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चिनाब किनारे -2

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ये रज्जो और बशर अली की पहली मुलाकात थी, जिसमें दोनों एक दूसरे को ठीक से देख भी नही पाये थे ………..उस वक्त रज्जो सिर्फ बारह तेरह बरस की थी और अली सत्रह अट्ठारह का ।।।
उसके अगले दिन अपनी छत पर वही नज़्म गुनगुनाता बशर अपने में मगन खड़ा था,उसे नही पता था कि आज भी उसकी आवाज कोई बड़े ध्यान से अपनी छत से सुन रहा है।।इसके दो रोज बाद ही अली अपनी नानी के घर रवाना हो गया।
इस वाकये के बाद अली पूरे पांच बरस बाद लाहौर से वापस आया था,अब वो इक्कीस बाईस बरस का नौजवान उंचा पूरा पठान था,अपनी तालीम के साथ साथ उसने अपने नाना के करोबार को लाहौर से दिल्ली तक फैला दिया था।।पांच बखत का नमाज़ी अली दीन ईमान से मुसलमान था।।
आते ही उसकी अम्मी ने उसे पड़ोस की रज्जो की निकाह की खबर दे दी थी,उनका भी पूरा घर इस होने वाली शादी की तैय्यारियों में जुटा हुआ था।।
रज़िया खुद दुल्हन का जोड़ा सिल रही थी, उसके अलावा भी रज्जो के बाकी कपड़ो मे सिलाई बुनाई का काम उसके घर पर ही हो रहा था, कहीं उसकी सुनहरी चुनरी में लाल मैरून बेल बूटे काढे जा रहे थे,कहीं लाल सलवार पे सलमा सितारे सिले जा रहे थे….रज़िया बिल्कुल ऐसे तैय्यरियों मे खोई थी जैसे उसकी खुद की सगी बहन की बेटी की शादी हो रही हो,वैसे रज़िया का लगाव भी बहुत था रज्जो से…..रज्जो की बचपन की बातें याद कर जाने रज़िया का जी कैसा तो हो रहा था,कल रज्जो बिदा हो जायेगी….. फिर जाने कब मौका मिले उसे देखने का….कितनी खुश थी वो जब रज्जो की माँ ने रज्जो के ब्याह की बात उसे बताई थी,कितने बड़े घर में रिश्ता तय हुआ था,और हो भी क्यों ना,रज्जो लगती भी तो राजकुमारी ही थी,तो उसका ब्याह तो किसी राजकुमार से ही होना था…. पर क्या उसका अली भी किसी शहज़ादे से कम लगता था क्या??
उसी समय रज़िया की नज़र अली पे पड़ी और अचानक उसके दिल मे खयाल आया कि कितना ही अच्छा होता अगर रज्जो का निकाह अली से हो जाता,पर दूसरे ही पल उसने अपना सर झटक कर अपने बे सिर पैर के खयाल को दिमाग से झटक दिया,उसे पता था ऐसा कभी नही हो सकता…. एक तो रुपये पैसे की कहीं बराबरी नही थी,दूसरा जात धरम भी अलग,उसके लिये तो ऐसा सोचना ही गुनाह था,पर तभी उसे आजमानी और उसकी बीवी कमला का खयाल आ गया,,वो दिल से जानती थी कि कमला जात धर्म को मानने वाली औरत नही थी,बल्कि कमला जैसी बड़े दिल वाली औरत उस पूरे मोहल्ले मे कोई नही थी।।
“किस सोच मे गुम हो अम्मी?” रज़िया को खुद मे खोये देख अली ने पूछा
“कुछ नही,बस सपना देख रही थी,कि अब तेरा भी निकाह हो जाये।”
“अभी तो ऐसा कहर बरपा है,और तुम्हें मेरे निकाह की सूझ रही।”
अली बचपन से बाहर रहा था तो उसका वैसा लगाव पास पड़ोस से नही जुड़ पाया था,और इस बार तो वो पूरे पांच बरस बाद लौटा था,अबकी बार भी वो चंद हफ्तों के लिये ही घर वालों से मिलने आया था,यहाँ से उसे अपने किसी काम से दिल्ली जाना था,पर वो जब से वापस आया था तभी से
अचानक से बंटवारे की आन्धी चलने लगी और इस आन्धी मे उसका जवान खून भी उबलने लगा था,यहाँ उसका सारा घर पड़ोस की शादी मे लगा था,और वो अपनी जमात के और लड़कों के साथ किसी और ही काम में मसरूफ हो रहा था।।
कुछ नापाक इरादों से भरी बेवजह की ज़ज़्बाती बातों ने उसके साफ दिल को भी नही बख्शा ,इन बेजा बातों से उसके खून में भी ऐसा ज़हर घुला कि अपने परिवार के लोगों से अलग जाकर वो अपनी कौम के लिये फिजूल के खून खराबे मे शामिल हो गया।।जहां घर के सारे लोग अपने काम मे मसरूफ थे,वो अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर कुछ अलग ही खेल खेलने लगा था।
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आज सुबह से शादी वाले घर में रौनक बढ़ गई थी,सारा पास पड़ोस उन्हीं के घर पे जमा था,बंटवारे की टीस तो थी पर शादी की खुशियाँ भी अपना रंग दिखा रही थी,हर कोई उस मौज मस्ती के माहौल मे खुश होना चाह रहा था,सभी जल्द से जल्द फेरे करवा के बिदाई कर देना चाह रहे थे,हर कोई इधर से उधर किसी ना किसी काम मे लगा दौड़ भाग रहा
था, एक वो ही था जो इस सब शोर शराबे से अलग अपने ही खयालों मे गुम एक किनारे चुपचाप खड़ा था।।
तभी बाहर से एक लड़का भागते दौड़ते उसी के पास आया,और जल्दी से उसके कानों मे कुछ कहा, उसके बाद वो दोनों ही वहाँ से तुरंत ही निकल गये, उसी समय सीढिय़ों पर से दुलहन अपनी बहनों और सहेलियों के साथ उतर के मण्डप तक चली आयी,, मुस्कुराती शरमाती रज्जो अपने दुल्हन के जोड़े में परियों को भी मात दे रही थी।।
ये वो दुसरी मुलाकात थी जिसमें अली और रज्जो एक बार फिर एक दूसरे को देख तक नही पाये थे।
रज्जो लजाती हुई अपने मण्डप में बैठी अपने नये जीवन के सपने बुन रही थी,देश दुनिया मे क्या चल रहा इससे बेखबर अपने छोटे से संसार मे कई नये रंगों को घोलती रज्जो बहुत खुश थी,
उधर अली अपने दोस्तो के साथ बिना वजह की नफरत को दिल में पाले सारे संसार को मिटाने को व्याकुल हो रहा था,उसके दिमाग में ये भर दिया गया था कि हिन्दुओं की वजह से ही हिन्दुस्तान के टुकड़े किये गये हैं और भी इसी तरह का काफी सारा ज़हर उसके अन्दर घुल गया था, इसलिए शादी वाली जगह से निकल कर अपने दोस्तों के साथ मिल वो उसी रात को पूरे शहर को आग लगाने के मंसूबे बना रहा था।।
अब वो हिंदुओं को खोज खोज कर मारने में लग गया था,अचानक से ऐसी लहर चली की लोगों का खून सफेद होने लगा था, जगह जगह पानी मे आग लग रही थी, सारा पाकिस्तान उबल रहा था।।।।
डरे सहमे से माहौल में फेरों के बाद शाम को ही रज्जो की बिदाई कर दी गई,रो के सब को रूला के रज्जो डोली मे बैठ सादतगंज पहुंच गई ।।
सादतगंज का हाल भी कुछ वैसा ही खौफनाक था,रज्जो को बिदा कर के लाने के बाद पूरा किरमानी परिवार नीचे दीवानखाने में बैठा अगले दिन दिल्ली निकलने की योजना बना रहा था
रज्जो को उसकी सास ने ऊपर के एक कमरे में बिठाया और उसे भी समझा दिया कि अगले दिन ही उन सब को दिल्ली निकलना होगा, उसे ये ताकीद भी कर दी कि अगर कोई शोर शराबा सुनाई दे तो वो चुपचाप इसी कमरे के भीतर छिपी रहे, बाहर ना निकले।।
घर की बाकी औरतें अपने जेवर जट्टे और बच्चों की संभाल मे लगी थी,मर्द गाड़ियों और बाकी तैय्यारियों को देख रहे थे कि दरवाजे पर ज़ोर से आवाज हुई,घर के लोग कुछ सोच समझ पाते कि दरवाजे को तोड़ कर आठ दस पठान भीतर घुस आये….जो सामने आता गया,मर्द औरत , बच्चे, बुजुर्ग,कोई नही बचा।।
कटारों शमशीरों का ऐसा नंगा नाच हुआ कि इंसानियत की रूह कांप गई,दो दिन पहले जिस घर में ढोलक की थाप गूँज रही थी,आज वहाँ मनहूसियत भरी आवाजें चहक रही थी,
“ढूँढ ढूँढ के मारो ,कोई जिंदा बचने ना पाये।”
तबाही मचा के एक एक कर सारे मर्द उस घर से निकल गये,जाते जाते एक लड़का छत पर की सीढियों को लाँघता ऊपर बने इकलौते कमरे की तरफ लपका कि गलती से कोई बच गया होगा तो उसे भी मौत के घाट उतार दिया जाये।।
एक दिन की ताजी दुलहन अपने कमरे के पलंग के नीचे दुबकी डरी सहमी छिपी बैठी थी।लड़के ने दरवाजा बहुत नज़ाकत से खोला और अन्दर झांक के देखा ,कमरा खाली था,पलंग के बाजू मे रखी मेज़ पर पानी का भरा गिलास देख उसे घंटो से सताती प्यास का होश आया,धीरे से भीतर आ कर उसने गिलास उठाया और पानी एक सांस मे पी गया,गिलास अभी नीचे रखा ही था कि किसी ने पुकारा
“बशर”
“हां “।
उसने जैसे ही अपना नाम सुन कर हाँ कहा ,वो फौरन पलंग के नीचे से निकल उसकी पीठ से लग के चिपक गई,उसके दोनों मेहंदी भरे हाथों ने बशर अली को पीछे से कस के बाहों मे भर लिया ,बशर ने जैसे ही उन हाथों को देखा ,उन्हें कलाई से पकड़ कर अपने सामने खिंच के खड़ा कर दिया,रो रो के बेहाल लाल बड़ी बड़ी आंखों को उठा कर रज्जो ने अली को देखा,अली ने रज्जो को।।
उन आंखों में जाने ऐसा क्या था,जो कुछ पल पहले का खूनी दरिंदा अचानक एक नर्म दिल इन्सान हो गया,खून को पानी समझ बहाने वाला नापाक इरादों वाला अली अचानक से उस नाज़ुक सी लड़की की जान बख्श देने को विवश हो गया।
कुछ देर पहले जब रज्जो ने उसे पीछे से पकड़ा तब रज्जो को सामने खींचते मे दूसरे हाथ से उसने अपनी कटार भी निकाल ली थी,पर जब तक खुद को पकड़ने वाले का वो गला रेत पाता एक जोड़ी आंखों ने उसे किसी एक शाम की चिनाब के पानी मे झांक लगाती आंखों की याद दिला दी,और कटार अपने आप अन्दर चली गई ।।
रज्जो समझ गई थी कि नीचे मचे ज़लज़ले में सब तबाह हो चुका है,बशर को अपने कमरे मे धीरे से घुसते देख उसे लगा कि किसी तरह से उसका पति बशर सिंह किरमानी जिंदा बच गया है,और उसे वहाँ से बचाने ही ऊपर आया है,उस ज़माने मे एक दूसरे को ब्याह के पहले देखने का रिवाज़ तो था नही ,उसे भी बस अपने पति का नाम ही पता था,इसिलिए उसने बहुत धीमे से उसका नाम पुकारा और जैसे ही हुंकार सुनी तुरंत नीचे से निकल अपने पति से लिपट गई,अब उसे संसार की चिंता नही थी,उसका खेवनहार उसके पास आ गया था।।
“जब तक मैं वापस ना आऊँ,इस कमरे के भीतर ही छिपे रहना,यहाँ से निकलने की गुस्ताखी ना करना।”
“मुझे छोड़ के मत जाओ,अकेले डर लगता है।”
उस मासूम कमजोर सी लड़की ने उस कद्दावर उँचे पूरे पठान को पटखनी दे दी,रज्जो का चेहरा देख अली का दिल जाने कैसा तो हो गया,उसे भर नज़र देख वो कमरे को बाहर से बन्द कर वहाँ से निकल गया।।
नीचे बिछी लाशों को देखते ही अचानक उसे रुलाई फूटने लगी ,और वो ज़ोर से वहाँ से भाग खड़ा हुआ,उस हवेली से बाहर निकल कर उसने सांस ली,उफ्फ ये क्या हो गया उसके हाथों।।
कितने लोगों का गला काटा ,कितने लोगों का खून बहा डाला था उसने…………………….. उसने ध्यान से उस घर को देखा,उसे अचानक याद आया कि आज तो उसके पड़ोसी घर में भी शादी थी,ये घर भी शादी वाला घर ही लग रहा था,वो वापस दौड़ कर ऊपर गया, दरवाजा खोला अन्दर रज्जो खिड़की पे खड़ी बाहर देख रही थी
“सुनो,तुम्हें क्या कह के बुलाऊं?”
“आप इतनी जल्दी वापस आ गये,मुझे क्या कह के बुलाएंगे,मेरा नाम ही पुकारिये रज्जो।”
अली का सर घूम गया,ये तो उसकी पड़ोस वाली रज्जो ही निकली ,हाँ यही जोड़ा तो उसकी अम्मी इतने दिन से सिल रही थी,वही सुर्ख जोड़ा पहने ही तो खड़ी थी सामने रज्जो।।
उफ्फ उसने अपने हाथों से इस लड़की के मांग का सिन्दूर पोंछ दिया था,इसकी सारी खुशियों को खत्म कर दिया था हमेशा हमेशा के लिये………
उसके मोहल्ले के सारे हिंदू मोहल्ला खाली कर के जा चुके थे,रज्जो के ससुराल मे एक परिन्दा भी जिंदा नही बचा था,अब इस अकेली जान का क्या होगा ,उसे लगा कैसे भी हो इस लड़की को यहाँ से निकाल कर हिन्दुस्तान पहुँचाना ही पड़ेगा ।।
लेकिन बाहर जैसी आग लगी थी ,उसमें रज्जो को निकाल के बचा कर ले जाना बहुत मुश्किल था,
“सुनो, हमें आज ही यहाँ से निकलना होगा, मैं हमारे यहाँ से निकलने का इन्तेजाम करने जा रहा हूँ,इस कमरे को बाहर से बन्द कर के जा रहाँ हूँ, जब तक मैं ना आऊँ,यहीं रहना चुप चाप ।”
“हम्म ! “
अली जाने को मुड़ा ही था की रज्जो ने उसे पुकारा
“सुनो ! घर के बाकी लोग कहाँ हैं?क्या सिर्फ हम दोनों ही जिंदा बचें हैं?या बाकी लोगों को कहीं भेज दिया है?””
“कोई जिंदा नही बचा ,बस तुम ही बची हो।”
रज्जो वहीं सर पकड़ के बैठ गई,उसे जिस बात का डर था ,वही हुआ।।।उसे रोता बिलखता छोड़ के अली वहाँ से निकल गया।।।
“सुनो !! जल्दी आ जाना।।”
“हाँ!जल्दी आ जाऊँगा।”
क्रमश:
aparna…

NYC part willing to read next part….💐🙏
बंटवारे के दंश की कहानी पढ़ना हमेशा आँखें नम कर जाती है आज भी पढ़के ऐसा हि लगा, रज्जो ने जो समझा वह सह सच बनके उसके सामने कैसे आएगा, यह पढ़ना रोचक होगा…. बेहतरीन लेखन दीदी 🙏💐