गली बनारस की -16

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की…-16

” हम आपके घर के नीचे खड़े हैं इंजिनीयर साहब! क्या ऊपर आ जाएं..?”

पन्ना की बात सुनते ही बिक्रम के चेहरे का रंग वापस उड़ गया..वो धीमे से उठ कर खिड़की तक पहुंचा,  उसने झाँक कर देखा उसे गली में खड़ी लंबी काली कार दिखाई दे गयी……

” आप यहां कैसे..?”

” आपसे बात कर के मन नहीं भरा था “

उससे बात करते हुए बिक्रम ने धानी को इशारे से खिड़की की तरफ देखने बुलाया,  धानी ने नीचे झाँक कर खड़ी कार देख ली ..
फोन पर हाथ रख बिक्रम ने धानी को देखा..

” यहाँ से नीचे जाने का कोई और रास्ता है?”

धानी ने जल्दी से हाँ में सिर हिला दिया…

” तो जाओ जल्दी !” एक तरह से धानी को धकियाते हुए बिक्रम ने कमरें का पिछला दरवाजा खोल दिया..छत की मुंडेर से धानी बाजू वालीं प्रतिमा की छत पर चली गई…
  लेकिन इसी सब जल्दबाजी में उसका दुपट्टा बिक्रम के कमरे के टेबल में उलझ कर वहीं जमीन पर गिर गया…
  
  ” इंजिनीयर साहब कहाँ गायब हो गए आप? आ जाएँ हम अंदर..?”

” दो मिनट रुकिए प्लीज..?”

  ” क्यों…? और इतना कहकर पन्ना दरवाजा धकेल कर भीतर चली आयी…

  पिछले दरवाजे से धानी को दुसरी छत पर कूदकर जाते देखता खड़ा बिक्रम चौंक कर मुड़ गया..

” ऐसा क्या करने में बिजी थे जो हमें ऊपर आने से मना कर रहे थे ..”

बिक्रम पन्ना को देख अपनी शर्ट के बटन पर हाथ चलाने लगा …

” वो कुछ नहीं…मैं ऐसे ही बैठा था….बस शर्ट पहन रहा था , उसी में वक़्त लग गया …

   गहरी नजरों से उसे देखती पन्ना ने एक कुर्सी खिंची और टेबल के ठीक सामने बैठ गयी…

” लगता है आप चाय पी रहे थे ..?”

” जी, !”

” दो दो कप में एक साथ …?”

पन्ना के सवाल पर बिक्रम का ध्यान गया, धानी की कप भी वहीं रखी थी….

” आप चाय लेंगी…?”  बिक्रम के सवाल पर पन्ना ने हाँ में गर्दन हिला दी…

” आप खुद बनाएंगे…?”

” हाँ…मुझे चाय बनानी आती है…!”

” बहुत बढ़िया! पर हमें नहीं आती…बल्कि हम सच कहें तो हमें रसोई का कोई काम नहीं आता …हमारी अम्मा कहती हैं हमारी शादी में हमारे साथ दो चार नौकर भी दहेज में देंगी ..”

बिक्रम का दिमाग इस वक़्त धानी पर लगा था , उसका ध्यान पन्ना की बातों पर नहीं था और पन्ना को ये बात समझ में आ रही थी..वो उठ कर चलते हुए कमरें के पिछले दरवाजे तक पहुंच गईं, जहां टेबल के पास नीचे पीले रंग का दुपट्टा पड़ा हुआ था ..उसे एक नजर देख वो बिक्रम की तरह मुड़ गई…

” एक ग्लास पानी मिलेगा इंजिनीयर साहब?”

बिक्रम ने उसके पैरों के पास पड़ी धानी की चुन्नी देख ली थी…
बिक्रम रसोई से पानी की बोतल भर कर ले आया.. और तब तक में पन्ना ने उस चुन्नी को अपनी सैंडल रख कुचल दिया …
बिक्रम पानी लेकर आया तब पन्ना उस चुन्नी पर खड़ी अपने मोबाइल पर किसी से बात कर रही थी….

” हाँ बाबुजी, बस हम आ ही रहें हैं …!

बिक्रम की तरफ देख वो मुस्करा उठी …पर धानी की चुन्नी की हालत देख बिक्रम के चेहरे पर मुस्कराहट नहीं आ पायी…

” आपको पता है इंजिनीयर साहब ये घर हमारे मुनीम जी का है..
अब यहां तक आए हैं तो जरा उनसे भी मिल लेते हैं, वरना आंटी को अच्छा नहीं लगेगा..!”

बिक्रम ने चुपचाप हाँ में सिर हिला दिया….

पन्ना तेज कदमों से नीचे उतर गई…नीचे लगे जालीदार दरवाजे को खोल वो बेधड़क अंदर घुस गई..उसके पीछे बिक्रम भी अंदर चला आया …
   धानी की माँ रसोई में शाम के खाने की तैयारी में लगी थी..बाहर से आती आवाज सुन वो हाथ पोछते हुए बाहर चली आयी….

” अरे वाह आज सूरज किधर से निकला है भई, स्वयम राजकुमारी जी हमारी कुटिया में पधारी हैं….

” प्रणाम काकी,  कैसी हैं आप?”

” ठीक है बिटिया,  आप कैसी है..? अम्मा जी और बाकी लोग कैसे हैं..? ऐसन ही आ जाया करो कभी-कभी?”

” वक़्त कहाँ रहता है हमारे पास , आप जानती तो हैं..  हम कितने बिजी रहते हैं…

” हाँ बिटिया बात तो सहीं हैं…धानी बेटा, पन्ना जिज्जी आयी हैं, पानी चाय कछु ले आओ ..”

अब तक में धानी प्रतिमा की छत से उतर कर घर के पिछवाड़े होते हुए अपने कमरे में पहुंच चुकी थी।  पन्ना की आहट सुनकर भी उसका बाहर निकलने का बिल्कुल मन नहीं था लेकिन अपनी मां की आवाज पर उसे बाहर निकलना पड़ा…
    पन्ना के साथ बैठे बिक्रम पर नजर पड़ते ही वह झेंप गई और ट्रे पन्ना के साथ-साथ बिक्रम की तरफ भी बढ़ा दिया…
बिक्रम ने हाथ दिखा कर लेने से मना कर दिया।
    ट्रे वही टेबल पर रख कर हाथ बांधे धानी भी एक तरफ खड़ी हो गई….
   पन्ना ने अपने पास से एक कार्ड निकाला और धानी की मां के हाथ में रख दिया…

” हीरक भैया का ब्याह तय हो गया है काकी, आप सभी को सपरिवार आना है, दो दिन बाद हल्दी की रस्म है..
  पन्ना ने एक दूसरा कार्ड साथ बैठे बिक्रम के हाथ में भी थमा दिया…

   “आपको भी आना है इंजीनियर साहब, हमें और बाबूजी को अच्छा लगेगा..!”

बिक्रम के हाथ में कार्ड पकड़ा कर वो अपनी जगह पर खड़ी हो गई और उसने धानी की मां के सामने हाथ जोड़ दिए …
    इस सब के बीच उसने धानी को एक बार भी नजर उठा कर देखा नहीं था..
… यहां तक कि जब धानी ने उसकी तरफ चाय की ट्रे बढ़ाई तब भी चाय का कप देखते हुए ही पन्ना ने कप उठा लिया था और धानी अपमान से जलती चुपचाप एक और खड़ी रह गई थी…

पन्ना उठकर जाने लगी तब धानी की माँ ने धानी को इशारे से उसे गेट तक छोड़ आने के लिए कहा और धानी अपनी मां को गुस्से से घूरती पन्ना के पीछे पीछे दरवाजे तक निकल गई…
       गेट तक पहुंचकर पन्ना एक पल को रुक गई। वह पीछे मुड़ी बिक्रम और धानी उसके ठीक पीछे ही खड़े थे…
   पन्ना ने गहरी नजरों से धानी को घूरते हुए उसे टोक दिया…

” धानी रंग तुम पर सूट करता है, लेकिन कुर्ते के साथ दुपट्टा होता तो और भी ज्यादा अच्छा होता।
      अपने दुपट्टे का ध्यान रखा करो धानी, अब तुम बच्ची नहीं रह गई कि यहां वहां दुपट्टा भूल जाओ…।”

धानी के चेहरे का सारा रक्त निचुड़ कर उसका चेहरा सफेद पड़ गया….
   बिक्रम के सामने पन्ना इस ढंग से उसे जलील करके चली जाएगी यह धानी ने सोचा भी नहीं था। उसकी आंखों में अपमान के आंसू छलक आए लेकिन उन आंसुओं को देखने के लिए पन्ना रुकी नहीं और तेज कदमों से चलते अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गई…
   
     पन्ना के गाड़ी में जा कर बैठते ही बिक्रम तेज कदमों से सीढ़ियां चढ़ गया, और विक्रम का इस तरह तेजी से चले जाना धानी को और भी बुरा लग गया…

” क्या हम में ऐसे कांटे लगे हैं जो पन्ना के आते ही हमे कमरे से धक्के देकर बाहर भगा दिया और अब ऐसे सीढ़ियां चढ़कर भागा जैसे हमे छू गया तो बीमार हो जाएगा..

  अपने आप में बड़बड़ाते  हुए धानी भारी कदमों से घर की तरफ मुड़ गई ….

पन्ना की गाड़ी गली से ओझल हो चुकी थी..

” अब ये एक और सिर दर्द हमारे मत्थे मढ गया, अब  इन हवेली वालों की शादी में हम गरीब क्या देंगे?
तुम्हारे बाबू जी से अगर कहे कि आप बस चले जाइए तो भी वह मानेंगे नहीं… कम से कम एक सोने की अंगूठी तो बहू को पहनानी ही पड़ेगी मुंह दिखाई में..

धानी की मां स्वगत भाषण में लगी थी और साथ बैठी धानी खुद में खोयी गुमसुम सी बैठी मटर की फलियां निकाल रही थी… उसे इस वक्त पन्ना से भी ज्यादा बिक्रम पर गुस्सा आ रहा था…
     कैसे बदतमीजी से पन्ना के जाते ही तुरंत सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चला गया जैसे कुछ देर को भी हमारे साथ खड़ा रह गया तो जाने कितना बड़ा प्रलय आ जाएगा…

” ए धानी!!हमारी बात सुन भी रही हो?
    अच्छा सुनो तुम आज आलू मटर छौंक लो हम जरा बाजार से आ जाते हैं…..
…वो चौक पर मजीठिया भाई की सुनारी है ना ? जरा देख आते हैं सोने का भाव ताव का चल रहा है?..फिर कल तुम्हारे पापा के साथ जाकर खरीद लायेंगे..!”

अनमनी सी बैठी धानी ने कोई जवाब नहीं दिया… और उसकी माँ पर्स में कुछ रुपये डाल बाहर निकल गई…शाम गहराने लगी थी,  धानी बाहर आंगन की बत्ती जला कर रसोई में सब्जी छौंक ने चली गई।
    सब्जी छौंक पर वह भगवान की दीया बाती कर एक दिया लेकर बाहर तुलसी पर रखने जा रही थी कि उसी वक्त लाइट चली गई….
  … इत्तेफाक से उसी समय बिक्रम नहा कर धानी की चुन्नी और चाय के कप नीचे वापस करने आया था..
वो अंदर घुस ही रहा था कि लाइट चली गई और उसी समय दिया लेकर बाहर निकलती धानी पर नजर पड़ते ही बिक्रम दीए की रोशनी में चमकता उसका चेहरा देखता ही रह गया….
   …. बिक्रम अंधेरे में खड़ा था , इससे धानी उसे नहीं देख पाई , वो उसके पास से गुजर ही रही थी की धानी को समझ में आ गया कि घर के अंदर कोई खड़ा है…. वो घबराकर जोर से चिल्लाने वाली थी कि विक्रम ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया…

” घबराओ मत धानी मैं हूं बिक्रम!”

एक हाथ में दिया पकड़े दूसरे हाथ से धानी छटपटाने लगी और बिक्रम उसे समझाने की कोशिश में लगा रहा…

‘ “अरे क्यों इतना परेशान हो रही हो, मैं ही हूं। कोई चोर उचक्का नहीं है। रोशनी नहीं है, तो मुझे नहीं देख पा रही हो तो क्या मेरी आवाज भी तुम्हें समझ में नहीं आ रही?
क्या इतने दिनों में मेरी आवाज भी नहीं पहचानी तुमने..?

बिक्रम इस बात को समझे बिना की धानी अपने मुंह पर से उसे हाथ हटाने कह रही है, अपनी बात कहता चला जा रहा था और उसकी चौड़ी और मजबूत हथेली में छिपा धानी का चेहरा कसमसा रहा था।
     आखिर उसने अपना हाथ बिक्रम की कलाई पर रखा और उसे जोर से अपने मुंह से हटाने की कोशिश की। उसकी इस कोशिश को देखकर बिक्रम को ध्यान में आया कि अगर वह उसके  मुंह से हाथ ही नहीं हटाएगा तो वह बोल कैसे पाएगी और झेंप कर बिक्रम ने तुरंत अपना हाथ हटा लिया…

” एम सॉरी!! मैं थोड़ा घबरा गया था। मेरा मतलब तुम घबरा गई थी। और इस बात से मैं घबरा गया था।
      अरे मैं ये क्या बोल रहा हूं?  मेरा कहने का मतलब यह है कि तुम कहीं चिल्लाकर कर लोगों को इकट्ठा ना कर लो इसलिए मुझे तुम्हारे मुंह पर हाथ रखना पड़ा… तुम्हारी चीख सुनकर पता नहीं आंटी क्या सोचती?”

“आंटी घर पर नहीं है..”

धानी के मुंह से यह सुनकर बिक्रम ने राहत की सांस ली.. और वापस अपने मजाकिया अंदाज़ में लौट आया…

“इसका मतलब तुम यह कह रही हो कि, मैं फिर से तुम्हारे मुंह पर हाथ रख लूँ..!

“बकवास मत करिए….”

” मुझे लगा तुम्हें मेरे हाथो से आने वालीं खुशबु भा गई इसलिए कह रही हो मम्मी नहीं है….

” कैसे इतनी बकवास कर लेते हैं आप..?”

” टैलेंट है भई,  ऐसे ही थोड़े ना कोई मेरे जितना स्मार्ट हो सकता है…!”

  धानी दीया रखने आगे बढ़ गई और बिक्रम टेबल पर कप रख उसके पीछे बढ़ गया …

” टैलेंट तो देख लिया ।
       जैसे ही पन्ना को देखा, डर के मारे हमें भगाने लगे जैसे हम कोई चोर हों..!”

” अरे वो बात नहीं थी धानी,  वहीं तो कहने आया हूँ…

धानी पलट कर अंदर चली आई और उसी समय लाइट भी आ गई…
    बिक्रम के हाथ में अपना दुपट्टा देखकर धानी को एक बार फिर पन्ना की कही बात याद आ गई। बिक्रम भी धानी के चेहरे के बदलते रंगों को देखकर समझ गया कि वह क्या सोचकर वापस दुखी हो रही है…. बिक्रम ने अपने हाथ में पकड़ रखे दुपट्टे को धानी की तरफ बढ़ा दिया…
    धानी उस दुपट्टे को लेकर ओढ़ने जा रही थी कि बिक्रम ने मना कर दिया..

” धानी रुक जाओ! इस दुपट्टे को मत ओढ़ो ..”

धानी ने घूर कर विक्रम को देखा ..” हद दर्जे के बेशर्म हैं आप..!”

बिक्रम ने धानी के हाथ से दुपट्टा छीन कर वापस एक किनारे नीचे फेंक दिया….
   ” पन्ना ने इस दुपट्टे को अपनी सैंडल से कुचल दिया था..
  गंदा हो गया है, इसलिए धोने के बाद ही यूज करना। बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि अब इस दुपट्टे को फेंक ही दो..!”

  धानी पहले ही जानती थी कि पन्ना उससे बेइंतहा नफरत करती है.. लेकिन वह इस ढंग से अपनी नफरत को दूसरों के सामने भी छिपा नहीं पाएगी यह सोचकर धानी का चेहरा उतर गया।
     उसने चुपचाप दुपट्टा उठाया और अंदर की तरफ बढ़ गई …विक्रम उसे आवाज देता हुआ उसके पीछे जाने लगा, कि धानी चुपचाप उसकी तरफ मुंह करके खड़ी हो गई…

” तुम्हारा दिल दुखाने का कोई इरादा नहीं था मेरा धानी,  लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा लगा की पन्ना मेरे कमरे में तुम्हें देखेगी तो वह हम दोनों के बारे में कुछ गलत सोच सकती है …
    इसीलिए तुम्हें कमरे से जाने को कहा, लेकिन उसने तुम्हारा दुपट्टा  और चाय का कप देख लिया था। और शायद उसने कुछ गलत सोच भी लिया, इसलिए जब वह तुम्हारे घर से निकली तब मैं भी तुरंत सीढ़ियां चढ़ गया… जिससे उसे ऐसा न लगे कि उसके जाने के बाद हम दोनों बातें कर रहे हैं…”

” इसका मतलब आप भी पन्ना से डरते हैं?”

“मैं पन्ना से  नहीं डरता, खुद के लिए तो बिल्कुल भी नहीं…
     लेकिन मेरा डर तुम्हारे लिए है। वह लड़की बहुत खतरनाक है और कहीं मेरे कारण वह तुम्हें कोई नुकसान पहुंचा गई तो मुझे बहुत बुरा लगेगा..”

” क्यों हमारा नुकसान होगा तो इससे आपको क्यों तकलीफ होगी, आपको क्यों बुरा लगेगा..?”

  धानी दीवार के पास खड़ी थी और बिक्रम उसके दोनों तरफ की दीवार पर अपने हाथों को टिकाये उसके चेहरे के बहुत करीब चला आया….
   अपने चेहरे पर गड़ी उसकी आँखें देख धानी की सांसे बढ़ने लगी..उसके माथे पर छलकती पसीने की बूंदे मोतियों सी नज़र आ रही थी, जिन्हें देख बिक्रम की भी धड़कन बढ़ने लगी थी…
    बिक्रम कुछ और आगे बढ़ा और घबरा कर धानी ने आँखें बंद कर ली…

” क्योंकि आई हेट धनिया की चटनी..”

उसकी बात सुन धानी ने चौंक कर आँखें खोल दी और हंसते हुए बिक्रम घर से बाहर निकल गया…
जाते जाते वो कुछ गुनगुनाता रहा….

     ओ मेहरमाँ मेरे मेहरमाँ,
       हो पूरी है दुआ….
     अब कुछ भी तो याद नहीं
    तुझे पा के लगे मुकम्मल है खुदा…
       ओ रेहनुमाँ मेरे रेहनुमाँ,
    ओ तेरे नाम सा अब कोई भी लफ्ज़ नहीं..
      पढ़ कर देखीं सौ किताबें सौ दफा….
       दिलदारा दिलदारा,
      ये रत्ती भर का जग सारा
      दिलदारा दिलदारा,
      तेरे नज़रों कदम पे सब वारा
    ओ दिलदारा दिलदारा,
    तब जीता जब तुझसे हारा……. दिलदारा

क्रमशः

aparna
  

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