
व्योम में विचरते पक्षियों की सुंदर कतारें
विहंगम दृष्टि से छोड़ती मन पर
आनंद की फुहारें।
बेला प्रातः हो या सांझ की
नभ पर बुला लेती ज्यों बहारें।
लालिमा आदित्य की सुनहरी होती जाती
जिस समय रश्मियां बिखर बिखर हैं आती
फूल मुस्काते कली खिल जाती
प्रातः की बेला बोलो किसे न भाती।
मंद मंद सुगंधित बयार चलती
हृदय को देखो आनंद से है भरती
सैर ,योग का संचार जगाती
उत्साह से हृदय आनंदित करती।
अखबार का इंतजार ,आया सब्जी वाला ठेला
शाला की तैयारी ,सड़कों पे रेला
कहीं भागम भाग ,कहीं चाय का हिसाब
बड़ा है झमेला, आई प्रातः की बेला।।
डॉ रश्मि लता मिश्रा
बिलासपुर,सी जी

शुरुआत से मंद स्वर पाठ कर जब अंतिम की चार पंक्तियों में आया, तब मुस्कान चेहरे पर खिल आई, बहुत अच्छा लगा पढ़के….💐👌🙏