जीवनसाथी -3 भाग -73

यह इस राज परिवार का नियम है कि नौकर का बच्चा राजशाही का हिस्सा कभी नहीं बन सकता! और अगर उस नौकर की लड़की से हर्षवर्धन की शादी हुई तो हर्षवर्धन को महल से निकाल दिया जाएगा..
यानी हर्षवर्धन को महल छोड़ना होगा !!”
बुआ जी की यह बात सुनकर बांसुरी चौंक कर खड़ी हो गई…
“फुफु साहब ये कैसी बात कर रही आप ? क्या ऐसा भी कोई नियम है ?”
“हाँ बांसुरी.. और ये नियम ज़रूरी है.. पहले राजघरानो में गद्दी में बैठने के लिए जाने कितने षड्यंत्र रचे जाते थे .. गद्दी के लालच में लोग दासियों के द्वारा राजा को कुछ दूषीविष खिला कर अपने प्रभाव में लेकर मनचाहा कार्य करवा लेती थी..
और फिर वो दासियाँ महारानी बन राजगद्दी में आ बैठती थी.. और फिर अपने सगे सम्बन्धियों को भी ला बैठाती थी..
पहले के राजे महाराजे भी तो अजीब होते थे, उन्हेँ बुद्धू बना लेना बड़ा आसान होता था, बस इसीलिए ये सब नियम बनाये गए..
अब मानना चाहो तो मानो, ना मानना चाहो तो कोई क्या कर सकता है… !”
“नहीं फुफु साहब बात वो नहीं है.. मुझे इन बातों की जानकारी नहीं थी..।
लेकिन यह तो वही बात हुई कि पहले के जमाने में अगर लोग षड्यंत्र करते थे तो हम अपने आसपास हर किसी को अविश्वास की नजरों से देखने लग जाए।
पहले की बात और थी। अब तो टेक्नोलॉजी ही इतनी आगे बढ़ चुकी है कि अगर कोई विश्वासघाती है तो हमें समय रहते पता चल जाता है। ऐसे में पुरानी रूढ़ियों को सिर्फ इसलिए कि वह हमारे पूर्वजों ने बनाई है बिना किसी लॉजिक के फॉलो तो नहीं किया जा सकता ना..!”
बांसुरी की यह बात फुफु साहब को पसंद नहीं आई..
और इसलिए बांसुरी की इस बात को सुनने के बाद उन्होंने अपना ब्रह्मास्त्र प्रयोग किया और उठकर अपना आखिरी वाक्य बोलकर वहां से चलती बनी..
” अब तुम सब आजकल के जमाने की लड़कियां हो, हम पुराने जमाने की ठहरी। हमारी बातें ना आप लोगों को समझ में आती हैं, और ना पसंद आती है। इसलिए जो भी करना है आप लोग करिए।
वैसे भी हर्षवर्धन रूपा का बेटा है। रूपा और युवराज के निर्णय पर तो हम भी उंगली उठाने वाले कौन होते हैं? उम्र में भले ही बड़े हैं लेकिन पद और ओहदे में तो तुम सबसे कम ही है।
वैसे भी हम घर की बेटी हैं। वह भी परित्यक्ता।
कहते हैं ना मायके में शादीशुदा बेटी की और ससुराल में दामाद की चार दिन के बाद इज्जत कम हो ही जाती है। बस वैसा ही कुछ हाल है…।”
अपने मन की भड़ास निकाल कर बुआ जी उठी और वहां से चल गई। उनके पीछे उनकी बहू जया भी उन्हें मनाने के लिए उनके पीछे-पीछे उन्हें आवाज देती हुई चलती बनी। अब वहां रेखा बांसुरी और रूपा ही रह गए थे ।
रूपा ने बांसुरी की तरफ देखा, वह कहना तो बहुत कुछ चाहती थी लेकिन पता नहीं क्यों उसका मन बैठ जा रहा था ।
उसके बेटे का अभी-अभी एक बहुत अच्छे खानदान से रिश्ता होते-होते टूट गया था, और उस पर अब बांसुरी निरमा की बेटी से हर्षवर्धन के रिश्ते की बात कह रही थी, जो उसे बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी।
लेकिन एक बार में बांसुरी की बात भी वह काट नहीं सकती थी। उसका मन कसैला होकर रह गया था..।
“बांसुरी!! तुम फूफु साहब का अतीत जानती हो ना, उन्होंने बहुत कष्ट झेले हैं, अपने ससुराल में।
उन्हें शुरू से बहुत प्रताड़ित किया गया। जबकि पिता साहब ने अपनी बहन यानी उन्हें बहुत सारा दान दहेज देकर विदा किया था। बावजूद ससुराल में उनके सांवले रंग के लिए उन्हें कभी माफ नहीं किया गया और बात-बात पर प्रताड़ित किया गया।
उनके पति का भी यही हाल था। पहले जब ससुराल में जमी नहीं तब फूफु साहब और फूफा साहब दोनों ही अपने दोनों लड़कों को लेकर यहां चले आए थे। लेकिन कुछ साल यहां रहने के बाद फूफा साहब और फूफु साहब दोनों के झगड़े इतने बढ़ने लगे कि वह अपने छोटे बेटे विजय को लेकर इनसे अलग होकर वापस अपने घर चले गए ।
तब से ना उन्होंने फूफु साहब को बुलाया और ना ही यह वापस गई।
इसीलिए बेचारी मन में ले लेती हैं हर बात को..।”
” मैं यह सब जानती हूं भाभी साहब, लेकिन जो बात सही है उसे बिना कहे सिर्फ यह सोचकर चुप कैसे रह जाऊं..
सिर्फ इसलिए कि फूफु साहब की जिंदगी में बहुत कष्ट थे, उन्होंने बहुत सारी परेशानियां देखी हैं, उनकी हर नाजायज बात को सही तो नहीं ठहराया जा सकता ।
और सिर्फ यह सोचकर की मेरे साहब मेरे साथ है, और उनके साहब ने उन्हें तलाक दे दिया उनकी बात काटने से खुद को रोक लूं, उन पर तरस खाकर उनकी हर गलत बात को मैं सही नहीं मान सकती…।”
“वो पुराने जमाने की है। लकीर की फकीर है, उनकी बातों को काटने से या उन्हें उनकी गलती समझाने से कोई फायदा नहीं है..।”
“यह बात मै समझती हूं, मुझे उनकी बात नहीं काटनी चाहिए थी, लेकिन आप लोग तो मेरी बात समझ सकते हैं ना कि मैं क्या कहना चाह रही हूं।
बस इतना कहना चाहती हूं भाभी साहब कि एक बार हर्षवर्धन से पूछ कर देखिए।
अगर उसके मन में मीठी के लिए कुछ नहीं है तो फिर मैं आप पर बिल्कुल भी दबाव नहीं डालूंगी..।”
बांसुरी की इस बात का जवाब अबकी बार रेखा ने दिया…
“लेकिन अगर हर्षवर्धन के मन में मीठी के लिए कुछ हुआ तो क्या जीजा सा मान जाएंगी..?”
रेखा ने रूपा की तरफ देखा और रूपा चिंतित आँखों से दूर कुछ देखती सोच में पड़ गयी…
रेखा की इस बात को सुन और उस पर रूपा के चेहरे के भाव देख बांसुरी भी सोच में डूब गयी..
उसके मन में बुआ जी की कही बात बार बार चक्कर लगा रही थी, कि एक बार को मीठी अगर प्रेम नहीं प्रताप कि बेटी होती तो फिर भी मीठी और हर्षवर्धन के बारे में सोचा जा सकता था लेकिन मीठी प्रेम की बेटी है, जो असल में इस महल का सेवक है… राजा साहब कितना भी उसे दोस्त मान ले, उनके मानने भर से कुछ नहीं हो जाता..
मीठी प्रताप की बेटी होती तो हर्ष और मीठी का रास्ता आसान हो जाता.. और मीठी तो वाकई प्रताप की बेटी है..
बांसुरी की ज़बान पर ये बात आते आते रह गयी..
उसने खुद को रोक लिया, उसे लगा एक बार उसे निरमा से बात करनी चाहिए उसी के बाद इस बारे में आगे विचार करना चाहिए..
****
हर्षवर्धन मीठी को छोड़ने उसके घर गया था।
उस वक्त मीठी के घर पर निरमा नहीं थी। दोनों साथ-साथ खड़े थे। दोनों को ही कुछ सूझ नहीं रहा था।
पहले बात बात पर मीठी को छेड़ते रहने वाले हर्षवर्धन को अब मीठी से बात करने के लिए भी शब्द नहीं समझ रहे थे।
दोनों मुस्कुराते हुए बस एक दूसरे को देख रहे थे कि तभी अम्मा बाहर चली आई..
“बिटिया यहां काहे खड़ी हो? अंदर आ जाओ दोनों।
चाय बना ले..?”
उन्होंने पूछा..
“ले आइये.. !”
“नहीं मीठी.. अब मैं वापस निकलूंगा, एक बार मां साहब से मिलकर तुम्हारे बारे में बात कर लूं!
क्योंकि धनुष कह रहा था कि हमें कल ही वापस लौटना होगा..!”
“एक बात पूछना चाहती थी?”
” हां पूछो !”
“अगर रानी मां ने मना कर दिया तो ?”
इस बारे में हर्ष ने अब तक सोचा ही नहीं था, वह थोड़ी देर के लिए मीठी को देखता रह गया….
“ऐसा संभव ही नहीं है मीठी कि मैं किसी बात को कहूं और मां साहब मना कर दें। बचपन से हर छोटी-मोटी बात मानती आई है, तो आज कैसे मना कर देंगे?”
” बच्चों की छोटी-मोटी ख्वाहिशों को पूरी करना माता-पिता के लिए एक अलग ही खुशी की बात होती है, लेकिन अपना हमसफर खुद चुनकर अपने माता-पिता को बताना कभी भी उन्हें खुशी नहीं बल्कि दुख देता है..।”
” तुम तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें करना सीख गई हो।”
” बचपन से ही करती आई हूं। मुझ में यह गुण मेरी मां से आया है….।
और एक बात कहना चाहती हूँ हर्ष..।”
“बोलो ना ।”
“मुझे नहीं लगता की मेरी मॉम भी जल्दी तैयार हो पाएंगी.. ।”
“क्यों.. क्या मैं उन्हेँ इतना नापसंद हूँ.. ?”
“अरे नहीं… तुम तो ऐसे हो कि हर विवाह योग्य कन्या के माता पिता तुम जैसे लड़के की चाह रखते हैं..।
लेकिन तुम मेरे लिए वो चाँद हो, जिसे मैं अपनी अटारी पर खड़ी होकर सिर्फ ताक सकती हूँ.. पा नहीं सकती.. !
और ये बात मैं भले ही ना मानुं,लेकिन मेरी मॉम इस बात को जानती और मानती भी है कि तुम्हारे साथ मेरे रिश्ते के लिए कभी महल में हाँ नहीं होगी.. ।”
“बावरी लड़की.. ऐसा कुछ नहीं है.. तुम्हे महल में हर कोई बहुत पसंद करता है.. ।”
“पसंद करना और अपने बेटे की शादी कर देना दो अलग बातें हैं..।
बेशक मैं रानी माँ को अच्छी लगती होंगी, पर तुम्हारे सामने मेरी कोई औकात नहीं है,हर्ष.. ।”
इतना कहते कहते मीठी की आँख में आंसू आ गए.. और हर्ष ने तड़प कर उसे अपने सीने से लगा लिया..
“मैं कैसे बताऊँ हर्ष.. कि मैं क्या सोच रही.. !”
अटक अटक कर जैसे तैसे मीठी ने कहा..
“कुछ मत कहो.. कभी-कभी जब दिल में बहुत कुछ भरा होता है, और हम सामने वाले को सब कुछ बता देना चाहते हैं। तब इस वक्त हमारे सारे शब्द खो जाते हैं। और एक खामोशी पसर जाती है दो दिलों के बीच। और वही खामोशी उन दो लोगों को जोड़ देती है, बिना कहे एक दूसरे को सब कुछ समझा देती है ।
हर्ष ने अपनी दोनों हथेलियों में मीठी का चेहरा थामा और अपनी तरफ उठाया।
मीठी से लंबा था हर्ष, काफी लंबा।
धीरे से वह मीठी के होठों की तरफ झुकने लगा।
मीठी के होंठ कांप रहे थे। उसकी पलकें बार-बार हर्ष को देखते हुए झपक रही थी। दिल की धड़कनें बढी हुई थी।
दोनों एक दूसरे की खुशबू महसूस कर रहे थे।
हर्ष की तपती उंगलियां मीठी को अपने गालों पर महसूस हो रही थी..।
वो धीमे से उसके होंठो को छूने जा रहा था कि तभी कमरे के दरवाज़े को ठेल कर निरमा अंदर दाखिल हो गयी..।
अपनी आँखों के सामने मीठी और हर्ष को देख निरमा एकदम से कुछ सोच ही नहीं पायी और उसे ऐसे सामने देख हर्ष ने हड़बड़ा कर मीठी को छोड़ दिया..
क्रमशः
aparna..

मैं बांसुरी के साथ हूं, बुआ जी को दुख है इसका मतलब यह नहीं कि वह कह दे आम के पेड़ पर लीची का फल आ रहा है, दुःख में साथ देना उनको सहयोग करना संबल प्रदान करना फर्ज़ है सबका ना कि अनाप शनाप बातों को मान लेना, उनकी गलतियों पर पर्दा डालना। उनकी हर बात को मानने से पहले सोचना चाहिए। रूपा के कान खड़ी कर वह चली गई। वह तो अपनी हिरोइन का मन साफ़ है उसने एक रास्ता ढूंढा मीठी प्रताप की बेटी है, पर शादी से पहले, बुआ जी इसको भी अपनी खुशी के लिए कहीं कान भर कर टोक ना लगा दे और सब उनकी मान कर चुपचाप ना बैठ जाए, यह भी पार करना होगा बांसुरी को
लेकिन निरमा को नहीं आना चाहिए था क्यूं आई है बीच में पढूंगा अंतराल के बाद, नाईस पार्ट दीदी…💐🙏
कमाल, धमाल, लाजबाब भाग 👌👌👌👌👌।मतलब नेहा ज़िंदा है 😊और कभी ना कभी कली अपनी माँ तक पहुंच ही जाएगी, ऐसा लग रहा नेहा महसूस करेगी अपनी बच्ची की मजूदगी और हवा के झोंके के साथ…. मुझे सांस आयी, मुझे सांस आयी… ये फ़िल्मी ड्रामा था 😄।थोड़ी सी सही कुछ तो खबर मिली नेहा की, साँसे है तो ठीक भी जल्दी ही हो जाएगी, बस इंतज़ार है उस दिन का ज़ब, वासुकी का पूरा परिवार भी साथ होग़ा।
ये कैसे मोड़ पर आ गयी कहानी… हर्ष और मीठी के लिए इतनी मुश्किले, पर ये प्रताप वाला मसला ना उठे तो ही ठीक है,,,सबकी ज़िन्दगी का रुख बदल जाएगा, निरमा, मीठी, प्रेम.. अरे सोचकर ही बुरा लग रहा 😔पर आप पर पूरा भरोषा है मुझे सब अच्छा ही होग़ा 😊😘।
बांसुरी के लिए कितना मुश्किल हो रहा इन रॉयल लेडिस क़ो समझाना सच में समझोते शायद मिडिल क्लास…लड़कियां ही कर सकती है।
अब क्या होग़ा 🤔कितनी काँटों भरी है ये प्यार की राहें….।
इंतज़ार अगले भाग का 🙏🏻।
👏👏👍