
तू बन जा गली बनारस की-25
“सुनो धानी की माँ, तैयार हो चुकी हो ना , आज चौधरी साहब कुछ जरूरी काम से जरा जल्दी बुलाए हैं…”
” हाँ बस तैयार ही हो रहे… ए जी हम को समझ नहीं आ रहा कि ब्याह का मुहूर्त तो रात का है, और बारात 8 बजे से लगनी है फिर आपको इतना जल्दी काहे बुलाएं है..?”
” अरे तो काहे नहीं बुलाएंगे..? हम ईमानदार एम्पलाई हैं उनके! हम ही पर तो रुपया पैसा का पूरा भरोसा करते हैं इसलिए बुला रहे होंगे , अभी तो रुपया भी पानी की तरह बह रहा है सारा हिसाब किताब हम ही को तो देखना है..”
” कह तो सही रहे हैं आप..” धानी की मां ने कान में झुमके डालें और तैयार होकर खड़ी हो गई तभी उसी वक्त उनके गेट पर हॉर्न की आवाज सुनाई दी..
गाड़ी की आवाज सुनते ही धानी के पिता भागकर बाहर निकल आए उन्होंने देखा उनके गेट पर चौधरी साहब की थार खड़ी हो रही थी…
धानी के पिता भागकर गेट तक पहुंच गए … गेट खोल कर वह हाथ जोड़े चौधरी साहब के सामने दोहरे हों गए कि चौधरी साहब ने उनके कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुरा कर अपनी गाड़ी से नीचे उतर आए…
उन्हें साथ लिए धानी के पिता अंदर चले आए…चौधरी साहब के पीछे उनका ड्राइवर और एक और सहयोगी हाथ में फल मिठाई और सूखे मेवों की बड़ी बड़ी टोकरियों को लिए चलें आए …
” ई सब का है चौधरी साहब?”
” काहे? हम अपना मर्जी से तुमहू को कछू दे भी नहीं सकते का?”
” हमारे दाता है आप पालनहार हैं हमारे! आप का दिया सब कुछ हमारे सर आंखों पर ,यह जीवन भी आप ही का है चौधरी साहब। बस आज्ञा करें आप…!”
” तुमहू को भली प्रकार पता है मुनीम, कि हम अपने लड़कों से कहीं ज्यादा बिस्वास तुम ही पर करते हैं.. घर पर सब कुछ अच्छा चल रहा है , हीरक का बिहाव हो रहा है, और हम इस सब में बहुत खुस हैं …एक और खुसखबरी थी जो तुम्हें बताने को हमारा मन ललचा रहा था बस इसीलिए चले आए.. हमरी पन्ना का भी बिहाव तय हो गया है…!”
” चौधरी साहब ई तो बड़ा खुसी की बात है, आपको बहुत-बहुत बधाई हो.. अरे सुनती हो चौधरी साहब आए हैं, तनिक पानी मीठा ले आओ..
” उ सब बाद में , पहले हमरी बात सुनो! बचपन से तुम देखे ही हो धानी भी हमको उतनी ही प्यारी है जितनी पन्ना! अब जब पन्ना का बिहाव तय कर दिए तो हमरी धानी कैसे पीछे रहती? तो यही तुमको बताने आए हैं कि हमने धानी के लिए भी एक बहुत अच्छा लड़का चुन लिया है..
आज शाम को बरात लगने के बाद पन्ना की ओली पड़ेगी और वहीं पर साथ ही साथ हम चाहते हैं कि धानी की भी ओली डलवा दें.. तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं है ना?”
” कैसी बात कर रहे है चौधरी साहब? आपने अगर रिश्ता देखा है तो उसमें आपत्ति का कोई सवाल ही नहीं उठता? अब धानी भी तो ब्याह के लायक हो ही गई है। हम खुद उसका ब्याह कर देना चाह रहे थे, लेकिन हम यह भी जानते हैं कि हम लालटेन लेकर ढूंढेंगे तब भी आपके जैसा हम घर वर नहीं ढूंढ पाएंगे..
उसी समय पर्दे की ओट में खड़ी धानी के माँ ने थोड़ा धीमे गले से खखार कर अपने पतिदेव को अंदर आने का इशारा किया … उनका इशारा समझने के बाद भी मुनीम की भीतर जाने की हिम्मत नहीं थी कि चौधरी साहब ने उन्हें वापस टोक दिया …
” जाओ जाओ बहुरिया अंदर से बुला रही है, आखिर लड़की की मां है उसका भी तो हक बनता है.. बल्कि हम तो कहते हैं बहुरिया को भी बाहर बुला लो … हम लड़के का तस्वीर साथ में लेकर आए और उसके बारे में तुम दोनों को एक ही साथ बता देंगे..
हाथ जोड़कर दोहरे होते धानी के पिता अंदर की तरफ चले गए…
” क्या कहे जा रहें हैं आप..क्या लड़के को जाने देखे बिना अपनी लड़की को कहीं भी बहा आयेंगे..”
” क्या बक रही हो..चौधरी साहब कोनो गलत रिसता बतायेंगे क्या ?”
” हमें क्या पता ? लेकिन आपका ऐसे आँख मूंद कर उन पर भरोसा करना सही नहीं लग रहा है… हमारी बिटिया कोई भेड़ बकरी नहीं है कि किसी भी दिशा में चराने भेज देंगे…
” तुम तो ऐसे बोल रही हो जैसे चौधरी साहब की बात काटकर लड़की का ब्याह तुड़वा दोगी..?
” तुड़वा देंगे!
बल्कि तुड़वाने कि आप क्या बोल रहे हैं अभी धानी का कहीं रिश्ता जुड़ा ही नहीं है जो तोड़ने की बात हो…
और ध्यान से सुन लीजिए आप, अगर धानी को या हमें यह रिश्ता पसंद नहीं आया तो धानी का ब्याह नहीं होगा..
“क्या मतलब? चौधरी साहब की बात काटना चाहती हो क्या..?”
“काटना ही पड़ेगा! धानी हमारी बेटी है उनकी नहीं। वह कैसे सोच लिये कि वह कहीं पर भी देख लेंगे रिश्ता और हम मान जाएंगे..!”
“पगला गई हो तुम..!”
“हम नहीं आप पगलाए हैं ।।आप उनके यहां नौकरी करते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि आपका जीवन वहाँ रहन रखा हो, जो अपनी बेटी को उनके हिसाब से ब्याहने चलें हैं…बेटी हमारी है, इकलौती बेटी है।, उसकी इच्छा पूछे बिना हम कहीं कुछ नहीं करेंगे। और रही बात आपके चौधरी साहब की तो अगर आप नहीं कह पाएंगे तो हम आगे से जाकर हाथ जोड़कर उनसे माफी मांग लेंगे..।”
” किस बात की माफी मांगना चाहती हो बहुरिया..?”
उन दोनों पति पत्नी ने सोचा भी नहीं था कि चौधरी साहब भीतर चले आएंगे…
” पाय लागी चौधरी साहब! ” अपने सिर के आंचल को माथे पर और नीचे खींचते हुए धानी की मां दूसरी तरफ मुड़ कर खड़ी हो गई ..
” खुसी रहो, मौज करो! बहुरिया हम यह बिल्कुल नहीं कह रहे हैं कि लड़के को जाने देखे बिना तुम हां कह दो , हम लड़के का तस्वीर साथ लाए हैं… और लड़का कोई ऐसा वैसा नहीं है हमारी खुद की बहन का बेटा…
बहनोई जब से नहीं रहे उ हमरे पास रह कर ही पढ़ाई लिखाई किया है…
वकालत पढा है और शहर का बहुत जाना माना वकील हो चुका है.. उसकी अम्मा यानी हमारी जिज्जी हमारे इधर ही हमारे साथ रहती हैं। लेकिन लड़का कानपुर में अपना काम देखता है। खुद का फ्लैट खरीद चुका है, बड़ी गाड़ी है, जमीन जायदाद भरपूर है..किसी चीज की कोई कमी नहीं है। अकेला लड़का और लाखों में खेलता है। ऐसा लड़का किस्मत से मिलता है बहुरिया। तस्वीर एक बार देख लो अगर उसके बाद भी तुम्हें लगता है कि यहां धानी का ब्याह नहीं करना चाहिए तो हम कोई जोर जबरदस्ती नहीं करेंगे…!”
चौधरी साहब ने सुयश की तस्वीर निकाल कर धानी की मां की तरफ बढ़ा दी…..
धानी के पिता को धानी की मां का चौधरी साहब के सामने इस तरह का बर्ताव पसंद नहीं आ रहा था लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकते थे क्योंकि एक तरफ जहां उनके मालिक खड़े थे दूसरी तरफ उनके घर की मालकिन खड़ी थी…. दोनों के खिलाफ बोलने में अक्षम थे लेकिन इस सबके बावजूद चौधरी साहब की इतनी विनम्रता उन्हें अंदर ही अंदर बहुत खल रही थी।
उन्होंने तुरंत चौधरी साहब के हाथ से फोटो लेकर देखा और फोटो देखते ही उनकी बांछें खिल गई… खुशी से उन्होंने तस्वीर धानी की मां के सामने कर दी…
धानी की मां ने धीरे से तस्वीर अपने हाथ में ले ली और देखने लगी… तस्वीर में एक गोरा चिट्टा लंबा चौड़ा सुंदर नाक नक्शे वाला लड़का वकील का काला कोट पहने खड़ा था…
तस्वीर देखकर ना की कोई गुंजाइश नहीं बची थी लड़का देखने में बहुत सुंदर था और उसके चेहरे का तेज उसकी बुद्धिमता को बता रहा था। धानी की मां के चेहरे पर भी हल्की सी मुस्कान दौड़ गई…
“क्यों बहुरिया हमरा सुयश ठीक-ठाक लगा?”
चौधरी साहब के सवाल पर धानी की मां ने धीरे से हाँ में सिर हिला दिया और तुरंत अंदर रसोई की तरफ बढ़ गई… चौधरी साहब भी बाहर आकर मुनीम के साथ बैठ गये और बस कुछ ही पलों में धानी कि माँ ट्रे भरकर नाश्ता पानी और मिठाई लिए बाहर चली आयी…
” शाम को इसी तैयारी से आना कि लड़के को अंगूठी पहना सको ! और हो सके तो फिलहाल धानी से कुछ मत कहना उसके लिए भी, वह कहते हैं सरपराइज हो जाएगा..!”
एक छोटा सा मिठाई का टुकड़ा उठाकर मुंह में रखने के बाद चौधरी साहब वहां से उठ गए… जाते जाते एक बार फिर वह दोनों को समय से पहुंच जाने की ताकीद करते गये…
*****
मंदिर में एक दूसरे की बाहों में सिमटे खड़े बिक्रम और धानी एक दूसरे से अलग हुए और बिक्रम ने धानी का हाथ थाम लिया दोनों साथ साथ सीढ़ियां उतरते हुए बिक्रम की बाइक तक चले आए…….
मौसम खुशनुमा हो चला था…हल्की हल्की सी फुहारें पड़ने लगीं थी….बिक्रम के पीछे बैठी धानी ने अपना हाथ धीमे से बिक्रम के कंधे पर रख लिया और बिक्रम ने धानी के हाथ को पकड़ कर अपनी कमर के चारों ओर कस लिया …
“अब क्या शर्माना, अब तो बीवी हो तुम हमारी…बस घर चल कर अंकल आंटी से बात कर लेता हूं उसके बाद अपने पापा और मम्मी से भी… और उसके बाद ..?
” उसके बाद क्या …?”
” उसके बाद हमारे फेरे होंगे और…
” और उसके बाद …?”
” उसके बाद ……वो..
” क्या …?”
” उसके बाद तो एक लंबा सा हनीमून होगा मिसेज़ धानी बिक्रम परिहार!! “
” धत!! कुछ भी कहते हो…!”
” कुछ गुनगुनाने का मन कर रहा है…इतनी प्यारी शाम है…कुछ सुनाओ ना धानी! कुछ मेरे लिए सुना दो..!”
” ठीक है एक गाना याद आ रहा है…बिल्कुल आपकी पर्सनैलिटी पर सूट करता हुआ ..सुनाए?”
” इर्शाद!”
” क्या ..?”
” अरे भई सुनाओ..!”
“हमने तो इतना देखा, हमने तो इतना सीखा
दिल का सौदा होता है सौदा ज़िन्दगी का
मिलते ही कैसे कोई होता है दीवाना
कितना मुश्क़िल है…
ये लड़का हाय अल्लाह कैसा है दीवाना
कितना मुश्क़िल है तौबा इसको समझाना
के धीरे-धीरे दिल बेक़रार होता है
होते, होते, होते, प्यार होता है…..”
” बहुत-बहुत मीठा गाती हो धानी…यूँ लगता है बस सुनता जाऊँ और तुम गाती रहो….
” क्यों आप जवाब नहीं देंगे ?”
” ऐसे ही गाने की भाषा में जवाब चाहिए ?”
” हाँ जी बिलकुल…हम मीठा गाते हैं पर आपकी तीखी आवाज़ सुनना पसंद है हमें…
धानी की बात सुन बिक्रम के चेहरे पर हंसी खेल गई और गले की खराश को मिटा कर उसनें गाने का अगला भाग गा दिया….
“भोली हो तुम क्या जानो, अब भी मुझको पहचानो
सपना तुम्हारा मैं हूँ, मानो या न मानो।
देखो नादानी से मुझे न ठुकराना
नहीं तो गाती ही रहोगी ये तराना
के धीरे-धीरे दिल…..”
गाते गुनगुनाते दोनों ही धानी के घर पहुंच गए ….बाइक को एक तरफ खड़े कर बिक्रम ने धानी के साथ घर में प्रवेश किया लेकिन घर के दरवाजे पर ताला पड़ा हुआ था… धानी को मालूम था कि अगर उसके माता-पिता कहीं बाहर जाते थे तो चाबी कहां रखा करते थे । उसने बाहर रखे गमले के नीचे से चाबी निकाली और ताला खोलकर अंदर चली गई…
“अरे वाह लगता है सासू मां और ससुर जी को भनक लग गई थी कि उनकी बिटिया शादी करके दमाद को लेकर घर आ रही है इसलिए हमारे लिए घर खाली छोड़ कर चले गए !”
“हमें तो समझ नहीं आ रहा कि अचानक इस वक्त कहां चले गए? वैसे जाना तो उन्हें हीरक की शादी में था लेकिन ऐसे हमें बिना लिए तो नहीं जा सकते…!”
धानी इधर उधर देख रही थी कि तभी बिक्रम की नजर टेबल पर रखे एक सफेद पन्ने पर पड़ गई , उसने वह पन्ना उठाया और धानी की तरफ बढ़ा दिया.. उसमें धानी की माँ ने धानी के लिए दो लाइने लिख रखी थी…
“धनिया!! चौधरी साहब के घर की शादी के लिए उन्होंने हमें और तुम्हारे पापा को जरा जल्दी बुला लिया था, इसलिए फिलहाल हम दोनों निकल रहे हैं। तुम जैसे ही घर आओगी तैयार होकर बिक्रम के ही साथ वहां पहुंच जाना..
देर मत करना बिटिया और सुनो, तुम्हारे लिए हम अपनी साड़ी निकाल कर आए हैं वही पहन कर आना…
धानी की मां और पिता को सुयश और धानी की सगाई के लिए सामान भी खरीदना था , इसलिए वो लोग बिना धानी का इंतजार किए ही निकल गए थे …
धानी का चेहरा रुआँसा हो गया… उसे हीरक की शादी में जाने का बिल्कुल मन नहीं था .. लेकिन अपनी माँ की कहीं बात वो टाल भी नहीं सकती थी…
” आप भी तैयार हो जाइए..हम भी तैयार हो लेते हैं..फिर शादी में भी तो जाना है….!”
आइने की तरफ़ मुड कर धानी ने अपना चेहरा देखा और माथे पर लगी सिंदूर की हल्की सी रेखा को पोछने लगी कि बिक्रम ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया…
” आज ही तो सिंदूर लगाया है और आज ही तुम पोंछ दोगी?”
” तो ऐसे कैसे जायेंगे वहाँ शादी में…?”
” बालों को ऐसे बना लो कि सिंदूर बालों से छिप जाए..
हाँ में सिर हिला कर धानी ने तिरछी मांग में बालों को समेट कर एक तरफ़ से कंधों पर आगे की तरफ़ डाल लिया…बालों के आ जाने से माथे पर भरा सिंदूर बालों की लटो से छिप गया….
बिक्रम उसे देख मुस्करा कर ऊपर चला गया…..
कुछ पंद्रह-बीस मिनट बाद ही वो तैयार होकर नीचे उतर आया….
क्रीम कलर की पैंट पर काली शर्ट पहने बिक्रम बहुत स्मार्ट नज़र आ रहा था वहीं मैरून बाँधनी में धानी भी ग़ज़ब ढा रही थी…
धानी आइने की तरफ़ मुहँ किए खड़ी तैयार हो रही थी कि बिक्रम ने आकर पीछे से उसे अपनी बाहों में भर लिया …
” अरे छोड़िए ना..हमारी साड़ी में सिलवटें पड़ जाएंगी…”
घबराकर बिक्रम ने उसे छोड़ दिया …
” अरे सच में छोड़ दिया..हम तो यूँ ही आपको डरा रहे थे…!”
” अच्छा तो ये बात थी…” बिक्रम धानी की तरफ़ झपटा और धानी वहाँ से बाहर भाग खड़ी हुई….
क्रमशः
aparna
