जीवनसाथी -3 भाग -31

जीवनसाथी -3, भाग -31

“इस लड़के ने डर के मारे मेरी कलाई इतने ज़ोर से दबाई की उँगलियाँ उभर आयी हैं…. !” मुहं बनाती हुई नर्स वहाँ से चली गयी…
कली ने शौर्य को घूर कर देखा और उसे साथ चलने का इशारा कर आगे बढ़ गयी…

सब करवाने के बाद कली उसे साथ लेकर अपने फ्लैट की तरफ बढ़ गई….

शौर्य उन लड़को से मिलने के बाद से ज़रा बुझा बुझा सा हो गया था.. इस बात पर कली का ध्यान गया लेकिन उसने जान बुझ कर शौर्य से कुछ नहीं पूछा..

दोनों फ्लैट पर वापस चले आये..

“क्या खाओगे.. ? आज तुम्हारी पसंद का डिनर बनेगा !”
. कली वापस चहकने लगी शौर्य ने बुझे मन से उसकी तरफ देखा और फिर अचानक कुछ सोच कर कली की तरफ देखने लगा..

” पूछ तो ऐसे रही हो, जैसे जाने कहां की मास्टरशेफ हो? वैसे अगर मैं कहूं मुझे पैवलोवा खाना है तो बना लोगी.. ?”

शौर्य इस इंटरनेशनल डिश का नाम लेते समय पल भर को ये बात भूल कर रह गया कि कली लंदन की रहने वाली है..

“वो तो डेजर्ट हुआ.. क्या सिर्फ स्वीट डिश से पेट भरना है ?”

“नहीं पेट तो खाने से ही भरना है, लेकिन तुम्हे बनाना तो कुछ आता नहीं !”

“तो क्या हुआ.. ? ऑर्डर करना तो आता है !”

कली के चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान आ गयी…

ना में गर्दन हिला कर मुस्कुराते हुए शौर्य नीचे देखने लगा..

“अपने हिसाब से मंगवा लो कुछ भी !”  इतना कह कर वो हाथ मुहं धोने चला गया..

वो नहा कर नाइट सूट में ही बाहर आया.. उतनी देर में कली बाहर हॉल से गायब हो चुकी थी..
वो बाहर आ कर बैठ गया..

उसे रसोई से कुछ उठापटक की आवाज़े आ रही थी… सोफे पर पीछे सर टिकाये उसे थकान से नींद सी लग गयी..

******

एक बड़े से अँधेरे कॉरिडोर में तेज़ कदमो से वो चला जा रहा था….
ऐसा लग रहा था उसे किसी बात की जल्दबाज़ी थी..
वो इस वक्त अपनी केमिस्ट्री लैब से निकल कर वाशरूम की तरफ बढ़ रहा था…
लैब में तयशुदा वक्त ही अपने-अपने काउंटर पर सभी विद्यार्थियों को मिलता था। उसके पास भी सिर्फ 40 मिनट थे, अपने प्रैक्टिकल को पूरा करने के लिए। लेकिन इसी बीच उसे वॉशरूम जाने की जरूरत पड़ गई, और वहां बैठे अपने टीचर से अनुमति लेकर वह वॉशरूम की तरफ तेजी से बढ़ गया।

बॉयज कॉमन रूम के सामने वह पहुंचा ही था कि अंदर से किन्हीं दो लोगों के बात करने और हंसने की आवाज आने लगी। उसने कॉमन रूम का दरवाजा खोला और अंदर दाखिल हो गया। अंदर लाइन से पांच वॉश बेसिन थे और उनके सामने अलग-अलग टॉयलेट थे। उनमें से एक टॉयलेट में कोई अंदर मौजूद था..
अंदर जो भी था, वह अकेला नहीं था। उसके साथ कोई और भी था,लेकिन दरवाजा खुलने की आहट उन अंदर मौजूद लोगों तक भी पहुंच गई और उनमें से एक ने कड़क कर पूछ लिया…

“कौन है बाहर ?”

“मैं.. मैं हूँ.. शौर्य प्रताप !”

इसके बाद सब कुछ गड्डमड्ड सा हो गया.. धुंधला धुंधला सा वह अंधियारा कोना जहां शौर्य प्रताप गिरा हुआ था। और उसकी आंखें खुलने पर सामने उसके हाईस्कूल टीचर और प्रिंसिपल का यूँ उसे घूरते हुए खड़े पाए जाना  ..
वह आंखें फाड़े उन सब को देख कर समझने की कोशिश कर रहा था कि हुआ क्या है? और तभी किसी लड़की ने उस पर काली स्याही फेंक दी। उसने अपने आप को बचाने की कोशिश में पूछना चाहा लेकिन हर तरफ से आरोप प्रत्यारोप की बाढ़ सी आ गयी..

एक बार फिर सब कुछ गड्ड-मड्ड हो गया। कुछ देर बाद ही पुलिस अधिकारियों के सामने खड़ा शौर्य अपने आप को बेगुनाह बताने की कोशिश कर रहा था। लेकिन उसकी बेगुनाही सुनने और समझने वाला वहां कोई नहीं था। और एक बार फिर उसे ले जाकर कंधेरे कोने में धकेल दिया गया..

लेकिन तभी उसके बालों पर उसने एक मीठा मुलायम स्पर्श महसूस किया..।
ऐसा लगा जैसे उसकी माँ उसके बाल सहला गयी। लेकिन तभी दूसरे ही पल कुछ तेज तेज बूट्स  की आवाज आने लगी..
और एक जल्लाद सा आदमी उस तक पहुंच गया। उस अंधियारे सुनसान कमरे में उस आदमी की शक्ल भी ठीक से नजर नहीं आ रही थी।
आंसू से धुंधली आंखों को पोंछ कर उसने देखने की कोशिश की, लेकिन वो जब तक देख पाता, उसकी पीठ पर एक जोर का कोड़ा पड़ा और वह खुद पर हो रहे इस अत्याचार से कलप कर रह गया…

****

आज बहुत दिन बाद शौर्य को यह भयानक  सपना नजर आया था यह वही सपना था, जो उसे किसी वक्त बहुत ज्यादा परेशान किया करता था। लेकिन धीरे-धीरे अपनी माँ की मदद से उसने अपने इस सपने पर विजय हासिल कर ली थी। लेकिन आज उन लड़कों के मुंह से ऑस्ट्रेलिया सुनकर एक बार फिर यह सपना उस पर हावी हो गया था, और उसकी अधकच्ची नींद में उसे वापस दिखने लगा था।

वह अपने चेहरे को इधर से उधर घूमाते हुए इन सब से बचने की कोशिश कर रहा था। उसका पूरा चेहरा पसीने से भीग चुका था और फिर वह अचानक अपने हाथों से किसी को धक्का देते हुए सोफे पर चौंक पर उठ बैठा।

      उसकी आंखें खुल गई और आंखें खुलते ही सामने कली को खड़ा देख उसे समझ में आया कि वह ऑस्ट्रेलिया के उसे स्कूल में नहीं बल्कि दिल्ली के इस फ्लैट में है।

कली आश्चर्य से आंखें फ़ाड़े पिछले 5 मिनट से शौर्य को देख रही थी।
उसका आर्डर किया हुआ खाना आ चुका था और वह रसोई में उस खाने को परोस रही थी, और इसी बीच शौर्य नहा कर आने के बाद सोफे पर ही सो गया था। मुश्किल से 5-7 मिनट बीते होंगे की कली को कुछ अजीबोगरीब आवाज़ सुनाई देने लगी। वह बाहर निकली और उसने देखा कि शौर्य नींद में कुछ बड़बड़ा रहा है। वह उसके सामने खड़ी उसे समझने की कोशिश करती रही, लेकिन शौर्य इतना अस्पष्ट बोल रहा था कि कली को उसका एक शब्द भी पल्ले नहीं पड़ रहा था। हालांकि कली को इतना समझ में आ गया था कि शौर्य कुछ बहुत बुरा सपना देख रहा है। और जिसके कारण वह बहुत ज्यादा परेशान है। कली ने धीमे से उसके बालों पर हाथ फेरना शुरू किया, और उसके कुछ पलों बाद ही शौर्य ने चौंक कर आंखें खोल दी…

कली के सामने वो झेंप गया..
कली इस बात को समझ गयी इसलिए उसने बहुत नरमी से अपनी बात रख दी..

“क्या हुआ ? कोई भयानक सपना देखा क्या ?”

शौर्य ने बिना कुछ कहे बस हाँ में गर्दन हिला दी..

“चलो कोई नहीं.. कभी कभी मुझे भी भयानक दौरे पड़ते हैं.. खाना परोसूं ?”

कली ने धीरे से पूछा और शौर्य ने हामी भर दी..

कली उन दोनों का खाना लेकर बाहर चली आयी..
इतनी देर में शौर्य भी सामान्य होने की कोशिश करने लगा था…

*****

महल में आज उल्लास का माहौल था..
रानी रूपा की सखी अपने पति और बेटी के साथ महल पधार रही थी…

बहुत साल पहले रूपा और गीता दोनों सहेलियां साथ साथ पढ़ा करती थी.. गीता के पिता का व्यापार बहुत फैला हुआ विस्तृत था.. और अपने कारोबार को विदेशो में फ़ैलाने के उद्देश्य से अक्सर उनके विदेश के दौरे होते रहते थे। जब उनके दौरे कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगे तब गीता की मां ने इस बात पर आपत्ति की और एक समय ऐसा आया कि अपने कारोबार को पूरी तरह से विदेश में स्थापित करने के उद्देश्य से गीता के पिता अपने सारे परिवार को एक साथ लेकर वहां से विदेश चले गए।

गीता का पूरा परिवार वहां से चला गया लेकिन गीता और रूपा की दोस्ती नहीं टूटी। समय के साथ दोनों का ही विवाह हो गया..

    अनंतरूपा राजा युवराज की धर्मपत्नी बनकर विजयराघवगढ़ के महल में चली आई, वहीं गीता की शादी कनाडा के एक बहुत बड़े व्यवसायी से हो गई..
और उसने अपना घऱ संसार वहाँ बसा लिया..

लेकिन इतने सालों और ज़िम्मेदारियों के बावजूद दोनों सखियों का स्नेह का धागा टूटने की जगह और मजबूत होता चला गया…

और फिर एक दिन बातों ही बातों में दोनों ने अपने बच्चों का भविष्य भी एक साथ देखना शुरू कर दिया..

गीता की बेटी प्रियदर्शिनी और रूपा का बेटा हर्षवर्धन!!

गीता इसके पहले जब भी भारत आयी थी, रूपा से मिले बिना नहीं गयी थी, लेकिन उसे भारत आये ही कई साल बीत चुके थे..

अब वो लगभग सात आठ साल बीतने के बाद आयी थी, और अपने गृह ग्राम में ठहरी हुई थी..

आज उसका और उसके पतिदेव का रूपा से मिलने के लिए महल में आना तय था.. और रूपा उससे धीरे से प्रियदर्शिनी को भी साथ लेते आने की गुज़ारिश कर रही थी..
गीता के ससुराल पक्ष में किसी विवाह में सम्मिलित होने ही वो आयी थी, और उसी कार्यक्रम से कुछ घंटो का समय निकाल कर वो रूपा से मिलने जा रही थी..
प्रियदर्शिनी को अपनी बुआ की बेटी के साथ शॉपिंग करना था लेकिन उसकी माँ उसे साथ चलने की ज़िद कर रही थी..

आखिर माँ बेटी की इस जंग में माँ की हार हुई, प्रियदर्शिनी के पिता ने उसका पक्ष लेते हुए उसे शॉपिंग पर भेज दिया और खुद अपनी रूठी पत्नी को साथ लिए महल की ओर निकल गए…
पत्नी को मनाने के लिए उन्होंने खुद ही ड्राइविंग सीट संभाल ली और ड्राइवर को भी साथ नहीं लिया….

वो लोग सफर में निकल पड़े, और इधर प्रियदर्शिनी भी अपनी बहन के साथ निकल गयी…

महल उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था.. रूपा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था..

लेकिन बांसुरी का मन जाने क्यों अशांत हुआ जा रहा था..

इधर कुछ दिनों से उसका मन शांत नहीं रह पा रहा था.. जबसे शौर्य के अकाउंट सीज़ कर दिए गए थे, तब से बांसुरी का हाल बेहाल था.. रह रह कर उसे लगता कहीं शौर्य को किसी चीज़ की ज़रूरत हुई तो वो क्या करेगा…
उसके बारे में सोच सोच कर बांसुरी का खाना पीना छूट गया था.. उसे ठीक से नींद नहीं आ रही थी..।

और इस सब के बीच अचानक इन मेहमानो का आना उसकी समझ से बाहर था..

प्रियदर्शिनी में कहीं से कोई कमी नजर नहीं आ रही थी…

लेकिन उसके सुंदर मुखड़े के पीछे से झांकता एक और सलोना सा चेहरा उसे नजर आने लगता और उसका दिल दुखी हुआ जा रहा था.. जाने क्यों वो रह रह कर हर्षवर्धन के साथ मीठी को ही खड़ा पाती थी और हर्ष के समानांतर खड़ी कोई भी और लड़की उसका हृदय द्रवित कर दे रही थी…

कुछ ही देर में एकदम से भगदड़ सी मच गयी महल में, और दीवानखाने में महल की महिलाओं के साथ बैठी बांसुरी भी मेहमानों के स्वागत के लिए आगे बढ़ गयी….

गीता और उसके पति भार्गव सिंह तोमर से मिल कर उन सभी को अच्छा लगा..

जितने ही बड़े लोग थे उतना ही विनम्र उनका स्वभाव था, सही भी तो है.. बड़े बुज़ुर्ग भी कहते हैं फलों से लदा वृक्ष सदैव झुका रहता है..
ऊँचे तने पेड़ अपनी अकड़ में कितना घमंड कर ले, पर ना उन से छाया मिलती और ना फल..

वैसा ही कुछ तोमर परिवार से पहली मुलाकात में मिल कर लगा..
और कुछ ऐसे ही भाव तोमर परिवार के भी थे..

उन्हें भी राजमहल वासियों से मिल कर यही महसूस हो रहा था कि वो किन्ही अपने रिश्तेदारों से ही मिल रहे हैं..

ना बिना बात का दिखावा ना किसी प्रकार का बड़बोलापन..

हाँ रॉयल तो वो सारे ही लोग थे तो, ये बात तो उनके हर अंदाज़ में झलक उठती थी। लेकिन इतने सब में भी घमंड का लवलेश मात्र नहीं था…

खाना पीना सम्पन्न होने के साथ ही युवराज सा, भार्गव जी को साथ लिए अपनी रियासत घुमाने निकल गए.. और गीता औरतो के साथ आ बैठीं..

बातों के दौर शुरू हुए और बातों ही बातों में रूपा और गीता ने अपने मन की बात कह दी..

दीवानखाने में लगी हर्ष की आदमकद तस्वीर को वैसे भी गीता बड़े मोह से देख रही थी.. ।
उसी समय बांसुरी के साथ साथ बाक़ी महिलाओं को भी समझ आ गया था की गीता और भार्गव जी की आँखों में हर्ष चढ़ गया है।
वैसे भी हर्ष में ऐसी कोई बात नहीं थी जो किसी को पसंद नहीं आता..

गीता ने बातों ही बातों में अपनी बेटी की तस्वीरो का पुलिंदा भी खोल दिया..
प्रियदर्शिनी सिर्फ नाम की नहीं बल्कि असल की भी प्रियदर्शिनी थी…
यथा नाम तथा रूप..।

वहां बैठी हर एक महिला को वो लड़की भा गयी थी, बस जाने क्यों बांसुरी ही खुले मन से उसे स्वीकार नहीं पा रही थी…

रूपा की ख़ुशी का ठिकाना ना था.. मन ही मन उसने हर्ष और प्रियदर्शिनी के सात फेरे भी देख लिए थे..।

दोनों परिवारों के इस मिलन समारोह में महल से बस राजा साहब ही अनुपस्थित थे.. वो अपने किसी काम से समर के साथ कहीं बाहर गए हुए थे..
वो रहते तो शायद उनसे अपने मन की व्यथा कह कर बांसुरी अपना दिल हल्का कर पाती, लेकिन उनके ना रहने से वो थोड़ा और बुझी सी थी..

पूरा दिन ही वहां मौजूद सभी के लिए बहुत अच्छा बीता और तोमर परिवार के वहाँ से जाने के पहले युवराज सा और भार्गव जी के बीच हर्ष और प्रियदर्शिनी की बात पक्की हो गयी…

रूपा और गीता ख़ुशी से एक दूजे के गले से लग गयी.. आज दो सखियों का रिश्ता रिश्तेदारी में बदल गया था… इस सब के पहले बांसुरी ने एक बार धीमे शब्दों में रूपा से कहना भी चाहा कि एक बार बच्चो से भी पूछ लेना चाहिए, लेकिन रूपा को पूरा विश्वास था कि उसका हर्ष कभी उसके खिलाफ नहीं जा सकता..
और शायद इसी आत्मविश्वास में रूपा से भारी चूक हो गयी…..

क्रमशः

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Abhishek Kishor
Abhishek Kishor
1 year ago

रानी बांसुरी का मन नहीं मान रहा है पर रूपा का दिल पहले अपनी दोस्त पर था अब उसकी बेटी पर वह जल्दी से जल्दी अपने बेटे का विवाह करना चाहती है, कर ही देना चाहिए, अगर प्यार करता है वह मीठी से जो की नहीं करता है तब शायद उसके लिए इजी गोइंग होगा पर जो होगा वह पढ़ने में रोचक होगा, यह भाग पढ़कर अच्छा लगा दी….💐👍🙏

Manu verma
Manu verma
2 years ago

बहुत सुन्दर भाग 👌🏻👌🏻👌🏻
शौर्य ने जो सपना देखा क्या वो सपना ही था या उसके साथ कुछ गलत हुआ था 🤔।
हर्ष और मीठी की जोड़ी मुझे भी अच्छी लगती है पर… यहाँ तो कोई ओर आ रही है 😟। अब क्या होगा 🤔🤔।
बेहद खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻