Bestseller-32

The bestseller-32

                       ”  कंकर”

नोट:- कहानी का यह भाग ह्रदय को उद्वेलित कर सकता है। लेकिन यह सब पूरी तरह से कल्पनिक नहीं है, बहुत पहले अखबार की एक खबर में मैंने पढ़ा था कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं।
   बस उन्हीं बातों को तथ्य बनाकर मैंने कहानी का यह हिस्सा तैयार किया है ।
   आप सभी से अनुरोध है कि कमजोर हृदय वाले इस हिस्से  को ना पढ़ें।

******

             उसने बड़ी मुश्किल से उस खिड़की में अंदर झांकने लायक दरार बना ही ली और अंदर देखने की कोशिश करने लगी।
    अंदर जो नज़ारा नज़र आया उसे देख उसकी आंखें फटी रह गईं…..

     खिड़की की दरार से देखने पर ठीक सामने एक बड़ी सी अलमारी नजर आती थी। जिसमें तरह-तरह की ऐसी वस्तुएं रखी थी जिनका कोई खास उपयोग नंदिनी को समझ नहीं आ रहा था। अलग-अलग तरह के जानवरों के चमड़े से बने बेल्ट जिनमें से कुछ में कील लगी हुई थी तो कुछ में कांटे इसके अलावा वहां लगी कील पर अलग-अलग तरह के हंटर दंगे हुए थे उस अलमीरा में कुछ सन्सी जैसी पक्कड़ भी रखे हुए थे।
   उसी अलमीरा में कुछ अलग-अलग आकार के लोहे के रॉड रखे थे , जो छोटी पिन के आकार से लेकर एक बड़ी स्केल के आकार के थे। जिनमें सामने का नुकीला भाग अलग से चमक रहा था यह सारी वस्तुएं देख कर नंदिनी को ऐसा महसूस हुआ जैसे यह कोई टॉर्चर चेंबर बनाया गया है। उस अलमीरा के साथ लग कर ही एक स्टडी टेबल रखी थी जिसमें अलग-अलग इंक पॉट साफ साफ नजर आ रही थी। उस टेबल के ठीक सामने की दीवार पर एक बड़ी सी और अजीब सी तस्वीर लगी थी जिसमें बहुत सारे रंग आपस में मिल कर कुछ अजीब आकृति बनाते से दिख रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे कोई मॉडर्न आर्ट है लेकिन उस तस्वीर की सबसे अजीब बात ये थी कि उस तस्वीर पर तिलक लगा हुआ था।

  स्टडी टेबल से लगी हुई एक दूसरी अलमीरा में ढेर सारी किताबें रखी हुई थी ।
   नंदिनी की उत्तेजना अपने चरम पर थी वह किसी भी तरह उस कमरे में अंदर जाने का रास्ता ढूंढने की कोशिश करने लगी कि तभी उसकी नजर गई जिस खिडकी की दरार से वो झाँक रही थी उस खिड़की से ठीक ऊपर कांच का एक ऐसा दरवाजा लगा था जिसे हल्का सा धक्का देने पर वह अंदर की तरफ मुड़ जाता था। इत्तेफाक से उस जगह पर कोई लोहे की रॉड नहीं थी और वह बाहर से अंदर जाने के लिए खुल रही थी।
जगह कम थी लेकिन नंदिनी ने दिमाग लगाया और पास ही पड़ी एक स्टूल को खिड़की के पास रख कर उस पर चढ़ गई ।उस कांच के दरवाजे को उसने अंदर की तरफ मोडा और उसे मोड़ कर उसके साथ के नॉच पर फिक्स कर दिया। और धीरे से अंदर घुसकर अंदर कमरे में कूद गई।

   कमरा शयन कक्ष के हिसाब से काफी बड़ा था और उसी खिड़की की दरार से कमरे का सिर्फ एक ही हिस्सा नजर आ रहा था।
  वह फटाफट चारों तरफ नजर दौड़ाने लगी एक किनारे पर एक डबल बेड पड़ा था और उससे लग कर ही एक बड़ी सी अलमीरा और थी।
   नंदिनी ने धोखे में उस अलमीरा को खोलने की कोशिश की और वह एक झटके में खुल गई। अलमारी मैं थोड़े बहुत कपड़ों के अलावा कुछ भी ज्यादा नहीं रखा था सब कुछ ध्यान से उठा उठा कर देखने के बाद नंदिनी ने अलमारी बंद कर दी। अलमारी बंद करते उसे ध्यान आया कि यह कपड़े तो कुछ अलग से थे उसने वापस अलमारी खोली और सारे कपड़े बाहर निकाल लिए यह कपड़े छोटी-छोटी बच्चियों के थे। लगभग 5 साल से बारह तेरा साल आयु वर्ग की बच्चियों के फ्रॉक, स्कर्ट टॉप और जींस वहां मौजूद थे नंदिनी ने अलग-अलग कर उन कपड़ों को गिनना शुरू किया कुल जमा नौ कपड़े वहां मौजूद थे।
    उसमें से एक फ्रॉक को नंदिनी ने उठा लिया और बहुत ध्यान से देखने लगी, उसे लगा उसने इस ड्रेस को कहीं ना कहीं तो देखा है।

” छूना मत !! वरना अनर्थ हो जाएगा।”

Advertisements

एकदम से आवाज सुनकर नंदिनी डर गई उसने पीछे पलट कर देखा,  सामने जमना खड़ी थी…

” मुझे कल ही तुम पर शक हो रहा था जब तुम नीचे कार्यक्रम को छोड़कर ऊपर तफ़रीह करने जा रही थी और आखिर आज तुम यहां पहुंच गई।”

नंदिनी समझ चुकी थी कि अब उसका कोई झूठ या नहीं चलने वाला है। उसने पूरी तरह से अपने आप को परिस्थितियों के हवाले छोड़ दिया।

” तुम बच नहीं सकती जमना,  तुमने जो भी किया है खुद कुबूल कर लो, वरना पुलिस थर्ड डिग्री टॉर्चर करके सब कुछ उगलवा लेगी।”

  नंदिनी की बात पर जमना जोर जोर से हंसने लगी…

” हां क्यों नहीं। मैं नहीं तो और कौन कबूल करेगी? मैंने ही तो सब किया है, तो मैं तो कबूल करूंगी। लेकिन तुझे यह नहीं पता कि पुलिस यहां तक नहीं पहुंच सकती। तू तो किस्मत से पहुंच गई क्योंकि आज वह बौड़म सावन अकेली सफाई कर रही थी।
    तुझे क्या  लगता है कि तू हमारे यहां काम करने वाली एक बाई को जानबूझकर गाड़ी से टक्कर मारेगी फिर उसको पैसा देगी और उसको यहां आने से रोक देगी, फिर खुद काम की तलाश है ऐसा बोल कर अंदर घुस जाएगी तो हम लोगों को समझ नहीं आएगा।
   खुद को करमचंद समझ रही है क्या? “

” नहीं मुझे ब्योमकेश बक्शी पसंद है। “

नंदिनी की बात पर जमना एक बार फिर जोर से खिलखिला कर हंस पड़ी….

” मानने लायक है तू भी!! तेरे सर पर मौत की तलवार लटक रही है और तुझे मजाक सूझ रहा है… क्या जानना चाहती है बोल मैं सब बता दूंगी।”

Advertisements

” सब कुछ जानना चाहती हूं , एकदम शुरू से क्योंकि देखो अब मुझे मरना तो है ही तो ऐसे सस्पेंस पेट में लेकर मरूंगी तो मेरी आत्मा भटकती रहेगी। इससे अच्छा है तुम सब कुछ बता दो फिर मुझे मार डालना।”

मुस्कुरा कर इधर-उधर टहलते हुए जमना ने अपने पास पड़ी स्टूल को जोर से धक्का देकर नंदिनी तक पहुंचा दिया नंदिनी उस स्टूल को खींच कर उस पर बैठ गई।।

” पिछले डेढ़ साल से शहर से बच्चे गायब हो रहे हैं जानती हैं कौन कर रहा था गायब? “

” तुम? “

” मैं !!! अब तू इसका कारण भी जानना चाहेगी कि, बच्चे मैं क्यों गायब कर रही थी?”

नंदिनी ने जोर-जोर से हां में सिर हिला दिया…

” बहुत उतावली है रे तू। तेरा वो दोस्त कैसे संभालता है तेरे को।”

” यह हमारा पर्सनल मैटर है। अगर आप अपनी लाइफ हिस्ट्री सुनाने में कॉन्सनट्रेट  करें तो ज्यादा अच्छा होगा।”

“अरे रे गुस्सा हो गयी तू तो।
    अब मैं सारी कहानी तुझे सुनाती हूँ। मेरा एक बेटा है जो बाहर तुझे दिखा होगा। एकदम लंबा चौड़ा साढ़े छैह  फीट का।  जानती है वह इतना लंबा कैसे हो गया?
   क्योंकि जब उसकी उम्र बढ़ रही थी उस समय उसे इंसानी मांस को खाने की आदत हो गई। उसी इंसानी मांस को खाकर ऐसा राक्षसों जैसा लंबा चौड़ा हो गया अभी आदत उसको कैसे लगी कहां से लगी यह सब सुनाने बैठी तो पूरी रात निकल जाएगी। बस यह समझ ले कि 15- 16 साल की उम्र थी, उसकी जब से आदत लग गई। उस समय हमारे घर के पास एक मसान था, वहां अक्सर लाशें जलाने के लिए लोग लाया करते थे ।उसी मसान से लगा हुआ बच्चों का खेलने का मैदान था। जहां मेरा बेटा भी अपने दोस्तों के साथ खेला करता था। एक शाम उसके सारे दोस्त खेल खत्म करके घर आ गए ।और वह वहीं एक पेड़ के नीचे बैठा हुआ था । उसी समय कोई लाश आधी जली थी कि बारिश हो गई जो भी लोग वहां आए हुए थे सब एक-एक करके जा चुके थे।
   पानी बरस जाने के कारण वो लाश आधी जली वैसे ही रह गई । वहीं बैठा वह उसे घूर रहा था शायद उसे वह जलने की गंध अच्छी लग रही थी और इसलिए वो चल कर उसके पास गया और उसने उस शरीर में से कुछ हिस्सा निकालकर अपने मुंह में रख लिया। उसकी मति मारी गई थी या मेरी ही किस्मत खराब थी कि उसे वह स्वाद बहुत पसंद आ गया और उसे उस शाम के बाद से चस्का लग गया । अब वह जब भी वहां कोई भी लाश जलने आती, पहुंच जाता और मौके की ताक में छुपकर खड़ा रहता । जब लोग वहां से चले जाते तो वह किसी तरह से पानी डाल डाल कर बुझा कर उन लाशों को निकाल कर खाने लगा।
    मसान में काम करने वाले ने एक रात उसे वहां खाते हुए देख लिया। वह हम लोगों को भी जानता था वह तुरंत मेरे घर आया और उसने मुझे सारी बात कह सुनाई। मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं थी क्योंकि मुझे उस समय पहली बार पता चला था कि वह वाकई एक राक्षस है। पर मैं क्या करती मैं उसे खींच खाचकर घर ले आयीं। और शुरुआत में तो बड़े प्यार से उसे समझाया लेकिन जब मुझे समझ में आया कि प्यार मोहब्बत की बोली समझने वाला यह लड़का नहीं है। तब मैंने उसे मारा-पीटा कमरे में बंद कर दिया लेकिन ना उसके समझ में कोई बात आनी थी और ना आई। इसी बीच किसी पड़ोसी ने उसकी शिकायत कर दी। क्योंकि  वो अट्ठारह साल का पूरा नहीं हुआ था। इसलिए पुलिस वालों ने उस पर किसी भी तरह का केस बनाने की जगह उसे सीधे बाल सुधार गृह भेज दिया।
     असल में उसके खिलाफ कोई सबूत भी नहीं था क्योंकि किसी ने भी उसे अपनी नजरों से ऐसा करते नहीं देखा था।
   मसान में काम करने वाले जिस कर्मचारी ने उसे देखा था उसने भी मेरे बहुत मेहनत करने पर पुलिस के सामने यही बयान दिया कि उसने जो भी देखा था वह दूर से देखा था और काफी धुंधला था इसलिए वह यह नहीं समझ सकता कि यह लड़का सच में वहां पर क्या खा रहा था।
     उस वक्त मैं राज ऋषि साहब के घर पर ही काम किया करती थी।  उन्हीं से  किसी बहाने से पैसे लेकर मैंने मसान वाले उस कर्मचारी को दिए थे जिससे वह अपना मुंह बंद रखें।

Advertisements


   फिर इस लड़के को बाल सुधार गृह भेज दिया गया वहां लगभग डेढ़ साल रहने के बाद हम सभी को लगा कि यह अपनी इस गंदी आदत से मुक्ति पा चुका होगा। क्योंकि वहां पर भी इस की इस आदत के बारे में मालूम था इसलिए एक मनोचिकित्सक की मदद से इसका इलाज भी किया गया था।
    डेढ़ साल के इस लंबे समय में मुझे लगा कि मेरा बेटा सुधर चुका है।
   जब वहां से वापस घर आया तो कुछ दिनों तक उसका रहन-सहन देखकर मुझे भी पूरा यकीन हो गया कि यह सुधर चुका है और मैंने बड़े साहब के हाथ पांव जोड़कर इसे उनके यहां काम पर लगा दिया।

    बड़े साहब बहुत भले मानुष थे। उन्होंने मेरी बात मान ली… उन्हें भी यही पता था कि आज तक इसे किसी ने भी लाशों को खाते अपनी आंखों से नहीं देखा था …तो यह भी हो सकता है कि यह वहां बैठकर और कुछ खाता हो। और बस इसी कारण उन्होंने इसे एक और मौका देने के लिए अपने ही घर पर काम पर लगा लिया वह इसे भी एक अच्छी तनख्वाह देने लगे।
   मुझे लगा सब कुछ ठीक हो गया है और मेरा बेटा मनोचिकित्सक की सलाह का पालन करते हुए सुधर गया है लेकिन मैं गलत थी….

  …. और एक दिन मैंने देखा ….

Advertisements

क्रमशः

aparna….
 

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments