
अपराजिता -115
“सर अखंड और धीरेन्द्र दोनों का ही मेरे घर आना जाना था, मुझे अखंड ज्यादा पसंद और पिता जी को धीरेन्द्र…
उसके बाद फिर वह हुआ जिसके बाद मुझे पूरी तरह से स्पष्ट हो गया कि मुझे अखंड और धीरेंद्र में से अखंड को चुनना है…।
मेरे पिता का पार्टी कार्यालय घर पर ही होने से घर पर अक्सर ढेरो कार्यकर्ताओ की भीड़ हुआ करती थी..।
मेरे पिता धीरेंद्र में अपना उत्तराधिकारी देखा करते थे, एक दिन दिल्ली से कोई जाने माने मंत्री आने वाले थे। पिताजी सुबह से उन्ही सारी तैयारियों में लगे थे। और फिर वक्त होने पर वह कुछ लोगों के साथ उन्हें लेने चले गये।
जाने से पहले उन्होंने धीरेंद्र और अखंड से भी कहा कि तुम दोनों वक्त पर पहुंच जाना। दिल्ली से आने वाले मंत्री जी हमारे शहर में आम सभा लेने वाले थे।
चुनाव के पहले का प्रचार प्रसार चल रहा था। इसलिए पापा मंत्री जी को साथ लिए आम सभा के लिए निकल गए थे।
पीछे से अखंड और धीरेंद्र को भी उन्होंने कहा था कि वक्त पर पहुंच जाना। ज्यादातर कार्यकर्ता पापा के साथ ही चले गए थे। कुछ नौकर और दो तीन कार्यकर्ता मौजूद थे। अखंड और धीरेंद्र भी बाकी काम निपटाकर निकलने वाले थे कि तभी हमारे यहां काम करने वाले एक नौकर की तबीयत बिगड़ गई….।
उसे अचानक से उलटी हुई और वो बेहोश होकर गिर पड़ा…
उसे गिरते देख अखंड उसकी तरफ भागा उसे सहारा दिया और एक तरफ लिटा दिया…
उस वक्त घर पर सिर्फ मैं और मेरी दादीजी थे…।
अखंड ने उस नौकर को अस्पताल ले जाने के लिए घर पर खड़ी गाडी ले जानी चाही..।
वो दादी जी के पास पूछने चला आया.. दादी जी ने हाँ कह दिया..।
लेकिन उस वक्त घर पर उस एक गाड़ी के अलावा और गाड़ी नहीं थी….।
घर की सारी गाड़ियां पापा अपने साथ ले गए थे..।
अखंड दादी से इजाजत लेकर बाहर निकला और उस नौकर को एक दूसरे लड़के की मदद से गाडी में डाल कर निकलने ही वाला था कि धीरेन्द्र ने उसे रोक दिया..
” यह घर की गाड़ी है परिहार, इसे लेकर कहां जा रहे हो?”
“हम दादी जी से अनुमति ले चुके हैं.. सुखिया की हालत सही नहीं है.. उसे होश नहीं आया है, इसे अस्पताल तो ले जाना ही होगा !”
“तुम पगला गए हो क्या ? वहाँ मंत्री जी पहुंच चुके हैं। वह आमसभा में पहुंचे उसके पहले हमारा वहां स्टेज पर पहुंचना जरूरी है। स्टेज पर उनके साथ खड़ा होना और फोटो खिंचवाना बहुत जरूरी है समझे। अब इस सब तामझाम में पड़े रहे तो वहां नहीं पहुंच पाएंगे..।”
“हम तुम से थोड़ी ना कह रहे हैं कि हमारे साथ चलो, हम सुखिया को लेकर अस्पताल जाते हैं। तुम मंत्री जी की आम सभा के लिए निकल जाओ..।
” तुम्हारी बारात की घोड़ी खड़ी है यहां, जो उस में बैठकर निकल जाए?
तुमको दिखाई नहीं दे रहा है, एक ही गाड़ी है यहां.. और इसके लिए भी हम तुमसे पहले जाकर इजाजत ले चुके हैं.. समझे ?”
“धीरेन्द्र बात को समझो यार, अभी इस वक्त इसे अस्पताल ले जाना बहुत ज़रूरी है..।”
धीरेंद्र ने अखंड की बात अनसुनी की, और कार का दरवाजा खोलकर पीछे लेटे सुखिया को खींचकर बाहर निकलने लगा। अखंड ने जैसे ही ये देखा उसे गुस्सा आ गया। उसने धीरेंद्र को पीछे से गर्दन पड़कर खींचकर सुखिया से दूर कर दिया..
इसी बात पर दोनों में झूमाझटकी शुरू हो गयी…।
इस सब में अखंड धीरेन्द्र पर भारी पड़ गया, और धीरेन्द्र को एक तरफ धक्का देकर अखंड अपने कुछ लड़को की मदद से सुखिया को अस्पताल ले गया..।
लेकिन जाने से पहले उसने गाड़ी की चाबी धीरेन्द्र के सामने फेंक दी..।
और सुखिया को ऑटोरिक्शा में डाल कर ले गया..
मैं खड़ी देखती रह गयी उस मसीहा को, जिसके सिर्फ बाहरी रूप रंग से ही मैं आज तक प्रभावित हुई थी। आज उसका स्वच्छ निर्मल मन मुझे अंदर तक भीगा गया.. ।
एक गरीब की जान बचाने के लिए उसने खुद अपनी भी परवाह नहीं की..। मैंने उसी दिन मन में ठान लिया था कि मैं पापा से अखंड के बारे में बात करुँगी !
धीरेन्द्र शुरू से ही कपटी था..
उसे समझ में आ गया था कि आज भले ही अखंड नेता जी की आम सभा में नहीं पहुँच पाया, लेकिन उसका ये कृत्य नेता जी के मन में स्थान बना सकता था। और ऐसा न हो इसका भी इंतेज़ाम उस कुटिल इंसान ने कर रखा था..।
पार्टी कार्यालय होने से हमारे यहां जगह जगह पर सीसीटीवी लगे थे..
धीरेन्द्र जानता था कि उनकी फुटेज देखी जा सकती है.. और इसलिए उसने अखंड के कुछ भी बोलने से पहले अपनी एक कहानी बना कर पापा के सामने पेश कर दी..
उसने पापा से कहा की बेहोश होकर गिरने वाला नौकर सुखिया अखंड के लिए भी काम करता है… अखंड की गैंग का एक मेंबर है वो..।
उसने कार्यालय में काम के दौरान ही जम कर शराब पी और बेहोश हो गया..
उसे शराब लाकर देने वाला अखंड ही था। क्यूंकि अखंड नहीं चाहता था कि धीरेन्द्र समय पर आम सभा में पहुँच सके..।
इसलिए उसने सुखिया को जम कर पिलाया, जिससे उसकी तबियत बिगड़े और उसी सब में उलझ कर धीरेन्द्र आम सभा में ना जा पाए, और उसकी जगह अखंड चला जाये..।
लेकिन धीरेंद्र को पहले ही अखंड की इस चाल का पता चल गया था। इसलिए उसने सुखिया को अस्पताल ले जाने से मना कर दिया और गाड़ी आम सभा के लिए मांगने लगा, और इसीलिए अखंड ने उसकी धुनाई कर दी और मारपीट कर उसे रोकने की कोशिश करना लगा।
लेकिन धीरेंद्र भी अपनी आन का पक्का था। इसलिए अखंड को धकेल कर उसने गाड़ी छीनी और आमसभा में पहुंच गया।
क्योंकि उसके लिए नेताजी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अब क्योंकि अखंड ने ही सुखिया की तबीयत बिगाड़ी थी इसलिए मजबूरन अखंड को सुखिया को लेकर अस्पताल जाना पड़ा…।
पापा ने जब धीरेंद्र से यह सारी बातें सुनी, उनका मूड उखड़ गया…
पापा को धीरेंद्र पसंद तो था लेकिन अखंड का जज्बा और उसकी प्रतिभा देखकर पापा उसकी तरफ भी जरा झुकने लगे थे। और इसीलिए धीरेंद्र ने धीरे-धीरे पापा के दिमाग में अखंड के खिलाफ जहर भरना शुरू कर दिया था ।
पापा ने दिल्ली से आए मंत्री जी के लौट के बाद जब अगले दिन कार्यकर्ताओं के बीच अखंड से यह सवाल किया कि वह आमसभा में क्यों नहीं पहुंच पाया, तब अखंड ने सारी सच्चाई बिना किसी लाग लपेट के बता दी। लेकिन पापा के दिमाग में धीरेंद्र पहले ही गलत बातें भर चुका था। इसलिए पापा उसकी बाद सुनकर उस पर बरस पड़े।
उन्होंने उसे बहुत बुरी तरीके से डांट-फटकार दिया, और कहा कि आइंदा वह ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा।
अखंड की समझ से बाहर था कि सुखिया की मदद करके उसने ऐसा क्या पाप कर दिया, जिसके लिए पापा उसे इस कदर डांट रहे हैं। इसके बाद ऐसे कई मौके आए जब धीरेंद्र ने अखंड का नाम पापा के सामने खराब करने की पूरी कोशिश की। पापा हर बार धीरेंद्र की बातों में आकर अखंड को लताड़ दिया करते थे। धीरे-धीरे अखंड ने पार्टी कार्यालय आना छोड़ दिया। वह पूरी तरह कॉलेज और यूनिवर्सिटी में रम गया।
उसने अपने कार्यकाल में छात्रों के हित के लिए ढेर सारा काम किया। वह कभी भी उन नेताओं जैसा नहीं था, जो परीक्षाओं को कैंसिल करवा कर, पेपर्स लीक करवा कर कॉलेज में छात्रों को जबरदस्ती राजनीतिक रंग देकर दंगे करवाते हैं। इनमें से कोई काम अखंड नहीं किया करता था।
इसीलिए छात्रों में उसका बहुत सम्मान था। छात्र अपने नेता अखंड सिंह परिहार को दिलो जान से चाहने लगे थे। और उन छात्रों में मैं भी शामिल थी..।
अखंड का एक कार्यकाल पूरा हो चुका था, और उसने दूसरी बार भी अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी प्रस्तुत कर दी थी। इस बार भी तय था की अखंड ही जीतेगा, और धीरेंद्र इस बार भी जान गया था कि उसे हारना ही है। लेकिन वह अपने दांव पेच खेलने में व्यस्त था।
हालांकि उसके ढेर सारे दांव पेच के बावजूद वह एक बार फिर हार गया। धीरेंद्र छात्रों को पैसे देकर अपने पक्ष में वोट डलवाता था।
कई गरीब छात्र उन पैसों का मान रखने के लिए धीरेंद्र को वोट दे दिया करते थे, लेकिन कई ऐसे भी थे जो पैसे डकार जाते, और वोट नहीं डालते, इसीलिए शायद धीरेंद्र उपाध्यक्ष पद तक पहुंच गया था..।
यूनिवर्सिटी में दो बार का जीता हुआ छात्र नेता राजनीतिक अखाड़े के दंगल का शुरुआती महारथी मान लिया जाता है।
मेरे पिता की नजरे अब धीरेंद्र से हटकर अखंड पर जमने लगी थी। उन्होंने साफ तौर पर धीरेंद्र से कह दिया था कि अगर तीसरी बार वह चुनाव हार जाता है, तो फिर पापा अखंड को अपनी राजनीतिक पार्टी का दावेदार घोषित कर देंगे। धीरेंद्र इस बात से पूरी तरह बौखला गया था। क्योंकि उसे किसी भी हाल में पापा की राजनीतिक पार्टी को ज्वाइन करना था, और आगे चलकर टिकट लेकर उसे चुनाव लड़ना था…।
विधानसभा चुनाव के लिए उसे अपनी दावेदारी मजबूत करनी थी। लेकिन अब पापा की नजरे अखंड पर टिकी हुई थी। और इसलिए अब की बार धीरेंद्र ने अखंड को चुनाव से पूरी तरह हटाने के लिए कमर कस ली…
और बस यही से उसने षडयंत्रों का अपना जाल बुनना शुरू कर दिया। अखंड उस वक्त भी कॉलेज आया जाया करता था।
उसे मेडिकल की एक लड़की पसंद आने लगी थी, और यह बात धीरेंद्र को भी मालूम चल गई थी। बस धीरेंद्र ने इस बात का फायदा उठाना शुरू किया। उसने पहले ही अपने दिमाग में सारा जाल बुन लिया था।
हालांकि धीरेंद्र का सिर्फ यही प्लान था कि वह उस लड़की के नाम से अखंड को बदनाम करेगा। उस लड़की को अकेले कमरे में बुलवाकर अंधेरे का फायदा उठाकर वह अपने आप को अखंड बताता हुआ उस लड़की से जबरदस्ती करने की कोशिश करेगा…
जिससे लड़की को यह लगे कि उसके साथ बुरा काम करने वाला अखंड सिंह परिहार है, और उसके बाद लड़की को बेहोश करके वहां से भाग जाएगा।
भगाने के साथ ही कुछ ऐसा करेगा जिससे अखंड उस वक्त उसी जगह पर पहुंच जाए। धीरेंद्र का प्लान सिर्फ इतना ही करने का था, क्योंकि एक बार अखंड अगर किसी लड़की के साथ जबरदस्ती के मामले में जेल चला जाता, तो उसकी बेल होनी भी मुश्किल हो जाती। उसे छुड़ाना तो फिर दूर की बात थी। लेकिन इस सबके बीच में पंकज टपक पड़ा…।
पंकज एक मेडिकल का विद्यार्थी था जो की रेशम के साथ ही पढ़ाई करता था। पंकज भी कहीं ना कहीं रेशम को पसंद करता था, लेकिन रेशम उसे कभी भाव नहीं देती थी। और बस इसीलिए पंकज ने भी दिल ही दिल में रेशम से एक बैर पाल लिया था। वह छुटपुट तौर पर रेशम से बदला लेना चाहता था। इसलिए उसने रेशम के साथ अपनी कुछ तस्वीरें खींचकर उन्हें अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर डाल दी, इस कैप्शन के साथ कि वह उसकी बहुत खास दोस्त है।
जबकि रेशम की तरफ से ऐसा कुछ नहीं था। जब यह बात अखंड को मालूम चली तो उसने पंकज की पिटाई कर दी।
इस बात पर पंकज अखंड से भी नाराज हो गया।
धीरेंद्र तो हमेशा से ही अखंड पर नजर रखता आया था। उसे पंकज वाला किस्सा भी मालूम चल गया और उसने पंकज का भी जबरदस्त फायदा उठाया।
पंकज के साथ मिलकर उसने सोशल मीडिया से कुछ तस्वीरें उठायी और उन्हेँ मॉर्फ करके अखंड और रेशम का चेहरा उस पर लगा दिया..।
“क्या.. ?” अनिर्वान हैरान सा बैठा था..
“क्या बोल रही हो तुम.. क्या सच में इस सब के पीछे धीरेन्द्र ही था.. !” नेहा भी चौंक गयी..
“हाँ … अभी तो बहुत सी बातें बाक़ी है.. मैं आपको सारी बातें बताती जा रही हूँ.. !”
“फिर क्या हुआ ?” अनिर्वान ने पूछा
क्रमशः

😳😳😳😳😳😳👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻😳😳😳👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
Bahut khoobsurat part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
बस एक कुर्सी के लिए धीरेन्द्र ने दो लोगों की ज़िन्दगी खराब कर दी और पंकज को तो मरवा ही दिया,।
गीता इतने सालों तक चुप रही, ये गलत है।
अनिर्वान के सामने सारे राज़ खुल रहे….
देखते है आगे क्या होता है..।
लाजबाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
Nice part ❣️💕❣️💕❣️💕❣️💕❣️💕
बहुत अच्छा जी
Aap ese hi likhte raho.
Chahe jahan bhi liko accha padhne wale aapko dhoondh hi lengen.
Kabhi bhi politics ko le kar demotivet na hona.
Baki Rachana ATI sunder.
राजनीति वैसे ही बहुत गंदी होती है और उस पर धीरेंद्र जैसे लीचड़ लोग इसमें आ जाएं तो करेला वो भी नीम चढ़ा वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।
nice part 👌
अनिर्बान को भी शॉक पर शॉक मिल रहे है। धीरेन्द्र ने अपना करियर बनाने के लिए अखंड की जिंदगी बर्बाद कर दी।
nice part 👌
Ye Dheerendra to iceburg nikla…apan ko lag raha tha bas college tak ka mamla hai ..isne to kafi paap kar rakhe hain…koi nahi..ghada ab bhar hi gaya hai…Anirwan hi use fodne wala hai.