गली बनारस की -4

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की..- 4

    धानी की बात सुन हमारी सांस अटक कर रह गई थी यह कितनी आसानी से बोल गई मर्डर के चार्जेस लगे हैं। ये जिसकी पैरवी कर रही है, उसने किसी का खून किया था । पर वह है कौन जिसने खून किया और खून किया किसका? सवाल बहुत सारे थे हमारे मन में और हम सामने बैठे उसके सलोने मुखड़े को देख रहे थे…
…. यूं लग रहा था सुबह का सूरज उसके चेहरे पर ही खिल रहा है…. हमने  वहां रखा पानी का बोतल उठाया और दो घूंट पानी  पीने के बाद उसकी तरफ देखा और अपनी सारी हिम्मत जोड़कर उससे पूछ ही लिया..

” मर्डर किसने किया है?”

” हमारे एक पहचान वाले हैं, उन्होंने!”

कसम से कह रहे हैं धानी ,अगर इस वक्त तुम्हारी जगह कोई और सामने बैठा होता और उसने ऐसा जवाब दिया होता तो हम उसका गला दबा चुके होते..

” अच्छा मर्डर हुआ किसका है?”

” उन्होंने अपनी पत्नी का खून किया है!”

सत्यानाश!! इस केस पर तो रिहाई नामुमकिन है धानी

” सॉरी लेकिन ये केस तो बनने से पहले ही खत्म हुआ समझो! अगर पत्नी का खून किया है किसी पति ने तो उसके बचने की कोई गुंजाइश नहीं है!”

” लेकिन जब आप उनकी कहानी सुनेंगे तो आप खुद समझ जाएंगे कि उन्होंने ऐसा किया क्यों?”

” लेकिन सबूत और गवाह तो उसके खिलाफ होंगे ही ऐसे में उसे बचा पाना बहुत मुश्किल है!”

” हां बचा पाना मुश्किल है, इसीलिए तो कोई वकील उनका साथ देने को तैयार नहीं है! लेकिन अब तक कोर्ट में उनका गुनाह साबित नहीं हुआ है और केस चल रहा है , इसलिए हमने सोचा अगर कोई काबिल वकील उनका केस ले लेता तो, हो सकता है वह बच जाए!”

हमारी समझ से बाहर था कि हम तुम्हें कैसे समझाएं धानी कि एक खूनी को बचा पाना बेहद मुश्किल है..

” हम जानते हैं आप सोच रहे होंगे कि हम आपके पीछे पड़ गए हैं। अगर आपको ऐसा लग रहा है कि हम किसी भी तरह की जबरदस्ती कर रहे हैं, तो हम चुपचाप चले जाएंगे लेकिन उसके पहले हम आपसे कुछ बताना चाहते हैं।”

“हां बोलो क्या बताना चाहती हो?”

” पता नहीं आपने हमें पहचाना या नहीं लेकिन हमने पहली बार देखकर ही आपको पहचान लिया था,  हम भी बनारस के उसी विद्या मंदिर से पढ़े हैं जहां आपने अपनी स्कूल की शिक्षा पूरी की थी! “

  यह क्या कह दिया धानी! आज तो मतलब तुमने दिन बना दिया हमारा ।
   एक के बाद एक हमें हार्ट अटैक देती जा रही हो।  पहले एक खूनी की तरफ से केस लड़ने का ऑफर देकर और दूसरी बार यह कहकर कि तुमने पहली नजर में ही हमें पहचान लिया था तो क्या स्कूल में हम जो सोचते थे कि हम पर किसी का ध्यान नहीं जाता गलत था? मतलब तुमने हमें स्कूल में भी नोटिस किया था? क्या  हम इस लायक भी थे..?
    हमारे सीने में चलती हमारी धड़कन हमारे कानों तक सुनाई दे रही थी, और वह वाकई इतनी तेज सुनाई दे रही थी कि लगा कहीं तुम भी पकड़ ना लो कि हमारा दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है। अनजाने में ही हमारा हाथ हमारे सीने पर चला गया और सीने को संभाले हुए हम नीचे देखने लगे। एक बार फिर बोतल से दो घुट पानी पिया अपनी धड़कनों को नियंत्रित करने के लिए,  और तुम्हारी तरफ देखने लगे..

” हमने भी तुम्हें पहचान लिया था धानी!”

” क्या सच!! आपने सच में हमें पहचान लिया था लेकिन स्कूल  के बाद तो हम गर्ल्स कॉलेज चले गए थे?

अब हम तुमसे क्या कहते धानी, कि तुम्हारे चक्कर में ही हमने आर्ट्स लिया था। लेना तो हम साइंस चाहते थे पर जब उस शाम सुना कि तुम जया से बातें करते हुए आर्ट्स विषय लेना चाह रही हो तो हमने भी 11वीं में आर्ट्स ही ले लिया..
   एक तरह से अच्छा ही किया था क्योंकि 2 साल और तुम्हें देखते हुए गुजारने का हमें मौका मिल गया था!
   हालांकि तुमने स्कूल के बाद कॉलेज की पढ़ाई के लिए वहां दाखिला नहीं लिया जहां हमने लिया था और हम वहां ले नहीं सकते थे जहां तुम ने दाखिला लिया था । तुमने महिला महाविद्यालय की तरफ रुख क्यों फेर लिया था धानी!  काश तुम भी हमारे एसबीआर कॉलेज का हिस्सा बनती तो कॉलेज के दिन भी तुम्हारी संगत में कितने रंगीन और खुशनुमा गुजर सकते थे हालांकि हमारा कॉलेज तुम्हारे कॉलेज से कितना भी दूर हो हम सुबह शाम आते जाते एक न एक बार तो तुम्हें ताक ही लिया करते थे…

  ” हमारा नाम जानती हो….”

पता नहीं कैसे हमारे मुंह से यह सवाल निकल गया और तुमने तुरंत ही चहकते हुए जवाब दे दिया..

” साजन, साजन खंडेलवाल!! अच्छे से जानते हैं आपका नाम; और हम ही क्या हमारी पूरी क्लास में शायद ही कोई हो जिसे आपका नाम याद ना रहा हो इतना अनोखा जो था!”

  अनोखी तो तुम थी धानी और आज भी हो! तुम्हें क्या बताएं कि आज कैसा महसूस कर रहे हैं तुम्हारे सामने बैठकर ।
   हमारे लिए तो बस यही बहुत है कि तुम हमें जानती थी और आज तक तुमने हमें याद रखा हुआ है वो भी  हमारे नाम के साथ ! हमारा तो यह जीवन सफल हो गया! उतना मिल गया है आज जितनी कि हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी! अब तो उस आदमी ने चाहे अपनी बीवी का खून किया हो या अपनी सास व ससुर का! हम उसका केस सिर्फ लड़ेंगे ही नहीं उसे जिताकर भी रहेंगे बस तुम अपने साजन पर भरोसा रखना….

“चलो अब उस केस के बारे में भी कुछ चर्चा हो जाए । लेकिन अब प्लीज यह मत कहना कि वह तुम्हारे पहचान वाले हैं हमें शुरू से बताओ और सब कुछ बताओ!”

“हां हम तुम्हें सब कुछ बताएंगे और शुरू से बताएंगे.. अरे सॉरी! देखा अभी कुछ देर पहले तक आप कह रहे थे और अब अचानक से तुम पर चले आए,स्कूल की बातें याद आ गई ना इसलिए!”

“अच्छा किया!  बल्कि हम तो कहने भी वाले थे कि हमें आप की जगह तुम ही कहो।   ज्यादा कंफर्टेबल होकर तुम अपने मन की बात हमसे कह पाओगी..”

हमारी बात सुन कर वो मुस्कुरा उठी और बस ऐसा लगा चारों तरफ फूल खिल उठे और बहार चली आई ….उसी वक्त हमारा फोन बजने लगा….

  तू बन जा गली बनारस की मैं शाम तलक

  रिंगटोन बजते हमने देखा फोन अनुराग का था, हमने कट कर दिया और तुम हमारे फोन को देखकर हमें देखने लगी..

“यह गाना तुम्हें भी पसंद है?”

अब तुमसे क्या कहते धनी की पहली बार तुम्हारे मुंह से ही सुना था ये गाना और तभी से दिल में बस गया…
   गंगा घाट पर कोई यूथ फेस्टिवल था उस समय हम वकालत की पढ़ाई शुरू कर चुके थे और हमें यूथ फेस्टिवल में गंगा किनारे सीढ़ियों पर बैठे उस वक्त यह उम्मीद नहीं थी कि तुम यहाँ नजर आ सकती हो। पर जाने कहां से माइक पर तुम्हारी आवाज सुनी और हम तुम्हें ढूंढने लगे….
…. गहरे हरे रंग का लहरिया कुर्ता पहना था तुमने और सुनहरी चूड़ीदार पर पतली पतली सुनहरी पायल पहन रखी थी…
    फागुन की दोपहर का समय था मीठी मीठी हवाएं चल रही थी और तुम्हारे बाल लहरा रहे थे….. तुमने अपना गाना शुरू किया था….

मुझे घर से भगा ले जा एक दिन,
तेरे साथ फिरूँ मैं सैलानी
तू हवा है मैं घनघोर घटा
मुझे छेड़ के कर पानी-पानी
मेरी खुशियों में, मेरे ग़म में तू…
मेरे इश्क़ के हर मौसम में तू
तू बैठा रहे मेरे साए में…
और धूप सी मैं निकलूँ तुझमें…..
तू बन जा गली बनारस की…

  एक हाथ से माइक पकड़े दूसरे हाथों से तुम अपनी उड़ती जुल्फों को गालों के पीछे कान पर समेटती जा रही थी। जिसमें तुम्हारा झुमका बार-बार तुम्हारे गालों पर टकराकर इतरा रहा था कि वह तुम्हारे कितने करीब है और हम बस तुम्हें देखे जा रहे थे।
     बस वह दिन था और आज का दिन है… उस दिन से हमारी रिंगटोन कभी नहीं बदली…
   तुम्हें बता नहीं सकते कि उस दिन से यह गाना हमारे लिए क्या हो गया था अब तो हमारे दिन की शुरुआत इसी गाने से होती है…

” हां हमें भी पसंद है।  यह गाना ठीक लगता है,  वैसे हमने तुम्हारे मुंह से इस गाने को सुना है एक बार!”

” यूथ फेस्टिवल में तुम भी थे क्या?”

” हां हम भी थे, लेकिन बहुत पीछे बैठे थे।”

” हम उस साल हिस्ट्री में पीजी करने के लिए कॉलेज में एडमिशन लिए थे और तभी यूथ फेस्टिवल का पता चला था तो बस जया के बहुत जोर देने पर हम गाने के लिए चले आए थे!”

” अरे हां जया कहां है आज-कल? और कैसी है वो?”

” पता नहीं!! हमारा अब किसी से कोई कांटेक्ट नहीं रह गया है!”

” फ्रेंड बुक पर तो होगी वह!”

” हां होगी, लेकिन हम नहीं है!”

” तुम फ्रेंड बुक पर नहीं हो?”

कैसा झूठा सवाल कर रहे थे हम तुमसे धानी !क्योंकि यह हम अच्छे से जानते थे कि तुम फ्रेंड बुक ही क्या किसी भी सोशल साइट पर नहीं हो! क्योंकि हमने रात दिन एक कर के तुम्हें ढूंढा था, हर उस जगह पर जहां तुम्हारे मिलने की एक छोटी सी भी उम्मीद रही हो , पर तुम नहीं मिली; कहीं भी नहीं, और देखो उस यूथ फेस्टिवल के बाद सीधे आज यहां ऐसे मिल गई…

” हम अगर अपने बचपन की यादों में गुम रहे तो तुम्हारे उस केस के बारे में बात नहीं कर पाएंगे। तुम बताना चाहोगी कि केस एक्चुअली क्या है?”

  धानी कुछ कहती उसके पहले ही अनुराग का फोन वापस आने लगा, हमें लगा एक बार फोन उठाकर उसे बताना ही पड़ेगा वरना वह फोन करता रहेगा हमने अनुराग का फोन उठा लिया…
   लेकिन फोन उठाते हीं कट गया और हमने फोन एक तरफ रख कर धानी को वापस पूछ लिया..और उसने बताना शुरू किया …

” जब हम कॉलेज में थे तब शायद तुमने भी सुना होगा चौधरी परिवार के बारे में । हमारे शहर के सबसे नामी गिरामी परिवारों में से एक था। हम उन्हें इसलिए जानते थे क्योंकि हमारे पापा उन्हीं के यहां मुनीम थे , उनके अकाउंट का काम देखा करते थे। उस वक्त हमें लगता था चौधरी इतना बड़ा नाम होने के बाद भी कितने अच्छे लोग हैं।  धर्म-कर्म के नाम पर सबसे आगे रहने वाला परिवार था उनका;  लेकिन उस वक्त हम यह नहीं जानते थे कि शहर के सारे दो नंबर के धंधे पर भी उनका एकछत्र राज था।
   दारू के अड्डे हो या अवैध रेत खनन का काम, किसी तरह की भी गुंडागर्दी में चौधरी खानदान पीछे नहीं था और इस बारे में हमारे पापा सब कुछ जानते थे..
    पहले तो सिर्फ बड़े होटल के बार के टेंडर ही उन्हें मिला करते थे , बाद में सरकारी दारू के अड्डों पर भी उन्होंने अपना कब्जा जमा लिया था। कहने का मतलब यह था कि शहर का कोई भी बड़ा या छोटा बिजनेस उनसे अछूता नहीं था ।
    शहर के सबसे जाने-माने रईस थे चौधरी…
जितना ही जाना माना खानदान था उतना ही बड़ा परिवार था इनका घर के सर्व प्रमुख सर्वे सर्वा थे.. मानिक चौधरी!
   हमारे पापा इन्हीं के नीचे काम किया करते थे।
मानिक चौधरी के दो बेटे थे… हीरक चौधरी और रत्न चौधरी और उनकी एक इकलौती बेटी थी पन्ना!!
   हमारी जान की दुश्मन पन्ना चौधरी!!

  वो अपनी रौ में बोलती चली जा रही थी और हम उसे देखे चले जा रहे थे , कि तभी एक बार फिर हमारा फोन बजने लगा ..
  अनुराग का फोन था, हमने उससे आंखों से ही इजाजत मांगी और फोन लपक लिया ..
फोन उठाते ही अनुराग बरस पड़ा ..

” अबे कहाँ मर गए हो ?, सुबह से चार बार फोन लगा चुके तुम्हें?”

” हुआ क्या है बताओगे भी ?”

” तुम्हारी तेरही की तैयारी हो रही है , खीर बनाने महाराज को बैठाया जा चुका है ,और हम दूध खरीदने निकले हैं। अबे यार तुम मरने वाले काम करते क्यों हो ? सुबह ही तुमसे चौधरी की फाइल के बारे में पूछा था ना ?”

” हाँ तो क्या हो गया ?”

” उनके पेपर्स तुमने तैयार कर दिए है ना ?”

” हाँ!”

” तो बेटा जमा कब करोगे ? अपनी बरसी के बाद?  ..चौधरी का बेटा रत्न चौधरी दस मिनट से यहाँ बैठा है , अब तक उसे इधर उधर कर के साहब टालते हुए तुम्हारा इंतजार कर रहे थे, पर तुम तो साले आज जादू के पिटारे में गायब हो गए हो … जल्दी आओ वर्ना ये छोटा चौधरी यहीं से तुम्हें गोली मार देगा .. साला कट्टा जींस में खोसें बैठा है ।”

” बस पांच मिनट में पहुंच रहे हैं , रोक के रखो उन्हें ..”

  उसने भी ये सुन लिया था कि किसी जरूरी काम से हमें तुरंत ऑफ़िस निकलना होगा , वो अपनी जगह से खड़ी हो गई …

” तुम जाओ साजन ! हम बाद में आ जाएंगे..”

धीमे से सिर हिला कर हमने अपना बैग सम्भाला और खड़े हो गए , वो चुपचाप उठ कर बाहर निकल गई और उसके निकलने के बाद हमने महसूस किया उसकी खुशबु हमारे घर में बसी रह गई थी ..
  दरवाजा जोर से खींच कर हम लगभग भागते हुए से लिफ्ट की तरफ़ दौड़ पड़े…

क्रमशः

aparna


5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments