The Bestseller – 24

“तबाही”
लगातार डेढ़ घंटे लिखने के बाद आखिर कामिनी ने अपनी डायरी बंद की और अपनी गोल्डन पेन पर उसकी कैप लगाकर संतुष्ट भाव चेहरे पर लिए खिड़की से बाहर देखने लगी….
“ऋषि आप होते तो पढ़ कर बताते की मैंने क्या कम क्या ज्यादा लिख दिया ….
आपके जाने के बाद अब यूँ लग रहा है जैसे ये सारी कहानियां और इनके किरदार भी अनाथ हो गए हैं। आप इन कहानियों में छिपी मेरी कमियां बता जाया करते थे और मैं उन्हें सुधार लिया करती थी। अब कौन आएगा मेरी कमियां गिनाने के लिए…”
एक बार फिर कामिनी की आंखें भीग गयी… बाहर भी झमाझम बारिश हो रही थी। न बाहर की बारिश का ठिकाना रह गया था न कामिनी के भीतर की बारिश का,कभी भी दोनो ही बरस उठते थे।
कामिनी चुपचाप खड़ी बाहर देख रही थी कि जमना ताई वहाँ चली आयी…
” सोंथालिया नीचे आया हुआ है। आपको पूछ रहा है,क्या कहूँ उसे ?”
कामिनी का प्रकाशक सोंथालिया ही था।
” आप उन्हें बैठाइए, मैं मुहँ धोकर आती हूँ। कुछ चाय कॉफी देख लीजियेगा।”
“जी ! आपकी ये डायरी उन्हें देना है क्या? “
” नही !! ये मैं लेकर आती हूँ। आप उन्हें देखिए तब तक…”
कामिनी अपनी बात पूरी कर बाथरूम में घुस गई।
और जमना ताई नीचे सोंथालिया के सत्कार के लिए बढ़ गयी।
*******
शेखऱ कुलदीप के सामने ही बैठा था, और उसकी टीम कुलदीप को अपने घेरे में लिए उसके चारों तरफ खड़ी थी।
अपनी बात कहते कहते कुलदीप भी बार बार भावुक हो रहा था। इसलिए जब वो थोड़ी देर को शांत हुआ तो शेखर ने भी ज्यादा हड़बड़ी नही मचाई….
” फिर क्या हुआ कुलदीप ?”
” घर वालों को अड़ोस पड़ोस सभी से यही सुनने को मिला कि कुछ देर पहले पार्क में खेलती गोली पता नही अचानक कहाँ गुम हो गयी। इधर उधर , आसपास घंटों तलाश करने के बाद हम सब घर आ गए। घर पर सभी उदास थे पर सबसे ज्यादा हालत आनू की ही खराब थी, उसके आँसू नही थम रहे थे। सब को यही लग रहा था कि गोली को उसकी जिम्मेदारी में छोड़ा गया था और गोली गुम हो गयी इसलिए ही वो इतनी उदास है। अगले दिन हम तीनों भाई पुलिस में रिपोर्ट भी कर आये। पुलिस ने भी अपनी तफ्तीश शुरू कर दी पर कुछ हाथ नही आया। इसी बीच समय आगे बढ़ता गया। दो तीन महीनों में अनन्या का रिज़ल्ट आ गया और उसके सेलेक्शन मेडिकल में हो गया। और आखिर उसे उस नरक से मुक्ति मिल गयी। लेकिन मैं जानता था की मुझे अब मुक्ति नही मिलनी है।
मैं अंदर ही अंदर जल रहा था, मेरी बेटी का दिमाग खराब करने वाले, उसे हत्यारन बना कर छोड़ देने वाले, दोनो लोग मेरे सामने बड़े आराम से रह रहे थे। और मैं कुछ नही कर पा रहा था।
मैं भीतर ही भीतर कितना सुलग रहा था ये उन दोनों को मालूम नही था।
मैंने नूपुर से बात करना तो दूर उसकी तरफ देखना भी छोड़ दिया था, पर उसे इस बात से कोई फर्क नही पड़ता था।
मैं खुद में परेशान था, फिर मैंने सोचा कि मुझे एक बार उन दोनों से बात करनी चाहिए, और यही सोच कर मैं वापस शहर गया।
और इस बार इत्तेफाक से वही दोनो घर पर थे, अकेले।
मुझे देखते ही सुदीप कहीं बाहर चला गया जैसे उसकी चोरी मैंने पकड़ ली हो, नूपुर भी नज़र चुराने लगी, पर मैंने अकेलेपन का फायदा उठाते हुए नूपुर को साथ बैठा कर उससे पूछना और जानना चाहा कि मैं जो सोच रहा हूँ वो सही है या नही? पर वो इस बात से साफ मुकर गई, और उल्टा मुझ पर ही शक्की होने का झूठा इल्ज़ाम लगा दिया।
मैंने उससे बात करने और समझाने की कोशिश की लेकिन वो कुछ समझने को तैयार ही नही थी, उल्टा उसने मुझे ही गलत ठहरा दिया। अगर मैंने अपनी आंखों से दोनों को साथ देखा न होता तो मैं शायद उसकी गोल मोल बातों में आ ही जाता।
मैं एक बार फिर वापस लौट गया, लेकिन अंदर ही अंदर मैं बहुत टूट चुका था। घर पहुँच कर मैंने शराब के साथ ढेर सारी नींद की गोलियां खा लीं। और सो गया। आधी रात के वक्त मेरी नींद खुली तो मुझे बहुत बेचैनी और घबराहट सी लग रही थी। मैं बाथरूम में गया तो मुझे उबकाई सी आई और उल्टी हो गयी। और उसी के साथ खाई गयी सारी दवा भी निकल गयी।
मेरा एक नौकर जो घर पर ही रहा करता था ने मुझे संभाला और सहारा देकर पलंग पर बैठा दिया। उसे भी गोली की गुमशुदगी मालूम थी । उसे लगा मैं इसी कारण से इतना बेख्याल सा घुम रहा हूँ।
उसने मुझे एक बाबाजी के बारे में बताया जो अपने चमत्कारों के लिए वहां आसपास के गांव खेड़े में बहुत प्रसिद्ध थे।
मैं यह सब मानता तो नहीं था लेकिन मैंने उसकी पूरी बात सुनी और उसकी बात सुनते सुनते मेरे दिमाग में एक आईडिया आ गया।
मेरा वो नौकर मेरा भरोसेमंद था। मैं खुद उस समय बहुत टूटा और थका हुआ महसूस कर रहा था। मुझे किसी ऐसे सहारे की जरूरत थी, जिसके सामने मैं अपना दिल हल्का कर सकूं ।और उस समय मुझे राजेश में ही अपना सहारा दिखा। मैंने अपने नौकर राजेश को सारी बातें कह सुनाई, अपनी बीवी की बेवफाई और अपने छोटे भाई कि बेईमानी की दास्तान।
सारी बातें सुनकर वह भी मेरे लिए बेहद दुखी हो गया और तब मैंने उसे बताया कि मैं अपनी पत्नी और अपने भाई से इस बात का बदला लेना चाहता हूं। उसने मुझे यकीन दिलाया कि वह मेरे साथ है।
इसके बाद मैं राजेश के साथ उसके बताए उस बाबा से मिलने चला गया। वहां पर अकेले में मैंने उस बाबा से कहा कि वह जितना चाहे पैसा मुझसे ले ले लेकिन मैं जो कहूंगा वही वह करते जाएंगे।
उस बाबा ने भी हामी भर दी क्योंकि जाहिर था अगर वह कोई बहुत ज्यादा ज्ञानी बाबा होता तो इस तरह लोगों को उल्लू बना कर पैसे नहीं कमा रहा होता उसे सिर्फ रुपयों से मतलब था।
अब मेरे प्लान के मुताबिक गांव से अनाज, सब्जी भाजी लेकर इस बार मेरी जगह राजेश शहर गया। घर पर सामान छोड़ने के बाद बातों ही बातों में उसने मेरे छोटे भाई सुदीप के सामने उसी बाबा का जिक्र कर दिया।
सुदीप और घर के बाकी लोग गोली को ढूंढ ढूंढ कर थक चुके थे और जब आपके पास कोई ऐसी मुश्किल हो जिसका कहीं से भी समाधान ना मिले, तो हम चमत्कारों की तरफ मुड़ ही जाते हैं। वही सुदीप के साथ भी हुआ। उसे लगा उस बाबा से मिलने के बाद शायद गोली को ढूंढने का कोई रास्ता मिल जाए। और इसलिए वो राजेश के साथ तुरंत ही उस बाबा से मिलने चला गया।
मैंने पहले ही उस बाबा जी को बता रखा था कि उसे सुदीप से क्या-क्या करवाना है।
उस बाबा जी ने गोली से जुड़ी सारी बातें बिना सुदीप के पूछे ही कह सुनाई। क्योंकि उन्हें मैंने पहले ही सब कुछ बता रखा था ।सुदीप गोली से जुड़ी सारी बातें सुनते ही आश्चर्यचकित रह गया। उसे बड़ी आसानी से उस बाबा पर विश्वास हो गया। उस बाबा ने सुदीप प्रदीप और मेरे बारे में बहुत सारी बातें बताइ, वो सारी जानकारियां जो परिवार के बाहर अमूमन किसी को नहीं होती, उन जानकारियों को उन बाबा के मुंह से सुनकर सुदीप चमत्कृत होता रहा और पूरी तरह बाबा की भक्ति में लीन हो गया।
सुदीप बाबा के ऊपर विश्वास करने लगा उसने उनके पैर पकड़ लिए कि किसी भी तरह वह गोली को वापस ले आए। तब बाबा ने सुदीप के सामने अपनी बात रख दी।
” तूने अपनी जिंदगी में कोई बहुत बड़ा गलत काम किया है। तूने अपनी किसी बहुत करीबी को बहुत बड़ा धोखा दिया है। और उसी के कारण तुझे यह सजा मिली , कि तेरी दिल अजीज बेटी गुम हो गई। तुझे उसे वापस पाने के लिए तपस्या करनी पड़ेगी। तू जब अपने सारे पापों को धो लेगा तभी वह तुझे वापस मिलेगी।”
” बाबा जी आप बस मुझे यह बताइए कि इसके लिए मुझे करना क्या होगा? “
” यह सब इतना आसान नहीं है। क्योंकि तूने अपना मन काला कर लिया, तेरी गलत नजर गलत औरत पर पड़ी। जिसे तुझे पूजना चाहिए था, उसके साथ तूने गलत किया है। और इसलिए तेरे मन की कालिख को धुलने में जितना समय लगेगा उतना ही समय तेरी बेटी को वापस आने में लगेगा।”
” बाबा जी मैं सारे काम करने के लिए तैयार हूं जो आप कहेंगे।”
इसके बाद वह बाबा हर महीने की अमावस्या को कुछ एक अलग सी विधि उन सब से करवाने लगा। सुदीप का कहना मान कर वह सारे लोग उसके साथ उन सब विधियों को करने में लग गए।
लगभग 2 महीने बाद ही मैं तैयार था कि सुदीप और नूपुर को बाबा के कहे अनुसार किसी तरह अपने रास्ते से हटा दूं। लेकिन उसी महीने मेरे दोनों बच्चों को शहर आना पड़ा और हमने वह प्लान बदल दिया।
मुझे और किसी से कोई लेना देना नहीं था। मुझे बस नूपुर को मारना था। किसी से कुछ ना कह पाने की वजह से अंदर ही अंदर मेरा गुस्सा सुलग सुलग कर एक जख्म से नासूर बन चुका था। अब बस मेरे दिमाग में यही चलता था कि मैं नूपुर और सुदीप को किस तरह तकलीफ दूँ? उन दोनों को मौत के घाट कैसे उतारा जाए?
वह कौन-कौन सी तकलीफदेह स्थितियां हो सकती हैं जिन से गुजरकर ये दोनों नर्क भोगने की पीड़ा सहन करें।।
मुझे पता नहीं था कि मैं नकारात्मक बातों को सोचते सोचते अंदर ही अंदर इतना पागल होता जा रहा था कि मेरा मन अब सिर्फ और सिर्फ उन दोनों के मौत के तरीकों को सोचने में लग गया था।
हर एक बीतते महीने के साथ मैं पागल होता जा रहा था। और मेरे अंदर के बदले की प्यास भी बढ़ती जा रही थी ।एक बार को तो ऐसा लगा कि मैं घर जाकर उन दोनों को शूट कर दूं। और मैं ये करने निकल भी गया, लेकिन फिर राजेश ने किसी तरह समझा-बुझाकर मुझे रोक लिया।
राजेश का यही कहना था कि अगर मैं उन दोनों के खून से अपने हाथ रंग लेता हूं, तो मेरे दोनों बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। क्योंकि सुदीप के मरते ही प्रदीप और उसका परिवार भी मेरे खिलाफ हो सकता है और फिर पता नहीं वो लोग मेरे बच्चों का ध्यान रखेगा या नहीं ?
अपने बच्चों की खातिर मैं धैर्य रखता चला गया। और आखिर वह दिन आ ही गया, जब मेरे बदले की आग पूरी होने वाली थी।
सुदीप उस बाबा की बातों में इस कदर उलझता चला गया था कि वह उन बाबा के बोलने के हिसाब से सोने जागने खाने पीने लगा था।
उसने नूपुर से दूरियां बढ़ानी तभी शुरू कर दी थी जब बाबा ने पहली बार उससे यह बात कही थी। और इसीलिए नूपुर और उसके बीच झगड़े होने लगे। लेकिन अपने प्यार का वास्ता देकर सुदीप ने नूपुर को भी अपने साथ इन विधियों को पूरा करने में शामिल कर लिया।
बाबा ने सुदीप के दिमाग को पूरी तरह से अपने कब्जे में कर रखा था। गोली को वापस पाने का पागलपन सुदीप के सर चढ़कर बोलने लगा था। उसे वापस पाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता था। धीरे-धीरे उसने घर में रखे सोने के जेवर चांदी की कलात्मक वस्तुएं रुपए पैसे इन सारी विधियों के बदले बाबा को देना शुरू कर दिया।
आखिर बाबा का ध्येय पूरा हो ही रहा था।
उसका मुख्य उद्देश्य सिर्फ पैसे कमाना था। वह मुझसे भी पैसे ले रहा था, और उधर सुदीप से भी पैसे ले रहा था ।
हालांकि ये बात मुझे पता थी लेकिन अब मुझे इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
मैं इधर बाबा पर जोर दे रहा था कि वह किसी तरह से अब सुदीप और नूपुर के मरने का रास्ता साफ करें। और बाकी लोगों को इन झमेलों से दूर रखें । लेकिन चूंकि उस बाबा की सुदीप की तरफ से भी कमाई शुरू हो चुकी थी। इसलिए वह उसे मारने की तिथि को टालता जा रहा था, और इसी तरह लगभग डेढ़ साल बीत गया।
अब मेरा धैर्य जवाब देने लगा था।
आखिर थक हार कर एक दिन मैंने उस बाबा से कहा कि अगर अब भी वह इसी तरह मुझे टालता रहा तो मैं उस घर में जाकर वहां के लोगों को सब कुछ सच-सच बता दूंगा।
उस दिन मेरी उस बाबा से कुछ ज्यादा ही बहस हो गई थी ।मैं गुस्से में पैर पटकता हुआ घर चला गया था। उस समय मैं शहर ही गया हुआ था।
मैंने सुदीप और नूपुर से बातचीत करनी बंद कर दी थी। प्रदीप से भी थोड़ी बहुत बात होती थी, लेकिन प्रदीप और उसका परिवार भी सुदीप का ही साथ दे रहा था।
मैंने जानबूझकर ऊपर से दिखाने के लिए कि मैं यह सब जादू टोना चमत्कार नहीं मानता। उन लोगों को उस बाबा से दूर रहने को कहा।
उन सभी को यही लगता था कि मैं उस बाबा और उसके चमत्कारों को नहीं मानता। हालांकि उनमें से किसी ने भी मेरी बात ना ही सुनी और ना मानी।
और मुझे भी इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता था। बल्कि मैं तो चाहता था कि वह लोग उस बाबा की फालतू बकवास मानते रहे।
उस शाम जब मैं बाबा से मिलने गया। तब मैंने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई और यह भी बता दिया कि अब अगर वह कोई ठोस काम नहीं करेगा तो मैं उसे पुलिस के हवाले कर दूंगा। बाबा मेरी बात से थोड़ा सा डर गया और उसने मुझे भरोसा दिलाया कि ठीक 2 दिन बाद वह वही करेगा जो मैंने उससे कह रखा है।
यह सुनकर मैं थोड़ा निश्चिंत हुआ और उसी रात अपने गांव के लिए वापस आ गया । अगले 2 दिन मेरे लिए बहुत भारी गुजरे। क्योंकि मुझे नहीं समझ में आ रहा था कि वह बाबा क्या करने वाला है? उस समय तक मैंने यह नहीं सोचा था कि वह इतना बड़ा कांड कर जाएगा।
उस बाबा ने सुदीप को उस दिन सुबह अपने पास बुलाया और कुछ विधियां करने की बात कहने लगा…-
” देखो बच्चा आज तक तुम हमारी बात मान कर जो जो भी विधियां करते आए, इस सब से कहीं ना कहीं तुम्हारा फायदा जुड़ा हुआ था। तुमने जैसे जैसे मुझे भेंट चढ़ाई मैंने तुम्हारी विधि कराई… तुम्हारी दुकान बढ़ने लगी, बरकत आने लगी और ऐसे ही बरकत तुम्हारी और आती जाएगी।
तुम्हारी जिंदगी में सारी खुशियां घुलती जाएंगी, अगर तुम हमारी बात मानते रहो।”
” बाबा जी मैं सब कुछ करने को तैयार हूं आप बताइए तो सही कि करना क्या है?”,
” तुम्हें एक झूला झूलना है। “
” झूला? लेकिन कैसा झूला? मैं समझा नहीं आप कहना क्या चाहते हैं?”
” तुम्हारी बेटी गोली को आखरी बार पार्क में झूले पर झूलते देखा गया था। तो हमारी आखिरी विधि भी झूला विधि कहलाएगी। इसमें तुम झूला झूलोगे, लेकिन हवा में नहीं बल्कि दो अलग अलग दुनिया के बीच का झूला ।
झूले पर जिस तरह से रस्सियाँ बंधी होती हैं, और हम रस्सियों में पाटा लगाकर उस पर बैठते हैं। और फिर हवा पर पींग लेते हैं। उसी तरह यह झूला तुम्हारे शरीर से जुड़ा होगा। तुम्हारे घर पर क्या कोई ऐसा स्थान है? जहां पर किसी कपड़े से एक लंबा झूला बनाया जा सकता है?”
” जी है !! बाबा जी एक कमरा है जहां पर छत से बॉलियाँ डली हुई है ।उन बल्लियों से कोई कपड़ा या रस्सी आप जो भी चाहेंगे वह डाल सकता हूँ।”
” रस्सी की जरूरत नहीं है। हमें फांसी का फंदा थोड़ी तैयार करना है?
.. हमें एक आसान सा झूला बनाना है। तुम एक काले रंग का बड़ा दुपट्टा लेकर उन बल्लियों से डालकर उसमें एक गांठ लगाओगे, और उसे अपने गले में पहन लोगे। इसके बाद तुम उस फंदे से झूल जाओगे। तुम्हारा शरीर जमीन से लगभग 4 इंच उपर होना चाहिए ।और उस समय तुम्हें ऐसा महसूस होगा कि तुम्हारे प्राण निकलने वाले हैं ….
….. बस उसी एक पल में तुम उस दूसरी दुनिया और इस हमारी दुनिया के बीच झूला झूलोगे। और उसी समय तुम्हें गोली मिल जाएगी।
तुम्हें बस उसे पकड़ना है और वापस लेकर अपनी इस दुनिया में आ जाना है। “
” और कहीं मैं वापस नहीं आ पाया तो? मतलब मैं फांसी के फंदे पर लटका और मारा गया तो?”
” जब हम पर विश्वास ही नहीं तो फिर तुम यहां क्या कर रहे हो? इसी वक्त चले जाओ, और ढूंढ लो!
इन डेढ़ सालों में क्या तुम्हारी बच्ची कहीं पर भी मिली ?किसी भी और आदमी ने उसे ढूंढने की कोशिश की? हम तो पिछले डेढ़ साल से इस कोशिश में लगे हैं और अब जब तुम उसके एकदम पास पहुंच चुके हो तब तुम वापस मुड़ जाना चाहते हो।”
” नहीं बाबा जी मेरा यह मतलब नहीं था। आप बोलिए आप क्या कहना चाहते हैं।”
” जैसे सात समंदर होते हैं , सात आसमान होते हैं । वैसे ही अलग-अलग सात दुनिया होती है। तुम्हारी गोली इस दुनिया से निकलकर उन सात दुनिया में किसी एक में जाकर फंसी हुई ।है और तुम्हें झूले की पेंग को इतनी ऊंचाई पर ले जाना है, कि तुम उस दुनिया से उसे लेकर वापस आ सको। हम यह नहीं कह रहे कि तुम्हारी गोली मर गई है, लेकिन वह इस दुनिया से जा चुकी है और उस और इस दुनिया के बीच कहीं अटकी पड़ी है । तुम्हें ही उस झूले में बैठ कर उसे लेने जाना है । लेकिन हम यह भी जानते हैं कि तुम अकेले इस काम को नहीं कर सकते। इस काम में तुम्हें किसी एक और की मदद चाहिए होगी। क्योंकि अगर जाते समय तुम्हारे झूले की पेंग कुछ ज्यादा लंबी हो गई तो तुम उन सातों दुनिया को पार करके सीधे स्वर्ग पहुंच जाओगे । तुम स्वर्ग ना पहुंचो और तुम्हारा झूला उन सात दुनिया के बीच छिपी गोली को ढूंढ सके इसके लिए तुम्हें किसी एक को अपने साथ लेकर जाना होगा।”
“क्या मैं अपनी पत्नी को लेकर जा सकता हूं?”
” तुम्हें उसे लेकर जाना होगा जिसके साथ तुमने वह पाप किया था, जिसके कारण तुमने गोली को खो दिया!”
” इस बारे में तो नूपुर से बात करनी होगी, मालूम नहीं वह इस बात के लिए तैयार होंगी भी या नहीं?”
” अगर तुमसे प्यार करती है, तो तुम्हारी बेटी को ढूंढने के लिए उसे इस काम को करने के लिए तैयार होना ही होगा। अगर वह तैयार हो जाती है तो कल सुबह आ कर हमे बताना हम सारी जरूरी चीजें लिख कर रखेंगे वह सब मंगवा लेना और हम विधि शुरु करवा देंगे।”
” जी बाबा जी!”
बाबा को प्रणाम कर सुदीप तुरंत घर के लिए निकल गया । उसने घर पर नूपुर से इस बारे में बात की, लेकिन जब वह घर में नूपुर से बात कर रहा था तभी उसकी पत्नी भी कमरे में चली आई। उसने सिर्फ विधि के बारे में सुना था। जैसे ही उसने सुदीप से यह जाना कि सुदीप क्या करने वाला है , वह भी उसके पीछे पड़ गई कि वह भी उसके साथ जाएगी जिससे अगर सुदीप कहीं अटकने लगे तो वह उसे वापस जिला सके।
उन तीनों के यह निर्णय लेते ही कि वह लोग इस झूले की यात्रा में जाने वाले हैं, सुदीप से बड़ा वाला भाई प्रदीप और उसकी पत्नी भी आ गए। जब उन्होंने यह बात सुनी तो वह लोग भी उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गए।
कभी-कभी सोचता हूं अंधविश्वास में आदमी कितना पागल हो जाता है। और उसके साथ उसके आसपास के लोग भी उस पागलपन में उसका साथ देते हुए खुद इतना डूब जाते हैं कि उन्हें सच और झूठ का फर्क भी दिखना बंद हो जाता है।
मेरे दोनों बेवकूफ भाइयों ने बैठकर यह निर्णय लिया कि खोई हुई गोली को लेने के लिए सारा परिवार एक साथ जाएगा। और सारे के सारे लोग फंदे लगाकर उस झूले में झूलते हुए उन सात दुनिया के बीच जाकर एक साथ गोली को तलाशेंगे।
अब सोचता हूँ कि काश उन लोगों ने उस रात मुझे एक बार फोन कर लिया होता!
काश नूपुर ने ही मुझे एक बार फोन कर लिया होता !!
क्योंकि मैं यही सोच रहा था कि सिर्फ नूपुर और सुदीप ही मारे जाएंगे…..
….. मुझे नहीं पता था कि वह सारे लोग इस बेवकूफी में एक साथ कूद पड़ेंगे….
क्रमशः
aparna….

ऐसे अंधविश्वासों से भरे पड़े हैं किस्से हमारे देश में