास भिजवा देने से मैं बिना अपॉइंटमेंट लिए ही आपकी समस्याओं का समाधान करने के लिए तुरंत प्रस्तुत हो जाऊंगा । आपको जो भी समस्या हो, आप निर्भीक होकर मुझसे कह सकते हैं। मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि आपकी हर समस्या का समाधान मैं जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी करूं।
आज मैंने कुछ ज्यादा ही समय ले लिया अब इसके बाद हम सब सेंट्रल लाइब्रेरी का उद्घाटन करेंगे और उसके बाद आप सभी को आज महल की तरफ से दावत दी जाएगी। आज रात का भोजन आप सभी का महल परिसर में होगा, इसके लिए आप सभी आमंत्रित हैं। “
जब तक राजा अजातशत्रु बोलते रहें सारे विद्यार्थी मंत्रमुग्ध से उन्हें सुनते रहे। राजा साहब ने अपना व्याख्यान पूरा किया और हाथ जोड़ कर एक बार सब की तरफ देखने के बाद अपनी जगह पर आकर बैठ गए।
उनके माइक से हटकर चले जाने के बावजूद कुछ समय तक उनका प्रभाव जैसे उस पूरे बड़े से हॉल में समाया रहा। उनके बाद आने वाले व्यक्ति ने माइक में क्या बोला क्या नहीं, किसी ने शायद ही सुना हो। इसके बाद महल के सम्मानीय सदस्य एक-एक कर आते गए और विद्यार्थियों के लिए कुछ चंद पंक्तियों की वेलकम स्पीच बोलते चले गए।
हर एक स्पीच के बाद विद्यार्थियों ने भर भर कर तालियां बजाई। विद्यार्थियों के उत्साह में कहीं से कोई कमी नजर नहीं आ रही थी। लेकिन रंगोली का ध्यान और किसी पर था ही नहीं।
राजा अजातशत्रु को देखने और सुनने के बाद ना उसने किसी और की तरफ ध्यान से देखा और ना ही किसी को सुना।
लेकिन उससे ठीक दो पंक्ति पीछे बैठा कोई निर्निमेष पलकों से सिर्फ उसे ही देख रहा था।
राजा विराट सिंह के बोल कर अपनी जगह जाने के बाद माइक पर खड़े व्यक्ति ने सबको सेंट्रल लाइब्रेरी चलने के लिए कहा, और इसके बाद सबसे पहले राजा अजातशत्रु ही मंच से उतरकर आगे बढ़ गए। उनके पीछे सारे महलवासी और उन सभी के बॉडीगार्ड्स भी तेज तेज कदमों से सेंट्रल लाइब्रेरी की तरफ चल पड़े।
उन सभी के पीछे विद्यार्थियों का जत्था भी उसी तरफ बढ़ने लगा।
झनक और रंगोली भी उस तरफ बढ़ रहे थे , तभी उस भीड़ भाड़ में चलते हुए एक आदमी उन लोगों के साथ ही लग कर चलने लगा…
” मेडिकल फर्स्ट ईयर में हो?”
उसके सवाल पर झनक और रंगोली उसे चौक कर देखने लगे। झनक ने उसे देखकर हां में सिर हिला दिया…
” झनक वेद तुम्हारा ही नाम है।”
झनक ने वापस हाँ में सर हिला दिया। लेकिन उसके माथे पर प्रश्न पूछती लकीरें खिंच गई।
” मेडिकल में टॉप किया था तुमने?”
” हां!! लेकिन आप इतना सब कैसे जानते हैं? “
” ट्वेल्थ में भी तुम डिस्ट्रिक्ट टॉपर थी मेरा मतलब टॉप टेन में थी।”
” हां लेकिन आप यह सब कैसे जानते हैं ?पहले इस बात का जवाब दीजिए!”
” यह मेरा कार्ड रखो। अगर कुछ पैसे कमाने का विचार हो तो मुझे इस नंबर पर कॉल करना। “
” आपको ऐसा क्यों लगता है कि मुझे पैसे कमाने की जरूरत है? मेरे मॉम डैड दोनों डॉक्टर है हमारा खुद का नर्सिंग होम है और मुझे किसी चीज की कमी नहीं है वो कहते हैं ना मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा होना मैं सोने का चम्मच लेकर पैदा हुई हूं , सो गेट लॉस्ट!”
” गलती कर रही हो मुझे यहां से भगा कर। वैसे जब अपने कमरे में बैठना तो आराम से सोचना कि तुम्हारे मां-बाप कितनी भी पैसे भेजते पर फर्स्ट ईयर में पढ़ने वाली बच्ची को आईफोन का लेटेस्ट मॉडल तो नहीं दे सकते? वुडलैंड के जूते लिवाइस की टीशर्ट, डुसॉल्ट अपेरल डेनिम ,गुची का परफ्यूम, रेबन के ग्लासेस यह सब तो तुम्हारे डॉक्टर पेरेंट्स भी हर महीने नहीं दिलवा सकते ना। तो अगर स्टाइल से भरी एक लैविश जिंदगी जीना चाहती हो तो मेरे नंबर पर कॉल करना। तुम्हें ज्यादा कोई मेहनत करने की जरूरत नहीं है। बस अपना दिमाग यूज करना है वह भी थोड़ा सा। “
झनक ने एक नजर उस आदमी को घूर कर देखा और उसके कार्ड को अपनी हथेली में मरोड़ते हुए आगे बढ़ गई…
रंगोली को अब तक उन दोनों की कोई भी बात ढंग से समझ में नहीं आई थी। लेकिन उसे यह समझ में आ गया था कि वह आदमी गलत प्रलोभन दे रहा है। वह भी भागते हुए झनक के साथ साथ आगे बढ़ती चली गई…
” तुमने उसका कार्ड फाड़ कर फेंका क्यों नहीं? रख क्यों लिया?”
” देखना चाहती हूं। है कौन यह लंगूर?”
” तू भी ना झनक!!! क्यों इन सब पचड़ों में पड़ती है? फेक दे उसका कार्ड । चल जल्दी जल्दी आगे चले। राजा साहब पता नहीं कहां निकल गए? बीच में इतने लोग आ गए हैं कि वह नज़र भी नहीं आ रहे हैं।”
रंगोली झनक का हाथ थामे तेजी से आगे कदम बढ़ाते बढ़ती चली गई….
झनक ने एक नजर मुड़ कर देखा, वह आदमी अब भी वही खड़ा उसे घूर रहा था….
क्रमशः
aparna….

Nice part
Outstanding excellent and intresting part
Wah mayangri ki b entry ho gyi..badhayi