Gone girl -4

Gone girl

Gone girl-4

–      ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ए’तिबार किया 
      तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया …

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वसीयत को पढ़ कर और सबके सिग्नेचर लेकर पर्सि अंकल चले गये…..उन्होनें उस वसीयत की एक एक कॉपी हम सभी को भी दे दी और दो कॉपी अपने साथ ले गये…..

       लेकिन उनके जाने के बाद वो शाम बड़ी मनहूस सी बीती……..मेरे पति जो मेरा इतना खयाल रखते थे भी उस दिन बड़े खामोश से थे…..,मै उनकी तकलीफ समझ पा रही थी,…….जिस बेटे ने अपने पिता को बचाने के लिये रात दिन एक कर दिया था, उसी बेटे को इस तरह से वसीयत का झुनझुना सा पकड़ा देना जाने क्यों  मुझे भी अच्छा नही लग रहा था पर मेरे हाथ बंधे थे, मैं कुछ भी करने में लाचार थी।

     खैर अगले दिन से मैने ऑफिस जाना शुरु कर दिया, ऑफिस में काम समझने मे मेरे देवर ने मेरी काफी मदद की।
      पहले पहले मुझे लगता था कि वो किसी काम का नही है……बस सारा दिन अपने लैपटॉप पे बैठा टाईम पास करता है,पर धीरे धीरे समझ आने लगा कि उसने ऑफिस को काफी हद तक संभाल रखा है।
     ऑफिस जाते हुए मुझे लगभग 15से 20 दिन हो चुके थे पर समर का मूड अभी भी ठीक नही हो पा रहा था, मै उन्हें लाख समझाने की कोशिश करुँ कि जो मेरा है वो सब उसी का तो है, पर समर के चेहरे पे मुस्कान नही ला पाई, इसी बीच मुझे ये महसूस होने लगा की मेरा देवर अमर मेरा फायदा उठाना चाहता है।।
    वो बार बार मुझसे नजदीकी बढाने की कोशिश करने लगा, वो किसी ना किसी बहाने मुझसे अकेले में बात करने की कोशिश करता, मुझसे अकेले मिलने के बहाने ढूंढता पर मै भी किसी ना किसी बहाने उसे टाल देती।
   मैनें ये बात समर को बताने की कोशिश की तो उसका गुस्सा और भड़क गया, उसने मुझे ही भला बुरा कहना शुरु कर दिया, उसके अनुसार ‘ अगर इतने पैसों की मालकिन रहोगी तो भँवरे तो आसपास मंडरायेंगे ही’ समर के मुहँ से खुद के लिये ऐसा सुनना बहुत बुरा अनुभव था, मुझे समझ आने लगा कि समर को खुद कम मिला इससे कहीं ज्यादा उसे बुरा इस बात का लगा कि मुझे वसीयत में बहुत कुछ मिल गया …..मैने उसी शाम पर्सि अंकल को बुलाया और अपनी वसीयत में नॉमिनी समर को कर दिया….. हालांकि मेरा ज़मीर गवाही नही दे रहा था, आखिर हम पति पत्नि जो थे , मेरा सब उन्हीं का तो था लेकिन उनका मेल ईगो सैटिस्फाई जो नही हो रहा था, अखिर कैसे कोई पति अपनी जरूरतों के लिये अपनी पत्नि के आगे हाथ फैलाता।
   इसलिये मैंने ये रोज़ रोज़ का झगड़ा ही समाप्त कर दिया और अपना नॉमिनी समर रायचंद को बना दिया।
  
      हालांकी एक पत्नि की वसीयत मे नॉमिनी पति ही होता है पर मैने अब तक वसीयत नही तैय्यार करवाई थी, इसलिये मेरे बाद उस वसीयत का मालिकाना हक मेरे से कम शेयर होल्डर को मिलना था….इस हिसाब से मेरे देवर को सब कुछ मिल जाता ।
   
      मेरे वसीयत तैय्यार कराने के बाद समर के चेहरे पे अब एक सुकून देख पा रही थी….वो वापस से पहले वाला खूब प्यार करने वाला समर बन गया..जिंदगी अपनी राह चलने लगी।
     घर में सभी खुश दिखते थे पर मैं अन्दर से जानती थी कि मेरी देवरानी अनन्या मुझसे खुश नही थी। वो अपना ज्यादातर समय अपनी सहेलियों के साथ मौज मस्ती और किटी पार्टी में निकालती थी, सासु जी का भी कुछ वैसा ही हाल था।


    मेरी हेल्पर जया ने मुझे बताया कि मेरी सास का शुरु से यही हाल था।
     इस सब के बावजूद मेरे ससुर जी ने मेरे नाम इतना सब क्यों किया ये मेरी समझ के बाहर था……. मेरी मैनेजमेंट की डिग्री बस तो कारण नही हो सकती थी…क्योंकि उनके दोनो लड़कों समर और अमर ने भी विदेशों से मैनेजमेंट की डिग्री हासिल की थी ।

    मैनें ऑफिस संभाल लिया था, मैं समर और अमर ऑफिस के अलग अलग डिपार्टमेंट को देखा करते थे,…
      समर एक बहुत अच्छे पति की तरह मुझे कभी कही अकेला नही छोड़ते थे, कॉमन मीटिंग्स के अलावा मेरे डिपार्टमेंट की मीटिंग्स मे भी वो साये की तरह साथ रहा करते थे….मुझे भी सही लगता था, मै भी हर पेपर साईन करने से पहले उनसे अप्रूव ज़रूर कराती थी, और इस सब में बीच बीच में मेरा देवर मुझे बार बार एक ही बात कहा करता था….

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   “आप किसी पर भी आँख मूंद के भरोसा कर लेती हैं,जो की नही करना चाहिये, कुछ काम सिर्फ अपने तक ही सीमित रखिये , हर काम मे समर को इन्वॉल्व करने की क्या ज़रूरत है।”

     मुझे अमर की बातें अच्छे से समझ आने लगी थी,मैं समझ चुकी थी कि उसकी नज़र मुझ पर सही नही है,…और इसिलिए वो बारबार मुझे समर और बाकी लोगों के खिलाफ भड़काता है।।
    मुझे क्या पता था सर की मैं उस पर भी भरोसा ना करुँ यही वो बार बार कह रहा था…..
   
   सर जब किसी इन्सान का भरोसा टूटता है ना तो वो सबसे अधिक टूट जाता है क्योंकि तब उसके पास कोई सहारा कोई अपना नही बचता, तब मैं क्या जानती थी कि मेरे खिलाफ क्या षड्यंत्र रचा जा रहा था?

क्रमशः

aparna..

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Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

बहुत खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻