Besatseller-3

  The bestseller -3

             रहस्यमयी मौतें…..

     सदमे से उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।  अभी कुछ देर पहले ही तो उसे पता चला था कि ऋषिकेश रायसागर गायब है और यहां उसकी गाड़ी की डिक्की में उस आदमी की जो इस शहर का एक बहुत जाना माना सेलिब्रिटी था की लाश पड़ी हुई थी।
   वह क्या करें क्या ना करें यह सोचने में भी वह ज्यादा वक्त जाया नहीं करना चाहती थी। उसने तुरंत गाड़ी का ट्रंक बंद किया और गाड़ी में आकर बैठ गई। थोड़ी देर तक वह अपनी असंतुलित सांसो को सामान्य करने की कोशिश में लग गई। फिर उसने गाड़ी में रखा अपना पानी का बोतल निकाला और एक सांस में गटक लिया।
     आखिर वह भी पत्रकारिता से जुड़ी थी उसे भी पता था कि किसी की गाड़ी में एक लाश मिलने का क्या मतलब होता है । वह पुलिस स्टेशन पर जाकर अगर यह बता भी देती तो भी उसे 100 तरह के सवालों के जवाब देने पड़ते। यह भी हो सकता है कि फिलहाल उसे पुलिस जेल में डाल दे और जेल के अंदर रहकर वह अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर सकती थी।  लेकिन इस वक्त वह क्या करें?
   उसके ऑफिस के गेट पर भी तो हमेशा गार्ड खड़ा रहता था जो ऑफिस से निकलते वक्त हर किसी की गाड़ी की बैकसीट और ट्रंक चेक किया करता था।
   अभी कुछ देर पहले ही वह इस ऑफिस से ही अपनी नाइट शिफ्ट पूरी करके गई थी और अभी-अभी बेवकूफी में वह वापस अंदर चली आई थी।
   काश उसने पहले ही अपनी गाड़ी का ट्रंक चेक कर लिया होता। पर क्या उसे पता था कि उसकी गाड़ी में कोई लाश छिपी होगी। उसे अपनी खुद की बेवकूफी पर हंसी आने लगी लेकिन यह हंसने का वक्त नहीं था। अब यहां से निकला कैसे जाए? और एक बार किसी तरह यहां से निकल भी गई तो इस लाश को अपनी गाड़ी में रखे हुए वह कहां कहां जाएगी? शेखर को भी नहीं बुला सकती वह भी किसी अजीब सी मिस्ट्री में फंसा हुआ है। नंदिनी का दिमाग बहुत तेजी से काम कर रहा था उसने तुरंत गाड़ी मोड़ी और गेट की तरफ बढ़ चली।
    अभी भी अपनी रात की शिफ्ट पूरी किए कई एंप्लॉय ऑफिस से निकल कर घर जा रहे थे। और सुबह की पाली के एंप्लॉय अंदर दाखिल हो रहे थे। इसलिए गेट पर थोड़ी सी जाम जैसी स्थिति बनी हुई थी।
   वह बहुत धीमी धीमी गति से आगे बढ़ रही थीं। पटरी पर तेजी से भागती रेलगाड़ी से टक्कर लेता उसका दिल धड़क रहा था। उसे बार-बार यही लग रहा था कि कहीं गार्ड ने डेली रूटीन के हिसाब से उसकी बैकसीट  के बाद गाड़ी का ट्रंक खोल दिया तो सबके सामने वह कैसे खुद को बेगुनाह साबित कर पाएगी?  माथे पर छलक आये पसीने को पोंछती वो गेट पर पहुंची कि गार्ड ने उसे देखकर एक बार फिर सलाम ठोक दिया…-” मैडम आप तो एक बार जा चुके हो ना।”
” हां वह यहाँ मेरी पानी की बोतल छूट गयी थी, तो जस्ट वही लेने के लिए अंदर आई थी।
” ठीक है मैडम आप निकलिए। ” एक औपचारिक सी नज़र उसकी बैकसीट पर मार कर गार्ड ने उसे गाड़ी आगे बढ़ाने का इशारा कर दिया।
लंबी सी राहत की सांस लेकर नंदिनी ने गाड़ी तेजी से आगे बढ़ा दी।

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   ******

       कामिनी अपनी टेबल पर बैठी अपनी डायरी के पन्ने पलट रही थी।
    4 दिन बीत चुके थे और उसके पति का कोई पता नहीं था। पूरी दुनिया उसे गलत समझती थी। सबको यही लगता था कि उसने अपने बाप की उम्र के आदमी से शादी की थी सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि उसकी किताब प्रकाशित हो सके। और साहित्य के क्षेत्र में उसका नाम बन सके।  लेकिन उसकी शादी के पीछे की सच्चाई उनमें से किसी को नहीं पता थी।
    और अब उसमें इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि वह पूरी दुनिया को चीख चीख कर अपनी शादी की असली वजह और सच्चाई बता सके उसने अपने साथ होने वाली चीजों को अपनी किस्मत मान कर मंजूर कर लिया था।
    
     बुकशेल्फ के सामने बैठी कामिनी ने वहां से एक किताब निकाल ली। किताब का नाम था वेगवती। उसने हाथ में थामे उसके पन्ने पलटने शुरू किए और चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान रेंग गई। उसकी कहानी की नायिका वेगवती असल में वंडर वुमन थी। एक ऐसी चमत्कारी लड़की जो दुनिया में किसी से नहीं डरती जिसके अंदर ऐसी ऐसी शक्तियां थी कि वह सूरज की भी दिशा पलट सकती थी।
     सोचकर कितना अजीब लगता है क्या ऐसी कोई चमत्कारी दुनिया होती है जिन्हें वह अपनी कहानियों में उतारा करती थी? नहीं!! शायद नहीं !! और इसीलिए वह ऐसी दुनिया अपने पन्नों पर उतार लिया करती थी जहां वह हमेशा रहना चाहती थी।
      उसकी नायिकाएं हमेशा शक्तिशाली होती थी तन से भी और मन से भी, बुद्धि और विवेक से भी। उसकी तरह नहीं कि अगर सामने वाला तेज आवाज में भी कह दे तो आंसू छलक आए।
     अपनी टेबल पर बैठी वो सूनी सूनी आंखों से खिड़की से बाहर देख रही थी कि तभी घर की पुरानी नौकरानी उसे खाने के लिए बुलाने चली आई…
” चलिए मेम साहब खाना लगा दिया है।”
” मेरा मन नहीं है जमना ताई। आप जाइये, और आप सब लोग खा लीजिये।”
        जमना उनके घर की पुरानी नौकरानी थी। पहले जरूर वह ढेर सारे काम किया करती थी लेकिन अब उम्र बढ़ जाने के बाद वह सिर्फ सभी कामों का ऊपरी अवलोकन ही किया करती थी। खाना बनाने के लिए बटलर थे। साफ सफाई के लिए बाकी नौकर थे। जमना का काम बस यह देखना था कि सारे नौकर अपना काम ढंग से करें।
     इसीलिए शायद उसमें एक अहम की भावना चली आई थी। जरा कड़कदार शब्दों में उसने वापस कामिनी से खाना खाने की गुजारिश की।
” थोड़ा ही सही कुछ तो खा लीजिए ऐसे तो आप बीमार पड़ जाएंगी।”
   अपनी फिक्र की बात जमना ताई के मुंह से सुनकर उसे अचानक रोना आ गया और वह फूट-फूट कर रोने लगी। जमना धीमे कदमों से उसके पास गई और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगी….
” साहब जल्दी आ जाएंगे उन्हें कुछ नहीं होगा आप विश्वास रखिए।”
” जमना ताई अगर उन्हें कुछ हो गया तो मुझे यह लोग जीते जी मार डालेंगे। वैसे ही सब मौके की ताक में थे कि कब वह आंखें मूंदे और सब मुझे यहां से निकाल कर बाहर फेंक दें।”
” अभी यह सब सोचने का वक्त नहीं है मेम साहब! आप चलिए पहले कुछ खा लीजिए और फिर थोड़ा आराम कर लीजिए। 2 दिन से आप यहीं इसी खिड़की पर बैठे उनकी राह देख रही है। “
     आखिर उनकी बात मान कर कामिनी नीचे खाना खाने चली गयी…

   दो तीन उल्टे सीधे कौर डाल कर वो थाली वैसी की वैसी टेबल पर छोड़ ऊपर चली आयी…
   उसे खाने में कोई स्वाद मिलता तब तो खाना गले से नीचे उतरता। उसका मन इतना दुखी था कि अभी उसे सिर्फ और सिर्फ एक चीज़ पसन्द आ रही थी, और वो था एकांत!
   उसने अपनी नॉवेल का पिछला प्रकाशित भाग निकाला और उसके कवरपेज को देखने लगी। इस कवरपेज को उसके लिए ऋषि ने ही डिज़ाइन किया था।
    कवरपेज पर स्नेह भरा हाथ फेर कर उसने किताब खोल ली….

******

    सुहास समझ गया था कि तांत्रिक अघोरिया का बांधा काला धागा टूटने से ही उसे वापस आत्माएं नज़र आने लगी हैं। और अगर उसे वापस अपनी सामान्य ज़िन्दगी चाहिए तो उसे वापस उस तांत्रिक से मिलना होगा।
   आज ही उसने जॉइन किया था, और इतनी जल्दी उसे छुट्टी मिलनी नही थी। इसलिए उसने यही सोचा कि ऑफ़िस के बाद शाम पांच बजे वो यहाँ से सीधे अपने शहर की ओर निकल जायेगा।
     उस दिन फिर उससे और ज्यादा कुछ काम नही हुआ और शाम होते ही वो वहाँ से निकल गया। उसका घर लगभग यहाँ से डेढ़ सौ किलोमीटर पर था। ठीक ठाक रास्ते पर गाड़ी भगाते हुए वो ढाई से तीन घंटे में जाना और उतने में ही आना कर सकता था।
   यही सोच वो ऑफिस के बाहर की गुमटी में चाय पीकर निकल गया।
    उसके शहर से बाहर की तरफ एक छोटा मोटा सा कस्बा था वहीं अघोरिया तांत्रिक का डेरा था।
  किसी पुराने टूटे फूटे से किले जैसे घर मे उन्होंने अपना डेरा डाल रखा था। मज़े की बात उनका कोई शिष्य या चेला नही था। एक औरत थी,जो उनके तंत्र मंत्र जादू टोने में उनकी मदद किया करती थी। और दो डरावने से अजीब आकृति और पहनावे वाले उनके मददगार थे।
   कैसे कैसे लोग उनके पास मदद मांगने आते थे। उसे भी पहले इस सब पर कहाँ भरोसा था?वो तो अपनी माँ के कहने पर ज़बरदस्ती गया था वहाँ! और जो देखा उसकी आँखे चुंधिया गयी थीं।
    पिछली बार उसके सामने ही एक औरत ने रो रो कर उसकी माँ को अपनी कहानी सुनाई थी। जो न चाहते हुए भी उसके कानों में पड़ ही गयी थी…-” तांत्रिक बाबा की क्या बात बताऊँ बहन जी। मेरा पति तो मुझे लूट गया था। लेकिन बाबा जी के वशीकरण मंत्र से खून की उल्टियां करता वापस आया।
” अच्छा ? वो कैसे?” माँ को भी ये सब जानने में बड़ा रस मिल रहा था।
” शादी के बाद पहले तो सब ठीक था,फिर मेरे दो दो बच्चे हो गए। अब बच्चों और घर गिरस्थि में तो औरत फंस ही जाती है ना बहन जी। अब उसे कोई दूसरी पसन्द आ गयी। रोज़ रोज़ वहीं रुक जाता। पहले मुझे लगा काम ज्यादा होने से घर नही आ पाता, फिर दबी ज़बान में अडोसी पड़ोसी कहने लगे।
   फिर तो हद हो गयी। मेरे गहने जेवर घर से पार होने लगें। तब मुझे इस पर घना शक हुआ और मैंने इसे पूछा तो नीच आदमी सीना ठोंक कर बोलने लगा कि हाँ दे दिए तेरे गहने जिसे देने थे। वैसे भी जिसकी गर्दन पर फबेगा वही तो हार पहनेगी।
   सुन कर ऐसा खून खौला की लगा पास रखी दरांती उठा कर गला रेंत दूँ। लेकिन मैंने खुद पर काबू किया और तांत्रिक बाबा जी के पास चली आयी। इन्होंने मेरी समस्या सुनी और मुझसे कहा उस दूसरी औरत का एक बाल और एक नाखून ले आना, और साथ ही अपने पति का भी।
  ” फिर !” माँ को ज़रा सब्र नही था
“फिर उस औरत के घर गयी मैं। वो जैसे ही बाहर आई मैंने उसे पूछा कि मेरे सुहाग को चुराने वाली तू होती कौन है तो वो भी भड़क गई। मुझसे कहने लगी हमारे रास्ते से हट जा, हमें अपना संसार बसाने दे। और जो मेरा संसार जला बैठी थी वो उसका क्या? मैंने जो उसके बाल नोच कर उसे मारा है ना ज़िन्दगी भर याद रखेगी साली।
  इसी नोचाखसोट में उसका नाखून भी तोड़ लिया। उसका बाल,नाखून और पति का बाल भी साथ ले बाबा जी को दे आयीं। और बस अगली रात खून की उल्टियां करता हुआ वो मेरे दरवाज़े खड़ा था।”
    सुहास को अब भी सब कुछ याद था वो औरत तांत्रिक को कैसे खुश हो कर उस दूसरी औरत की दुर्दशा बता रही थी।
        ” अघोरिया बाबा जगह जगह से उसके सिर के बाल गायब हो गए थे। और चेहरे पर जगह जगह पीले हरे से चकत्ते से उभर आये थे। आंखों में अजीब सूजन हो जाने से वो किसी को ठीक से देख भी नही पा रही थी। उसका वो रूप ही विभत्स हो गया था जिस पर रीझ कर वो मुझे छोड़ गया था।
     उस पर उसका बनाया खाना भी कुछ अजीब सा लगने लगा था। और इसी लिए उसे छोड़ कर वो वापस आ गया।”
     उसके अनुसार उसका पति उलटियां करता हुआ रोता गिड़गिड़ाता वापस आ गया था।

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      सुहास ने अपने माथे को एकदम से झटका और बाहर देखने लगा। वह लगभग बहुत देर से अपनी सोच में गुम गाड़ी चला रहा था लेकिन अब भी वह अपने शहर से काफी दूर था।
    
      आज के इंटरनेट वाले युग में उस जैसा कंप्यूटर इंजीनियर क्यों माइलस्टोन देखकर गाड़ी चला रहा है? उसने अपने ही सर पर अपना हाथ मार लिया और मोबाइल निकाल कर गूगल मैप पर उस कस्बे का नाम ढूंढने लगा। उस ने दिमाग पर बहुत जोर डाला लेकिन उसे उस कस्बे का नाम याद नहीं आ रहा था। वह चाहता तो अभी अपनी मां को फोन करके पूछ सकता था लेकिन फिर उसकी मां उससे सौ सवाल करती और समझ जाती कि उसके गले से काला धागा निकल गया है। और इसलिए उसने खुद ही अपने दिमाग पर और जोर डालने की कोशिश की और उसे नाम याद आ गया ‘कोयलीगढ़’!!
    उसने डेस्टिनेशन में कोयलीगढ़ डाला लेकिन उसे कोई रिज़ल्ट नही मिला। उसने आसपास की बाकी जगहों के नाम से भी तलाश लिया लेकिन उसे कुछ नही मिला।
   उसे समझ नही आ रहा था कि उसके साथ ये हो क्या रहा है? वो पिछले लगभग दो घण्टे से गाड़ी चला रहा था , और गाड़ी लगातार आगे बढ़ रही थी फिर भी उसे ऐसा लग रहा था जैसे पीछे छूटते पेड़ पौधे दुकानें वहीं हैं जिन्हें  वो अभी कुछ देर पहले ही पीछे छोड़ आया था।
    रास्ता सुबह के उसके जिम के ट्रेडमिल जैसा लगने लगा था जिसमें वो भाग तो रहा था लेकिन आगे बढ़ नही पा रहा था कि तभी उसे एक फ्यूल स्टेशन नज़र आया और  उसके चेहरे पर थोड़ी राहत सी वापस आ गयी।
   यही पेट्रोल डलवा कर उन लोगों से उस जगह के बारे में भी पूछ लेगा यही सोच कर उसने गाड़ी स्टेशन की ओर मोड़ ली।

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     सुबह सुबह का वक्त था… जब पुलिस सायरन के साथ तीन चार पुलिस की गाड़ियों का काफिला इंद्रपुरी में दाखिल हुआ।
    छोटी-छोटी आपस में घुसी हुई गलियों में बड़ी मुश्किल से पुलिस की गाड़ियां अंदर तक दाखिल हो पाई।  गलियां इतनी सँकरी थीं की पुलिस की गाड़ियों के गलियों के अंदर जाने के बाद और किन्ही गाड़ियों के अंदर जाने और निकलने के लिए रास्ता नहीं बचा था।
लगभग सारे घर आपस में जुड़े हुए थे जिनकी छते भी जुड़ी हुई थी। यहां तक कि ऊपर इलेक्ट्रिक तारों का भी जाल फैला हुआ था लोग अपने घरों में चढ़ चढ़ कर नीचे झांक रहे थे। पूरा रास्ता लोगों से खचाखच भरा हुआ था। शेखर के पहुंचने से पहले ही जो दो पुलिस वाले वहां पड़ोस में थे वहां पहुंच चुके थे और उन्होंने क्राइम सीन को बाहर से बंद कर दिया था।
     शेखर तेज कदमों से गेट को खोलकर सीढ़ियां चढ़ पर ऊपर पहुंच गया। पुराने तरीके का बना घर था। जिसमें पहली मंजिल पर वह लोग रहा करते थे। निचली मंजिल पर उनके किराएदार थे। जिन्होंने सबसे पहले उनके घर में झांक कर ऐसा मंजर देखा था और पुलिस को फोन किया था।
     शेखर क्राइम सीन पर पहुंचा तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।
    वे सारे लोग एक ऐसे कमरे में मौजूद थे जो ऊपर छत की तरफ खुला हुआ था और उस खुली छत पर लोहे की जाली पड़ी हुई थी। उसी जाली से सात काले रंग के दुपट्टे नीचे लटक रहे थे और उन दुपट्टों से फांसी लगाए वह सारे लोग झूले हुए थे।
   बेहद खौफनाक मंजर था और सबसे अजीब बात यह थी कि उन सारे लोगों के पैर आपस में बंधे हुए थे और दोनों हाथ भी पीछे बंधे थे।
    पहली नजर में देखने पर यह सामूहिक आत्महत्या का मामला लग रहा था लेकिन शेखर उन लोगों को चारों तरफ से देखकर सोच में पड़ गया कि सभी के हाथ और उनके पैर बंधे हुए हैं तो इन लोगों ने खुद को फांसी लगाई तो लगाई कैसे…..

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क्रमशः

aparna….
    
   
   

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Kavita
Kavita
1 year ago

Kya..aparna ji, achche se dra rhi hain

Raj Kumar
Raj Kumar
2 years ago

Nice part ❣️💕❣️💕