
तू बन जा गली बनारस की..-20
पन्ना बिक्रम के गले से लगी खड़ी अंदर ही अंदर सुलग रही थी..वो जानती थी कि धानी यहीं कहीं छुपी बैठी है….
उसे ढूंढती आंखों के साथ वो चुप खड़ी रही..बिक्रम ने उसे खुद से दूर किया और उसे समझाने लगा …
” रुकिए मैं आपके लिए ठंडा पानी ले आता हूं..!”
” नहीं , रहने दीजिए हमें नहीं चाहिए..!”
उसकी बात को अनसुना करता बिक्रम रसोई मे घुस गया…
उसे रसोई में धानी कहीं नजर नहीं आ रही थी..वो हैरान सा फ्रिज में से बोतल निकालने लगा कि फ्रिज की आड़ में छिपी बैठी धानी पर उसकी नजर पड़ गई…
” तुम यहाँ क्या कर रही हो..? गईं क्यों नहीं..?”
बिक्रम धीमे से फुसफुसा उठा… उतनी ही धीमी अवाज में धानी भी बोल उठी..
” कैसे जाएं…बाहर निकलने का दरवाज़ा उसी हॉल से है जहां वो चुड़ैल बैठी है..!”
” ओह, मैं जाकर उसे जल्दी यहाँ से भगाने की कोशिश करता हूं.!”
बिक्रम पानी की बोतल लिए बाहर चला आया …
” लीजिए ..आपके लिए चाय बनाऊँ..?”
” ओह नहीं ! उसकी जरूरत नहीं है..! इंजीनियर साहब आप से कुछ कहें?”
” जी कहिये ना !”
” आपके माता पिता हमारे यहाँ रुक गए हैं… अब वो लोग हीरक भैया की शादी के बाद ही वापस जाएंगे ..वो लोग चाहते थे कि उनका बेटा भी उनके साथ रहे बस इसलिए हम सुबह सुबह आपको लेने आ गए थे …
हमने सोचा था आपको साथ लेकर ही लौटने की कोशिश करेंगे पर अगर किसी कारण से आप मना कर दें तो फिर देखा जाएगा …
लेकिन अब अपनी आंखों के सामने आप पर हुआ हमला देखने के बाद आपको अकेले छोड़ कर जाने का मन नहीं कर रहा…
आपका जीवन तो यहाँ सुरक्षित ही नहीं ..!”
” नहीं पन्ना जी आप फिजूल इतना डर रही हैं..मैं मेरे घर पर सुरक्षित नहीं तो कहाँ सुरक्षित रहूँगा..मैं आज ही जाकर पुलिस मे उस हमले की रिपोर्ट लिखवाने जाऊँगा!”
” यहाँ की पुलिस को आप देख ही चुके हैं..नहीं हम ऐसे आपको नहीं छोड़ो कर जा सकते..अब आपको हमारे साथ जाना ही पड़ेगा ..
” लेकिन सोचने वालीं बात है कि अखिर मुझ जैसे साधारण से लड़के पर हमला करने से किसे फायदा है..?
बिक्रम की उस बात पर पन्ना इधर-उधर देखती उससे नज़रे चुरा उठी…
” आप अपना सामान बांध लीजिए इंजिनीयर साहब, अब हमें लौटना होगा ..!”
” पन्ना जी ! मुझसे ज़बरदस्ती मत कीजिए प्लीज ! मेरी माँ के अलावा आज तक किसी के ऑर्डर फोलो नहीं किया है मैंने और अगर आप ऐसे ही रूल करती रही तो आपकी बात भी नहीं मानूँगा। “
” आप तो जिद पर उतर आए इंजिनीयर साहब ! आप समझ क्यों नहीं रहे हम आपकी जिंदगी के साथ कोई रिस्क नहीं लेना चाहते ..!”
” क्यों ..? “
” क्योंकि …
क्योंकि हम आपसे … हमारा कहने का मतलब है कि आप हमारे मेहमान है…
और अभी आप वहीं काम देख रहे जो कभी हमारा प्रोजेक्ट था…
हाँ अब समझ में आया , आप जिस नदी परियोजना पर काम कर रहे उसके घोटाले के जिम्मेदार लोग ही आपको मारना चाहते होंगे …
” पर वो काम तो आप देख रही थी ना !”
” पर हम घोटाले के लिए जिम्मेदार तो थे नहीं..जो थे उन्होंने ही आप पर हमला.करवाया है..
” आपको तो डिटेक्टिव होना चाहिए था पन्ना जी..अब आप जाइए , मैं ऑफिस से होकर आ जाऊँगा ..!”
” हमने एक बार कह दिया तो कह दिया…आप अब हमारे साथ हवेली चलेंगे ..!”
” मैं नहीं जाऊँगा !”
पन्ना उस लड़के की जिद देख कर आश्चर्य चकित रह गई..आज तक उसके सामने किसी ने इतनी जिद नहीं की थी…वो जो कहती सब तुरंत पूरा हो जाता..चाहे उसके भाई हो या बाबुजी सब उसके मन में आने से पहले उसकी इच्छा पूरी कर जाते..
इस बार भी तो वहीं हुआ था..पन्ना की आँखों में बिक्रम का अक्स नजर आते ही उसके बाबुजी ने बिक्रम के घर वालो को बुला भेजा था कि बिक्रम और पन्ना का रिश्ता करवा दिया जाए…
और ये निडर लड़का बिना पन्ना की ताकत समझे उससे उलझा पड़ा था…
” आप क्यों जिद पर अड़े हैं…हमें ना सुनने की आदत नहीं है इंजिनीयर साहब!”
” और मुझे किसी भी ऐरे गैरे की जिद पूरी करने की आदत नहीं है ..!”
” अब आप अपनी सीमाओं से आगे बढ़ रहे हैं इंजिनीयर साहब ..प्लीज हमारी बात सुन लीजिए ..!”
” पन्ना !! आखिरी बार कह रहा हूं, मेरे सामने से दफा हो जाओ..मुझे ल़डकियों से तमीज से पेश आना सिखाया गया है..और मैंनें आज तक कभी किसी लड़की.को अपमानित नहीं किया। मैं नहीं चाहता तुम वो पहली लड़की बनो जिसे मैं धक्के मार कर अपने घर से निकालूँ!”
” आप पन्ना की ताकत अब तक नहीं जान पाए..हम प्यार से बात कर रहे तो आप हमारे सर पर ही चढ़ बैठे …. प्लीज हमें मत आजमाये.. अगर हम अपनी हदों को भूल बैठें तब फिर हमें दोष मत दीजियेगा..!”
” में तुम्हें कुछ नहीं देना चाहता , बस तुम जाओ यहां से ..!”
” मतलब आप नहीं चलेंगे ?”
” नहीं ?”
” पक्का..? सोच लिया या एक बार और सोचना है !”
” मैं हर काम सोच समझ कर करता हूं ..जितना सोचना था सोच लिया ..मैं तुम्हारे साथ नहीं जा रहा ..!”
पन्ना की आंखों में आंसू छुपाने की कोशिश में खून उतर आया था…
उसने आगे बढ़ कर बिक्रम का चेहरा अपने हाथो में ले लिया …
इसी सब बहसबाजी के बीच धानी चुपके से रसोई की खिड़की से कूद कर नीचे भाग चुकी थी…
” इंजिनीयर साहब हम आपसे प्यार करने लगे हैं….इतना प्यार की आपको समझा नहीं सकते और ना ही खुद समझ सकते हैं कि अखिर आप में हमने ऐसा क्या देखा जो आप हमारी आंखों में यूँ चढ़ बैठे की अब इन आंखों को और कोई चेहरा जमता ही नहीं ….
बिक्रम के चेहरे के रंग कुछ देर को बदल से गए और तभी पन्ना ने अपना चेहरा बिक्रम के चेहरे के करीब किया और बिक्रम ने उसे करीब आते देख उसे दूर झटक दिया …
” मुझसे दूर रहो पन्ना ! तुम मुझसे प्यार करती हो ये जान कर मुझे भी बुरा लग रहा है कि तुमने गलत जगह दिल लगा लिया …मैं कभी तुम्हारे प्यार के बदले तुम्हें प्यार नहीं दे सकता ..!”
” क्यों ? क्या हम खूबसूरत नहीं , होशियार नहीं..अच्छी पत्नी प्रेमिका बनने का कौन सा गुण है जो हममें नहीं है..?”
” तुम अच्छी हो, बल्कि बहुत अच्छी हो..मैं ही शायद तुम्हारे लायक नहीं..!”
” वो सब हम पर छोड़ो दीजिए..हम जानते हैं आप हमारे लायक हैं..बहुत लायक है..बल्कि हमने आज तक आप.जैसा कोई देखा ही नहीं..
पन्ना एक बार फिर मुस्करा कर बिक्रम से चिपक गई और इस बार बिक्रम ने उसे जरा जोर से ही खुद से दूर कर दिया …
” तुम समझ क्यों नहीं रही हो पन्ना ..मैं तुम्हारे लिए वैसा कुछ नहीं सोचता ..!’
” तो सोच लीजिए ना , सोचने के पैसे थोड़े ना खर्च होतें हैं…”
” अरे हद करती हो? ..मैंनें कह दिया ना मतलब ना !”
” तो फिर सुन लीजिए इंजिनीयर साहब , शादी तो आपकी मुझसे ही होगी…चाहे अभी आप कितना ही ना ना चिल्ला लें लेकिन सुहागरात तो आप.मेरे ही साथ मनाएंगे … “
पन्ना ने एक नजर बिक्रम को देखा और उल्टे पैर वहाँ से निकल गई…
उसके जाते ही बिक्रम अपना सर पकड़ कर बैठ गया….
बैठे बिठाए ये कैसी मुसीबत उसके गले पड गई थी..इस पन्ना का कुछ तो हिसाब करना ही पड़ेगा …लेकिन वो क्या करे जिससे इस बेहूदा लड़की से पीछा छूट सके…
वो बैठा सोच रहा था कि खिड़की से एक बिल्ली रसोई में घुस गई और उसके चलने से प्लेट छन्न से गिरी और अपने में मगन बिक्रम का ध्यान टूट गया …
उसे धानी का ख्याल आया और वो भाग कर रसोई में पहुंचा लेकिन धानी वहाँ नहीं थी…
कुछ सोच कर वो नीचे उतर गया….
” आओ बेटा , नाश्ता खाओगे..?”
” नहीं आंटी..बस मैं ऑफिस के लिए निकल रहा था तो सोचा धानी को भी पूछ लूँ, उसे भी तो कॉलेज निकलना होगा ..!
धानी को आसपास ना देख उसने बेशर्मी से पूछ ही लिया लेकिन धानी की माँ को बिक्रम के चेहरे की व्यग्रता नहीं दिखाई दी…वो भोलेपन मे जवाब दे गयी…
” वो तो कॉलेज निकल भी गई बेटा..!”
” अच्छा !” कहता गिरता पड़ता वो बाहर की ओर भागा
की पीछे से धानी की माँ कटोरी में कुछ मीठा निकाल लायी लेकिन तब तक वो घर से निकल चुका था ……
सारे रास्ते इतनी तेजी से बाइक भगाने पर भी उसे धानी कहीं नजर नहीं आई, अखिर वो उसके कॉलेज पहुंच ही गया… वहाँ भी इधर उधर ढूंढते उसे एक बड़े से पेड़ के नीचे चबूतरे पर उदास सी बैठी धानी बड़ी देर में नजर आयी..
” अरे तुम यहाँ बैठी हो…मैं सारे रास्ते तुम्हें ढूंढते आया ..बता कर तों निकलती…
” कब बताते और कैसे बताते वो चुड़ैल जो चिपकी पडी थी आपसे ..!”
” तो इसमें मेरी क्या गलती..मैं तो पूरी कोशिश में था कि वो भागे वहाँ से , लेकिन जा ही नहीं रही थी.. क्या करता..?
” आप अगर उसे भगाने की कोशिश कर रहे थे तो फिर ये क्या है…?
धानी ने अपना फोन बिक्रम की तरफ़ बढ़ा दिया ..उसकी स्क्रीन पर नजर पड़ने से पहले बिक्रम की नजर धानी की लाल आंखों पर पड़ी और उसे रोते देख वो आश्चर्य चकित हो गया ..
बिना कुछ बोले उसने धानी का फोन हाथों मे लिया और देखने लगा…
उसमें उसके ठीक सामाने पन्ना का फ्रेंड बुक एकाउंट खुला.था जिसमें उसकी और पन्ना की हाथ थामें तस्वीरें नजर आ रही थी…
उसे याद आया पिछली रात संगीत के समय उसने एक अध बार उसका हाथ यूँ ही थाम लिया था लेकिन उतनी सी देर में ये तसवीर कौन ले उड़ा…
उसने चोर नजर से धानी की तरफ़ देखा वो उसे ही घूर रही थी…..
” कैप्शन भी पढ़ लीजिए …..
बिक्रम ने वापस देखा … एक तस्वीर जिसमें वो बहुत खुल कर मुस्करा रहा था के नीचे एक गाने की पंक्ति लिखी थी…..
दिलदारा दिलदारा
तब जीता जब तुझसे हारा ….
और साथ ही लिखा था …
equally unsingle ….
बिक्रम ने लाचारी से धानी की तरफ़ देखा , और धानी नाराजगी से वहां से उठ कर चली गई…
क्रमशः
aprana….
