
Gone girl-6
या तेरे अलावा भी किसी शय की तलब है
या अपनी मोहब्बत पे भरोसा नहीं हम को….
सर मैं जैसे ही उस कार में बैठी किसी ने मेरी कनपटी पे गन रख दी, मैं चुपचाप बैठी रही, मैने धीरे से ड्राईवर का चेहरा देखने की कोशिश की पर उसकी बड़ी दाढ़ी और गॉगल्स के अलावा कुछ नही देख पाई, पीछे की सीट पर एक आदमी था या उससे ज्यादा मुझे समझ नही आया, पर मै ये समझ गयी थी की मै बुरी तरह से फंस चुकी हूँ ।
कार बहुत तेज़ रफ्तार से भाग रही थी, तभी एक ब्रिज आया, गाड़ी जैसे ही ब्रिज पे आगे बढ़ी , ट्रैफिक के कारण स्पीड थोड़ी कम हो गई….मैने बिल्कुल भी समय ना गंवाते हुए कार का अपने तरफ का दरवाजा खोला और कार से बाहर कूद गई, उन लोगों को जब तक कुछ समझ आता और वो लोग गाड़ी वापस मोड़ते मैनें तुरंत ब्रिज से नीचे पानी में छलांग लगा दी, मेरे मन में उन कार वालों और उनकी गन का इतना डर बैठ गया था कि मुझे लगा अगर मै ब्रिज पे रही तो ये लोग गोली मार देंगे….
पानी में मैं कूद तो गई लेकिन मुझे तैराकी सिर्फ काम चलाऊ ही आती थी, मैं इतनी अच्छी तैराक नही थी कि नदी को तैर के पार कर पाऊँ, फिर भी मैं अपना दम साधे तैरती रही, कुछ देर में ही मेरी सांस फूलने लगी….हाथ पैर ने जवाब दे दिया….मै बिल्कुल अशक्त हो गई…..मुझे लगा मैं डूब जाऊंगी, धीरे धीरे खूब सा पानी अन्दर जाने लगा, नाक से मुहँ से और मेरा दम घुटने लगा…तभी एक उंचा पत्थर नज़र आया, मै बस किसी तरह वहाँ पहुंच कर निढ़ाल हो गई
मै ना जाने कब तक बेहोश पड़ी रही, जब होश आया तो फिर थोड़ा बहुत तैर कर किसी तरह किनारे पहुंची, ज़मीन पे पहुंचते ही मुझे लगा जन्नत मिल गई, अपने बचने की खुशी होती कि उसके पहले मुझे समर पे चली गोली याद आ गई, और मै वही बैठी रोने लगी, कुछ देर बाद अपने मन को समझा कर मैं उठी और चलते चलते पास की बस्ती तक पहुंची, वहाँ लोगो से बात की तो पता चला कि ये कोई पिछड़ा सा गांव था जहां फ़ोन की भी सुविधा उतने अच्छे से नही थी बल्कि कहना चाहिये थी ही नही, किसी एक आध के घर फ़ोन था भी तो बंद पड़ा था।
उसी गांव में एक परिवार ने मुझे अपने घर पे बैठाया खिलाया पिलाया, मै इतनी थक गई थी कि मेरी सारी हिम्मत चूक गई थी, मैं खाने के बाद वही सो गई।
जब मेरी नींद खुली तब मुझे कुछ आवाजें सुनाई देने लगी, मेरी हालत ऐसी थी कि मुझे अब किसी पे भी भरोसा करने मे डर लग रहा था, मैं चुपके से दरवाजे से लगी उनकी बातें सुनने लगी, मुझे जो सुनाई दिया उससे मेरे होश फाख्ता हो गये….
वो औरत और आदमी मुझे नेपाल ले जाकर बेचने की बात कर रहे थे, मैनें चुपके से पीछे की खिड़की की जाली को हटाया और खिड़की से कूद कर वहाँ से भाग खड़ी हुई।।
मैं बहुत परेशान हो चुकी थी सर………,थकान कमजोरी और समर को खो देने का दर्द इतना गहरा था की मैं थोड़ी थोड़ी देर मे थक कर बैठ जाती थी,…पूरी रात उस जंगल से गुजरने के बाद सुबह मुझे एक कच्चा सा रास्ता दिखा, उसी रास्ते को पकड़े मैं बहुत दूर तक चलती चली गई….आखिरकार मुझे हायवे मिल गया और मेरी जान में जान आयी।
हाईवे पे मैं बहुत देर तक किसी गाड़ी आने का रास्ता देखती रही, आखिर शाम को मुझे एक बस आती दिखी, मैं उस बस में चढ़ गई……ना तो मेरे पास पैसे थे…ना मोबाईल….मैने कंडक्टर से पूछा तो उसने कहा बस शिमला जा रही है..
मेरे शहर से उल्टी तरफ जा रही बस में बैठने के अलावा मेरे पास कोई चारा ना था…मैने सोचा शिमला से वापस अपने शहर जा कर पुलिस में शिकायत दर्ज कराउन्गी……
मै सबसे पहले वहाँ पहुंच कर अपने पापा को फ़ोन करना चाहती थी, क्योंकि मुझे और किसी का भी नम्बर याद नही था, मैने सोचा पापा को अपने पास बुला कर उनके साथ ही वापस लौटूंगी।।
पर जाने मेरी किस्मत को क्या मंजूर था, बस घाटियों में चक्कर खाती चल रही थी कि बस के अन्दर एक छोटा सा धमाका हुआ और देखते ही देखते बस की मेन बैटरी के पास आग लग गई….आग ऐसी तेज़ी से फैलने लगी कि ड्राईवर घबरा गया और बस के ऊपर से उसका कोन्ट्रोल खो गया, बस एक गोल चक्कर लगाती सीधी खाई में गिरी ।।।
बस के अन्दर ऐसी भगदड़ मच गई की लोग बाहर कूदने को इधर उधर भागने लगे, तभी बस पलटी और पलट पलट के इतनी गहरी खाई में गिरती चली गई ।।
उसके बाद मैं बेहोश हो गई थी सर!!!!
मैं पता नही कब तक बेहोश रही, असल मे मेरे तरफ की खिड़की का कांच टूट गया था तो बस के गिरते समय मैं किसी तरह बस से बाहर गिर पड़ी और इसिलिए जिंदा बच पाई, क्योंकि जो लोग अन्दर रह गये थे उनका तो क्रियाकर्म भी वही हो गया।।
मेरे सर और बाकी शरीर पे बहुत गहरी चोट आयी थी, मुझे जब होश आया तो मैनें खुद को एक मोनेस्ट्री में पाया…..वहाँ कई धर्म गुरू इधर उधर आते जाते दिख रहे थे…एक माई मेरी सेवा कर रही थी, उन्ही के लगाये लेप और दवा का जादू था जो मुझे मौत के मुहँ से खींच लाया, मैने उन माई से पूछा मै कब से यहाँ हूँ, तब उन्होने बताया कि मैं लगभग 7 महीने से बेहोश पड़ी थी, मेरा शरीर लगभग अर्धमृत अवस्था में शिमला से लौटने वाले धर्म गुरुओं की टोली को मिला था….. जिसे वो अपने साथ तिब्बत ले आये, और तब से मैं बेहोश ही थी, उन्होने मुझे बताया की मेरे हाथ और पैर की सारी हड्डियां कहीं ना कहीं से टूट गई थी जिन्हे उनके चमत्कारी लेप ने जोड़ा है,और अब मुझे धीरे धीरे खुद को उठाने और चलाने फिराने की कोशिश करनी चाहिये।।
– सर मुझे इतने जख्म आये थे कि मुझे खुद आश्चर्य था की मैं जिंदा कैसे बच गई ।।पर उन बौद्ध लामा गुरुओं की औषधियों और सात्विक आहार पथ्य का कमाल था कि मैं वापस जी उठी, , मेरी सारी टूटी फूटी हड्डियों को भी उन लोगों के पट्टीबन्धन ने जोड़ कर नया कर दिया था, लेकिन इतने भर से मेरी समस्या का समाधान नही था, अभी तो मुझे खुद से जंग लड़नी और जीतनी थी, सात महीने बाद जब मैनें पहली बार ज़मीन में पैर रखा तो मैं वापस भरभरा के गिर गई , यहाँ से मेरी असली परीक्षा शुरु हुई, उनके चिकित्सा वैद्य की सहायता से उनके बताये अनुसार धीरे धीरे मैनें खड़े होना और चलना शुरु किया।।
और लगभग सोलह महीनों की मेहनत का नतीजा है कि मैं आज आपके सामने खड़ी हूँ, उन मॉन्क की सहायता से मैं इतने दिन वहाँ रही, जब वहाँ से निकली तब उन्होनें मेरे हाथ में एक पोटली रख दी, रेशमी कपड़े से बंधी उस पोटली में मेरे हीरे के कर्णफूल हीरे की अँगूठीयाँ और हीरे की पेंडेंट के साथ प्लेटिनम की चेन और ब्रेसलेट थी, मैने उसे लेने से मना किया पर वो लोग नही माने और सब कुछ मेरे हाथ में रख दिया।।
मुझे गाड़ी से शहर तक भिजवाने का इन्तेजाम भी कर दिया, शहर पहुंचते ही सबसे पहले मैनें अपने पापा को फ़ोन किया, पापा का फ़ोन उनके असिस्टेंट ने उठाया और उसने बताया की अपनी बेटी की मौत की खबर पापा बर्दाश्त नही कर पाये और कुछ दिनो बाद ही अटैक से उनकी सांसे थम गई, उसके बाद माँ, मामा जी के पास आस्ट्रिया चली गई…….उन्होनें अहमदाबाद का सारा बिजनेस बुआ जी को सौंप दिया, मैनें घर पर बुआ जी को फ़ोन लगाया और बताया की मैं सलोनी बोल रही हूँ तो उन्होनें मेरी बात मानने की जगह मुझे भला बुरा कहना शुरु कर दिया और पुलिस की धमकी देकर फ़ोन काट दिया, उसके बाद मेरी मेरे ससुराल फ़ोन करने की या जाने की हिम्मत नही हुई ,और मैं सीधे यहाँ आपके पास चली आई….
सर प्लीज़ आप मेरी मदद कीजिए, कुछ नही कर सकते तो कम से कम समर के कातिलों को सज़ा दिलवा कर मुझे मेरी माँ के पास भेज दीजिये, आपका बड़ा एहसान होगा।।”
सलोनी ने अपनी बात खतम कर पानी पिया और इंस्पेक्टर शेखर की तरफ देखने लगी,इंस्पेक्टर शेखर ने सलोनी से तिब्बत की मोनेस्ट्री का पता लेकर वहाँ के पुलिस स्टेशन में बात कर मोनेस्ट्री मे अपने लोगो को भेजा सारी बात की सच्चाई जानने के लिये,और सलोनी को अपनी कहानी सुनाना शुरु किया___
शेखर–सलोनी जी आज से कुछ दो साल पहले की बात है, एक शाम ऐसे ही बारीश वाली अंधियारी रात में आपके रायचंद हाऊस से फ़ोन आया, फ़ोन करने वाली ने अपना नाम सलोनी रायचंद बताया ,और हमे जल्दी से जल्दी घर पहुंचने को कहा, मैं अपने साथ दो कोन्स्टेबल लेकर निकल पड़ा,जब आपके घर पहुंचा तो वहाँ बड़ी हाय तौबा मची थी, हम लोग जैसे ही अन्दर गये, वहाँ खड़ी औरत ने आगे बढ़ के मुझे अपना परिचय घर की बडी बहू सलोनी रायचंद के नाम से दिया, वहाँ खड़ी एक और बुज़ुर्ग महिला को उसने अपनी सास बताया और वही सर पकड़ के हैरान परेशान आदमी को अपना पति समर रायचंद बताया।
मेरे पूछने पर उसने बताया की उसकी देवरानी अनन्या और देवर अमर का हर समय झगड़ा होता है, अमर और अनन्या आज भी किसी लड़की को लेकर झगड़ा कर रहे थे, और दिन की बात होती तो वो लोग बीच बचाव कर लेते पर आज अमर गुस्से में हाथ में गन लेकर अन्दर कमरे में घुसा और दरवाजा बन्द कर लिया है, उसके कुछ देर बाद गोली चलने की आवाज़ आयी और तबसे अन्दर सब शान्त है, डर के मारे घर के लोग उस तरफ गये नही और पुलिस को बुला लिया, ये सुनते ही मैं ऊपर की तरफ भागा, दरवाजा अन्दर से बन्द था, हमने धक्का मार कर दरवाजा तोड़ दिया, अन्दर गये तो एक लड़की की बुरी तरह से बिगडी लाश वहाँ पड़ी थी, चेहरा तेजाब डालने से बुरी तरह जल कर बिगड़ गया था, और गोली मारने वाला गोली मार कर फरार हो चुका था, उस लाश को देखते ही सबका रोना धोना शुरु हो गया, हमने लाश का पंचनामा किया और लाश को फोरेंसिक में भेज दिया, और साथ ही अमर की तलाश शुरु कर दी।।
लाश का पोस्टमार्टम होना था कि उसके पहले लड़की की सास की तबीयत बहुत खराब हो गई, ऐसी नौबत आ गई कि उन्हें आई सी यू में भर्ती करना पड़ा, और उन्होने कहा कि उनकी इच्छा है कि लाश को चीरा फाड़ा ना जाये, उस परिवार के लिखित अनुमति के कारण हमनें लाश का पोस्टमॉर्टम नही कराया और लाश उनके हवाले कर दी, इसके दो दिन बाद ही अमर की बुरी तरह से जली हुई गाड़ी और गाड़ी के अन्दर बुरी तरह से जली हुई लाश दूर हाइवे पे मिली, लाश के पास से बरामद घड़ी और चेन से उसकी शिनाख्त कर के हमने उसे परिवार के हवाले कर दिया।
घड़ी और चेन दोनो ही गाड़ी से बाहर पडी मिली जिससे एक बार को शक भी हुआ कि सब कुछ जल जाने पर ये दो चीज़े बाहर क्या लाश ने खुद फेन्की पर जब घर के लोग खुद किसी तफ्तीश के लिये तैय्यार नही थे तो हम ही क्यों माथा मारे, ये सोच हमने केस क्लोज़ कर दिया।।”
सलोनी–सर आपकी कहानी तो बिल्कुल अलग है,ऐसा तो कुछ नही हुआ था,मुझे तो कुछ समझ ही नही आ रहा।।
शेखर–सेम हेयर सलोनी जी!! मुझे भी माजरा समझ नही आ रहा,,अब ये माजरा रायचंद हाऊस जा कर ही सुलझेगा , कल सुबह आप और मैं रायचंद हाऊस जायेंगे और समझने की कोशिश करेंगे की आखिर सच क्या है।
क्रमशः
aparna…

हाय.. दिमाग़ है या कंप्यूटर 🤔, नज़र ना लगे ऐसे दिमाग़ वाली हमारी डॉक्टर साहिबा को,। इतना सस्पेंस… 🤔पर अच्छा, बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻👌🏻