
अपराजिता -107
कुसुम को उसके साथ खड़ी भाभी ने संभाल कर वही लगी बेंच पर बैठाया और खुद उसे सहारा देकर पानी पिलाने की कोशिश करने लगी..
अखंड भी भाग कर उन लोगो के पास चला आया.. डॉक्टर जैसा आया था, वैसे वापस चला गया…
डॉक्टर की इस खबर से हर किसी को थोड़ी सी ही सही राहत तो मिल गई थी।
लेकिन फिर भी, अब भी सबके दिल धड़क रहे थे और सबसे ज्यादा कुसुम का…
उसके चेहरे, को भीगे हाथों से पोंछने के बाद उसकी भाभी उसे उठाने की कोशिश करने लगी…कुसुम के चेहरे पर उन्होंने थोड़ा पानी छिड़क दिया था..
कुसुम ने धीरे से आंखें खोली और अपना सर पीछे दीवार से टिका कर बैठ गई…
उसे अपने आप पर ही आश्चर्य हो रहा था.. उस जैसी लड़की जो आज तक अपने आप को सबसे मजबूत औरत मानती आई थी, आज कैसे सिर्फ अपने पति की बीमारी के वक्त ही लड़खड़ा गई।
उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि किसी वक्त यज्ञ उसके लिए इतना महत्वपूर्ण हो बैठेगा, ऐसा हाल तो उसका उस समय भी नहीं हुआ था, जब उसके भाई की छत से गिरने की खबर उस तक पहुंची थी।
बल्कि उस वक्त भी वह अपने भाई के ऊपर गुस्से के कारण अकड़ कर खड़ी रह गई थी, और उसकी अकड़ को जड़ से उखाड़ कर यज्ञ ने हीं फेंका था, और उसे पड़कर अस्पताल ले आया था।
कितना निराला था यज्ञ!!।
कितना जानता था वह हर बात को। सबसे ज्यादा तो जिंदगी को!!
कितने करीब से उसने महसूस किया था।
रिश्तो को दिलों जान से निभाता था, इतना अच्छा सच्चा नेक दिल लड़का क्या इतनी जल्दी जिंदगी खो देगा?
क्या इतनी छोटी उम्र ही अपने हिस्से लिखवा कर लाया हैं वो ?.
और सच में अगर उसे कुछ हो गया तो.. ?
अम्मा अक्सर कहती हैं अच्छे लोगो की भगवान को भी ज़रूरत होती हैं, लेकिन नहीं.. अगर ऐसा हैं तो यज्ञ तुम बुरे बन जाओ,बहुत बुरे !!
क्यूंकि तुम्हारा ज़िंदा रहना हमारे साँस लेने के लिए बहुत ज़रूरी हैं..
अगर उन्हेँ कुछ हो गया तो…
नहीं… !” अपने ख्यालों में कोई कुसुम चीख कर अपनी जगह पर खड़ी हो गई..
उसके आसपास मौजूद लोगों को भी समझ में आ गया कि कुसुम के दिल में हाहाकार मचा हुआ है! और वह बिना यज्ञ के सांस भी नहीं ले पा रही है!
उसकी भाभी ने उसे बैठाने की कोशिश की, लेकिन वह चुपचाप वही खड़ी रह गई। इस समय वहां से गुजरती एक नर्स ने कुसुम की तरफ देखा और एक गलियारे की तरफ इशारा कर दिया।
कुसुम को उसका इशारा समझ में नहीं आया, लेकिन उस नर्स ने एक बार फिर कुसुम से उसे गलियारे की तरफ जाने का इशारा कर दिया।
कुसुम धीरे से उस तरफ बढ़ गई। उसकी भाभी भी उसके पीछे चलने लगी, लेकिन कुसुम ने हाथ देकर उन्हें रोक दिया।
” आप रुकिए भाभी, हो सकता है अंदर से बुलाए तब आप हमें बुलाने आ जाइएगा। हम देख कर आते हैं वहां क्या है ?”
कुसुम धीरे-धीरे कदम बढ़ाती आगे बढ़ गई। वैसे भी कभी-कभी कोई ऐसा वक्त भी चला आता है, जब इंसान अपने दुख दर्द के साथ सिर्फ अकेले रहना चाहता है। कुसुम भी इस वक्त अकेली रहना चाहती थी, हर समय की हंसती बोलती कुसुम जैसे बिल्कुल शांत हो गई थी। वह धीरे-धीरे उसे गलियारे में आगे बढ़ती गई उसके गलियारे में एक बड़ा सा जंगला था, जो खुला हुआ था। उसे जंगले को पार कर कुछ सीढ़ियां उतरने पर कुसुम एक बगीचे में चली आई।
जहां काफी सारे मरीजों के परिजन इधर-उधर बैठे हुए थे। कुछ बुजुर्ग चहल कदमी कर रहे थे। कुछ परिजनों के साथ आए बच्चे खेल भी रहे थे। वहीं एक तरफ एक बड़ा सा बरगद का पेड़ था, जिस पर ढेर सारी घंटियां बंधी हुई थी।
कुसुम धीरे-धीरे चलती हुई वहां पहुंच गई। उस बरगद के पेड़ के नीचे एक छोटा सा हनुमान जी का मंदिर था। मंदिर में हनुमान जी की कोई स्थापित सी मूर्ति नहीं रखी थी, बल्कि सिर्फ एक नारंगी रंग का बड़ा पत्थर था, जिस पर खूब सारा सिंदूर और चमेली का तेल पुता हुआ था। वहां पहुंचकर कुसुम चुपचाप उस मंदिर को देखने लगी वहां बैठे पंडित जी ने धीरे से एक घंटा कुसुम की तरफ बढ़ा दिया…
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।तुम रक्षक काहू को डर ना।।
लो बेटी ये घंटा तुम भी बांध दो .. इशारे से पंडित जी ने कहा और कुसुम ने हाथ बढ़ा कर ले लिया, और इधर उधर देखने लगी..।
हनुमान चालीसा का पाठ करते पंडित जी ने आगे बोलना जारी रखा..
नासै रोग हरै सब पीरा।जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
पंडित जी की कही हर पंक्ति को कुसुम बड़े ध्यान से सुन रही थी…
पंडित जी भी जैसे उसे ही ज़ोर दे कर सुना रहे थे…
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।तुम रक्षक काहू को डर ना।।
कुसुम ने मन ही मन यज्ञ की सलामती की दुआ मांगी और उस छोटी सी घंटी को उस ऊँचे बरगद की विशाल लटकती जड़ों में अपने विश्वास में लपेट कर बांध दिया…
वो जैसे ही बरगद पर घंटी बांध कर पलटी की भावना उससे लिपट गयी..
भावना ने उसे कस कर अपनी बाँहों में बांध रखा था..
उसके आंसुओ को देख कुसुम भी रो पड़ी..
आज फिर एक सखी अपनी सखी के अकेलेपन में, उसकी उदासी में उसकी परेशानियों में उसके साथ खड़े होने चली आयी थी..।
उसे संभालने चली आयी थी..।
भावना का हाथ थामे कुसुम वापस अस्पताल के अंदर चल पड़ी..
वो धीमे धीमे चल रही थी..
“तुम्हे कैसे पता चला भावना ?”
“डॉक्टर साहब ने फ़ोन किया था.. !”
“और तुम भागती चली आयी.. वो भी ऐसे.. !”
उसके खाली पैरो की तरफ इशारा कर कुसुम ने कहा और तब भावना का ध्यान गया कि डॉक्टर साहब ने जब फ़ोन किया था उस वक्त वो बाहर बगीचे में थी और नीचे रहने वाली आंटी से कुछ बात कर रही थी..
उसने चप्पलें नहीं पहन रखी थी…
और जैसे ही डॉक्टर साहब ने फ़ोन में उसे ये खबर दी, वो उसी हालत में भागती हुई वहाँ से निकल गयी..
कुसुम के ध्यान दिलाने पर वो झेंप सी गयी..
“हमें होश ही नहीं रहा कुसुम ! सुनो तुम्हारी अम्मा कहाँ हैं ?”
“उन्हेँ नहीं बताया हैं भावी… वो पहले ही भाई के कारण परेशान हैं.. !”
“हाँ ठीक ही किया.. हमारा दिल कह रहा, कि सब ठीक हो जायेगा.. यज्ञ बाबू बिलकुल सही सलामत बाहर आ जायेंगे, तुम देखना !”
धीरे धीरे वक्त बीत रहा था…
लेकिन कुसुम के लिए जैसे लम्हा वहीँ थम गया था…
थोड़ी देर बाद राजेंद्र बाहर चला आया..
उसे आते देख भावना खड़ी हो गयी.. वो उसे ही देख रही थी, इशारो में ही भावना ने यज्ञ का हालचाल पूछ लिया और और राजेंद्र ने उसे सब ठीक हैं का इशारा भी कर दिया…
राजेंद्र को आता देख कर कुसुम भी धीरे से खड़ी होने की कोशिश कर रही थी कि राजेंद्र उस तक पहुँच गया..
“नहीं, बैठी रहो…। अब चिंता मत करो, अंदर सब ठीक हैं कुसुम.. !”
“वो कैसे हैं.. उन्हें होश आया ?”
“तुम्हारे वो ठीक हैं.. ब्लड बहना नहीं रुक रहा था, इसलिए पल्स धीमी हो रही थी लेकिन अब ब्लड रुक गया है..।
पल्स भी स्टेबल हो गई है। कुछ देर तक तो एनेस्थीसिया का प्रभाव रहेगा इसलिए वह बेहोश रहेंगे, लेकिन जल्दी ही होश में आ जाएंगे, फिलहाल उनके बाकी सारे वाइटल्स नॉर्मल आ गए हैं…।”
“मतलब ?” कुसुम ने अपनी अबोध आंखें राजेंद्र पर टिका दी।
राजेंद्र ने उसे अपनी आंखों से ही आश्वस्त कर दिया,
” मतलब तुम्हारे पति खतरे से बाहर है, और अब तुम भी आराम करो। सुबह से देख रहा हूं, तुम जबसे यहां आई हो तब से परेशान इधर-उधर मारी-मारी फिर रही हो। अब चाहे तो घर जाकर आराम कर लो..।”
“नहीं, जब तक वह आंखें नहीं खोल देते हम कहीं नहीं जाएंगे..।”
भावना ने अपने साथ लाई पानी की बोतल धीरे से राजेंद्र के हाथ में थमा दी और उसे कुसुम की तरफ बढ़ने का इशारा कर दिया। राजेंद्र ने बोतल खोलकर कुसुम की तरफ बढ़ा दी..
“ठीक है, अब पानी पी लो। वरना तुम्हें भी डिहाइड्रेशन हो जाएगा और चक्कर खाकर गिर जाओगी।
दोनों पति-पत्नी अगल-बगल की बेड पर सोते रहना फिर।
उनके उठने के बाद तुम्हें संभालना भी है ना या खुद बीमार पड़ जाना है?”
कुसुम ने पानी लेने से एक बार मना किया, लेकिन राजेंद्र की ज़िद के आगे कुसुम की एक न चली और कुसुम ने अपने गले में पानी की घूंट उतार ली..।
उसी वक्त राजेन्द्र के इशारे पर एक वार्डबॉय वहां मौजूद सभी के लिए काफी के कप कैंटीन से लिए चला आया। राजेंद्र ने एक कप उठाकर कुसुम की तरफ बढ़ा दिया।
” हमारी कैंटीन में चाय अच्छी नहीं मिलती, इसलिए चाय पसंद करने वालो के लिए मैंने अपनी पसंद की काफी मंगा ली। पी लो थोड़ा राहत मिलेगी।”
कुसुम ने धीरे से वह कप थामा और वही कुर्सी पर बैठ गई। उसके एक तरफ उसकी भाभी और दूसरी तरफ भावना बैठी थी।
दोनों ने अपना एक-एक हाथ कुसुम के पैरों पर रखा हुआ था। कुसुम धीरे-धीरे कॉफी पीने लगी। राजेंद्र कॉफी का कप लेकर अखंड की तरफ बढ़ गया। अखंड ने मुस्कुराने की एक नाकाम सी कोशिश की और कप चुपचाप थाम दिया..
” धन्यवाद डॉक्टर साहब, आप शायद वही डॉक्टर है जो पहले दूर्वागंज में काम कर रहे थे। शायद इसीलिए आप ठाकुर परिवार को जानते पहचानते हैं..।”
” जी सिर्फ जानता हूं, पहचान कुछ खास नहीं है… आप चिंता मत कीजिए आपके भाई सुरक्षित हैं..!”
अखंड ने धीमे से हाँ में गर्दन हिला दी…
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अनिर्वान अपने ऑफिस में पहुँच कर अपने काम में लग गया था..
कुछ देर में ही उसके सामने दीपक के फ़ोन की सारी डिटेल्स मौजूद थी..
एक नंबर उसमे ऐसा नजर आ रहा था, जिससे अभी पिछले तीन चार दिन में दीपक की लगातार बात हुई थी..।
अनिर्वान ने फौरन उस नंबर की जानकारी इकट्ठा करने बाबूराव को भेज दिया और खुद दीपक के सोशल अकाउंट्स को खंगालने लगा..।
दीपक का कहीं कोई सोशल अकॉउंट नजर नहीं आया लेकिन इसी खोजबीन में उसे दीपक के छोटे भाई का फ्रेन्डबुक अकॉउंट मिल गया…।
पंकज का अकॉउंट बहुत समय से इनएक्टिव था, लेकिन उसमे उसकी कुछ पुरानी तस्वीरें मौजूद थी..
अनिर्वान ने उस सारी तस्वीरों और उस अकॉउंट की छानबीन करनी शुरू कर दी…
अनिर्वान पंकज के फ्रेन्डबुक को खंगाल रहा था, जहाँ उसे पंकज की तस्वीरें दिख गयी..
उन ढेर सारी तस्वीरों में पंकज के साथ काफी सारे लोग दिख रहे थे..
बहुत सी तस्वीरों में पंकज के साथ पूर्व छात्र नेता धीरज भी नजर आ रहा था..
एक तस्वीर में पंकज के साथ बैठी रेशम भी नजर आ गयी.. इन तस्वीरो का अनिर्वान आपसी मिलान करने की कोशिश कर रहा था… उसे इन तस्वीरों में कुछ तो असामान्य लग रहा था, लेकिन वो क्या था जानने के लिए उसने उन तस्वीरो को अलग से निकालना शुरू कर दिया..
कुछ देर में ही बाबूराव उस फ़ोन नंबर की सारी जानकारी समेट कर ले आया…।
“साहब इस नंबर की जानकारी मिल गयी हैं ?”
“कौन हैं बाबूराव ?”
“साहब ये आदमी यहां आसपास का रहने वाला नहीं हैं, ये बाहर रहता हैं.. !”
“काम क्या करता हैं ?”
“साहब ये ऐसा कुछ खास काम नहीं करता, जब जहाँ जो काम मिल जाये कर लेता हैं.. जैसे किसी नयी बनती इमारत में मजदूरी का काम या फिर रोड बन रही हो तो वहाँ काम, एक तरह से दिहाड़ी हैं हुज़ूर !”
“ओह्ह अच्छा.. तो इस दीपक के बच्चे ने इस दिहाड़ी को उठाया और इससे गोली चलवाने का काम करवाया हैं ?”
“हुज़ूर इतने आत्मविश्वास से ये कैसे कह सकते हैं आप ?”
“बाबूराव, अभी तो बहुत कुछ दिमाग में चल रहा हैं, एक बार ये सारे तार आपस में मिल जाये तब पुरे आत्मविश्वास से मैं उस दीपक को पहले थाने लेकर आऊंगा और उसके बाद मेरे हाथ उस धीरज कुमार का गला पकड़ने को भी कुलबुला रहे हैं… मुझे पता नहीं क्यों ये आदमी शुरू से पसंद नहीं आया..।
और मेरा दिल कहता हैं इस सब के पीछे कहीं न कहीं इस धीरज का भी हाथ हैं..।
चलो अभी फ़िलहाल ये आदमी कहां मिलेगा, इसका नंबर ट्रेस करो और इसे पकड़ने चलो..
आगे की जानकारी यही देगा.. !!
“लेकिन इसका नंबर तो बंद आ रहा हैं !”
“लास्ट लोकेशन से ही ये पकड़ा जायेगा.. मुझे नहीं लग रहा कि ये इतना स्मार्ट होगा कि फ़ोन बंद कर कहीं भाग पायेगा !”
“जी हुज़ूर.. गाड़ी निकलवाए फिर ?”
हामी भरता अनिर्वान अपनी जगह पर खड़ा हुआ और बाबूराव को साथ ले उस आदमी की तलाश में निकल गया..।
लेकिन इसके साथ ही उसके दिमाग में ढेर सारी बातें अब भी चल रही थी..
धीरज और पंकज का आपसी कनेक्शन सोचते हुए सारा गणित दिमाग में बैठाने की कोशिश करता अनिर्वान एक बार फिर वापस उसी यूनिवर्सिटी की गलियों में अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाने लगा…
. क्रमशः

🕉️🕉️🕉️🕉️🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰
Superb part good job dear 😘😘🎈🎈💐
ईश्वर के आगे सब नतमस्तक हैं। उसकी लीला ही अपरम्पार हैं 🙏🏻🙏🏻🙏🏻 यज्ञ को ईश्वर ने बचाया ही नहीं कुसुम में आस्था भी जगा गया । अपने आप उसने मन्नत मांग के घंटी भी़ बांध दी।
भावना का खाली पैर भागे आना एक बार फिर से दोस्ती की मिशाल दे गया।
Bilkul shi kha
बहुत ही उम्दा लिखा है
बहुत ही अच्छा पार्ट था
बहुत सुंदर जी
itna sukoon mil raha hai na ye jankar ki aap fir se likh rahi hein. Sach me esa lag raha hai jese kisi high bp k patient ko dawai mil gyi warna upar ka ticket katt jata😂
मुझे भी राहत की सांस आने लगी आप दुबारा मिल गयीं तो वर्ना प्रतिलिपि बार बार चेक करनी पङती थी कि आप की कोई अपडेट मिले
इतने लंबे इंतज़ार और आशंकाओं के बीच ऐसा लग रहा है जैसे कुसुम के साथ-साथ हमें भी साँस आ गई हो। शुक्र है आपने लिखना तो शुरू किया। कुसुम और यज्ञ का रिश्ता भी सही होने जा रहा है, यह देखकर अच्छा लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि जल्द ही अनिर्बान के हाथ दीपक के जरिए धीरेंद्र तक पहुँचने वाले हैं, अब अखंड भी निर्दोष साबित हो जाए बस, फिर दोषियों को तो अनिर्बान वासुकी स्टाइल में सज़ा दे ही देगा।
Very well written as always ❤️❤️❤️👍👍👍👏👏👏❤️❤️❤️❤️
भावना और कुसुम की दोस्ती, भावना की मां के ना रहने पर कुसुम ने पूरा साथ दिया और अब भावना नंगे पांव ही भागी चली आई अपनी सखी की परेशानी में।
अनिर्वाण के हाथ अभी कुछ सबूत आ गए अब तो दीपक और धीरज गए काम से, और अखंड की बेगुनाही भी साबित हो जायेगी।
बहुत ही बेहतरीन पार्ट 👌👌👌👌❤️❤️❤️❤️