जीवनसाथी -3 भाग -17

जीवनसाथी -3 भाग -17

जीवनसाथी by aparna

   सुबह हो चुकी थी, लेकिन शौर्य अब भी सोया पड़ा था..
लंदन से आये दो दिन बीत गए थे, लेकिन उसकी थकान उतरने का नाम नहीं लें रहीं थी, या जाने क्या था उसका कहीं बाहर जाने का मन ही नहीं कर रहा था..

उसकी चौकड़ी उसे दो बार बोल चुकी थी लेकिन वो बस सारा सारा दिन महल में पड़ा हुआ बिता दे रहा था..

*****

हर्ष ने अपना व्यापार देश की राजधानी में जमाया हुआ था… और इसलिए उसने वहाँ भी एक फ्लैट लेकर छोड़ा हुआ था।
हालाँकि उसका हेड ऑफ़िस अब भी राजपरिवार की रियासत में ही था… इसलिए अब तक महल में ही रहते हुए काम चल रहा था, पर महीने के दस बारह दिन उसे दिल्ली जाना ही पड़ जाता था..

अब तक व्यापार उसके पिता देखा करते थे, लेकिन अब उसने अपने काम को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलवा दी थी। और इसी सब में उसका काम ख़ूब फ़ैल गया था..
बाकी सारे राज्यों में उनका काम देखने के लिए लोग थे। उसकी टीम थी, और उन सब को वो रियासत में बैठा बैठा भी मैनेज कर लेता था।
    लेकिन अब विदेशी क्लाइंट्स का आना इतना बढ़ गया था की उन्हें बार बार रियासत तक लाने ले जाने से बेहतर हर्ष ने खुद दिल्ली शिफ्ट हो जाना समझा था..।

धनुष और यश का हर्ष के साथ जाना तय ही था..
बिना धनुष के हर्ष कहीं अपनी कलम नहीं चलाता था, यहाँ तक की अब हर्ष को धनुष की इतनी आदत हो गयी थी कि उसके बिना उसके हलक से कॉफ़ी का घूंट भी नीचे नहीं जाता था….

हर्ष ने शौर्य को भी साथ लें लिया था..।

लेकिन इस सब में मीठी को दिल्ली जाकर रहने की इजाज़त नहीं मिल पायी थी…।

पिछले दो दिन से वो निरमा के पीछे पीछे घूम कर उसे मनाने की कोशिश कर रहीं थी, लेकिन निरमा ने जैसे उसे हाँ, ना बोलने की कसम खा ली थी….

मीठी का दिल्ली जाने का खासा मन था, एक तो उसके साथ कॉलेज में पढ़ी उसकी सबसे खास दोस्त रूही दिल्ली में परास्नातक की पढाई कर रहीं थी, सो दिल्ली जाने से मीठी अपनी उस सखी से मिल सकती थी। दूसरा मीठी अपने कैरियर को भी ऐसे आधे में नहीं छोड़ देना चाहती थी..।

उसका सोचना था, अगर अपने दोस्तों के साथ ही काम करते हुए अपने कैरियर को भी बनाया जा सकता है तो इसमें बुराई क्या है ?
लेकिन अपने समय में कैरियर पर ज़बरदस्त ध्यान देने वाली निरमा जाने क्यूँ लेकिन मीठी को भेजने को तैयार नहीं थी….।

अपनी माँ को मनाने इसलिए आज उसने अपनी बंसी मासी को बुलाया था..।
बाँसुरी ही उसकी आखिरी उम्मीद की किरण थी..

शाम के समय अपना काम निपटा कर निरमा यूनिवर्सिटी से घर लौटी और ड्राइवर को गाड़ी पार्किंग में डालने बोल अंदर की तरफ बढ़ने लगी..

तभी उसका ध्यान बगीचे पर चला गया..
निरमा को बागवानी का भी ज़बरदस्त शौक था, और उसने अपने बगीचे को अपने हाथों से सजाया था..

कहीं छोटा सा पत्थरो का निरमा के हाथ का बना झरना अपनी मधुर स्वर लहरी हवाओं में घोल रहा था। कहीं एक तरफ पौधों की छांव में बैठी बुद्ध की शांत मूर्ति देखने वाले को एक सौम्य शांति प्रदान कर रहीं थी…।
जिसके बाजू में टिमटिमाता इलेक्ट्रीक दीपक अलग ही छँटा बिखेर रहा था..
जहाँ निरमा को बागवानी का शौक था, वहीँ प्रेम को घोड़ों से ज़बरदस्त लगाव था..।

बगीचे के एक तरफ जहाँ उन दोनों के सपनों का आशियाना था। वहीं बगीचे के दूसरे तरफ से आगे बढ़ने पर अंदर की तरफ प्रेम का अस्तबल था, जहाँ अरबी नस्ल के कद्दावर ऊँचे चौड़े बारह घोड़े बंधे थे..

निरमा को प्रेम के घोड़ों से कभी कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन कई बार ऐसा होता था कि अगर घोड़ों को ठीक से बांधकर नहीं रखा गया और कहीं गलती से वह खुले छूट गए तो वह आकर निरमा के बगीचे को तहस-नहस कर दिया करते थे और तब निरमा के गुस्से का ज्वालामुखी प्रेम पर ही फूटा करता था…।

प्रेम इस बात का अक्सर ध्यान रखा करता था। उसके घोड़े बगीचे में पहुंचकर कोई नुकसान ना पहुंचाएं ।लेकिन कई बार घोड़ों की देखभाल करने आने वाला लड़का उनको नहलाने धूलाने के बाद कुछ देर के लिए खुला छोड़ कर अपने फोन पर व्यस्त हो जाया करता था। और निरमा को प्रेम पर नाराज होने का मौका दे दिया करता था। निरमा को अपने बगीचे, अपने इस आशियाने ,प्रेम के घोड़ों हर किसी से बेहद लगाव था। अक्सर यूनिवर्सिटी से लौटने के बाद अगर वह शाम ढलने के पहले-पहले लौट आए तो बगीचे में बैठकर ही शाम की चाय पिया करती थी। आज भी पूरी तरह से अंधेरा नहीं हुआ था और उसका ध्यान बगीचे में बैठे प्रेम पर चला गया।  प्रेम उसी का इंतजार कर रहा था, अंदर जाते हुए निरमा के कदम थम गए और मुस्कुरा कर वो  अपने प्यारे, अनोखे से पति की तरफ बढ़ गई! अपने कंधे पर टांग रखा लंबा चौड़ा बैग उसने बगीचे की घास पर रखा और बैठने के लिए आगे बढ़ी थी कि, प्रेम ने धीरे से कुर्सी पीछे सरका दी।
  मुस्कुराकर आंखों आंखों में उसका आभार व्यक्त कर निरमा बैठ गयी..।
उसी वक्त बगीचे में ही एक तरफ लगे इलेक्ट्रिक चूल्हे पर से चाय छानती मीठी ने उन दोनों को मुस्कुरा कर देखा और ट्रे लिए उन तक चली आई…

” क्या बात है आज आपकी प्रिंसेस ने चाय बनाई है..  वैसे इसे चाय बनानी तो आती नहीं है!”

  निरमा ने आश्चर्य से मीठी की तरफ देखा और मीठी ने मुस्कुराकर कप उठाकर अपनी मां के हाथ में पकड़ा दिया..

“यस माय जासूस करमचंद मॉम, आपकी मीठी को चाय बनानी नहीं आती, चाय सुमित्रा काकी ने बनायीं है.. मैंने बस आप लोगों के लिए सर्व की है.. ये कुकीज़ भी ट्राई कीजिये ना !”

निरमा के माथे पर बल पड़ गए

“आज इतनी सब सेवा क्यों की जा रही है? मीठी तुम्हारा बदला हुआ रुप मुझे शॉक दे रहा है ,ठीक है..!”

“अपनी ही बेटी पर विश्वास नहीं है तुम्हें.. वहाँ यूनिवर्सिटी में इतने बच्चों को कैसे संभालती हो ? मेरी प्रिंसेस है ही कमाल !”

“एक आप कमाल और एक आपकी बिटिया कमाल.. आप दोनों एक दूसरे के प्रति वैसे भी इतने आसक्त है कि आप को और कोई दिखता ही नहीं.. आपको मालूम है ना इतना सब गोलमाल आपकी ये महान कन्या किस लिए कर रहीं.. !”

“अरे.. दिल्ली ही तो जाना चाहती है.. भेज दो ना, क्या पहाड़ टूट पड़ेगा ?”

“ये आप पूछ रहें हैं..? ये वहाँ अकेली कैसे रहेगी.. ज़रा बताइये ?”

“अकेली क्यूँ.. हर्ष शौर्य धनुष सब तो जा रहे है !”

“देखिये प्रेम जी… दोस्ती अपनी जगह है और काम काज अपनी जगह ! मैं मानती हूँ हर्ष धनुष यश शौर्य सब प्यारे  बच्चे है लेकिन लड़के हैं…..
और मैं इन सब के साथ मीठी को नहीं भेज सकती ! मैं कोई ज्यादा सफाई नहीं देना चाहती.. !”

“क्यूँ सफाई नहीं देना चाहती है आप ?”

बाँसुरी ने कहा और पीछे से उसे अपनी बाँहों में ले उसकी कुर्सी पर हल्की सी झुक गयी..
बाँसुरी को देखते ही मीठी लपक के उसके गले से लग गयी…

बाँसुरी ने प्यार से उसके गाल पर हाथ फेरा और निरमा के बगल की कुर्सी खींच कर बैठ गयी..

“सॉरी प्रेम भैया, आप लवबर्ड्स की शाम की चाय का स्वाद फीका करने मैं चली आई.. !”

“ओहो.. हम लवबर्ड्स हैं तो, आप दोनों क्या है मैडम…? अपने पतिदेव के साथ चिपके रहने के लिए नौकरी तक छोड़ कर बैठने वाली आप हैं, मैं नहीं.. !”

“अच्छा सुन… !”

बाँसुरी के चेहरें पर गंभीरता चली आई.. -” मैं कुछ ज़रूरी काम से आई थी.. !”

“हाँ बोल ना ! मीठी, मासी के लिए भी चाय ले आओ !”

मीठी हामी भरती हुई चाय लेने चली गयी..

“हमारा बनाया एनजीओ है ना “जाग्रति” उस पर जाँच बैठने वाली है.. !”

“लेकिन क्यूँ ?” निरमा की आश्चर्य से आंखें चौड़ी हो गयी..

उसने आश्चर्य से प्रेम की तरफ देखा, क्यूंकि वो जानती थी राजा साहब और बाँसुरी से जुडी कोई बात हो और अब तक प्रेम को मालूम ना हो ऐसा सम्भव नहीं था.. प्रेम उसकी निगाहें समझ गया और उसे बताने लगा..

“इतना परेशान मत हो..राजनैतिक ओहदा ही ऐसा होता है राजनेताओ के परिवार पर ऐसे दबाव बनायें जाते है..। हुकुम की लोकप्रियता है ही ऐसी कि उनके प्रतिद्वंदी जलते कुढ़ते रहते हैं.. ।
जबकि हुकुम ने आज तक कभी किसी का बुरा करना तो दूर सोचा तक नहीं, बावजूद लोग अगर उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रहें तो क्या किया जा सकता है.. ?
लेकिन हम ये भी जानते है कि ऐसे प्रतिद्वंदियों का होना जान कुछ है नहीं। हर बार की तरह मुहँ की खानी है बस.. लेकिन बरसाती मेढ़क की तरह उछलने  से बाज़ नहीं आएंगे..।
सब जानते है कि बाँसुरी के नेतृत्व में तुम पांच महिलाओ ने मिल कर घरेलु हिंसा और मानसिक प्रताड़ना से त्रस्त महिलाओं के लिए ये एनजीओ खोला था..।
जहाँ महिलाएं आकर अपनी समस्या आप लोगों से कह कर उसका समाधान पाती है.. कई ऐसी महिलाएं जिनका कोई ठौर ठिकाना नहीं है, उनके रहने खाने का भी इंतज़ाम कर रखा है…।
अब अचानक जाने क्यूँ उस पर जाँच बिठाई जा रहीं है..!”

निरमा ये बात सुन कर परेशन हो गयी थी.. लेकिन बाँसुरी मुस्कुरा उठी..

“नीरू अब तू इतना परेशान मत हो.. मैंने तुझे बस इसलिए ये बताया की तुझे भी पूछताछ के लिए बुलवाया जा सकता है.. बस उसके लिए तैयार रहना और दूसरी बात मेरी लाड़ो को दिल्ली जाने की तैयारी करने दे.. !”

“बंसी.. तू तो जानती है, मैं क्यूँ डरती हूँ.. !”

अब तक में प्रेम का कोई फ़ोन आ गया था और वो उठ कर चला गया था..

“क्यूँ डरती है, तू ही बता दे.. !”

निरमा एकदम से खामोश हो गयी..

उसे ऐसे देख बाँसुरी ने एक तरफ से उसे अपनी बांहों में भर लिया..

“नीरू…. हादसे कहीं भी कभी भी हो सकते हैं.. जब प्रताप का एक्सीडेंट हुआ तब हम सब उसी शहर में थे ना, पर क्या हुआ ? क्या बचा पाए उसे.. ?
मैं जानती हूँ वो बात तेरे अंदर गहराई तक समायी हुई है। लेकिन एक उस डर की वजह से तू ना प्रेम भैया को कहीं जाने देती है, ना मीठी को..
मुझे पता है जब प्रेम भैया इनके साथ भी कहीं जाते है, तब भी तू रात भर जागती, उनका इंतज़ार करती रहती है…!
निरमा तेरा ये पागलपन तेरा पति ही बस झेल सकता है बेटी क्यूँ झेलेगी भला..?
कल उसका अपना घर होगा, पति होगा तब भी वो कहीं आना जाना चाहेगी तब भी तू ऐसे ही उसे टोक पायेगी ? नहीं ना ? और उस वक्त खुद में कुढ़ती बैठी रहेगी..। उसलिए अपने दिमाग से ये सब निकाल..
बल्कि मेरा कहना है एक बार उसे दिल्ली जाने दे..। दिल्ली कौन सा दूर है?, साहब का तो महीने में दो तीन दौरा हो ही जाता है.. इस दौरान तू और मैं भी उनके साथ लटक कर चले जाया करेंगे..।
और फिर तेरी बेटी क्या हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है..?
ठीक है महल से सारे लड़के ही बस जा रहे हैं तो, कायदे से मीठी उनके साथ नहीं रह सकती। लेकिन माला के घर पर पीजी तो रह सकती है ना.. !”

“माला ?”

निरमा ने चौंक कर बाँसुरी को देखा..

” माला 5 साल हो गए नीदरलैंड से वह वापस आ चुकी है। दिल्ली में ही तो रहती है। और वैसे भी उसने शौक शौक में इतना बड़ा घर खरीद लिया था, रहना तो बस उन तीनों को ही है..।
उसकी बेटी भी कॉलेज में पढ़ती है। माला से मेरी बात हुई थी। वह मीठी को अपने साथ रखने के लिए तैयार है। लेकिन मैं जानती हूं कि तुम और प्रेम भाई साहब ऐसे किसी के घर पर रहने नहीं दोगे। इसलिए मैंने माला से पीजी की बात कर ली है। उसके घर में ऊपर 2 कमरे हैं। जिनमें मीठी पीजी के तौर पर रह लिया करेगी… ।
सबसे अच्छी बात यह है कि माला का घर जहां पर है उसी के बहुत पास मौजूद सोसाइटी में हर्ष का फ्लैट है। तो यह भी हो जाएगा कि मीठी को कोई जरूरत पड़े तो हर्ष और शौर्य वहां मौजूद रहेंगे। और वैसे भी मीठी शौर्य को सगे भाई से भी ज्यादा मानती है ।और शौर्य के लिए भी उसकी मीठी दीदी उसकी मम्मी के बराबर है…।
अब तू ज्यादा सोच मत और उसे बुला कर इजाज़त दे दे.. समझी ! अब इतना तो मेरी बात का मान रख लें.. !”

“तेरी बात का मन नहीं रखा तो तू मेरा गला नहीं दबा देगी.. महारानी सा जो ठहरी, तेरा हुकुम सर माथे..।
तेरी बात टाल दूं, ऐसा कोई बहाना भी तो नहीं छोड़ती तू। अब माला को पकड़ लाई।
अब जब किसी सहेली के घर पर पीजी रहने मिल जाएगा तो मैं भी इतनी खड़ूस थोड़ी ना हूं कि  अपनी मीठी को अपने से दूर ना भेजूं..!”

उसी समय प्रेम भी मुस्कुराता हुआ चला आया..

“तो हो गया सब फाइनल.. मीठी मैंने क्या कहा था बेटा, एक बार अपनी बाँसुरी मौसी को बुला लो , फिर देखना ममा कैसे एक बार में मान जायेगी.. हुआ भी वहीं ना !”

बनावटी गुस्से से निरमा ने प्रेम को देखा और फिर बाँसुरी को देख हॅंस पड़ी..

“तो ये इन बाप बेटी की मिली भगत थी.. दोनों ने मुझे हिटलर बना रखा है.. !”

“बना नहीं रखा, आप हो ममा और हम मासूम नाज़ी सैनिक.. !”.

बाँसुरी खिलखिला उठी..

“चल अब मैं भी जाऊं… शौर्य को भी दिल्ली निकलना है उसकी तैयारी भी करनी है.. !”

“अरे अब आई है तो खाना खा के जाना.. !”

“अरे नहीं नीरू.. आज साहब चार दिन बाद वापस लौट रहें हैं तो, खाना तो उन्हीं के साथ खाउंगी.. तेरे साथ खाने के लिए उन्हें साथ लेकर आउंगी.. !”

“तू और तेरे साहब.. आज कल तुम दोनों के पास फुर्सत ही कहाँ है ?”

“हाँ जैसे तुम और प्रेम भैया तो सारा वक्त फुरसत में ही बैठे हो !”

हंसती हुई बाँसुरी खड़ी हो गयी…
प्रेम और निरमा उसे छोड़ने बाहर तक चले आये.. मीठी अब तक अपने दिल्ली आने की खुशखबरी अपनी  गैंग को सुनाने चली गयी थी.. ।

****

कली एक बार फिर अपने दोस्तों के साथ कॉलेज में बैठी उन लोगों को अपने पिता से मिलने आने के लिए मना रही थी। कली के दोस्त वाकई बहुत अच्छे थे। लेकिन कली के पिता के सामने उनमें से कोई भी नहीं टिकता था। सारे के सारे लोग वासुकी से बहुत डरते थे। जबकि आज तक वासुकी ने कभी किसी से तेज आवाज में बात तक नहीं की थी। लेकिन वासुकी का धीर गंभीर व्यक्तित्व, उसकी गहरी खोजी आंखें ही ऐसी थी कि वह लोग उसके सामने खड़े होते ही कांपने लगते थे…।

” ना बाबा तेरे हिटलर डैडा से मिलने मैं तो नहीं जाने वाली..!”

” प्लीज यार एक बार, बस एक आखरी बार मेरी हेल्प कर दो। उसके बाद मैं कभी तुमसे कोई हेल्प नहीं मांगूंगी। और सुनो मैं इंडिया से वापस आते समय तुम सब के लिए एक एक छोटा छोटा ताजमहल लेकर आऊंगी। इंडिया की फेमस मिठाइयां लेकर आऊंगी। तुम सब के लिए लखनऊ से लखनवी कुर्तियां लाऊंगी। और भी जिसको जो चाहिए मैं सब ले आऊंगी..!”

” तेरे डैड ना बिल्कुल जेलर लगते हैं। उनके सामने जब मैं खड़ा होता हूं ना, तो मुझे खुद ब खुद अंदर से ही फील आ जाती है कि मैं कोई बहुत बड़ा चोर हूं, जिसने वर्ल्ड बैंक पर डाका डाला है। और उस चोरी के बाद मैं पकड़ा गया हूं।और मुझे तेरे डैड की जेल में ले जाया गया है..।”

कली के एक दोस्त ने अपने विचार रखें..

” तू ना बहुत बड़ा नाटकबाज है। ना मेरे डैडा जेलर है, और ना तू कोई कैदी। तुमको कुछ नहीं करना है। मेरी बात समझो ना, तुम जाकर बस डैडा के सामने यह कहना कि तुम लोग भी मेरे साथ इंडिया चल रहे हो। हमारा सिर्फ 10 दिन का टूर है। और उसके बाद हम वापस आ जाएंगे। इसके साथ ही कह देना कि सरू को साथ ले जाने की कोई जरूरत नहीं है। हम सब एक दूसरे की देखभाल कर लेंगे..!”

” कली!! यार तेरा प्लान भी अजीब है। एक तो तू यहां से पहली बार इंडिया जाने वाली है, वह भी अकेले जाने वाली है। उस पर तूने अपने डैडा से यह कहा है कि हम सब तेरे साथ जा रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि इतना बड़ा और इतना सारा झूठ बोलकर तू अपने डैडा से बच पाएगी।
यार तेरे डैडा की आंखें नहीं है, स्कैनर है। जब उनके सामने हम बैठते है ना, हमारा चेहरा देखकर वह खुद खुद समझ जाते होंगे कि हम सच बोल रहे हैं, या झूठ ? मुझे तो समझ में नही आ रहा कि उन्होंने तेरा झूठ पकड़ा कैसे नहीं..?”

” तो क्या करूं अपनी इच्छा को मार दूँ मैं..?
  नहीं जाऊं मैं इंडिया?
तुम लोगों को कैसे समझाऊं मैं कि, मैं इंडिया क्यों जाना चाहती हूं….!”

कली उदास हो गयी..
थोड़ा रुक कर इसने बोलना जारी रखा…

   “मुझे ऐसा लगता है मेरी जिंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा कहीं खोया हुआ है…
और वह हिस्सा मुझे इंडिया में ही मिल सकता है। और सिर्फ मेरी जिंदगी का नहीं मेरे डैडा की जिंदगी, सरू की जिंदगी, दर्श अंकल की जिंदगी, हम सब कहीं ना कहीं आधे अधूरे से हैं। मेरे डैडा रात रात भर अपने कमरे में बैठकर मॉम का गाना सुनते रहते हैं यार।
उन्हें लगता है कि उनकी कली आराम से अपने कमरे में सो रही है। जबकि मैं जानती हूं, जब कभी आधी रात के बाद डैडा के कमरे के बाहर से होकर गुजरती हूं ना, तो मॉम की आवाज साफ साफ बाहर तक सुनाई देती है। डैडा ने मॉम के गाने बस को नहीं उनकी बातों को भी रिकॉर्ड करके रखा हुआ है। और सारा वक्त सुनते रहते हैं।
कुछ चूड़ियों की आवाजें हैं, पायल की रुनझुन है। और बहुत कुछ है।
   दर्श अंकल को भी कई बार देखा है मैंने, गार्डन में अकेले बैठे सिगार फूँकते रहते हैं। और कभी कुछ पूछो तो जवाब ही नहीं देते।

   सरू मंदिर में रखे कान्हा जी को ऐसे प्यार से सजाती है जैसे कि वह सच में उनके बच्चे हैं। और मैं जब भी पूछती हूं ना कि आपको यह किसने दिया, तो कहती है एक एंजेल आई थी मेरी जिंदगी में, एक परी, जो मुझे यह कान्हा जी सौंपकर गई है।और कह कर गई है कि हमेशा इनकी सेवा करना। तुम जानते हो वो खाना बनाने के बाद सारा खाना पहले कान्हा जी को जाकर खिलाती है ,कहीं गलती से मैंने कुछ भी टेस्ट कर लिया ना तो उस दिन मुझे घंटे भर सरू का लेक्चर सुनना पड़ता है। मेरे घर के सारे लोग आधे पागल है यार और इन पागलों के पागलपन का कारण मुझे और कहीं नहीं इंडिया में ही मिल सकता है।
मैं जानती हूं मैंने, बहुत बचपन में अपनी मॉम को खो दिया था। लेकिन ऐसा और भी बच्चों के साथ होता है। दुनिया में और भी तो आदमी होते हैं जो अपनी पत्नियों को कम उम्र में खो चुके होते हैं। लेकिन उनका हाल मेरे डैडा जैसा नहीं होता।

मैं सच कहूं तो मेरे डैडा का शरीर हम लोगों के साथ हैं, उनकी आत्मा उनका मन वह तो पता नहीं किस दुनिया में रहते हैं। मेरे डैडा की लाइफ में कोई तो ऐसा मलाल है, जिसके कारण अब तक सामान्य जीवन नहीं जी पा रहे, इन सब बातों के अलावा एक छोटी सी बात और है। मेरी जिंदगी में बचपन में एक कोई और औरत भी थी, जिसने मुझे बहुत सारा प्यार दिया है। मैं उनके बारे में कुछ भी नहीं जानती, मुझे सच कहूं तो उनका चेहरा तक याद नहीं। बस कभी-कभी नींद में होती हूं तो ऐसा महसूस होता है जैसे मैं एक बहुत प्यारी सी गोद में हूं, कि बहुत मीठी सी खुशबू मुझे अपने आप में जकड़ लेती है। ऐसा लगता है जैसे वह मेरे बालों पर हाथ फेर रही है। और मुझसे कह रही हैं, मेरी प्यारी कली तुम्हें बहुत अच्छा इंसान बनना है।
ऐसा लगता है जैसे मेरे बालों में हाथ फेरती हुई वह मुझे राजा अजातशत्रु सिंह के किस्से सुना रही हैं। तुम लोगों को पता है मैंने आज तक राजा अजातशत्रु की तस्वीर तक नहीं देखी थी …
ऐसा नहीं है कि गूगल पर उनकी तस्वीरें मौजूद नहीं है.. लेकिन मैंने खुद से यह प्रॉमिस किया था कि मैं राजा अजातशत्रु को आमने-सामने देखूंगी! इसलिए आज तक गूगल पर उनके बारे में कभी कुछ सर्च नहीं किया, लेकिन मेरा यह प्रॉमिस थोड़ा सा टूट गया..!”

“क्यों क्या हुआ ?”

“अभी इवेंट के दौरान जब हमें राजप्रसाद के अंदरूनी कक्ष में ले जाया गया, तो वहां सारे बड़े-बड़े राजा महाराजाओं की तस्वीरें लगी थी! और वहां राजा अजातशत्रु की आदमकद तस्वीर दिख गयी..
       अब मैं क्या कहूं यार,सच में मैं दिल हार गई उस बंदे पर!
अब तो मुझे इंडिया जाने से कोई नहीं रोक सकता। पता नहीं क्यों लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि राजा अजातशत्रु और मेरा कोई ना कोई कनेक्शन जरूर है। और ये मुझे उनसे मिलने के बाद ही पता चलेगा..।”

” तो, कली मैडम 10 दिन में आप क्या करने वाली हैं। आप राजा अजातशत्रु को ढूंढ लेंगी, उनसे अपना कनेक्शन भी ढूंढ लेंगी। फिर उस मिस्ट्री लेडी को भी ढूंढ लेंगी जो आपको राजा साहब के किस्से सुनाए करती थी।
इसके बाद आप लखनऊ जाकर चिकन की कुर्ती हमारे लिए खरीदेंगी।
उसके बाद आप इंडिया की जगह जगह की स्पेशल मिठाइयां हमारे लिए खरीदेंगी।
फिर आप आगरा जाकर हम लोगों के लिए छोटे-छोटे ताजमहल भी खरीदेंगी।
आपके पास 10 दिन है, आप जिंदगी भर के लिए इंडिया नहीं जाने वाली हो..।’

” काश कुछ ऐसा हो जाए कि मैं इंडिया जाऊं और वही रह जाऊं। लेकिन जानती हूं कि मेरे डैडा मुझे 10 दिन से एक घंटा भी ऊपर वहाँ नहीं टिकने देंगे।
तो साथियों मेरी इस दुख भरी कहानी को सुनकर मेरा प्लीज साथ दे दो ।
प्लीज एक बार आकर मेरे डैडा से मिल लो और मुझे परमिशन दिलवा दो, और सुनो …..
तुम लोग उनके सामने घबराना बिल्कुल मत। चेहरे पर आत्मविश्वास कूट-कूट कर ऐसा दिखना चाहिए कि डैडा तुम सबको देखते ही भरोसा कर ले कि तुम लोग भी मेरे साथ दिल्ली जा रहे हो।
    और हम सब वहां पर होने वाली आर्ट एग्जिबिशन को अटेंड करने जा रहे हैं।
हम सबके लिए उस आर्ट एंपोरियम के मालिक ने एक फ्लैट हायर कर रखा है।
   ठीक है?
इन सब के बारे में भी डैडा हमसे यानी कि तुम लोगों से सवाल करेंगे तो उस आर्ट एंपोरियम के मालिक का नाम है विराट सिंह ।
एक नंबर तुम सबको दूंगी। वह नंबर ही तुम डैडा को देना। मैं विराट सर से बात कर लूंगी। अगर डैडा उन्हें फोन करते हैं तो, वह सब कुछ मैनेज कर लेंगे। ओके..?”

” यार जब तुझे हम लोग पसंद ही नहीं थे तो साफ बोल देना था ना, ऐसे बार-बार हम लोगों को आत्महत्या करने क्यूँ लें जाती है!
   तेरे डैडा से मिलना मतलब कि सीधे स्वर्ग के रास्ते पर हायाबुसा दौड़ा देना है..!”

” तो दौड़ा दो ना.. मेरी दोस्ती के लिए तुम इतना नहीं कर सकते..?
देखो मैंने साफ-साफ कहा था कि मैं और मेरे 4 दोस्त यानी तुम तीनों लड़कियों और डेरिक तुम, मतलब तुम चारों मेरे साथ चल रहे हो..!
मैं इससे ज्यादा प्यार से तुम लोगों को नहीं समझा सकती !
     अगर इसके बाद भी तुम लोगों ने नहीं समझा तो मैं  अपने डैडा की गन चुरा कर लाऊंगी, और चारों को शूट कर दूंगी…!”

“इतनी गन्दी धमकी.. हम तेरी घटिया सी धमकी से डरकर नहीं आ रहे हैं…
   हम सब तुझसे प्यार करते हैं, और तेरे जीवन की मिस्ट्री सॉल्व हो जाए इसलिए बस तेरी हेल्प करने वाले हैं । लेकिन एक बात याद रखना, तेरे इंडिया जाने के बाद 10 दिन के लिए हम चारों पूरी तरह से भूमिगत हो जाएंगे। वरना अगर किसी दिन ऐसा हुआ कि तेरे डैडा कि तुझ से बात नहीं हो पाई या कहीं से उन्हें इतना भी हिंट मिल गया कि हम लोग तेरे साथ नहीं गए हैं तो, वह सब छोड़ कर हम लोगों को पकड़ लेंगे और सच में अपनी गन से हम चारों को शूट कर देंगे..।”

” एक्जेक्टली!! यही तो मैं भी तुम लोगों से कहने वाली थी कि उन 10 दिनों में तुम लोग यहां लंदन की सड़कों पर नजर मत आना। वरना तुम चारों को ब्रह्मा भी नहीं बचा पाएंगे..।”.

कली आगे झुक कर उन चारों के एक साथ गले से लगी और अपना बैग कंधे पर टांग कर मुस्कुराते हुए उन लोगों को बाय करती हुई वहां से निकल गई। जाते जाते उसने एक बार फिर उन लोगों को आवाज लगा दी..

” शाम ठीक 7 बजे मेरे घर पहुंच जाना गाइज़, आज का डिनर मेरे घर..!”

“बकरा हलाल करने से पहले उसे खिलाया पिलाया भी तो जाता है ना… !”  रीना  ने अपने बाकी दोस्तों को देख कर कहा और वो चारों लोग अपने अपने घर की तरफ निकल गए..

क्रमशः

aparna….

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Abhishek Kishor
Abhishek Kishor
2 years ago

पिताजी से कहकर एक फिल्म देखने जाने के लिए कहना बड़ी हिम्मत की बात होती थी, वर्षों लग गए। हालांकि वह समझ जाते रहे थे तो फिर काली के लिए वैसे स्ट्रिक्ट डैड से बचकर 10 दिन गुजारना आसान नहीं होगा। मीठी को भी इजाज़त मिल गई है लेकिन कंडीशनस आर एप्लाइड, बढ़िया पार्ट लगा दीदी 💐👌🙏

Manu verma
Manu verma
2 years ago

बहुत खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻♥️♥️♥️

Manu verma
Manu verma
2 years ago

बेहद खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻।
आज बहुत दिनों बाद निरमा और बांसुरी से मिलकर बहुत अच्छा लगा, निरमा का बगीचा भी देख लिया,, बेहद खूबसूरत 👌🏻👌🏻।
फाइनली मीठी को परमिशन मिल ही गई दिल्ली जाने की उधर वासुकी ने भी कली को इंडिया जाने की परमिशन दे ही दी पर क्या कली के दोस्त वासुकी के सामने टिक सकेंगे 🤔। रीना ने सही कहा बकरे को हलाल करने से पहले लखातिरदारी की जाएगी 😃😃, अब देखते है आगे क्या होता है…. 🤔।
बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻।