
बेसब्रियां दिल की….. – 26
ये बात सुनते ही सिमरन के चेहरे का रंग बदलने लगा…
तो क्या श्लोक के अचानक चले जाने और निम्मी से बात ना करने के पीछे अक्षत था…
सिमरन राहुल से सारी बात जानना चाहती थी, लेकिन उसी वक्त अक्षत वापस आ गया..
“वो एक ज़रूरी फ़ोन कॉल आ गया था, इसलिए मुझे बाहर जाना पड़ गया.. !”
अपनी बात कह कर अक्षत वापस बैठा नहीं… वो समय का पाबंद था, ऐसे ही नहीं उसने इतना बड़ा बिज़नेस एम्पायर खड़ा किया था, इसके पीछे उसका काम करने का जूनून तो था ही उसकी एकाग्रता और उसका अनुशासन भी था !
रात अपने समय पर सोना, सुबह जल्दी जागना उसकी आदत में शुमार था और जिससे वो किसी कीमत पर समझौता नहीं करता था !
“ललित जी… अब हम चलते हैं.. रीत जी खाना बहुत शानदार था… बहुत बहुत धन्यवाद आपका !”
“, अरे अक्षत जी आप इतना फॉर्मल क्यों हो रहे हैं ? मुझे तो शौक है बनाने,खिलाने का और वैसे आपने जो कुछ भी खाया है वह मैंने नहीं सिमरन ने बनाया क्योंकि मैं तो आज बस नरगिसी कोफ्ता ही बनाती रह गई थी !”
अक्षत ने सिमरन की तरफ देखा और धीरे से मुस्कुराते मुस्कुराते रह गया…
हालांकि उसकी आंखों में कुछ अलग सी बात थी जो सिमरन के साथ-साथ रीत ने भी गौर कर ली थी…
अक्षत और राहुल वहां से निकल गए उनके जाने के बाद ललित कुमार उन तीनों के लिए पान लेने नीचे उतर गए.. और रीत और सिमरन रसोई समेटकर अपना-अपना कॉफी का कप पकड़े में बालकनी में चले आए..
” सिम्मी तू माने या ना माने, पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है जैसे यह अक्षत तेरे लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर रखता है!”
” सवाल ही नहीं उठता? ये खड़ूस कभी किसी के लिए सॉफ्ट नहीं हो सकता ! “
” ऐसा तुझे लगता है सिम्मी, लेकिन आज मैंने बार-बार नोटिस किया कि वह तुझे कुछ अलग नजर से देख रहा था ! एक ऐसी नजर जो इंसान अपने चाहने वाले पर ही डाल सकता है ! वह बहुत ध्यान से तेरी बातें सुनता है, तुझे देखता है, तुझे समझने की कोशिश करता है..! हो सकता है तुझसे शादी की सोच रहा हो !”
” किसी मुगालते में मत रह रीत ! यह बड़े लोग हैं, और इनके लिए हर एक बात इनके स्टेटस के हिसाब से ही होती है | यह लोग तो शादी-ब्याह भी अपने बिजनेस प्रॉफिट और लॉस को देखकर करते हैं | उनके लिए हमारी मध्यमवर्गीय मान्यताएं कहीं भी स्टैंड नहीं करती और मध्यमवर्गीय लड़कियां तो इनके लिए इनको लूटने का एक उपाय बस है, और कुछ नहीं!”
” तू इस बंदे से इतनी नाराज क्यों लगती है ? कभी उससे बात कर, उसे समझने की कोशिश तो कर!”
” मैं क्यों ऐसी कोशिश करूं रीत जिससे इसे एक बार फिर से हम पर इल्जाम लगाने का मौका मिल जाए कि हम मध्यमवर्गीय लड़कियां बस लड़कों के पैसे और उनकी प्रॉपर्टी को देखकर उनके पीछे लट्टू हो जाती हैं | और हमारी किसी अच्छे घर में शादी हो जायें बस यही सोचकर हम ऐसे रईस लड़कों को फंसाने में लगी रहती है !
तू जानती नहीं है रीत, इन लड़कों की और इनके घर की औरतों की यही सोच होती है…
इसलिए इन लड़कों से मेरी दूरी ही भली है!”
” चल ठीक है इतना मूड मत ऑफ़ कर..
सुन आज यहीं रुक जा ना, वैसे भी निम्मी भी तो शिमला चली गई है!”
“हम्म… मौसी से पूछ लेती हूँ.. !”
“पूछ लें.. मासी मना थोड़े ना करेंगी !”
रीत की जिद के कारण सिमरन ने धरा मासी को फोन किया और उनसे इजाजत लेकर अपनी सहेली के घर ही रात में रुक गई….
सुबह अपनी आदत से मजबूर सिम्मी जल्दी जग गयी उसने देखा रीत और ललित का कमरा बंद था..उन्हें सोता हुआ पाकर वो चुपके से सुबह की सैर करने निकल गयी…
सुबह के पांच बज रहें थे… पूरी कॉलोनी सोई पड़ी थी..| इक्का दुक्का बुज़ुर्ग ही टहलते हुए नज़र आ रहें थे..
सुबह सुबह का ये वक्त सिमरन को बहुत पसंद आता था….
उसने सामने ग्राउंड में पहुँच कर एक अंगड़ाई ली और धीमी गति से दौड़ने लगी..
कानों में लगा रखे ईयर पीस में उसका मनपसंद स्पेनिश गाना बज रहा था…
अचानक उसकी नज़र सामने से तेज़ी से भागते हुए अपनी तरफ को आते अक्षत पर पड़ गयी…
उसकी नज़र खुद पर ना पड़ जायें उस डर से सिम्मी तुरंत घूम गयी और उसकी तरफ पीठ कर खड़ी हो गयी…
धीरे से वो एक तरफ को बढ़ने लगी की पेड़ की आड़ लेकर छिप जायेगी और अक्षत बिना उसे देखें ही निकल जायेगा..
पेड़ के पीछे छिपी खड़ी वो मन ही मन उसके जाने का इंतज़ार करने लगी.. लेकिन पांच मिनट बीत जाने पर भी जब दूसरे तरफ से अक्षत उसे निकल कर जाता हुआ नज़र नहीं आया तब वो धीरे से खड़ी होकर पीछे पलट गयी.. और पीछे पलटते ही चौंक गयी..
अक्षत ठीक उसके पीछे खड़ा था.. !
“क्या हुआ ? आप यहाँ ऐसे क्यों खड़ी थी.. ? किसी की जासूसी कर रहीं थी क्या ?”
“नहीं नहीं.. मैं तो बस ऐसे ही.. आप यहाँ क्या कर रहे ?”
“मैं तो हर सुबह जॉगिंग करता ही हूँ चाहें किसी भी शहर में रहूँ इसलिए मुझे लगता है हर शहर का जॉगिंग ट्रैक मुझे पहचानने लगा है !”
“हम्म… !”
“आप कुछ अनकम्फर्टेबल सी लग रहीं है ? आइये आपको कहीं लेकर चलते हैं !”
इस तरह अक्षत को अपने सामने पाकर सिम्मी अचानक कुछ कह नहीं पायी… उसके माथे पर छलक आई पसीने की बूंदो को देख अक्षत ने उसे टोक दिया और वो कोई जवाब नहीं दे पायी..
अक्षत के साथ जाने के अलावा कोई उपाय बचा ना देख वो चुपचाप चली गयी…
सोसाइटी से बाहर निकल कर कुछ दूर आगे बढ़ने पर ही उसे समंदर का किनारा नज़र आने लगा था…
“ओह्ह तो ये सी बीच लेकर जा रहा है मुझे !”
मन ही मन कुढ़ती सिम्मी समंदर की रेत पर धंसे जाते पैरों के साथ आगे बढ़ गयी…
दूर एक सायकल पर एक आदमी अपनी छोटी सी दुकान सजाने जा रहा था..
“क्या हुआ अन्ना ! दुकान सेट कर लिया ना ? मैं कहीं जल्दी तो नहीं आ गया !”
“नहीं सर… आप बरोबर टाइम पर आये हैं… अभी आपका स्पेशल फिलटर काफ़ी देता हैं !
“आज दो ग्लास देना !”
अन्ना ने अक्षत के साथ खड़ी सिमरन को पहले ही देख लिया था, वो मुस्कुरा कर दो छोटे छोटे ठेठ दक्षिण भारतीय स्टील गिलास में कॉफ़ी डालकर दोनों को थमा गया..
अक्षत ने अपनी जेब से पैसे निकाल कर उसे दे दिये..
और पहला घूंट भरते ही ऑंखें मूँद कर उस अहसास को अपने अंदर उतरने लगा…
सामने फ़ैले नीले समंदर से सूरज का लाल गोला धीरे धीरे ऊपर को उठ रहा था…
समंदर के पानी में लालिमा एक पंक्ति में घुलती नज़र आ रहीं थी…
और उगते सूरज की किरणें अक्षत के चेहरे पर पड़ कर उसे भी अपनी अरूणाई में रंगे जा रही थी..
सिमरन कुछ देर को उसके चेहरे में खो कर रह गयी.. अक्षत आंखें बंद किए सूर्य के सामने कॉफी का गिलास हाथ में पकड़कर कितना लुभावना नजर आ रहा था ! उसके चेहरे के पीछे छिपी कलुशता इस वक्त बिल्कुल भी नजर नहीं आ रही थी और सिमरन को उसे यूं ही एक टक देखना अच्छा लग रहा था…
सी बीच पर इस वक्त लोगों की आवाजाही बहुत कम थी और मुंबई का समंदर पहली बार साफ सुथरा नजर आ रहा था !
कुछ देर में ही अक्षत ने आंखें खोली और कॉफी का अगला लंबा सा घूंट भर लिया…
” जानती हो सिमरन मेरी मां दक्षिण भारतीय हैं.. तेलुगु ब्राह्मण है वो ! उस जमाने में पापा और मम्मी ने लव मैरिज की थी ! नानाजी कट्टर ब्राह्मण परिवार के थे उन्हें पंजाबी दूल्हा बिल्कुल पसंद नहीं था और वही दादी भी कट्टर पंजाबन थी | उन्हें भी यह शादी मंजूर नहीं थी | पर उस वक्त मेरे पेरेंट्स ने अपने अपने घर वालों को बहुत समझाया और उन्हें शादी के लिए मंजूर कर लिया | बावजूद बचपन से ही मैंने अपनी दादी को मम्मी के खिलाफ ही खड़े देखा | वह मेरी मम्मी को उनके दबे हुए रंग के लिए कभी माफ नहीं कर पाए | मेरे पैदा होने तक उनके मन में यही डर बैठा हुआ था कि कहीं मैं, सांवला न पैदा हो जाऊं ?
इत्तेफाक से मेरा रंग मेरे पापा जी पर गया और मैं गोरा पैदा हुआ लेकिन बचपन से दादी के मुंह से रंगभेद की बातें सुन सुन कर दिमाग में इस कदर कोहराम मचा हुआ था कि मुझे इस गोरे रंग से ही नफरत हो गई | मुझे लगा जो रंग आपको आपके परिवार वालों से दूर कर दे उस रंग की क्या अहमियत?
मुझे बचपन से मेरी मां का रंग यानी सांवला रंग बहुत आकर्षित करता आया है! बचपन में मेरी क्लास के बच्चे मेरे हद से ज्यादा गोरे रंग का मजाक उड़ाया करते थे… और तब मैं दुखी नहीं होता था, अंदर ही अंदर खुश होता था कि मेरा रंग है ही इस लायक कि उसका मजाक उड़ाया जाए ! मैं कहीं ना कहीं यह चाहता था कि काश मैं सांवला होता, काश मैं मेरी मां जैसा होता!
लेकिन मैं मां जैसा नहीं हो पाया!”
” दूसरे भले ही मजाक उड़ाए लेकिन आपकी मां को तो आपका रंग पसंद होगा?”
“कौव्वे के बच्चे भी अपनी मां को दुनिया में सबसे खूबसूरत लगते हैं फिर मेरी मां को मेरे रंग से क्या दिक्कत होती ?
अब मैं इतना बड़ा हो चुका हूं, समझता हूं कि रंग और रूप में कुछ खास नहीं रखा बावजूद आज भी अपनी मां को दादी के सामने दबते देखता हूं तो दिल से बुरा लगने लगता है कि सिर्फ रंग के कारण आज भी मां दादी के का सामने दब जाती हैं !”
” आप शायद गलत समझ रहे हैं | एक औरत कभी अपने रंग और रूप के कारण कॉन्प्लेक्स में नहीं आती | वह दबती इसलिए नहीं हैं कि उनका रंग दबा हुआ है, वह दबती इसलिए हैं क्योंकि उनके अंदर यह संस्कार है कि वह अपने से बड़ों का सम्मान करें ! आपकी दादी उनकी सास हैं, यानी उनके पति की मां और वह कहीं ना कहीं इस बात को आज भी दिल से समझती हैं कि अगर अपने पति को प्रेम और सम्मान देना है तो उन्हें पैदा करने वाले को भी सम्मान देना ही पड़ेगा !
अपने मन से यह रंग वाली बात निकाल दीजिए…
मुझे नहीं लगता शादी के इतने सालों बाद भी आपकी मां के अंदर रंग को लेकर कोई कॉन्प्लेक्स होगा!”
” हो सकता है कि तुम सही कह रही हो, हो सकता है रंग को लेकर आज मां कांपलेक्स में ना हो, लेकिन मैं तो आज तक यहीं समझता आया हूँ !”
” कोई बात नहीं, इस बार जब घर जाना तब अपनी मां से पूछ कर देखना!”
“हम्म ! लेकिन दादी के उसी कांपलेक्स के कारण मैं कभी खुलकर अपने ननिहाल पक्ष से जुड़ नहीं पाया…या शायद दादी ने जुड़ने नहीं दिया !
और शायद बचपन की अपनी उन्हीं यादों को ताजा करने के लिए जब भी मुंबई आता हूं तो यहां चला आता हूं !
यहाँ अन्ना के हाथ की यह फिल्टर कॉफी पीकर अपने ननिहाल को और अपनी नानी की गोद को याद कर लेता हूं!”
” बचपन की बातें भुलाये नहीं भूलती… वैसे आपकी फैमिली तो शिमला में रहती है ना और शायद श्लोक जी की फैमिली भी!”
” हां मेरे फादर और श्लोक के फादर काफी अच्छे दोस्त हैं ! दोनों ने साथ ही अपने बिजनेस को शुरू किया जमाया और यहां तक पहुंचाया है | अब उनके साथ-साथ उनके बच्चे भी उनकी दोस्ती और बिजनेस को आगे बढ़ा रहे हैं..!”
” क्या यह दोस्ती रिश्तेदारी में भी बदल सकती है?”
जाने कैसे बातों में बहते हुए सिम्मी ने अक्षत से पूछ लिया.. अक्षत उस बात का कोई जवाब दे पाता कि तभी उसके पास एक औरत आकर ठहर गई…
औरत लगभग 45 से 50 बरस की नजर आ रही थी… गुलाबी रंग के ट्रैक सूट पर ऊंची हाई पोनीटेल बनाए हुए आंखों पर शेड्स चढ़ाये वो शक्ल सूरत से ही काफी रईस नजर आ रही थी…
उसने जैसे ही अक्षत के कंधे पर हाथ रखा अक्षत चौंक पर उसकी तरफ देखने लगा और उसे देखते ही अक्षत के चेहरे पर हल्की सी पहचान वाली मुस्कान आ गई..
“सूद आंटी आप.. यहाँ कैसे ?”
“वैल… मैं आज यहाँ जॉगिंग करने आई थी… तुम यहाँ कैसे ? मुंबई कब आये ? मुझे बताया भी नहीं ?”
“सॉरी आंटी ! एक प्रोजेक्ट था, उसी के लिए आया हूं ! हफ्ते भर का काम था दो दिन गुजर चुके हैं और बस दो-चार दिन का काम और बाकी है उसके बाद वापस लौट जाऊंगा!”
“तो फिर आज डिनर पर आ जाओ.. कोई बहाना नहीं चलेगा राज ! वरना तुम्हारी मां से शिकायत कर दूंगी कि मुंबई में उसका लड़का सुबह सवेरे लड़कियों के साथ जोगिंग करता हुआ पकड़ में आया है..!”
मिसेज सूद ने मुस्कुरा कर अपना निशाना सिम्मी की तरफ साधा और अक्षत ना में गर्दन हिलाते हुए सिम्मी का परिचय देने को बाध्य हो गया..
” यह सिमरन है इनसे दिल्ली में मुलाकात हुई थी..! यहाँ राहुल के अपार्टमेंट में ही इनकी भी दोस्त रहती हैं, वहीं इनसे कल दुबारा मुलाकात हुई थी !”
” तो तुम्हारे पीछे यहां तक चली आई… डोंट माइंड यंग लेडी.. मैं बस अक्षत को छेड़ रहीं हूँ !”
” नो नो इट्स अब्सोल्युटली फाइन !”
सिमरन और कहती भी क्या ?
” वेल ! अगर तुम अक्षत की दोस्त हो तो, तुम भी आ जाओ डिनर पर !
अक्षत तुम्हें साथ ले जाएगा… शार्प सात बजे.. ठीक है अक्षत ! तुम्हारा कोई बहाना नहीं चलेगा!”
बिना अक्षत की कोई बात सुने मिसेज सूद तेजी से कदम बढ़ाते आगे निकल गयीं..
उन्होंने दोबारा सिमरन पर नजर भी नहीं डाली, लेकिन सिमरन बैठे-बिठाए की इस मुसीबत के गले पड़ने पर झुंझला कर रह गयी ! उसके चेहरे पर उसकी परेशानी साफ नजर आने लगी…
” क्या हुआ ? कुछ परेशान हो ? अगर तुम नहीं जाना चाहती हो तो मैं मना कर दूंगा..!”
“हाँ… मतलब… नहीं.. वो बिना जान पहचान के वहाँ जाकर भी क्या करूँ ?”
“इन्हीं के रियल स्टेट वाले ऑफ़िस में ललित कुमार काम करते हैं ! तुम चाहो तो उन्हें भी साथ लें लेना.. !”
“वो पता नहीं जाना भी चाहेंगे या नहीं ?”
“वो ज़रूर जायेंगे.. तुम बात तो कर के देखो ! वैसे अब देर हो रहीं है.. मुझे ऑफ़िस भी निकलना है.. तुम शाम में तैयार होकर रीत के घर ही आ जाना.. मैं वहीँ से तुम्हें लें लूंगा !”
सिमरन ने चुपचाप हामी भर दी..
उसे खुद समझ में नहीं आ रहा था कि क्यों वह कठपुतली की तरह अक्षत आज जो भी बोलता जा रहा था उस पर हामी भरती जा रही थी !
क्यों वह उस जिद्दी और बिगड़ैल रईसज़ादे की बातों का विरोध नहीं कर पा रही थी ?वह चाहती तो मुंह पर उस रईस बुढ़िया को ना बोल सकती थी कि मुझे तुम्हारे घर की पार्टी में नहीं आना…
लेकिन नहीं बोल पाई ! उसी तरह अभी भी अक्षत की बात को काटे बिना उसने हामी भर दी ! क्या होता जा रहा था उसे? क्यों वह इस लड़के के मायाजाल में यूं उलझती जा रही थी | जहां उसे बिल्कुल भी नहीं उलझना चाहिए था |
अब मन ही मन अपनी बातों को सोचती वह धीमे-धीमे कदम घर की तरफ बढ़ाने लगी…
लगता है इस फिल्टरकॉफी ने सिर्फ मुंह का स्वाद ही नहीं बदला बल्कि दिमाग की सोचने समझने की शक्ति भी बदल दी है ! मैं क्यों इस लड़के से अपनी नफरत को भुला कर इसकी कही बात सुनने और मानने को तैयार हो गई हूं ?
लानत है मुझ पर ! सिम्मी तू वो पहले वाली सिम्मी नहीं रही ! लग ही नहीं रहा कि तू वही सिम्मी है जो मोहल्ले के लफंडरों को दो चमाट धर दिया करती थी ! आज यह सामने से तुझ पर धौंस जमाकर और तुझे शाम को तैयार रहने का ऑर्डर देकर निकल गया और तू चुपचाप हां बोल कर वापस घर चली आई ?
कहीं तू भी उसके मोहक अवयवों पर अपना दिल हारने तो नहीं लगी..?
नहीं-नहीं सवाल ही नहीं उठता..
इस बद्तमीज़ का मुंह भले तोड़ दूँ इससे प्यार मुहब्बत तो मैं कभी नहीं कर सकती !
अपने आप को समझाते हुए सिमरन घर की तरफ बढ़ गयी… ये ध्यान दिये बिना की अक्षत भी ठीक उसी के पीछे पीछे बढ़ रहा है…
क्रमशः
aparna
