The bestseller -27

“इवनिंग प्रिमरोज़”
शेखर और नंदिनी को वैसे तो रायसागर परिवार ने नहीं बुलाया था, लेकिन ऋषिकेश राय सागर इतना बड़ा नाम था कि उनकी आत्मा की शांति के लिए रखें शांति पाठ के बारे में हर एक अखबार में खुलकर खबर आई थी। और उनके सभी चाहने वालों को वहां सादर आमंत्रित किया गया था।
शेखर भी नंदिनी को साथ लिए सादे कपड़ों में 4 बजे के आसपास उस भवन में पहुंच चुका था। साहित्यिक भवन बाहर से ही किसी इंग्लिश इमारत की कॉपी लग रहा था। बड़ी बड़ी ऊंची मीनारों से सजी भव्य इमारत थी। जिसमें सामने की ऊंची ऊंची दीवारों के मध्य एक लंबा चौड़ा सा लगभग आठ से दस फीट का लकड़ी का दरवाजा था। जिसके ऊपर कांच की नक्काशी दार कलात्मक पेंटिंग लगी हुई थी।
दूर से किसी इंग्लिश कैसल सा नजर आता वह भव्य भवन एक बारगी देखने वालों को प्रभावित कर जाता था। उसके बड़े बड़े दरवाजे अंदर की तरफ खुले हुए थे।
और साथ ही एक गार्ड वहां पर तैनात था। वह सभी आने वालों के नाम पते एक रजिस्टर में नोट करता जा रहा था। अंदर का हॉल लगभग इतना बड़ा था, कि डेढ़ सौ से दो सौ लोग आराम से वहां बैठ सकते थे । और लगभग इतने ही लोगों के बैठने की व्यवस्था भी वहां की गई थी। अंदर प्रवेश करते ही सबसे सामने ऋषिकेश रायसागर की आदम कद तस्वीर लगी हुई थी।
तस्वीर बेहद कलात्मक थी। किसी अच्छे पेंटर से बनवाया हुआ तैल चित्र था। जिस के रंगों के कारण ऋषिकेश रायसागर का चेहरा और भी उभरकर नजर आ रहा था । नंदनी तो कुछ देर तक उस तस्वीर को देखती ही रह गई….
” क्या हुआ नंदू ? यह राइटर पसंद आ गया क्या? “
” शट अप शेखर !! अब वो जिंदा नहीं है? “
” मतलब अगर जिंदा होता तो उसके लिए कुछ होप थी क्या?”
नंदिनी को शेखर के ऐसे छिछोरे मजाक कभी पसंद नहीं आते थे। उसने शेखर को एक बार घूर कर देखा और उस हॉल में भीतर की तरफ बढ़ गई।
हाल की ऊंचाई बहुत ही ज्यादा थी , और सबसे ऊपरी छत पर कांच की डिज़ाइनर पेंटिंग्स लगी थीं। दीवारों पर भी चारों तरफ बड़ी-बड़ी खिड़कियां बनी थी। खिड़कियां जमीन से लेकर भवन की आधी ऊंचाई तक पहुंची हुई थी। और इसीलिए खिड़कियां खोल देने पर वह हॉल आश्चर्यजनक रूप से ठंडा हो जा रहा था। लेकिन वहां मौजूद नौकर खिड़कियों पर लगे कांच को बंद करते जा रहे थे। इन खिड़कियों पर बड़े-बड़े रेशमी पर्दे झूल रहे थे। खिड़कियों के बीच बची दीवारों पर एक से एक प्रसिद्ध पेंटिंग लगी हुई थी।
कहीं गगनेंद्र टैगोर का कल्कि अवतार सजा था तो कहीं रवि वर्मा की शकुंतला टंगी थी।
एक पूरी दीवार भारतीय चित्रकारों से सजी थी तो दूसरी दीवार को पाश्चात्य कला के रंगों से सजाया गया था।
दुनिया की प्राचीनतम पेंटिंग से शुरू करके मध्यकालीन और फिर आधुनिक काल की पेंटिंग सिलसिलेवार लगी हुई थी। जिनमें कुछ पाश्चात्य थी तो कुछ भारतीय। इसका मतलब इनमें देश विदेश की विभिन्नता समेटे कालक्रम को दर्शाया गया था। यही वहाँ की थीम थी।
नंदिनी उस कमरे की सजावट देख देख कर अभिभूत हुई जा रही थी । उसे पहले भी ऋषिकेश राय सागर पसन्द था, लेकिन इस हॉल की सजावट को देखने के बाद ऋषिकेश रायसागर की कला पारखी नजर की वो शिद्दत से फैन हो चुकी थी।
” यह साहित्य भवन कम, कोई अच्छा खासा आर्ट म्यूजियम लग रहा है। शेखर तुम्हें पता है इन पेंटिंग्स की कीमत क्या होगी?”
शेखर को इन पेंटिंग्स को देखने में कोई खास मजा नहीं आ रहा था। वह बस वहां आए लोगों पर नजर फिरा रहा था। इसलिए नंदिनी के सवाल पर वह एकदम से चौंक गया, और उसने एक बार फिर ध्यान से उन पेंटिंग्स को देखना शुरू किया । बावजूद उसके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा और उसने नंदिनी के सवाल पर “ना “में सिर हिला दिया।
” करोड़ों की कीमत की है यह पेंटिंग ….और जरूर ऋषिकेश रायसागर ने भी किसी ऑक्शन में ही यह पेंटिंग खरीदी होंगी और यहां पर सजाई होंगी।”
” यह करोड़ों की पेंटिंग है। मतलब यह भी तो ऋषिकेश रायसागर की वसीयत का ही एक हिस्सा होगा, यह पेंटिंग किसके हिस्से में आई है?”
नंदिनी अपनी कला पारखी आंखों पर गर्व करते कला से संबंधित बातें कर रही थी और उसमें भी शेखर ने अपना जासूसी एंगल निकाल लिया यह देखकर नंदिनी के चेहरे पर हल्की सी नाराजगी आ गई। वह दोनों बातें करते आगे बढ़ रहे थे कि उसी वक्त गेट पर कुछ कहासुनी की आवाज सुनाई दी। दोनों ने मुड़कर देखा, दरवाजे पर उसी वक्त कामिनी और ऋषिकेश राय सागर की पहली पत्नी एक साथ प्रवेश कर रही थी। और शायद कामिनी के बिना बुलाए आ जाने पर ऋषिकेश रायसागर की पहली पत्नी उसे अपमानित कर रही थी।
पर उनकी बात पर गौर किए बिना कामिनी चुपचाप अंदर चली गई। कुछ देर उसके बर्ताव पर तीखे शब्द बोलने के बाद समय की मर्यादा देखते हुए ऋषिकेश की पहली पत्नी भी चुपचाप सबसे सामने की तरफ जाकर बैठ गई।
कैसा अजब इत्तेफाक था जिसकी आत्मा की शांति के लिए पाठ रखा गया था उसी की एक पत्नी तो सबसे सामने बैठकर पूजा में भाग ले रही थी, और उसी की दूसरी पत्नी सबसे आखिर के एक कोने पर बैठी सुबक रही थी। इन दोनों में से किसी को भी देख कर उसकी आत्मा को शांति मिलना कठिन ही था।
शेखर इधर उधर देखते हुए चुपचाप कामिनी की तरफ बढ़ गया और नंदिनी को साथ लिए जाकर कामिनी के पास की कुर्सी पर बैठ गया।
वहाँ बिछी कुर्सियां भी साधारण नहीं थी । चमड़े से ढकी कुर्सियां भी काफी कीमती नजर आ रही थी।
कामिनी के बहते आंसू देख कर शेखर ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और उसकी तरफ बढ़ा दिया….
” आप रोती हुई अच्छी नहीं लगती, आंसू पोंछ लीजिए।”
कमीनी ने उसके हाथ से रुमाल लिया और अपने आंसू पोंछ लिए।
नंदिनी के पेट में खलबली मची हुई थी, उसे बार-बार इस हॉल और इस पूरी इमारत के बारे में कामिनी से बात करने का मन हो रहा था। लेकिन कामिनी की हालत देखकर उसकी पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी। हालांकि उसे कामिनी के आंसुओं से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन शेखर जरूर इस समय कि उसकी पूछताछ से नाराज हो सकता था, इसलिए बड़ी मुश्किल से अपने अंदर घुमड़ते सवालों को पेट में ही रोक कर नंदिनी चुपचाप इधर उधर देखने लगी।
वह उन बड़ी-बड़ी खिड़कियों को देख रही थी, कि तभी उसे ऐसा लगा कि किसी एक खिड़की की दरार से दो आंखें उसे ही घूर रही हैं। नंदिनी ने ध्यान से उस तरफ देखने की कोशिश की, तो ऐसा लगा खिड़की के बाहर ही तरफ कोई बच्ची खड़ी है, जो झांककर नंदिनी को घूर रही है। नंदिनी धीरे से अपनी जगह से उठ कर खड़ी हो गयी और धीमे कदमों से चलते हुए वह उस खिड़की तक पहुंच गई।
खिड़की पर बहुत भारी रेशमी पर्दे डाले हुए थे। उस खिड़की पर से पर्दा एक किनारे से जरा हटा हुआ था, जिसके कारण नंदिनी खिड़की से बाहर की तरफ खड़ी उस लड़की को देख पा रही थी।
लेकिन जब तक नंदिनी वहां पहुंची और उसने उस परदे को सरकाया, वहां से वो लड़की जा चुकी थी।
नंदिनी ने एक बार शेखर की तरफ देखा…. वो कामिनी से बातों में लगा हुआ था । नंदनी चुपचाप दबे पांव उस हॉल से बाहर निकल गई ।
वह हॉल ग्राउंड फ्लोर पर जरूर था लेकिन जरा ऊंचाई पर बना हुआ था ।शायद नीचे गाड़ियों की पार्किंग के लिए बेसमेंट बनाया गया था। हाल की सीढ़ियां उतरकर नंदिनी नीचे गार्डन में पहुंच गई। और फिर उस खिड़की की तरफ जाने के लिए वह मुड़कर उस दिशा में आगे बढ़ गई। कुछ आगे जाने पर वह खिड़की के पास पहुंची लेकिन अब वहां कोई नजर नहीं आ रहा था। कुछ एक दो मजदूर वहां बैठे गार्डनिंग का काम जरूर कर रहे थे। नंदिनी ने देखा उस ऊंचे पूरे आलीशान भवन के चारों तरफ उतना ही सुंदर बगीचा सजा हुआ था।
उस बगीचे की बाहरी दीवार के अंदर तरफ एक पंक्ति में सजी हुई गुल मेहंदी थी, जिसके सामने सफेद रजनीगंधा की क्यारियां थी। उसके ठीक बाद एक बार फिर थोड़ी थोड़ी दूर पर गुलमोहर मुस्कुरा रहे थे। बीच में एक बड़ा सा कृत्रिम तालाब बना था, जिसमें कुमुदिनी महक रही थी ।
इवनिंग प्रिमरोज की खुशबू से पूरा बगीचा गमक रहा था ।
फूलों को भी इतने कलात्मक तरीके से लगाया गया था, कि दूर से देखने पर ऐसा लगता जैसे कोई रंगीन गुदगुदा कालीन बिछा हुआ है। नंदिनी एक बार फिर बगीचे की सुंदरता से मोहित होती कि उसे ऐसा लगा दूर कहीं पर वही बच्ची बगीचे से भागती हुई बेसमेंट की तरफ गई है।
नंदिनी उसे देखकर उस भवन के पिछले हिस्से की तरफ बढ़ने लगी कि तभी वहां काम करती एक औरत ने उसे आवाज दे दी…
” क्या चाहिए आपको ?उस तरफ आगे कुछ भी नहीं है। “
” जी कुछ नहीं!! मुझे कुछ नहीं चाहिए! मैंने बस अभी वहां आगे किसी बच्चे को देखा!
” आपकी आंखों का धोखा होगा। यह बगीचा चारों तरफ से 15 फीट ऊंची दीवारों से घिरा हुआ है। यहां बाहर से कूदकर किसी के आने की संभावना नहीं है। और गेट पर खड़े गार्ड को धोखा देकर कोई भी बच्चा यहां अंदर नहीं आ सकता। “
” हो सकता है वह बच्चा रायसागर परिवार का ही हो।”
” रायसागर परिवार में छोटे बच्चे कहां हैं? उनकी बड़ी बहू की शादी को भी कितने साल हो गए, लेकिन कोई बच्चा नहीं है। उन्हें श्राप जो लगा…
वह औरत अपने बड़बोलेपन में जाने कौन सा राज खोल जाती की दूसरी औरत ने तुरंत उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी तरफ खींच लिया।
” तू मिसाई में ध्यान दें। क्या बके जा रही है ? वो भी बाहर वालों के सामने।
आप जाइये मेडम अंदर कार्यक्रम शुरू हो गया होगा। “
नंदिनी उन दोनों को घूरती हुई धीमे कदमों से अंदर की तरफ बढ़ने लगी । उसके मन में अब तक उस बच्ची को लेकर शंका चल रही थी। अब उस पर इस औरत ने एक और नया बम फोड़ दिया यह श्राप वाला बम।
वह आगे बढ़ रही थी कि उसने सीढ़ियों पर शेखर और कामिनी को बाहर आते देखा वह दोनों को देखकर थमक कर वहीं खड़ी रह गई। शेखर नंदिनी को देखकर उसी की तरफ बढ़ गया, और उसके साथ-साथ कामिनी भी वहीं आ गई।
” तुम यहां क्या कर रही हो नंदू?” एकदम से नंदिनी को कोई जवाब नहीं सूझा लेकिन ऐसे मौकों पर उसका दिमाग सामान्य से जरा ज्यादा तेज चलने लगता है। उसने तपाक से फोन का बहाना लगा दिया…
” वह एक दोस्त का फोन आ गया था, बस वही अटेंड करने मैं बाहर चली आई। “
शेखर ने आंखें गोल गोल करके नंदिनी को देखा और फिर हां में सिर हिला दिया।
“आप दोनों बाहर कैसे चले आये? वहां तो अभी पूजा शुरू होने वाली थी। “
” इन्हें वहाँ घबराहट सी हो रही थी। इसीलिए ताजी हवा में इन्हें आराम मिलेगा ऐसा सोचकर हम दोनों बाहर चले आए। “
कामिनी उन दोनों को साथ लेकर भवन के दूसरी तरफ मुड़ गई। अभी नंदिनी जिस तरफ से आई थी उसके विपरीत दिशा में भी उतना ही सुंदर बगीचा बना हुआ था। लेकिन इस बगीचे में इवनिंग प्रिमरोज नही लगा हुआ था।
यहाँ बैठने की भी बहुत खूबसूरत व्यवस्था की गई थी। बड़ी-बड़ी छतरियों के नीचे चार कुर्सियां और गोलाकार टेबल लगी हुई थी। हर एक टेबल पर छोटी-छोटी पानी की बोतल रखी हुई थी। और साथ ही रखे थे छोटे छोटे डॉयफ्रूट बॉक्स।
उन्हीं में से एक टेबल पर जाकर कामिनी ने कुर्सी खींची और वहां बैठ गयी। शेखर और नंदिनी भी उसके पास जाकर वही बैठ गए । कामिनी ने अपने पास से एक रुमाल निकाला और धीमे से अपनी आंखें पोंछ ली।
” सर की फेवरेट जगह थी यह। वो अक्सर अपनी कहानी की सीटिंग्स के लिए यही “बर्न्स” में आया करते थे। “
” क्या यह भवन “रॉबर्ट बर्न्स” के नाम पर ही है?”
नंदिनी के सवाल पर कामिनी ने “हां” में सर हिला दिया
” हां!!! यह पुराने इंग्लिश साहित्यकार “रॉबर्ट बर्न्स” के नाम पर ही सर ने बनवाया था। मेरे आने के पहले का है यह भवन। “
” लगता है ऋषिकेश सर इंग्लिश साहित्य से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने इस इमारत को बहुत खूबसूरती से सजाया है। यहां तक कि उनका गार्डन भी किसी बहुत खूबसूरत इंग्लिश इमारत से टक्कर लेता नजर आता है।”
कामिनी ने इस बार भी धीमे से “हां” में सिर हिला दिया। नंदिनी एक बार फिर अपने पेट में मची खलबली को आराम पहुंचाने के लिए सवाल करने लगी।
” लेकिन क्या इतने बड़े हॉल में वह आराम से बैठ कर लिख पाते थे? यह हॉल तो सिर्फ साहित्यिक गोष्ठियों या मुशायरा और बाकी कार्यक्रमों के ही काम का लग रहा है। शांति से बैठ कर लिखने के लिए यह जगह कुछ ज्यादा बड़ी नहीं है?
” इस भवन की पहली मंजिल पर बहुत बड़ी सी छत के साथ दो बड़े कमरे भी बने हुए हैं । जिनमें से एक सर का स्टडी रूम था।
” और दूसरा?
” वह एक सामान्य सा कमरा था, जहां पर वह अपनी कुछ खास चीजों को संभाल कर रखा करते थे।”
” क्या मैं वह कमरा देख सकती हूं?”
” नहीं वह कमरा उनका व्यक्तिगत कमरा था! और उस कमरे में मेरे और उनकी पत्नी के अलावा किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं थी। “
” ऐसा क्या था वहां? “
नंदिनी ने तपाक से सवाल तो कर दिया लेकिन अपने सवाल के बाद वह खुद शर्मिंदा हो गई …
“आई एम सॉरी कामिनी मैडम? अगर आप ना चाहे तो आप जवाब ना दें!”
” जी!!” मैं आपकी इस बात का कोई जवाब नहीं दूंगी। “
नंदिनी ने मुस्कुराकर हामी तो भर दी लेकिन अब उसके मन में वह कमरा कुलबुलाने लगा। उसने वापस सवालों की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी…
” क्या आप भी ऋषिकेश सर की तरह इंग्लिश लिटरेचर से ही प्रभावित हैं?”
नंदिनी के अंदर का पत्रकार ना दिन-रात देखता था और ना वाजिब जगह….इस वक्त शेखर के चेहरे पर इ यही भाव थे। नंदिनी ने शेखऱ का चेहरा पढ़ लिया और धीरे से उसे देखकर अपने कानों को हाथ लगा कर उससे माफी मांग ली।
नंदिनी के इस सवाल पर कामिनी जवाब देने को आगे आ गई…..
” हां !!! नहीं मैं ऐसा तो नहीं कह सकती कि, मैं ब्रिटिश लिटरेचर से बहुत ज्यादा प्रभावित रही हूं… क्योंकि मैंने बहुत सी कहानियों को पढ़ा है। और मुझ पर सबसे ज्यादा असर मेरे बचपन में पढ़ी कहानियों का दिखता है। मैं बचपन में इंग्लिश लिटरेचर ही पढ़ा करती थी। लेकिन इसके साथ ही मैंने कुछ इंग्लिश पल्प राइटर्स को पढ़ने के बाद हिंदी रायटर्स को भी पढ़ना शुरू किया था।
मैंने बचपन में एक बंगाली कहानी पढ़ी थी। असल में तो वह बांग्ला साहित्य था, लेकिन उसका इंग्लिश ट्रांसलेशन मुझे कहीं से मिला था और मैंने उसे पढ़ा था।
और उस कहानी से मैं बहुत ज्यादा प्रभावित हुई थी। हालांकि अब मुझे ना ही कहानी के लेखक का नाम याद है, और ना ही कहानी का नाम ठीक से याद है।
लेकिन उस कहानी का अजीबोगरीब प्लॉट जरूर मुझे याद है, अगर आप सुनना चाहें तो मैं सुना सकती हूं।
कहानी का कुछ अजीब सा नाम था शायद “जीवनसंगिनी” या “कालचक्र”!!!
” अगर आपको सुनाने में तकलीफ ना हो तो मैं जरूर यह कहानी सुनना चाहूंगी।”
” मुझे सुनाने में क्यों तकलीफ होगी? कहानियां ही तो मेरा जीवन है….
कामिनी ने एक नजर शेखर पर डाली, शेखर ने भी कहानी सुनने के लिए हामी भर दी।
” अभी अंदर का कार्यक्रम शुरू होने में वक्त है तब तक मैं आपको सुनाती हूं वह बहुत अजीब सी कहानी…..
….. कहानी एक लेखक की है एक अजीब सनकी और पागल लेखक की, जो अपनी पत्नी से बेहद प्यार करता है……
बेहद यानी वाकई बेहद… हर हद से कहीं ज्यादा!!!
क्रमशः
aparna….
