बेसब्रियां-17

बेसब्रियां दिल की -17

   थप्पड़ खाते ही अमित ने पलट कर देखा एक कद्दावर सा ऊँचा चौड़ा वनमानुष सा दिखता आदमी खड़ा उसे घूर रहा था…
अमित जब तक उसे कुछ बोलता मोहिता उस तक पहुँच गयी…

“रुस्तम ये क्या किया… ? ये हमारे सीनियर सर है ? इन्हे क्यों मारा ?”

“ये आपको परेशान कर रहा था बेबी साहब !”

“अरे इसे परेशान करना नहीं कहते… तुम जाओ यहाँ से.. !”

“आप भी साथ चलिए बेबी साहब ! वर्ना मैं मालिक को फ़ोन कर के सब बता दूंगा कि आपको कॉलेज में गाना गवाया जाता है.. !”

“अरे नहीं बाबा.. प्लीज़ ! डैड को आप कुछ मत बोलना वरना मेरा कॉलेज आना बंद हो जायेगा !”

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मोहिता के बॉडी गार्ड और मोहिता की बातचीत सुन अमित ताज्जुब से उन दोनों को देख रहा था, वो अभी आगे बढ़ कर कुछ बोल पाता कि मोहिता उससे माफ़ी मांग कर वहाँ से चली गयी…

“आई एम सॉरी सर ! मेरी वजह से आपको दिक़्क़त हुई !मैं वाकई आपसे माफ़ी मांगती हूँ !”

आंखें  झुका कर  वह अपने बॉडीगार्ड के साथ वहां से बाहर निकल गई लेकिन मोहिता के वहां से जाने के बाद क्लासरूम में एक अजब सा सन्नाटा पसर गया…
अमित भी कोई साधारण घर का लड़का नहीं था वह खुद एक बड़े जाने-माने बिजनेस टायकून का बेटा था और इस बात से वह पूरा कॉलेज वाकिफ था |

लेकिन अजब इत्तेफाक था कि अमित और मोहिता यह दोनों ही एक दूसरे के परिवार और खानदान से परिचित नहीं थे…

अमित के दोस्तों में उसका रुतबा सिर्फ उसके रुपए पैसे के कारण नहीं बल्कि उसके मीठे स्वभाव के कारण भी था, और इसीलिए उसका अपमान उसके दोस्तों का भी अपमान बन बैठा था | किसी की अमित से कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी..
लेकिन कुछ पलों बाद अमित खुद जोर से ठठा कर हॅंस  पड़ा…

” अबे ऐसा भी क्या हो गया ? ऐसी मनहूसियत क्यों फैला रखी है.. ? यह रुस्तम वुस्तम के थप्पड़ से अमित को फर्क पड़ जाए इतना सीधा बंदा भी नहीं है अमित..!  ठीक है ! वह तो मैंने उस लड़की के लिहाज के कारण उस रुस्तम को पलट कर थप्पड़ नहीं लगाया और बात यह भी है ना कि मेरे खूंखार थप्पड़ के बाद वह बेचारा टिकता नहीं.. !

अमित की बात सुनकर उसके सारे दोस्त भी उसके स्वभाव की विनम्रता देख हंसने लगे…

अगले दिन ही मोहिता कॉलेज में पहुंचते ही अमित को ढूंढ कर उसके पास माफी मांगने वापस पहुंच गई, और  इस बार मोहिता के साथ रुस्तम भी था.. !

भरी कैंटीन में रुस्तम ने सबके सामने अमित के आगे हाथ जोड़ दिये | और अपनी भलमनसाहत के कारण अमित ने उसके दोनों हाथ पकड़ लिये..

” अरे दोस्त ऐसी भी कोई बड़ी बात नहीं हुई, अब माफी मांग कर आप मुझे शर्मिंदा ना करें.. !”

विनम्रता से दुहरा होता रुस्तम अपनी पलके झुका कर अमित से वापस माफी मांग उठा और उसके बाद मोहिता के इशारे पर वह बाहर कार में जाकर बैठ गया..

मोहिता अमित के सामने की खाली पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी | मोहिता को अमित के साथ बैठते देख कर अमित के सारे दोस्त उठकर किसी ना किसी बहाने से वहां से बाहर चले गए..

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” वैसे तो आप सीनियर हैं, मुझे इस तरह आपके साथ बैठना नहीं चाहिए | लेकिन मुझे लगा कल की बात के बाद मुझे आपको इस बारे में सफाई दे देनी चाहिए !
मेरे पापा त्रिभुवन जी अम्बुजा हैं.. शहर के जाने माने बिज़नेसमैन.. ! आप जानते ही होंगे कि अमीरों के पास जितना पैसा होता है उससे ज्यादा वह अपना मान सम्मान दिखाया करते हैं..
बस उसी दिखावे की बलि चढ़ गया हैं मेरे और मेरे भाई बहनों का बचपन भी ….

मुझसे छोटे श्लोक को तो पापा ने शुरू से विदेश भेज दिया है पढ़ाई के लिए.. !   आज से कुछ साल बाद जब वह वापस लौटेगा तो उसे आते ही हमारे फैमिली बिजनेस को ज्वाइन कर लेना है….  उसके लिए कोई रियायत नहीं है!  उसके दिमाग में बचपन से ही यह भर दिया गया कि वह हमारे खानदान का चिराग है, और उसे हमारे खानदान के नाम को और ऊंचा ले जाना है हम भाई-बहन क्या पढ़ना चाहते हैं ?क्या करना चाहते हैं..? हमारे सपने क्या है? इस बात से हमारे घर के बड़ों को कोई लेना देना नहीं है | लेकिन श्लोक के साथ यह है कि वह खुद भी बचपन से ही फैमिली बिजनेस को लेकर रुचि दिखाता था और इसलिए आगे चलकर अगर वह हमारे बिजनेस अंपायर को और ऊंचाई दे देता है तो उसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है.. |
लेकिन जाने क्यों मैं शुरू से ही इन सब बातों से दूर भागती रही हूं | मुझे जिंदगी में खुश रहना सबसे जरूरी लगता है रुपए पैसे तो एक तरफ की बात है.. |
मैं यह नहीं कहती कि रुपए जिंदगी में खुश रहने के लिए जरूरी नहीं है, लेकिन उन रुपयों के दिखावे से खुशियां खरीदी नहीं जा सकती और मुझे उस दिखावे से सख्त नफरत होती है!
   मै अपने ही देश में रहकर पढ़ाई करना चाहती थी, लेकिन पापा को मंजूर नहीं था इसलिए बचपन से मुझे भी मेरे भाई के साथ ही विदेश भेज दिया था लेकिन कॉलेज की पढ़ाई पर मैं अड़ गयी कि मुझे अपने देश में रहकर ही पढ़ना हैं और इसलिए लड़ झगड़ कर मैं वापस आई हूं | यहां भी मैं अपनी जिंदगी अपने हिसाब से कहां जी पा रही हूं ? यह गार्ड का बच्चा हर वक्त मेरे साथ लगा रहता है.. !

ऐसा लगता है जैसे मैं कहीं की राजकुमारी हूं.. या कोई बहुत बड़ी फिल्म स्टार या सेलिब्रिटी..
जबकि इनमें से मैं कुछ भी नहीं हूं..!
अगर मेरे पापा इस कॉलेज के ट्रस्टी नहीं होते तो, यकीन मानिए इनमें से कोई भी मुझे नहीं पहचानता..! हालांकि उनके ट्रस्टी होने के बावजूद यहां लोग मुझे नहीं पहचानते अगर वह हर एक एनुअल फंक्शन में इस बात का जिक्र नहीं करते कि वह यहां के ट्रस्टी हैं और उनके बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं!
   एक बार मेरे एडमिशन से पहले उन्होंने कॉलेज में मीटिंग लेकर सारे टीचर से मेरे यहां एडमिशन की बात रखी और मेरी क्लास में भी मेरी टीचर ने आकर सभी बच्चों को यह बता दिया जिससे कि मुझे एक स्पेशल स्पेस और वैल्यू दी जाए!

मैं खुद एक सामान्य जिंदगी के लिए तरसती हूं | इसीलिए जब उस दिन आपने रैगिंग के लिए मुझे गाना गाने कहा तो मैंने बिना किसी ना नूकुर के आपको गाना सुना दिया, क्योंकि मैं यही चाहती थी कि सामने वाला मुझे भी एक सामान्य लड़की ही समझे ना कि त्रिभुवन अंबुजा की बेटी.. !
   आपसे यही रिक्वेस्ट है कि आप मुझे त्रिभुवन अंबुजा जी की बेटी समझकर ट्रीट ना करें और मुझे सिर्फ मोहिता समझे..!
   आपसे रिक्वेस्ट हैं सर !!

“श्योर ! बल्कि सच कहूं तो मैं खुद कभी किसी के रुतबे से प्रभावित होता भी नहीं… हालाँकि उस दिन मुझे तुम्हारे बारे में मालूम नहीं था.. | लेकिन अब जब मैं सब जानता हूं तो मैं भी उस दिन के लिए तुम्हें सॉरी नहीं बोलूंगा..!”

” नो नीड सर!”

” लेट्स फ्रेंड्स!”

अमित ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया था और मोहिता ने भी अपना हाथ बढ़ा कर उसका हाथ थाम लिया…

******

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मोहिता रसोई में खड़ी अपनी पुरानी यादों में खोई हुई थी कि श्लोक उसे शाम के लिए बुलाने चला आया..

” यहाँ रसोई में खड़ी किन ख्यालों में खोई हुई है आप..?  कहीं आज फिर कोई नयी डिश ट्राई करने का भूत तो नहीं सवार हो गया ना! याद हैं पिछली बार जो आपने चॉकलेट केक बनाया था..!
  ओह्ह गॉड पत्थर भी उससे कम सख्त होते हैं !”

    श्लोक मोहिता की हंसी बनाने लगा लेकिन उसी समय अक्षत राज भी रसोई में चला आया और उसने आकर मोहिता के दोनों कंधों को किनारे से अपनी बाहों के घेरे में ले लिया..

” कोई कुछ भी कह ले, लेकिन मुझे मेरी दी के हाथ का केक बहुत पसंद है ! और वैसे भी जलने वाले यूं ही जलते हैं..! दी आप टेंशन ना लो, कहावत हैं ना बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद..? बस वही हाल हैं श्लोक साहब का !”

“मोहिता को इसके सामने कोई कुछ बोल ही नहीं सकता !  कभी-कभी तो लगता है मोहिता मेरी नहीं तेरी ही बड़ी बहन है..! “

” बड़ी बहन नही बल्कि मेरी पिछले जन्म की मां है वो समझा ! खैर मेरे और उनके रिश्ते को तू नहीं समझ पाएगा..!  अच्छा सुन श्लोक मुझे अब शिमला निकलना होगा..!  घर पर मॉम डैड भी याद कर रहे हैं और फिर अक्षिता भी शिकायत करने लगी हैं…
वापस आने के बाद सोचा था तुम लोगों से मिलकर 2 दिन में शिमला निकल जाऊंगा लेकिन देखो हफ्ता बीत गया और मैं शिमला नहीं निकल पाया..!”

” ओके.!  ऐसा है तो फिर, कल सब साथ ही निकलते हैं..!

” लेकिन जिस काम से आए थे वह तो हुआ नहीं ! मोहिता दी का केस कुछ आगे बढ़ जाता.. तो फिर.. ?”

” हां वह वकील साहब कह रहे थे कि अमित किसी काम से इंडिया से बाहर चला गया है तो, उसके आने तक तो फिलहाल पेंडिंग ही समझो वह वापस आएगा तब उससे बातचीत होने के बाद ही आउटसाइड सेटलमेंट की चर्चा दुबारा छेड़ी जा सकती हैं.. “

अमित का नाम आते ही  मोहिता एक बार फिर गुमसुम सी हो गई…

” चलो सब चल कर बाहर बैठो…  मैं सबके लिए कॉफी लेकर आती हूं!”

एक तरह से जबरदस्ती धकेल कर उसने श्लोक  और अक्षत को रसोई से बाहर भेजा और वहां खड़े नौकर से उसने कॉफी बनाने के लिए बोल दिया और खुद  रसोई के दूसरी तरफ के दरवाजों से निकलकर अपने कमरे में  चली गई….

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क्रमशः

aparna..

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Manu verma
Manu verma
1 year ago

हर बार की तरह ये भाग भी बहुत लाजवाब 👌🏻👌🏻👌🏻⭐⭐⭐⭐⭐