The Bestseller – 11

” काला धागा “
तस्वीर को सीने से लगाए जाने कब तक कामिनी वही खिड़की पर खड़ी रही कुछ देर बाद थक कर वह अपनी रिवॉल्विंग चेयर पर बैठ गई…. न जाने उसी थकान और आंसुओं के बीच कब उसकी आंख लग गई । उसकी सुबह की नींद जमना ताई की आवाज से खुली…-” मेमसाहब उठिए आप बिस्तर पर नहीं सोईं? रात भर ऐसे ही कुर्सी पर बैठी रही?”
” हां जमना ताई। शायद मुझे वहीं बैठे-बैठे नींद लग गई थी।
” चाय ले आऊं आपके लिए?
” हां आप चाय ले आइए तब तक मैं हाथ मुंह धो लेती हूं।
कामिनी के मुंह हाथ धोकर आते तक में जमना ताई भी चाय लेकर आ गई थी… चाय पीते हुए कामिनी ने अपनी यह किताब खोली। उसके दिमाग में यह भी चल रहा था कि उसे तेरहवा भाग जल्द से जल्द पूरा करके प्रकाशक को देना था। प्रकाशक तो प्रकाशक था। पक्का व्यापारी!! उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कामिनी के मन की अभी क्या हालत थी? वैसे भी उसने कहानी लगभग पूरी कर ही ली थी थोड़ी बहुत एडिटिंग ही बाकी थी उतना करके उसने मन बना लिया था कि जल्दी ही प्रकाशक के हाथ में अपना ड्राफ्ट रख देगी।
क्योंकि वह खुद भी अपने कारण किसी और का नुकसान नहीं करवाना चाहती थी।
उसने चाय पीते हुए अपनी डायरी खोल ली…….
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सुहास अपने बचपन की यादों से घिरा हुआ था कि तभी सारा वहां चली गई…-” हेलो सुहास आज बड़ी सुबह-सुबह आ गए तुम।”
” हां बस ऐसे ही कल कुछ खास काम तो किया नहीं था, तो सोचा आज अपना सेटअप तैयार कर लूँ। हैकिंग में जितना वक्त नहीं लगता उससे कहीं ज्यादा वक्त उसकी तैयारी में लगता है।”
” सही कहा तुमने। मुझे पासेस अरेंज हो गए हैं… आज हम लंच के पहले रेनबो के ऑफिस चलेंगे। मैं तुम्हें वहां के मैनेजर से मिलवाने के बहाने लेकर जा रही हूं। लेकिन तुम उनके सारे एम्प्लाइज पर और उनकी डेस्क पर नजर मार लेना।”
” यू डोंट वरी !!! वह सब मैं कर लूंगा। बस उनके ऑफिस में जाने से पहले मुझे कुछ एक चीजों की जरूरत होगी। “
” हां वह तुमने जिन चीजों की लिस्ट दी थी.. वह मैंने अभय से मंगवा ली है। तुम्हारे वो स्पेशल माइक्रो मिनी कैमेरा स्पेशल माइक्रोफोन और बाकी चीजें भी आ गई है। “
” थैंक यू सरा। “
दक्षिण भारतीय होने से सुहास सारा को सरा ही कहा करता था …सारा ने भी एक दो बार उसे टोका लेकिन फिर उसने भी अब उसे कुछ भी बोलना छोड़ दिया था।
कुछ देर बाद धीरे-धीरे ऑफिस के बाकी लोग भी आने लग गए। लगभग 11 बजे के आसपास सारा अपने केबिन से निकलकर सुहास के पास चली आई…-” आर यू रेडी हम चले?”
” येह!!! आई एम रेडी चलो चलते हैं।”
सारा के साथ सुहास भी ऑफिस से निकल कर सामने बड़ी बिल्डिंग की तरफ आगे बढ़ गया।
सारा के साथ भले ही वह पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा था, लेकिन जाने क्यों दिल ही दिल में ज़रा सा डरा हुआ भी था। उसे डर इस बात का था कि सारा उसे जिस सॉफ्टवेयर ऑफिस में लेकर जा रही है, वह असल में उसे उस दिन अस्पताल नजर आया था। तो अगर आज भी वही हुआ और उसे सॉफ्टवेयर के लोगों की जगह डॉक्टर और नर्स दिखाई देने लगे तो वह क्या करेगा?
अपनी उधेड़बुन में वो सारा के साथ चला जा रहा था। सारा ने जैसे ही लिफ्ट खोली वह चौक कर दो कदम पीछे हट गया….-” यू कैरी ऑन मैं सीढ़ियों से आता हूं।”
सारा के बार-बार बुलाने पर भी वह नहीं आया।
सारा जब तक लिफ्ट से ऊपर पहुंची तब तक दो-दो सीढ़ियां एक बार में लांघ कर वह भी ऊपर पहुंच गया।
सामने ही बड़े से कांच के दरवाजे पर इंद्रधनुष बना हुआ था और बहुत ही डिज़ाइनर शब्दों में द रेनबो लिखा हुआ था।
सारा के पीछे वह भी भीतर दाखिल हो गया… लेकिन उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही जब उसे वहां पर अस्पताल की जगह वही सॉफ्टवेयर ऑफिस नजर आया! उस ने राहत की सांस ली और सारा के साथ आगे बढ़ गया।
हालांकि ऑफिस का डिजाइन काफी कुछ उस अस्पताल की डोरमेट्री से मिलता हुआ सा था लेकिन ये ऑफिस ही था।
अपनी एक्सरे मशीन सी आंखों से उसने हर तरफ ताड़ना शुरू कर दिया। उसे तो हर कोई गुनाहगार नज़र आ रहा था और देखा जाए तो सभी बेगुनाह थे।
सारा के साथ जब वो मैनेजर के कमरे में पहुंचा वहाँ कुछ दो चार लोग और भी बैठे मिले।
सारा मैनेजर से इधर उधर की बातों में लग गयी और उसके बातें शुरू करते ही वो लोग एक एक कर वहाँ से निकल गए।
सुहास बस इस बात के इंतज़ार में था कि, किसी तरह मैनेजर का लैपटॉप या मोबाइल बस पांच मिनट के लिए इसके हाथ लग जाये……और उसे वो मौका मिल भी गया।
सारा असल में वहाँ इंटीरियर डिजाइनर के तौर पर आई थी…और इसलिए वो मैनेजर उसे साथ लिए बाहर निकल गया। उसे बाहर का हॉल कमरे आदि दिखाने थे।
उस बात का फायदा उठाते हुए सुहास ने तुरंत लैपटॉप पर अपना जादू दिखाना शुरू कर दिया। और पांच से दस मिनट के भीतर उसका जासूसी दिमाग उस कंपनी के लैपटॉप पर कब्जा जमा चुका था।
सारा वापस आयीं , उसने सुहास को देखा और इशारों में ही उनकी हॉं ना हो गयी।
” ये मेरे कुलीग हैं श्रीराम! इन्हें भी एक बार सेटअप दिखाना है।”.
” याह श्योर! “सारा की बात पर सहमति जताता मैनेजर सुहास को भी साथ लिए बाहर निकल गया।
वापस एक बार सब देख कर सारा और सुहास बाहर निकल गए..
उस कॉरिडोर से सुहास और सारा बाहर निकल रहे थे कि सुहास को अचानक ऐसा लगा जैसे उसने अभी कॉरिडोर के पिछले सिरे पर कुछ देखा। वह चौन्क कर पीछे मुड़ गया। उसे कॉरिडोर के एकदम अंत में दरवाजे पर वही लड़का खड़ा नजर आया जो एक दिन पहले ठीक उसके चश्मे के सामने अचानक चला आया था। सुहास ने अपने आप को संभाला और सामने की तरफ मुड़ कर सारा के साथ आगे बढ़ गया।
” सुहास तुम्हारा काम हो गया न?”
” हाँ जब मैनेजर ऐसे उल्लू होते हैं तब काम में दिक्कत नही होती!” सुहास ने एक रूखा सा जवाब दिया
” उल्लू क्यों? स्मार्ट था बंदा?”
“कहाँ का स्मार्ट ? आज के समय में जब इंटरनेट चोरी का सबसे सरल माध्यम बन गया है, उस समय कौन गधा अपना लैपि खुला छोड़ जाता है। मैं तो सोच रहा था उसका आईडी पहले रिसेट करना पड़ेगा…. तब जाकर अंदर घुस पाऊंगा, पर बंदे का स्क्रीन ऑन था वो भी बिना किसी पासवर्ड के। बस यूं लगा जैसे दरवाज़ा खोल कर मुझे इनवाइट कर रहा हो।”
दोनो हंसते खिलखिलाते पास वाली कॉफी शॉप पर जा बैठे।
सेल्फ सर्विस थी, सारा को बैठा कर वो खुद कॉफी ऑर्डर करने चला गया। काउंटर के उस पार खड़ी लड़की नीचे सर किये काउंटर को घूर रही थी। उसके अजीब उलझे से बाल उसका आधे से ज्यादा चेहरा ढाँके हुए थे।
दोनो हाथ लंबे से काफ्तान में छिपे थे। सुहास ने उसे कॉफी के लिए बोला, उस लड़की ने नही सुना…. सुहास ने दुबारा जैसे ही कहा उस लड़की ने अपना चेहरा ऊपर कर दिया और सुहास घबरा कर एक कदम पीछे हट गया।
उस लड़की के माथे के बीचों बीच एक गहरा सुराख था….. जहाँ से अब भी धुँआ निकल रहा था। उसकी एक आंख अजीब सी फूल कर फैल गयी थी और जहाँ से खून बह कर जम चुका था। होठों के आसपास ब्रूसेस और चोट के निशान उभर आये थे। वो अपना मुहँ खोलने की कोशिश में थी लेकिन यूँ लग रहा था जैसे उसे इसमें बहुत कठिनाई हो रही थी। फिर भी अपना पूरा जोर लगा कर उस लड़की ने अपना मुहँ खोल दिया और उसके मुहँ से कुछ सफेद पाउडर और हरी सुखी सी पत्तियों का कुछ चुरा सा गिरने लगा…
” स्टॉप इट , प्लीज़ ये क्या कर रही हो।”
सुहास चौन्क कर पीछे भागा और सीधे सारा के पास जा कर रुका…
” क्या हुआ सुहास? सब ठीक है?
सुहास ने उस काउंटर की ओर इशारा कर दिया। सारा ने मुड़ कर देखा… काउंटर खाली था..
” तुम बैठो। मैं बताना भूल गयी थी यहाँ खुद ही अपनी कॉफी बनानी भी पड़ती है। और वो जो उस किनारे वाले काउंटर पर बुजुर्ग से आदमी बैठे हैं ना बस हमें उनके पास जाकर पैसे देने होते हैं और कुछ नहीं। रुको मैं हम दोनों के लिए कॉफी लेकर आती हूं।”
सुहास को सामने वाले काउंटर के पीछे अब भी वह लड़की नजर आ रही थी लेकिन आश्चर्य की बात थी कि सारा को वो नज़र नहीं आ रही थी। कुछ देर में ही सारा दो कप में अपने और सुहास के लिए कॉफी लेकर चली आई सुहास के सामने उसका कप रखते हुए सारा बैठ गई….-” वह देखो सुहास उस तरफ अपने पीछे देखो। “
सुहास ने अपनी गर्दन पीछे मोड़ी। उसके ठीक पीछे की दीवार पर उसी काउंटर वाली लड़की की एक पुरानी खूबसूरत सी तस्वीर लगी हुई थी। खूबसूरत से कटे हुए बालों में गोरी सी लड़की मुस्कुराती हुई खड़ी थी। और उसकी तस्वीर पर एक चंदन के फूलों की माला चढ़ी हुई थी। उस माला को देखते ही सुहास चौन्क गया…. लेकिन उसे धीरे से समझ में आ गया कि क्यों वह लड़की उसे तो नजर आ रही है लेकिन सारा को नहीं।
अब सुहास को यह तो अच्छे से समझ में आ ही गया था कि उसे सामान्य लोगों की इस दुनिया में कुछ असामान्य लोग भी नजर आते हैं …और इसका कारण शायद यही था कि वह खुद भी कुछ असामान्य था ।
उसे बाबा जी की वह बात याद आने लगी जब उसे उसकी मां उनके पास लेकर गई थी उन्होंने उसे सामने बैठाकर उसके माथे पर अपना अंगूठा रख दिया था…. और आंखें बंद करके कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे थे।
ढेर सारे मंत्रों का जाप करते हुए बीच-बीच में वह अपनी आंखें अधखुली अवस्था में खोल लेते थे और फिर वापस बंद कर लेते थे। मंत्र पढ़ते पढ़ते उनका शरीर गर्म होने लगा था और उनके अंगूठे से वह गर्मी सुहास के शरीर में उतरने लगी थी….
सुहास का चेहरा जलने लग गया था। उसे अपने चेहरे पर खून की नसों में खून दौड़ता हुआ साफ महसूस हो रहा था… उसे लग रहा था जैसे माथे पर कि उसकी नसें इतनी तनाव में आ गई है कि शायद फूल कर फट जाएंगी। लेकिन इतने सबके बावजूद उसे किसी तरह की कोई शारीरिक तकलीफ नहीं हो रही थी। नसें तनाव में जरूर थी…. लेकिन उसके माथे पर किसी तरह का कोई दर्द नहीं था। बाबा जी ने उसके माथे पर अपने अंगूठे से दबाव बढ़ाना शुरू किया और दबाव बढ़ाते बढ़ाते एक अवस्था ऐसी आयीं जब बाबाजी और सामने बैठे सुहास ने एक साथ आंखें खोल दी…..
बाबा जी सुहास की आंखों में झांक रहे थे, सुहास को पूरी तरह से महसूस हो रहा था कि सामने बैठे बाबा की आंखें धीरे-धीरे उसकी आंखों के पास चली आई है….. और फिर उनकी आंखें उसकी आंखों से जुड़ कर उसकी आंखों के रास्ते उसके अंदर चली गई थी ..
इतना होने के साथ ही उसने अपनी आंखें बंद कर ली और लगभग 5 मिनट के बाद वह बेहोश होकर गिर पड़ा । उसकी मां को बाबा जी ने जरा दूर बैठा दिया था । उस पूरे कक्ष में चारों तरफ ढेर सारे दिए जल रहे थे। उन जल रहे दीपक की रोशनी और गर्मी सभी को अपने शरीरों में महसूस हो रही थी, उस पूरे कक्ष में सिर्फ बाबाजी सुहास और उसकी माँ ही थी। सुहास के गिरते ही बाबा जी ने अपनी आंखें एक झटके से खोल दीं। ऐसा लगा जैसे वह सुहास की आंखों से बाहर निकल कर आए हैं।
उन्होंने आंखें खोली ही थी कि सुहास की मां भाग कर उनके पास पहुंच गई…-” क्या हुआ बाबा जी कुछ तो बताइए क्या चिन्ना को किसी ने कैद कर रखा है? मतलब कोई आत्मा या कोई बुरी शक्ति?”
” नहीं यह किसी बुरी शक्ति की कैद में नहीं है। बल्कि इसके पास एक अलग ही शक्ति है इसकी आंखें।
यह वह देख सकता है जो हम नहीं देख सकते और इसे यह शक्ति जन्मजात मिली है। जब गर्भाशय के अंदर शुक्राणु और अंडाणु मिलते हैं …..तब बीज का निर्माण होता है। उसी समय बहुत सारी ऐसी संरचनाएं निर्मित होती हैं जो मानव शरीर को बनाने के लिए आवश्यक है । जिस समय यह बीज किसी विशेष आकृति का नहीं होता उस समय एक बड़ा सा गोला होता है , अंतरिक्ष के समान और इसके अंदर लगभग 24 भाग बटे हुए होते हैं। यही 24 भाग आगे चलकर हाथ, नाक कान पैर और शरीर के बाकी हिस्से बनाते हैं । तेरे बेटे में वह 25 तत्व थे । इसकी आंखों को एक अलग से तत्व से भगवान ने बख्शा है।
सामान्य भाषा में बताऊं तो हम लोगों की आंखों में सिर्फ एक लेंस होता है जिससे हम इस दुनिया को देख सकते हैं… तेरी बेटे की आंखों में दो-दो लेंस है, जिससे वह इस सामान्य दुनिया को तो देख ही सकता है, लेकिन इस दुनिया के परे जो एक दूसरी दुनिया है उसे भी देख सकता है।
देख भूत प्रेत आत्माओं को देखने की शक्ति बहुत से लोगों को मिली होती है… हमारी भाषा में कहा जाता है कि जिस आदमी की छाया कमजोर होती है, उसे इस संसार को छोड़ चुके लोग यानी की आत्माएं नजर आती हैं। लेकिन तेरे बेटे की छाया कमजोर नहीं है। उसकी नजर थोड़ी ज्यादा तेज है।
उसे सिर्फ आत्मा ही नजर नहीं आती उसे वह दूसरी दुनिया भी नजर आती है, वह आत्माओं को देखने के साथ आत्मा के रहने की जगह उनके काम करने की जगह और उनका समय सब कुछ एक साथ देख लेता है यह बहुत बड़ी शक्ति है।
यह आत्माएं ऐसा नहीं है कि सिर्फ तेरे बेटे के पास आती हैं …यह ऐसी आत्माएं होती हैं जिनकी कुछ ना कुछ इच्छाएं अधूरी रह जाती हैं ,और जिन की इच्छाएं जीवित रहते में पूरी नहीं हो पाती वह मरने के बाद इस संसार से मुक्त नहीं हो पाता और ऐसी अतृप्त आत्माये इस संसार में घूमते हुए हर किसी इंसान के सामने जाती हैं। उससे बातें करने की कोशिश करती हैं। उसे अपनी इच्छाएं बताने की कोशिश करती हैं, कि हम इंसान उनकी कोई मदद कर सके। लेकिन हमारे पास कोई ऐसी दृष्टि तो होती नहीं कि हम उन आत्माओं की बातें सुन सके और समझ सके इसलिए हम उनकी तरफ ध्यान ही नहीं दे पाते।
तेरे बेटे में यही खासियत है। इसके साथ यही बात है वह उन आत्माओं को देख पाता है, उनकी बोली सुन पाता है ,समझ पाता है, और इसीलिए वह आत्माएं बार-बार उसे नजर आती हैं क्योंकि वह भी जानती हैं कि हमें देख पा रहा है।
” बाबा जी कुछ ऐसा कर दीजिए कि इसे यह सब दिखना बंद हो जाए बहुत परेशान है मेरा लड़का ।”
” ये धागा ले जा । अभिमंत्रित किया हुआ है। इसे पहना देना लेकिन इस लड़के को भी इस धागे पर विश्वास करना होगा तभी कुछ हो सकता है। ये पूरे विश्वास से पहनेगा तब तो कोई इसके आसपास फटकेगा भी नही, लेकिन कहीं भी इसने उतार कर छोड़ तो इसका प्रभाव जाता रहेगा। इसलिए एक बार पहना लिया तो फिर उतारना नही है। “
” जी बाबा जी।
इतनी देर में सुहास को होश आ गया था। बाबा ने अभिमंत्रित धागा उसके गले में डाल पांच गांठे लगा दी।
” पंच तत्वों की पांच गांठ लगाई है अब कोई बुरी शक्ति इसकी ओर झाँकेगी भी नही।”
बाबा ने सुहास को उतना ही समझाया जितने में वह उस धागे को गले में पहना रहे उतार कर फेंक ना दे…
लेकिन उन तांत्रिक बाबा के इस धागे के बाद वाकई चमत्कार हुआ और सुहास को ऐसी कोई भी अनोखी चीजें दिखनी बंद हो गई।
” पहले इन तांत्रिक बाबा के बारे में मालूम होता तो इंडिया से जाने से पहले ही तेरे गले में यह धागा बनवा दी होती लेकिन चलो कोई बात नहीं जब जागो तभी सवेरा वैसे बेटा एक बात बता क्या अमेरिका में भी तुझे यह सब परेशानियां होती थी।”
सुहास के संकोच ने उसे अपनी मां से कुछ भी कहने से रोक दिया । उसने बस हल्के से अपने सिर को इस ढंग से हिलाया कि उसकी मां उसका जवाब समझ नहीं पाई कि उसने हां बोला है या ना।
असलियत तो सुहास ही जानता था कि उसे अमेरिका में भी कितना कुछ झेलना पड़ा था…….
क्रमशः
aparna….
