अपराजिता -92
पुलिस जीप अपना सायरन बजाते हुए पुलिस थाने के सामने जाकर रुकी…
गाड़ी से वासुकी एक झटके में कूद कर नीचे उतर गया। उसके इशारे पर बाबूराव, दीपक को लेकर उसके पीछे-पीछे अंदर दाखिल हो गया। अपनी केबिन में जाकर वासुकी बैठा और उसने दीपक को अपने सामने ही बुला लिया।
दीपक वहां पहुंचकर उसके सामने रखी कुर्सी खींचकर बैठने ही जा रहा था कि बाबूराव ने नहीं-नहीं में गर्दन हिलाते हुए उसे न बैठने का इशारा कर दिया..
“क्यों मना कर रहे हो? हम क्यों ना बैठे? पुलिस थाना तुम्हारे बाप का है..?
दीपक ने अकड़ कर बोला.. उसे लगा था बाकी पुलिसवालों की तरह वासुकी भी चंद्रभान के प्रभाव से मुक्त नहीं होगा..
बोल कर वो बैठने को हुआ और वासुकी ने उसकी कुर्सी को लात मार कर पीछे धकेल दिया..
दीपक उसमे बैठने की कोशिश में धड़ाम से गिर गया….
वो आश्चर्य से आंखे फाडे वासुकी को देखता, घूरता हुआ उठ खड़ा हुआ…
बाबूराव ने उसे देखा और बोल पड़ा..
“साहब की तरफ ऐसे मत देखो ?”
“क्यों बे.. काहे ना देखे ? भगवान हमको आँख किसलिए दिया है ? “
“अपनी हद में रह कर देखो, वरना कहीं देखने के लायक नहीं रहोगे !”
बाबूराव ने धीरे से कहा और वासुकी ने बाबूराव को पुकार लगा दी…
” बाबूराव हमारी सबसे मनपसंद डिश का नाम बताओ?”
“हुज़ूर… समोसा ?”
“अरे नहीं बाबूराव.. वो तो रविवार की सुबह का नाश्ता है..समोसे और जलेबी।
पर वैसे हमारी मनपसंद डिश क्या है.. ?”
“पनीर टिक्का हुज़ूर ?”
“बहुत बढ़िया, अब यह बताओ बाबूराव की पनीर टिक्का बनाने के लिए क्या-क्या उपयोग में लाया जाता है..?”
” हुजूर मसाले, पनीर, दही, सरसों का तेल, तंदूर..?”
“और… ?”
“और.. सींक ?”
“जियो बाबूराव जियो..!!
तुम्हारा तो दिमाग ऐसा अनाप-शनाप तेज भागता है, कभी-कभी लगता है कि तुम्हें केबीसी में भेज दे…।
हमारे गुरुदेव अमित बाबू जब तुमसे पूछेंगे कि क्या कीजियेगा बाबूराव जी, इतनी धनराशि का? तब तुम कह देना गुटका खा लेंगे हुज़ूर !”
वासुकी की बात सुनकर काले कलूटे बाबूराव का चेहरा शर्म से लाल होने की जगह बैंगनी हो गया।
उसे वासुकी के यह उटपटांग मजाक अंदर से गुदगुदा जाते थे।
उन दोनों की इस बातचीत में दीपक घूरता हुआ कभी वासुकी को, कभी बाबूराव को देख रहा था।
एक तो वह बुरी तरह से टूटा फूटा हुआ था। उसके आंख नाक कान सभी जगह से खून रिस रहा था। उस पर अब तक गर्म दूध और मिर्च की जलन उसकी त्वचा पर बाकी थी, और यह दोनों आदमी यहां कौन बनेगा करोड़पति खेल रहे थे..।”
“साला पुलिस थाना है, या नौटंकी का स्टेज.. ?”
दीपक के इतना कहते ही वासुकी ने उसे घूर कर देखा और वापस बाबूराव की तरफ देखने लगा।
” हां तो बाबूराव मैं क्या कह रहा था..?”
“हुजूर हमको केबीसी में खेलने भेज रहे थे आप..।”
“नहीं नहीं उसके ठीक पहले..?”
“उसके पहले पनीर टिक्का.. !”
“हां, तो पनीर टिक्का के लिए जरूरी होता है, तंदूर और सींक।
तो ऐसा करो यहां जो पास में शंभू हलवाई है ना उसके यहां से तंदूर और सींक दोनों ले आओ..।
“हुज़ूर पनीर भी तो लाना पड़ेगा ?”
” नहीं बाबूराव मैं पनीर टिक्का नहीं आँखों का टिक्का बनाऊंगा… आज तक साला कोई हरामखोर पैदा नहीं हुआ जो मुझे यूँ घूर सके..। और जिस ने यूँ घूरने की हिम्मत की उसकी आंख का तो टिक्का ही बनेगा, अब।”
अपनी बात ज़ोर से बोलते हुए वासुकी अचानक खड़ा हुआ और उसने दीपक की गर्दन पकड़ कर उसका सर टेबल पर तेज़ी से मार कर झुका दिया..
दीपक कलप उठा.. -” अरे मैंने कुछ नहीं किया ?”
उसके चेहरे को ऊपर उठा कर वासुकी ने उसे देखा और सवाल पूछ लिया..
“आधी रात के वक्त उस घर में सत्यनारायण कथा करवाने गए हुए थे ?”
वासुकी की गहरी शराबी आंखे दीपक को लगातार घूर रही थी, उन आँखों से झूठ कह पाना मुश्किल था..
दीपक हड़बड़ा गया..
“वो.. हम.. किसी काम से..
“किस काम से गए थे ? जल्दी बोलो.. !”
“वो.. वो.. !”
वासुकी ने आंखे छोटी कर उसे देखा और टेबल पर पड़ी पेन उठा कर उसकी निब दीपक के माथे पर ज़ोर से चुभा दी.. वो चीख उठा..
“अरे कितना अत्याचार करोगे… सालों एक बार चंद्रभान यहाँ आ गया ना तो तुम लोगो का बैंड बजा देगा.. !”
“अच्छा तुम्हारा चंद्रभान ठाकुर बैंड पार्टी चलाता है क्या?”
एक बार फिर वासुकी ने पेन की निब उसके गाल में चुभा दी..
“जब तक इधर उधर की बतोलेबाजी कर के तुम मेरा टाइम वेस्ट करोगे, मैं ऐसे ही अपना टाइम पास करूँगा !”
और अब वासुकी ने दीपक का हाथ खींच कर पकड़ा और निब उस पर लगा कर उसे अपनी तरफ खींचने ही वाला था की त्वचा के फटने के डर से दीपक तेज़ी से चीख़ उठा…
“हम बहुत पहले से भावना को जानते थे… कल दोपहर उसे देखा और नीयत ख़राब हो गयी.. गलती हो गयी.. माफ़ कर दीजिये.. !
उसकी बात सुन वासुकी की आँखों में खून उतर आया..
“कमीने, तुम लोग सुधरते काहे नहीं हो बे ? कब अक्ल आएगी की नीयत खरब करने की चीज़ नहीं है, नीयत नेकनामी की चीज़ है…।
तुम जैसों के कारण सारी मर्द जात से औरतों का भरोसा उठ जाएगा। औरतों का अकेले घर से बाहर निकलना बंद करवा दोगे तुम जैसे राक्षस।
तुम्हारी नियत ऐसे कैसे खराब हो जाती है? इतना सा धैर्य नहीं है। इतना सा संयम नहीं है, तो तुम पुरुष ही नहीं हो ।
क्योंकि पुरुष का दूसरा नाम संयम और धैर्य ही होता है…
वासुकी बोलते बोलते दीपक की गर्दन पर अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा था और अब दीपक की साँस उखड़ने को थी कि बाबूराव चीख पड़ा..
“छोड़ दीजिये हुज़ूर मर जायेगा साला ! इसके घर द्वार में और कोई बचा भी नहीं जो इसके लिए रोये.. !”
बाबूराव की बात पर वासुकी ने बाबूराव की तरफ सवालिया नजरों से देखा और बाबूराव ने हां में गर्दन हिला दी।
“हां साहब इसका छोटा भाई कुछ सालों पहले कॉलेज में मर गया था मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा था हुजूर डॉक्टरी कर रहा था…
किसी छात्र नेता के चक्कर में मारा गया !”
वासुकी को अचानक अखंड और उसका केस याद आ गया…. उसने ध्यान से दीपक की तरफ देखा और उसे पंकज धीरेन्द्र अखंड सभी याद आ गए और याद आ गया वो केस जिसमे जूझ कर उसने अखंड को निर्दोष साबित करवाया था..
लेकिन इतना करने के बाद भी वो उस निर्दोष लड़के के चेहरे की हंसी वापस नहीं ला पाया था…।
वो अभी ध्यान से दीपक को देख ही रहा था कि बाहर से कुछ शोरगुल सुनाई देने लगा..
वो बाहर झांक पाता कि बाहर से एक हवलदार अंदर चला आया..
और उससे तेज़ रफ़्तार से एक लड़की अंदर चली आयी.. उसे देखते ही वासुकी और बाबूराव एक दूसरे की तरफ देखने लगे..
ये लड़की वही नेहा थी, जो अपनी पत्रकारिता की इंटर्नशिप करने यहाँ इस जगह आयी थी और घर ढूंढती हुई वासुकी के पास मदद मांगने आयी थी..
“हाश… आप मिले तो सही.. !”
उसने वासुकी को देख कर कहा… और बाबूराव की तरफ देख मुस्कुरा उठी..
“नमस्ते भैया जी.. कैसे हैं आप ?”
“जी मैडम जी ठीक है.. आप कैसी है.. !”
“मैं मस्त.. !”
वो मुस्कुरा कर आंखे नचाते हुए उसे देख रही थी..
“अब अगर युवक युवती परिचय सम्मलेन समाप्त हो गया हो तो बाबूराव मैडम को बता दो की ये पुलिस थाना है.. कोई तफरीह की जगह नहीं है !
“बाबूराव भैया.. मैं भी यहाँ तफरीह करने नहीं आयी.. ।
मैं कुछ दिन पहले आयी थी ना..।
बस एक दिक़्क़त हो गयी, उसी सिलसिले में वापस आना पड़ा।
वरना किस घर की शरीफ लड़की पुलिस थाने के चक्कर लगाती है ? भले ही थानेदार कितना भी हैंडसम है!”
आखिरी लाइन होंठो ही होंठो में नेहा बुदबुदा गयी..
“क्या परेशानी है आपको ?”
“मुझे.. वो क्या कहते हैं.. अरे वो होता है ना… अरे बाबूभैया वो शब्द है ना जो बोलते हैं… अरे देखो अब तक ज़बान पे था, अब गले में सरक गया, बाहर ही नहीं आ रहा.. वो क्या कहते हैं ?”
“क्या कहते हैं मैडम ?” बाबूराव ने पूछा..
“वो गाना है ना तुमको पिया दिल दिया उसकी दूसरी लाइन में जो शब्द आता है… अरे… क्या बोलते हैं..
“नैना ?” बाबूराव ने पूछा और वासुकी उसे घूरने लगा.. और नेहा ने अपने माथे पर हाथ मार लिया
“रुकिए मैं गाना ही सुना देती हूँ…
तुम को पिया दिल किया कितने नाज़ से
नैना लड़ गए भोले, भाले कैसे दगाबाज़ से…
लागी नजरिया तोरी जादू भरी हो,
मांगी बहारें हमने,बिजली गिरी
हाय जादू भरी
बिजली गिरी, हाय जादू भरी
दिल के सोए अरमान जागे तेरी ही आवाज़ से हो….
नेहा का गाना सुन वासुकी अपनी सीट पर अपने माथे पर हाथ रखे बैठ गया और बाबूराव मगन होकर सुनने लगा..
गाना ख़त्म कर नेहा उछल पड़ी..
“बिजली… बिजली शब्द याद कर रही थी मैं.. उफ़ क्या बताऊँ बाबू भैया… जब शब्द गले में अटका पड़ा हो और ज़बान तक ना आ पाए तो कैसी उलझन होती है उफ़… अब जाकर चैन मिला !”
“वो तो ठीक है, लेकिन ये बिजली शब्द याद क्यों कर रही थी आप ?”
दीपक ने जैसे ही सवाल किया, वासुकी ने खींच कर एक थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया..
“कोई दूसरा आ गया उसका ये मतलब नहीं कि तेरा गुनाह माफ़ हो गया है….
मैं तो तेरे पुराने गुनाहो का हिसाब किताब लगा रहा था… और ये याद रखना जिस दिन तेरा कर्मकांड उजागर हुआ ना तेरी कपालक्रिया मेरे ही हाथो होगी.. ।
साले ज़िंदा रहे में तेरे मुख में अग्नि रख कर तुझे मुखाग्नि दूंगा… और आईने के सामने खड़ा कर तुझे दिखाते हुए तेरी कपालक्रिया कर दूंगा..
इस मामले में मैं मसान में भटकने वाला अवधूत हूँ… इन सब कामो में महारत हासिल है मुझे.. !”
एक ज़ोर का थप्पड़ वासुकी ने दीपक को लगाया की दीपक उस कमरे के दरवाज़े पर जाकर गिरा…
बाबूराव को उसने इशारा किया और वो दीपक को उठा कर बाहर लें गया..
“बोलिये आपकी क्या समस्या है ?”
“”सर जिस घर में आपने भेजा था ना, वहाँ बिजली ही नहीं रहती.. नहीं रह पाऊँगी सर वहाँ !”
“मैडम ये कस्बा हैं.. यहाँ आपको ऐसे ही सब मिलेगा.. !”
“सर बाकी चीज़े मैं एडजस्ट कर लूँगी लेकिन बिना इलेक्ट्रिसिटी के रहना इम्पॉसिबल है.. !”
“यहाँ हर जगह ऐसा ही है.. आपको एडजस्ट करना होगा या फिर आप अपना वापसी का टिकट कटा लीजिये.. !”
वासुकी नेहा को समझा रहा था की बाबूराव बाहर से भीतर चला आया..
“साहब ये आपका बिजली का बिल भर दिया था, उसकी रिसीट है ये…. वैसे हुज़ूर पुलिस कॉलोनी में रहने का ये भी एक फायदा है कि यहाँ बिजली नहीं जाती.. है ना ?”
बाबूराव ने मुस्कुरा कर कहा और वासुकी और नेहा एक दूसरे को देखने लगे….
“अब तो यही तय हुआ बाबू भैया कि मैं पुलिस कॉलोनी में ही रहूंगी… पत्रकार हूँ अगर पुलिस की नेकनामी के किस्से लिखने बैठ गयी ना तो प्रतिलिपि के आड़े तिरछे लेखकों को भी पीछे छोड़ जाउंगी.. समझा दीजिये जरा अपने साहब को.. !”
वासुकी ने बाबूराव को देखा और फिर नेहा की तरफ घूम गया..
“बाबूराव मैडम को एडमिन में बात कर के पुलिस कॉलोनी में एक घर दिलवा दो.. !”
“ओह्ह थैंक यू सो मच..!”
“लेकिन आप एम्प्लोयी नहीं हैं इसलिए थोड़ा कुछ प्रबंध करना पड़ेगा.. अभी से खुश ना हो आप.. जब घर मिल जाये तब सोचियेगा..
“फिर तब तक कहाँ जाऊं ?”
“अपने भाई के घर !”
वासुकी ने चपलता से जवाब दिया…
“पर मेरा तो कोई भाई नहीं.. मैं इकलौती हूँ !”
“ठीक है पापा की परी जी, फ़िलहाल आप जाइये और अपना वर्तमान का पता ठिकान बताती जाइये.. घर मिलते ही तुरंत आपको इन्फॉर्म कर दिया जायेगा..
“थैंक यू… !” झूमती हुई सी वो बाहर निकल गयी.. वो जा रही थी कि सीढ़ियां चढ़ कर अंदर आते भावना और राजेंद्र से उसका सामना हुआ और दोनों एक दूसरे को देखते देखते अलग अलग दिशाओँ में आगे बढ़ गए..
क्रमशः
aparna….

आए दिल खुश कर दिया dr साहिबा, वासुकी का वो कूद कर जीप से बाहर निकलना , वो दीपक को टॉर्चर करना । आहहा मजा ही आ गया ।
क्या ज्ञान दिया है , पुरुष का दूसरा नाम ही धीरज और सइयम है। पेन की नॉब से हाथ की त्वचा की चीरना अह्ह्ह्ह। पनीर के नही आंखो के टिक्के बनाने है , ओर और वो जापद रसीद कर मारना , मैं न धीरे धीरे लग रहा है शैतान होती जा रही जो वासुकी का टॉर्चर करना इतना पसंद आ रहा है मुझे। पर गलती मेरी नही है , दीपु ने काम ही ऐसे किए है, अब वासुकी को भी याद आ रहा है , की निर्दोष साबित करने के वावजूत us मासूम चेहरे पर खुशी नही ला पाया था ।
नेहा, अरे वाह ! क्या गाना गया है ,और अब तो वासुकी की पड़ोसन वन ने का प्रबंध किया जा रहा है क्या ??
आज न सुकून वाला मजा करा दिया dr sahiba 😍 🫡❤️😘😘😘😘