
सर्वगुण संपन्न
कुमुद को गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर खुद पर
काबू कर उसने सुरेन की तरफ देखा और हल्के से
मुस्कुरा दी.. -“नैना को यही आशीर्वाद देती हूँ कि
उसे अपने चाचा जैसा ही सर्वगुण सम्पन्न पति मिले..
कुमुद की शादी को लगभग बाइस साल हो चुके थे, दो महीने बाद उसकी तेईसवीं सालगिरह थी…
घर में सभी खुश थे, उसकी जेठानी का कहना था बहुत अच्छे से मनाएंगे.. लेकिन कुमुद का कहना था-
“तेईसवीं ही तो है दीदी, पच्चीसवीं मनाएंगे.. इस बार बस घर परिवार के लोग मिल कर मना लेंगे !”
चाय छान कर कुमुद ने अपनी जेठानी को कप पकड़ाया और अपना कप लेकर रसोई से बाहर चली आयी..!
उसकी जेठानी चाय पीते हुए अपना मोबाइल देखने लगी और कुमुद अपनी शादी की यादों में खो गयी..
हंसती खिलखिलाती कुमुद का जीवन ही बदल गया था जैसे.. वो पढ़ना चाहती थी, लेकिन छोटे शहर के कायदे कानूनों ने उसकी कॉलेज की बीए की डिग्री के बाद ही उसके पैरो में बंधन डाल दिया, विवाह का !
सुरेन स्वभाव के अच्छे थे, बल्कि बहुत अच्छे थे, लेकिन कुछ बातों में बहुत ज़िद्दी,बहुत अड़ियल थे!
अपने घर परिवार से बहुत जुड़े थे, हद से ज्यादा ! लेकिन उनका यही जुड़ाव कभी कभी कुमुद को दिखावा सा लगा करता था!
उसे हमेशा लगता था कि वो तो कभी अपने माता पिता के प्रति प्रेम इस कदर ज़ाहिर नहीं करती थी, लेकिन सुरेन हर बात पर उसे सिर्फ अपने परिवार के प्रेम की पोथी पढ़ाने की कोशिश ही किया करते थे..
शादी के शुरुवाती दिनों में जब कभी किसी व्रत त्यौहार में मायके से उसका बुलौवा आता, उसकी सास के मना करने के पहले सुरेन मना कर देता..।
वो कलप कर रह जाती..
शुरुवाती दिन थे उसका मन भी मायके के लिए तरसता था।
लेकिन ये बात सुरेन नहीं समझता था। शायद वो अपने परिवार वालों के सामने ये जताना चाहता था कि वो बीवी का गुलाम नहीं, और बस इसलिए कुमुद पर कुछ ज्यादा ही कड़क हो जाया करता था..।
लेकिन अगर इसी सच्चाई को वह कुमुद से सीधे तौर पर कह देता, तब शायद वह भी समझ जाती। लेकिन अपने मेल ईगो को सेटिस्फाई करने के लिए उसने कभी सच्चाई कुमुद के सामने नहीं कही।
वह उसे वाकई बहुत प्यार करता था, लेकिन उसके मायके जाने के नाम पर उससे बेवजह उलझ जाया करता था। और उस वक्त उसके मुंह से दुनिया भर की अनाप-शनाप बातें निकला करती थी।
कुमुद की पहली राखी थी, उसकी मां ने उससे कहा-
“तुम्हारे दोनों भाई तुम्हें लेने आएंगे, कम से कम हफ्ते भर तो हमारे साथ रहोगी ना?”
” हां क्यों नहीं मां, पहले राखी है, हफ्ते भर क्या पूरे दस दिन रुकेंगे। वैसे भी मेरी जेठानी अपने मायके नहीं जाती, उनके भाई खुद राखी बंधवाने चले आते हैं।”
कुमुद ने बड़े प्यार से यह कहकर फोन रख दिया। दो दिन बाद उसके दोनों भाई उसे लेने के लिए चले आए। कुमुद ने एक दिन पहले ही सुरेन से कहा था कि उसे राखी के लिए अपने मायके जाना है। लेकिन शायद अपने काम की व्यस्तता में सुरेन ने उसकी बात पर कान नहीं दिया था।
खैर दूसरे दिन जब दोनों भाई आए, कुमुद बड़े उत्साह से अपने भाइयों के सेवा जतन में लग गई। उसकी सास और जेठानी भी खुशी-खुशी उसका साथ दे रही थी। दोनों भाई अपनी बहन के ससुराल आए थे। इसलिए बिल्कुल संस्कारी बने चुपचाप बैठे थे। और जो सामने आ जाता उसी के पैर छुए जा रहे थे।
इन्हीं सबके बीच दोपहर के खाने के वक्त सुरेन चला आया। सुरेन भी अपने दोनों सालों को देखकर खुश हो गया।
बड़े प्यार से उनसे बैठ कर बातें करने लगा। कुमुद और उसकी जेठानी ने सबका खाना एक साथ लगा दिया। खाना खाते हुए कुमुद का छोटा भाई चहक कर बोल उठा -” दीदी अम्मा ने तुम आने वाली हो, इसलिए शाम को इंद्राहर बनाने की तैयारी की है, अब मन भरकर इंद्राहर खाना घर चल के..।
उसकी बात सुनकर कुमुद भी खुश हो गई। लेकिन सुरेन के चेहरे पर बारह बज गए। उसने कुमुद की तरफ देखा और उसका देखना देखकर ही कुमुद सहम गई।
उसे समझ में आ गया कि सुरेन को कोई बात खल गई है। खाना निपटने के बाद कुमुद रसोई में कुछ काम कर रही थी कि सुरेन वहाँ चला आया।
” क्या सुन रहा हूं मैं?”
” क्या सुन रहे हैं आप?”
” यह दोनों कब तक रुकेंगे?”
सुरेन का इस तरह पूछना कुमुद को खल गया।
” शाम को ही हम तीनों निकल जाएंगे। एक घंटे का तो रास्ता है मेरे घर का।”
” तीनों निकल जाएंगे मतलब?”
“मतलब आपको बताया तो था। एक हफ्ते के लिए राखी पर घर जा रही हूं।”
“राखी तो एक ही दिन की होती है। एक हफ्ते के लिए जाने की क्या जरूरत है? अम्मा से पूछा है तुमने?”
” अभी बता दूंगी अम्मा जी को।”
“बता दूंगी क्या होता है? तुम्हें उनसे पूछ कर अपने भाइयों को बुलाना चाहिए था। वह इस घर की मालकिन है, उनकी इच्छा के बिना यहां हम में से कोई कुछ भी नहीं करता। तो तुमने यह कैसे सोच लिया कि तुम अपनी मर्जी से अपने मायके आना-जाना कर लोगी?”
” इसमें इतना नाराज होने की क्या बात है? मैं अभी अम्मा जी से जाकर बात कर लेती हूं।”
” अब तुम्हारे बात करने का मतलब ही क्या रहा? अब तो तुमने अपने भाइयों को बुला लिया है। तुम्हें कुछ समझ में आता भी है कि नहीं? ससुराल में किस तरीके से रहना होता है, जानती हो कि नहीं? तुम्हारी मां ने तुम्हें कुछ सिखाया नहीं।
अरे बेवकूफ, तुम्हारी मां भी अगर तुम्हारी तरह हर महीने दस दस दिन मायके चली जाती तो, तुम तीनों को पाल पोस पाती?
ससुराल के कुछ नियम कायदे होते हैं, तुम जो थी जैसी थी अपने मायके में थी। अपने उसे लड़कपन को अपने ससुराल आकर भूल जाओ।
एक बात गांठ बांध लो इस घर की तुम कुत्ता हो, मैं रोटी दूंगा,तुम्हें खाना होगा। जहां बांधूंगा वहीं बंधे रहना होगा। आई बात समझ में?”
कुमुद की आंखों में अपमान से आंसू छलक आये।
उसने पलट कर देखा, रसोई के ठीक बाहर वाले कमरे में बैठे उसके दोनों भाइयों के कानों में सुरेन की कही एक-एक बात जा रही थी।
बाहर वाले कमरे में ही उसकी सास बैठी पान लगा रही थी। लेकिन बेटे के गुस्से के सामने आकर उसे रोकने की शायद उन्हें भी हिम्मत नहीं थी। जेठानी अपने कमरे में बिस्तर पर टांगे फैलाए बैठे मोबाइल पर रील देख रही थी। उनके लिए तो यह एक सुस्वादु तमाशा ही था।
उनकी दो साल की बच्ची अचानक कुनमुनाने लगी और उसे खाना खिलाने के लिए उन्हें रसोई में आना पड़ा।
लेकिन तब तक सुरेन अपना सारा जहर उगल कर अपने कमरे में चला गया था। कमरे में जाकर उसने दरवाजा जोर से बंद किया। दरवाजा बंद करने की आवाज कुमुद के साथ-साथ उसके दोनों भाइयों के कानों तक चली गई..।
अपने से छोटे दोनों भाइयों के सामने कुमुद को जाने में शर्म सी आने लगी थी। पता नहीं वह दोनों क्या सोचेंगे, शादी को ले देकर पांच महीना बीता था..।
वो शर्म से बाहर ही नहीं निकली थी, और फिर उसके भाई उसे लिए बिना ही लौट गए थे….
ना कुमुद ने सुरेन से कुछ कहा ना सुरेन ने कुमुद से..।
लेकिन रात बीतते ही अगले दिन सुरेन वापस चहकता हुआ पहले वाला सुरेन बन गया। लेकिन कुमुद सामान्य नहीं हो पायी..।
उसे सुरेन से बात करने का मन नहीं हो रहा था। लेकिन सुरेन से यह अबोला सहन नहीं हो रहा था। उसने आगे पीछे घूम घूम कर हाथ पैर जोड़कर कुमुद को मना ही लिया, और फिर उसे तैयार होने कमरे में भेज दिया।
बिना मन के हाथ मुंह धो कर कुमुद जैसे तैसे कपड़े बदल कर बाहर आई और सुरेन उसे साथ लेकर बाहर घूमने चला गया..।
कुमुद को पानी पुरी बेहद पसंद थी।
उसे पानी पुरी खिलाकर, कुल्फी खिलाकर सुरेन अपनी तरफ से उसे मनाने की कोशिश करता रहा, और कुमुद भी अपने गुस्से से खुद थक गई और हल्के से मुस्कुरा उठी। लेकिन उसके दिल पर जो खरोंच लगी थी, वह सुरेन फिर कभी भर नहीं पाया..।
हालांकि दो दिन बाद पड़ने वाले राखी के त्योहार पर कुमुद की सास ने कुमुद को सुरेन के साथ ही उसके मायके भेज दिया। मायका सिर्फ घंटे भर के रास्ते पर था, इसलिए सुरेन के साथ घर की गाड़ी में ही वह दोपहर तक वहां पहुंच गई, राखी बांधकर और सबसे मिलकर एक डेढ़ घंटा वहां बिता कर वापस लौट आई।
लेकिन यह उसके लिए कहीं से भी त्यौहार मनाना नहीं था। यह तो बस एक खाना पूर्ति थी, जो उसकी सास ने अपनी समझदारी दिखाते हुए कर दी थी। लेकिन इस खानापूर्ति से कुमुद के अंदर कुछ टूट कर रहा गया.. ..
दिन बीतते रहे।
सुरेन उसे बहुत प्यार करता था, उसके बिना रह नहीं पाता था लेकिन अगर उसके और उसकी जेठानी के बीच कोई कहासुनी हो जाये, या सास से कुमुद की अनबन हो तो वो बिना कुमुद का पक्ष सुने हर बार दोष कुमुद के मत्थे मढ़ देता और उसे सब के बीच चार बातें सुना जाता..।
कुमुद हर बार मन मार कर रह जाती।
ऐसा नहीं था कि वह अपना पक्ष नहीं रखती थी, या चुप बैठ जाती थी। वह भी बराबरी से सुरेन से सवाल जवाब करती थी, लड़ाई करती थी। लेकिन उसमें सुरेन का दिमाग इतना खराब होता था कि अगर कुमुद समय पर रुक ना जाए तो सुरेन दुनिया भर के सामने उस पर हाथ भी उठा सकता था।
और बस इसी बात से कुमुद घबराती थी।
उसे लगता था अगर एक बार इनका हाथ सबके सामने उठ गया तो उसकी क्या इज्जत रह जाएगी? और बस अपनी झूठी इज्जत बचाए रखने के लिए वह अक्सर सुरेन के चीखने चिल्लाने पर खामोश हो जाती थी।
और उस जगह से ही हट जाती थी।
इस बात का असर यह हुआ कि सुरेन को समझ में आने लगा कि वह चीख चिल्ला कर अपनी बात मनवा सकता है। और धीरे-धीरे कुमुद ने अपने अंदर दुख का ऐसा समंदर इकट्ठा कर लिया कि उसका नमक बढ़ते हुए उसके खून को खारा करने लगा..
सिर्फ बत्तीस की उम्र में उसे उच्च रक्तचाप हो गया..।
कुमुद के मायके में सब सुरेन को दिल जान से मानते थे। उसका कुछ ज्यादा ही सम्मान किया करते थे। कुमुद के परिवार वालों को सुरेन का स्वभाव मालुम था, लेकिन उसके पीछे सबको यही लगता था कि सुरेन अपने परिवार को अपने कुछ ज्यादा ही महत्व देता है। और देखा जाए तो यह कोई गलत बात भी नहीं।
कुमुद जब कभी एक दिन के लिए अपने मायके जाती तो उसकी मां उसे सुरेन से बनाकर चलाने की ही घुट्टी पिलाया करती थी। अब कुमुद ने भी शिकायते करना छोड़ दिया था।
अब उसके पास वैसे भी ज्यादा सोचने का वक्त नहीं बचा था। गोद में छोटे से गोलू के आ जाने के बाद उसका सारा दिन उसी के पीछे बीतने लगा था।
सुरेन में भी पिता बनने के बाद बदलाव नजर आने लगे थे। लेकिन अब भी कुमुद का मायके जाना, पहले की तरह ही दुष्कर था।
वह जब जाती, जितने दिन के लिए जाती, सुरेन साथ जाता, वहीं रुकता और उसे साथ लिये वापस आता।कुमुद को पहले पहल यह बात बहुत खटकती थी कि मायके में भी वह अपने हिसाब से नहीं रह सकती।
हर वक्त सुरेन की मौजूदगी उसे मायके में भी त्रस्त किए रहती, लेकिन अब धीरे-धीरे उसे आदत पड़ने लगी थी।
और अब तो ससुराल में काफी सारी बातें बदलने लगी थी..।
शायद हर एक के घर ऐसा ही होता होगा। लड़कियां जब नई नई ससुराल जाती है, उस वक्त ससुराल वाले सबसे ज्यादा नियम कायदे बताते हैं, और लड़कियों के लिए उन कायदों को मानना बेहद कठिन होता है। जिस वक्त उन्हें सबसे ज्यादा मायके की याद आती है, उस वक्त ससुराल से मायके जाने की इजाजत नहीं मिलती।
लेकिन समय के साथ सब कुछ बदलने लगता है। और एक समय ऐसा आता है कि वही लड़कियां जो ससुराल में सर झुकाए हर किसी की बात पर चुपचाप हामी भर दिया करती थी, अब घर की मालकिन होने लगती है।
अब सब कुछ उनके हाथ में होने के बावजूद, सारी स्वतंत्रता के बावजूद, अब उनके पास ही मायके जाने का वक्त नहीं बचता।
बड़ी अजब है संसार की रीत..।
कुमुद के ससुराल में भी उसे वैसे कोई शिकायत नहीं थी। जो शिकायत थी, वह ऐसी भी बड़ी नहीं थी कि इसके लिए वह धरना देकर बैठ जाए।
धीरे-धीरे सुरेन के स्वभाव को समझ कर उसने खुद को ढाल लिया था। उसने भी अपने आप को मना लिया था कि शायद सुरेन वाकई उसे इतना प्यार करता है कि एक पल भी उसके बिना चैन से रह नहीं पाता।
जेठानी उसकी जरा कठोर स्वभाव की थी, लेकिन अब उनके स्वभाव से भी कुमुद ने समझौता कर लिया था।
हां घर के बच्चे उससे बहुत प्यार करते थे। उसकी जेठानी की एक बेटी थी और एक बेटा और दोनों कुमुद पर जान लुटाते थे।
जेठानी की बेटी नैना से कुमुद को विशेष लगाव था। जिस वक्त वह ब्याह होकर इस घर में आई थी, तब वह बच्ची सिर्फ 2 साल की थी, और उस छोटी गोलगुथनी को देखकर कुमुद अक्सर अपना दुख भूल जाया करती थी। और इसलिए उससे कुमुद का लगाव कुछ अलग ही था..।
देखते ही देखते नैना चौबीस साल की हो गई थी, उसका खुद का गोलू अब बीस साल का हो चुका था, कॉलेज जाने लगा था…
इन्हीं सब ख़यालो में खोयी कुमुद खाली प्याला पकडे खिड़की से बाहर उगती बेलों को ध्यान से देख रही थी.. की उसकी जेठानी ने उसे टोक दिया..
“कहाँ ध्यान है कुमुद.. चाय तो ख़त्म हो गयी ! और ले आऊँ ?”
कुमुद चौंक कर कुर्सी से उठ बैठी..
“नहीं दीदी, जाती हूँ सब्जी बना कर रख देती हूँ, फिर इनके और भाई साहब के आने का टाइम भी हो गया है !”
“हाँ तुम सब्जी छौंक लो, मैं छत से कपड़े उतार लाती हूँ.. अब ये दोनों आये तो पता चले, शुक्ला जी के घर से क्या जवाब आया ?”
“जवाब पॉज़िटिव ही आएगा दीदी, हमारी नैना में कोई कमी ही नहीं, जो वो लोग मना करे, और फिर लड़के ने खुद नैना को पसंद किया है.. !”
“हाँ कुमुद.. बस इसी बात की आस है कि लड़के को नैना पसंद है.. !”
कुछ देर में ही सुरेन और वीरेन घर आ गए.. और दोनों अपने साथ खुशखबर लेकर आये..
दो दिन बाद ही शुक्ला परिवार से लोग नैना को देखने और रोके की रस्म करने आ गए..
पूरा परिवार खुश था..
कुमुद और उसकी जेठानी सुमन एक दिन पहले से तैयारियों में लगी थी.. उस दिन तो सुबह से साँस लेने की फुरसत ना थी..
घर के सभी लोग उत्साहित थे, सब अंदर बाहर हो रहे थे, कि कब किस वस्तु की ज़रूरत आन पड़े..
नैना का होने वाला दूल्हा नहीं आया था..
नैना की होने वाली नन्द और नन्दोई उसके कमरे में ही उससे मिल गए थे, बाद में ससुर जी के बुलाने पर वो बाहर चली आयी थी..
कुमुद चाहती थी, नैना साड़ी पहन ले लेकिन नैना सूट में ही आराम महसूस कर रही थी, इसलिए फिर कुमुद ने उसे नहीं टोका….
मुहूर्त देख कर नैना का शगुन हो गया..
उसे आशीर्वाद देकर उसके ससुराल की टोली वापस लौट गयी..
उन लोगो के लौटते ही सबकी जान में जान आयी..
सब निढाल से इधर उधर जहाँ जगह मिली पसर गए..
अब घर के सबसे बड़े वीरेन और सुमन ही थे, दो साल पहले ही कुमुद की सास फिर ससुर गुज़र गए थे..
लेकिन अब भी कुमुद अपने जेठ के सामने हल्का घूंघट लेती थी..
वो भी सबको चाय देकर अपना प्याला लिए अपने कमरे में चली आयी..
वैसे तो आज सब बड़े खुश थे लेकिन सबसे ज्यादा खुश सुरेन था..।
उसकी आंखों का तारा थी, नैना! वो नैना से बेहद प्यार करता था। इतना ज्यादा प्यार करता था कि जिस वक्त कुमुद माँ बनने वाली थी, उसने कुमुद से कह दिया था कि तुम्हें बेटी नहीं होनी चाहिए। हमारे घर में हमेशा एक ही बेटी रहनी चाहिए, जिससे हम उसे पलकों पर बैठा कर पाल सके..।
कुमुद को उस वक्त बुरा तो लगा लेकिन नैना के प्रति सुरेन का प्यार भी वो समझती थी, इसलिए मुस्कुरा कर रह गयी..
आज भी सुमन से ज्यादा भावुक सुरेन हुआ जा रहा था… यहाँ तक की जिस वक्त नैना के ससुर ने उसके आंचल में फल नारियल और रूपये डाले, सुरेन की आंखे भर आयी.. उसके ठीक बगल में खड़ी कुमुद ने उसकी बांह पर अपनी हथेली रख दी..
वो कमरे में चाय का प्याला लिए बैठी थी कि सुरेन भी अपनी चाय लेकर चला आया..
“जानती हो कुमी, आज कितना खुश हूँ मैं.. बिलकुल जैसा घर द्वार चाहिए था, वैसा मिला है मेरी नैना को.. !”
कुमुद मुस्कुरा उठी..
“ऐसा लग रहा है हमारी राजकुमारी हमारे घर से निकल कर महल में जा रही है.. दिल कर रहा है पूरी दुनिया को चीख चीख कर ये ख़ुशी बताऊँ..।
तुम जानती हो पांच तो गाड़ियां है उनके घर.. अरे बहुत ही बड़े लोग है.. सतना के पास का एक पूरा गांव है उनका..।
वो और भी बहुत कुछ बोलता रहा, उसका उत्साह उसकी प्रसन्नता उसके हर ओर छोर से बह रही थी..।
कुमुद को अचानक अपने पिता याद आ गए, जिनसे शादी के बाद कभी वो तसल्ली से बैठ कर बात तक नहीं कर पायी..
और कुछ सालों पहले वो भी हृदयाघात से चल बसे..
वो एकटक सुरेन को देख रही थी..
“क्या हुआ कुमुद.. तुम भी तो कुछ कहो, हमारी नैना के लिए.. !”
अपने पिता को याद कर, सुरेन की अतीत में की हुई कारगुज़ारियां याद कर कुमुद को गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर खुद पर काबू कर उसने सुरेन की तरफ देखा और हल्के से मुस्कुरा दी..
“नैना को यही आशीर्वाद देती हूँ कि,
उसे अपने चाचा जैसा ही सर्वगुण सम्पन्न पति मिले..!”
इति..

Kumud ko dekh kar mujhe bhi apne din yaad aa gaye par mere patidev ji mana nahi karte they mere jaith-jethani ko pareshani hoti thi bahut kalesh karte they ab to biti baaten ho gayi kya kahen par hakikat to yahi hai maike na ja pane ki teesh ek aurat se behtar koi nahi samajh sakta …….. bahut khubsurati se varnan kiya👌👌👌👌 🩷🩷🩷🙏🙏
पता नहीं क्यों पर कुमुद की हर एक बात अपनी जैसी लगी उसका हर दुख उसकी हर परेशानी बिल्कुल अपने दुख जैसी लगी ।
मायके ना जा पाने का दुख उनके साथ ना रहे पाने का दुख पिता के चले जाने के बाद मां को सहारा ना दे पाने का दुख🥺🥺🥺😞😞😞😞
क्यों पति अपनी पत्नियों को घर का कुत्ता बनाने की कोशिश में रहते हैं क्यों पत्नियों के लिए धोबिया कुत्ता ना घर का ना घाट वाली कहावत इतनी सफल हुई जाती है मुझे कहीं ना कहीं लगता है कि मायका पक्ष के लिए जिम्मेदार होता है क्योंकि घर के लोग हमेशा ही अपनी बेटी को मुसीबत समझकर दूसरे के गले मढ़ने की कोशिश में रहते हैं और यही बात ससुराल पक्ष के लोग बहुत अच्छे से समझते हैं और उसका फायदा भी उठाते हैं पर अंत में कुमुद के द्वारा कही गई बात की उसके चाचा की तरह सर्व गुण संपन्न पति मिले अच्छी नहीं लगी क्योंकि इन सब में उसे बेचारी बच्ची की क्या गलती है
आज आपकी ये कहानी पढ़ कर ऐसा प्रतीत हो रहा था की जैसे कि मेरा अतीत ही मेरे सामने कहानी के रूप मैं गया है। आज के एडवांस समय में भी ऐसे पुरुष हैं जो आज भी अपनी पत्नी को अपने अहम के आगे प्रताड़ित करते है,वो फिर चाहे कहीं शारीरिक जो या मानसिक।।
समाज को आइना दिखाती कहानी👌👌👌👌👌
कुमुद… एक नाम पर हर औरत को बस एक किरदार में समेट लिया आपने,शादी के बाद एक लड़की के जीवन में समझौता ही रह जाता है हर मोड़ पर, वो कभी अपने मन का नहीं कर पाती,। आज मेरी तरह बहुत सी ऐसी औरतें होंगी जो कुमुद में खुद को देख रही है, क्यूंकि हर घर में शायद एक कुमुद तो है ही।
समझ नहीं आता ये कैसा प्रेम है जो पिजरें में कैद करके रखा जाता है,आज कुमुद ने जो आशीर्वाद दिया है शायद अब समझ आएगा सोरेन को वो कहाँ गलत 😊।
पर अगर यहाँ मैं होती तो ये आशीर्वाद कभी ना देती, मेरा सोचना है जो दुख हमने देखा वो कोई और क्यों देखे 😊।
लाजबाब रचना 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻।
Peedadayak
Bhut khoob 👌👌👌👌
Bahut badhiya
Kahi ladki ko jhuk na padta h kahi ladke ko kahi parivar ko yehi jeevan h…. Kahani ghar ghar ki kahani har ghar ki 🥰😍
Are yar bahut bura lagta होगा जब किसी husband unke liye unke mayke ke bare mein Aisi Baat Kahate Honge Maine pahle Hi Din yah Tay Kar Liya Tha Humne balki aapas Mein Tay kar liya tha na tum mere ghar Walon Ko uff Kahana aur Na Main kahungi
Ek dusre ke Parivar ko Ijjat Denge aur yah agar koi hai aise Karte Hain To bahut galat hai
Aparna mam Aisi Kahani uthakar lati Hain Ki Sabse Sab ke Dilon se Jhuk Jaati Hai real ekadam doctor hokar bhi pata nahin kahan se Itna छोटी-छोटी Baat per Dhyan De Leti Hain super
हर स्त्री के जीवन की कहानी , विवाह के बाद हमेशा लड़कियों को ही समझोता करना पड़ता है कहीं कम कहीं ज़्यादा! कुमुद ने बहुत सही आशीर्वाद दिया है, शायद सुरेन को अब एहसास हो जाए उसने आजीवन कुमुद के साथ गलत व्यवहार किया है! बहुत ही बेहतरीन रचना 👌🏻👌🏻
Kutta bole jaane pr bhi kumud ka wha reh jaana ye kaisa pyaar hai.striya itni majboor kyo hoti hai